लाल बहादुर शास्त्री के बाद जब इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनी तो उन्होंने एक साल बाद 1967 में सुशीला नैय्यर को हटा कर तीन बच्चे पैदा कर चुके हर पुरुष की नसबंदी करवाने के पक्षधर श्रीपति चंद्रशेखर को भारत का स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री बना दिया. 1966 में फाइनली नई दिल्ली ने पॉपुलेशन काउंसिल, आईपीपीएफ, फोर्ड फाउंडेशन और वर्ल्ड बैंक द्वारा रिकमेंड की जा रही पॉपुलेशन पॉलिसीज़ को स्वीकार कर लिया था. इनमें नसबंदी कराने वाले हर व्यक्ति और महिला को पैसे दिए जाने का सुझाव दिया गया था. हर आईयूडी इंसर्शन के लिए 11 रुपए, हर पुरुष नसबंदी के लिए 30 रुपए और महिला नसबंदी के लिए 40 रुपए, जिसे बाद में बढ़ा के 90 रुपए कर दिया गया. और इसके बाद देश में नसबंदी के आंकड़ो में बेहताशा वृद्धि हुई.
जैसे अकेले बिहार में उस साल लगभग 1 लाख लोग नसबंदी करने आगे आए, तो अगले साल ये आंकड़ा 2 लाख पहुंच गया था. जिसमें से अधिक लोगों ने स्टेरलाइज़ेशन का रास्ता चुना क्योंकि उसके लिए अधिक पैसे मिलते थे. बिहार में साल 66-67 में पड़ा अकाल भी इतनी संख्या में नसबंदी कराने का मुख्य कारण था. समाजवाद के कारण भयंकर गरीबी थी. आप कल्पना कीजिए लोग 30-30 रुपए के लिए नसबंदी करवा रहे थे. इसलिए मैं मानता हूं कि समाजवाद को इस देश से समाप्त कर देना चाहिए.
ऐसा ही हाल मध्य प्रदेश का था. पहले साल 133,000 और अगले साल 67-68 में 230,000 नसबंदी हुई. कारण था बीते तीन साल से राज्य में सूखा पड़ना. ऐसी ही स्थिति उत्तर प्रदेश और उड़ीसा की भी थी. कुछ ऐसे भी राज्य थे जहां सूखा नहीं पड़ा था तो नसबंदी इम्पोज़ करने के लिए सरकार ने मनमानी वाला रुख अपनाया और केरल और मैसूर में तीन से अधिक बच्चों वाले सरकारी कर्मचारियों को मैटरनिटी लीव देनी बंद कर दी गई.
महाराष्ट्र एक कदम और आगे था. इन्होंने सुझाव दिया कि जिन परिवारों में तीन या तीन से ज़्यादा बच्चे हैं उन्हें मेडिकल ट्रीटमेंट्स और मैटरनिटी बेनिफ़िट्स ना दिए जाए. महाराष्ट्र सरकार 1976 में नसबंदी को अनिवार्य करने के लिए बिल लेकर आई जिसका नाम बदल कर महाराष्ट्र फ़ैमिली बिल कर दिया और जुलाई 1976 में ये बिल पास भी करवा दिया गया.
रूलिंग इलीट कैसे एक कुर्सी के लिए, एक नेमप्लेट के लिए अपने बच्चो को फॉरेन में सेट करने के लिए, कैसे अपनी आत्मा का सौदा करता है इसका उदाहरण हेल्थ एंड फ़ैमिली प्लानिंग मिसनाइटर श्रीपति चंद्रशेखर थे. 1943 में लिखे अपने एक लेख में वे इंडिया को औवरपोपुलेटिड कहकर हाई पॉपुलेशन ग्रोथ पर ही सवाल खड़ा कर रहे थे. फिर वे पीएचडी करने अमेरिका चले गए. उसी दौरान उन्हें सीआईए के फॉरेनर ऑफिस ऑफ स्ट्रैटिजिक सर्विसिज़ में काम मिल गया और वहीं से उनका हृदय परिवर्तन हो गया.
अब उन्हें भारत में ओवरपोप्यूलेशन दिखने लगी, अब वे बर्थ कंट्रोल की बाते करने लगे. अब वही चंद्रशेखर इतने पैसिमिस्ट हो गए कि सन 60 में जो आबादी 50 करोड़ के करीब थी जिसका 70 के दशक में 60 करोड़ होने का अनुमान था, चंद्रशेखर घबराने लगे. उन्हें भारत की अनाज पैदा करने की क्षमता पर संदेह होने लगा.
1976 में इमरजेंसी के दौरान चंद्रशेखर ने पॉपुलेशन एंड लॉ नाम से किताब लिखी जिसमें उन्होंने जबरन बर्थ कंट्रोल को डिफेंड ही नहीं किया बल्कि उसे लीगल बनाने के लिए एक विस्तृत प्लान तक सुझाया.
भारत में श्रीपति जैसे ही एक और डेमोग्राफर थे आशीष बोस. इन्हें भारत का जाना-माना डेमोग्राफर कहा जा सकता था. इन्होंने भारत में चल रही ओवर पॉपुलेशन की डिबेट में नार्थ और साउथ डेमोग्राफिक डिवाइड का तड़का लगा दिया. उनके अनुसार देश में बढ़ती जनसंख्या के लिए उत्तर भारत के राज्य दक्षिण भारत के राज्यों से ज़्यादा रेस्पोंसिबल है. यानी नार्थ वाले जनसंख्या वृद्धि के लिए ज़्यादा दोषी है.
आपने हिंदी पट्टी के लिए एक शब्द यूज़ होता हुआ सुना होगा बिमारू राज्य. यह आशीष बॉस का ही खोजा हुआ है. यह शब्द इन्होंने 1985 में राजीव गांधी को पालिसी ब्रीफिंग देते समय बोला था. इन्होंने बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, और उत्तर प्रदेश इन चारों राज्यों के लिए बिमारू नाम रखा था. आशीष बोस के लिए ये रिग्रेसिव नार्थ और प्रगतिशील साउथ के बीच सीधी लड़ाई था. फिर इमरजेंसी में किस प्रकार नसबंदी की गई यह आप सब जानते ही है. आशीष बोस के कारण अब ओवरपोप्यूलेशन की डिबेट में एक एंगल और जुड़ गया कि साउथ इंडिया ने फ़ैमिली प्लानिंग को अच्छे ढंग से इम्प्लीमेंट किया है. नार्थ इंडिया ने नहीं किया है और उनकी जनसंख्या बेहताशा बढ़ रही है.
नार्थ साउथ वाला मुद्दा इसके बाद देश में हर पॉपुलेशन पर होने वाली डिबेट का हिस्सा बन गया. ये पॉपुलेशन बॉम्ब का मिथ, डेमोग्राफिक ट्रांजीशन, भारत में पॉपुलेशन कंट्रोल की हिस्ट्री ये सब मैं आपको क्यों बता रहा हूं? क्योंकि भारत में फिर एक बार ये मुद्दे चर्चाओं में हैं. और अगले डेढ़ 2 साल ये चर्चाओं में बने रहेंगे.
2026 में भारत में जनगणना शुरू होने वाली है. साथ ही डेलिमिटेशन भी होना है. जिसके चलते भारत के दक्षिणी राज्यों से विरोध के स्वर उठने शुरू हो गए हैं.
14 फ़रवरी, 2024 को तमिलनाडु असेंबली में डेलिमिटेशन और डेलिमिटेशन के कारण होने वाले सीटों के बंटवारें के ख़िलाफ़ एक रेजोल्यूशन पारित किया गया. आपको याद होगा सितंबर 2023 में महिला आरक्षण बिल पास हुआ था. और इस बिल को लागू करने के लिए डेलिमिटेशन का होना ज़रूरी है. अब इस प्रोविज़न से डीएमके वाले परेशान हो गए. तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री एम के स्टालिन का कहना था कि “दक्षिण के राज्यों ने केंद्र सरकार की दो बच्चों की पॉलिसी पर अधिक अमल किया है जिससे डेलिमिटेशन के दौरान इन राज्यों को हानि उठानी पड़ सकती है.
डेलिमिटेशन को पोलिटिकल कांस्पीरेसी कहते हुए उन्होंने आगे कहा कि ‘हमें जनसंख्या के आधार पर दक्षिण भारत के सांसदों की संख्या घटाने की इस तरह की पोलिटिकल कांस्पीरेसी को हराना है.’
महिला आरक्षण बिल पर सदन में बहस के दौरान स्टालिन की बहन और डीएमके की सांसद कनिमोझी करुणानिधि ने अपने भाई स्टालिन को कोट करते हुए कहा कि विमेन रिजर्वेशन बिल को डेलिमिटेशन से क्यों जोड़ा जा रहा है? उन्होंने आगे कहा कि साउथ के लोगों के मन में डेलिमिटेशन से डर है कि उनकी आवाज़ दबा दी जाएगी.
ऐसे ही डीएमके के राज्यसभा सांसद इनवीएन सोमू ने डेलिमिटेशन का विरोध करते हुए सदन में बात दोहराई कि सदन में सीटों के बंटवारें में पारदरर्शिता नहीं है.
सीपीआई एम के पोलित ब्यूरो मेंबर और केरल के पूर्व शिक्षा मंत्री एमए बेबी ने महिला आरक्षण बिल पर इंडिया टुडे के साथ बातचीत करते हुए कहा कि डेलिमिटेशन गलत तरीके से दक्षिण भारत पर थोपा जा रहा है. केंद्र सरकार संघिय ढ़ाचे को खराब कर रही है.
डेलिमिटेशन का विरोध करने में दक्षिण से आने वाले कई नेता जैसे कांग्रेस एमपी कार्ति चिदंबरम, शशि थरूर आदि के अलावा पूर्व कैबिनेट सेक्रेटरी केएम चंद्रशेखर, सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस केएम जोसेफ़, रामचंद्र गुहा, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के मीडिया एडवाइज़र संजय बारू, रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव राव और यहां तक कि पूर्व में एनडीए सरकार में चीफ रहे इकोनॉमिक एडवाइज़र अरविंद सुब्रमण्यम भी शामिल हैं.
स्टालिन से लेकर अरविंद सुब्रमण्यम तक का डेलिमिटेशन और इससे होने वाले सीटों के बंटवारे को लेकर इन सभी का क्या तर्क है. वो बीमारू राज्य की बात करने वाला आशीष बोस याद है आपको? बिलकुल वही विचार इन सभी का है कि साउथ के राज्यों ने फ़ैमिली प्लानिंग को ढंग से इम्प्लीमेंट किया और पॉपुलेशन ग्रोथ को कंट्रोल में कर लिया. जबकि नार्थ इंडियन स्टेट्स ने फ़ैमिली प्लानिंग की नीतियों को ढंग से लागू नहीं किया इसलिए इनकी जनसंख्या में बेहद वृद्धि हो रही है. और अब डेलिमिटेशन होगा तो जनसंख्या के प्रोपोर्शन में ही सीटें अलॉट होंगी तो स्वाभाविक है कि साउथ की सीटें घटेंगी. या नार्थ की तुलना में कम बढ़ेंगी क्योंकि नार्थ की जनसंख्या ज़्यादा है. हालांकि यहां यह जानना भी ज़रूरी है कि डीएमके चीफ करुणानिधि के ख़ुद के छह बच्चे थे.
इसके अलावा एक और तर्क आजकल चल रहा है कि साउथ को फाइनेंसियल रिसोर्सेज कम मिलते है और नार्थ को ज़्यादा मिलते है. 1 फ़रवरी, 2024 को जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण अंतरिम बजट पेश कर रही थी तब उनका विरोध करते हुए कर्नाटक से कांग्रेस के सांसद डीके सुरेश ने दक्षिण भारत को एक अलग देश बनाने की मांग रखी थी.
अब आप सोच रहे होंगे ये डेलिमिटेशन है क्या जिसके चक्कर में इतना बवाल हो रहा है? भारत के संविधान के आर्टिकल 246 और सेन्सस एक्ट 1948 के अनुसार हर 10 साल में जनसंख्या का सर्वे होना चाहिए. इसी संविधान के आर्टिकल 82 और आर्टिकल 170 के अनुसार इस सर्वे के आधार पर लोकसभा और राज्यो की विधानसभाओं में सीटों की संख्या होना चाहिए ताकि सभी को समान प्रतिनिधित्व मिले. यानी जनसंख्या के हिसाब से विधानसभाओं और लोकसभा में सीटों की संख्या के निर्धारण को सरल शब्दों में डेलिमिटेशन कहा जा सकता है.
स्वतंत्र भारत में तीन डेलिमिटेशन हुए है, 1952, 1963 और 1971 में. फिर इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में जो ४२वां संविधान संशोधन किया उसके अंतर्गत बिना चर्चा किए ही डेलिमिटेशन की प्रक्रिया पर अगले 25 सालों के लिए एम्बार्गो यानी रोक लगा दी. सरकार ने घोषणा कर दी कि संसद, राज्यों की विधानसभाओं में 1971 की जनगणना की संख्या के हिसाब से ही सीटें होंगी.
1976 में लगाई गई इस रोक के बारे में एक और जानकारी यह है कि डेलिमिटेशन पर रोक लगाने का प्रस्ताव डीएमके के सांसद मुरासोली मारन लेकर आए थे जो बाद में यूनियन मिनिस्टर भी रहे. रोक लगाने के लिए बाकायदा अपनी पार्टी की तरफ से प्राइवेट मेंबर बिल लाए थे. इनका भी यही तर्क था, साउथ ने पॉपुलेशन कंट्रोल कर ली है, नार्थ ने नहीं की है.
कुछ राजनीतिक जानकारों का कहना है कि रोक लगाने के पीछे जनसंख्या नियंत्रण तो एक कारण था ही पर एक और महत्वपूर्ण कारण था और वो था नार्थ इंडिया और वेस्ट इंडिया के राज्यों को सबक सिखाना. क्योंकि ये रीजन इमरजेंसी से पहले और इमरजेंसी के दौरान एंटी इंदिरा और एंटी कांग्रेस विरोध के एपिसेंटर थे. साथ ही इंदिरा के नार्थ इंडियन स्टेट्स से गुस्से का एक और कारण था. 1962 में चीन से हारने के बाद लोहिया ने एंटी कांग्रेस धड़ा यूनाइट करने की सोची. फिर 1967 के चुनावो में इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री तो बन गई पर कांग्रेस का आज़ादी के बाद पहली बार 9 राज्यों से सूपड़ा साफ़ हो गया. इन दो कारणों से भी डेलिमिटेशन पर रोक लगाई गई थी.
खैर जब 2001 में इस रोक किं डेडलाइन आई तो देश में अटल बिहारी वाजपई के नेतृत्व में एनडीए की 24 दलों की गठबंधन की सरकार थी. उन्होंने इस रोक को 84वां अमेंडमेंट पास करके 25 सालों के लिए और आगे टाल दिया. उसकी डेडलाइन अब 2026 में आ रही है. इसीलिए सभी हल्ला मचा रहे हैं.
हमें नोर्थ राज्यों के पॉपुलेशन कंट्रोल नहीं करने और साउथ के राज्यों की पॉपुलेशन कंट्रोल करने की सच्चाई को एक बार जान लेना चाहिए.
भारत में पहला सेन्सस 1871 में हुआ था. तभी से लेकर अब तक का सभी राज्यों का डेटा देख लेते हैं दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा. इसमें एक ही दिक्कत है 1871 का डेटा पूरी तरह रिलाएबल नहीं है क्योंकि उस सर्वे में कई राज्यों के पुराने सर्वे के डेटा को ही ले लिया गया था. जैसे पंजाब के लिए 1855, 1868 का डेटा, हैदराबाद के लिए 1867 का डेटा, अवध के लिए 1861 का डेटा, नार्थ वेस्टर्न फ्रंटियर प्प्रोविंस के लिए 1853 1865 का डेटा, मद्रास के लिए 1851-52 का डेटा. यानी 1871-72 में जो सेन्सस हुआ था वो सिंक्रोनस नहीं था कि एक ही समय पर सभी राज्यों में सर्वे किया गया हो, कई राज्यों के लिए 40 साल पुराने डेटा को ही उठा लिया गया था.
कायदे से भारत में पहला ढंग का सिंक्रोनस सर्वे 1881 में हुआ था इसीलिए हम स्टार्टिंग पॉइंट 1881 के सेन्सस से लेंगे तो पिक्चर साफ़ दिखाई देगी. हम भारत के इन डेढ़ सौ सालों के सर्वे को समझने के लिए इसे चार ज्योग्राफिकल रीजन्स में बांट लेते है.
ईस्ट:- बंगाल , उड़ीसा
वेस्ट:- गुजरात प्लस महाराष्ट्र
नार्थ :- नार्थ और सेंट्रल इंडिया के सभी हिंदी भाषी राज्य
साउथ :- 2014 तक जितने भी साउथ इंडियन स्टेटस थे वे सभी, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश.
इसमें हमने जम्मू कश्मीर और पंजाब को नहीं जोड़ा है और उनके ना जोड़े जाने से हमारी सेन्सस स्टडी में कोई समस्या नहीं आएगी. अच्छा 1881 से 1947 तक का भारत 1947 से 2011 के भारत से अलग है क्योंकि 1947 में जब विभाजन हुआ था तब कुछ राज्यों की सीमा और जनसंख्या बदली थी जैसे बंगाल की. हमने डेटा को उसी हिसाब से एडजस्ट कर लिया है ताकि पार्टीशन का कोई अंतर इस डेटा पर ना आए.
सबसे पहले लेते है 1881 का सेन्सस डेटा.
ईस्ट इंडिया की आबादी थी 2,58,66,760 थी जो कुल पॉपुलेशन का 12.08% थी.
वेस्ट इंडिया की आबादी थी 2,87,74,086 थी जो पॉपुलेशन का 13.44% थी.
साउथ इंडिया की आबादी थी 4,61,68,966 जो कुल पॉपुलेशन का 21.56% थी.
और नार्थ इंडिया की आबादी थी 10,67,46,332 जिसकी पॉपुलेशन में हिस्सेदारी 49.85% थी.
यह हमारा स्टार्टिंग पॉइंट था. आइए एक बार एंडिंग पॉइंट जो हमारे पास 2011 का सेन्सस है उसमें इन रीजन्स का डेटा देख लेते है. 2011 के सेन्सस के हिसाब से
ईस्ट इंडिया की आबादी थीं 16,44,55,909 यानी पॉपुलेशन का 13.58%.
वेस्ट इंडिया की आबादी थी 17,28,14,025 यानी पॉपुलेशन का 14.27%.
साउथ इंडिया की आबादी थी 25,12,29,165 जो पॉपुलेशन का 20.75% थी.
और नार्थ इंडिया की आबादी थी 56,27,10,668 जो पॉपुलेशन का 46.47% थी.
इन चारों रीजन्स में नार्थ इंडिया की आबादी लगभग 3% के क़रीब घटी है. और वेस्टर्न इंडिया की आबादी बढ़ी है. आइए इसे और तोड़ते है ताकि और बेहतर समझ आ सके. हम 1881 और 2011 के बीच हुए अलग-अलग साल के सेन्सस में पॉपुलेशन का प्रतिशत देखते हैं.
1881
नार्थ:-49.85%, साउथ:- 21.56%, ईस्ट:- 12.08%, वेस्ट:- 13.44%
1901
नार्थ:- 46.16%, साउथ:- 24.23 %, ईस्ट:- 12.81%, वेस्ट:- 11.95%
1921
नार्थ:- 44.14%, साउथ:- 25.56%, ईस्ट:- 13.24%, वेस्ट:- 12.34%
1951
नार्थ:- 42.61%, साउथ:- 26.08 %, ईस्ट:-13.56%, वेस्ट:-13.37%
1971
नार्थ:- 41.90%, साउथ:-24.69%, ईस्ट:-14.76%, वेस्ट:-14.07%
2011
नार्थ:- 46.47%, साउथ:- 20.75%, ईस्ट:- 13.58%, वेस्ट;-14.27%
इन सेन्सस डेटा में एक चीज़ साफ़ क्या दिख रही है? कि नार्थ इंडिया की आबादी लगातार 10 सालों तक 1881 वाली आबादी के मुक़ाबले घट रही है. जैसे 1881 में कुल आबादी की 49.85% जनसंख्या नार्थ इंडिया में थी जो 1901 में घट के 46.16%, 1921 में और घट के 44.14%, फिर 1951 में और घट के 42.61% और 1971 में घट कर 41.90% रह गई थी.
इसी दौरान साउथ की आबादी लगातार ९० सालों तक १८८१ के मुकाबले बढ़ी है जैसे 1881 में देश की कुल आबादी का 21.56% साउथ में था. जो 1901 में 3 % की ग्रोथ के साथ 24.23%, 1921 में बढ़ के 25.56%, 1951 में बढ़ के 26.08%, 1971 में 24.69% और 2011 में 20.75% हो गई. यानी साउथ अपनी आबादी के मामले में 1951 में पीक पर था. जो 1881 वाले शेयर से 5% अधिक था. और 1971 के बाद से और 2011 में ये अपनी 1881 वाले शेयर से 0.81 प्रतिशत ही कम हैं.
सबसे अधिक आबादी पिछले डेढ़ सौ सालों में किसी रीजन की बढ़ी है तो वो ईस्टर्न इंडिया की बढ़ी है. और उससे भी ज़्यादा वेस्टर्न इंडिया की बढ़ी है. ईस्टर्न इंडिया में जनसंख्या का प्रतिशत 1881 में 12.08% था, जो 1971 में पीक पर था. और बाद में 14.76% पर पहुंच गया. और 2011 में भी अपनी 1881 वाली आबादी से 52% ज़्यादा ही था. ऐसे ही वेस्टर्न इंडिया 1881 में 13.44% था, ये 2011 में अपने पीक पे पहुंचकक 14.27% हो गया. जो कि 1881 वाली आबादी की तुलना में 0.83% अधिक है.
इस डेढ़ सौ साल के सेन्सस डेटा में एक और इंट्रेस्टिंग चीज़ क्या है? नार्थ को छोड़कर बाक़ी सारे रीजन्स अपने 1881 वाले शेयर से आगे जाकर पीक कर चुके है और नार्थ पीक करना तो छोड़ो पिछले डेढ़ सौ सालों में 1881 वाले शेयर पर भी नहीं पहुंचा है. अभी भी लास्ट सेन्सस में 3 प्रतिशत ही कम था. यानी जब उत्तर भारत भी अपने 1881 वाले शेयर 49% से बाकी रीजन्स की तरह 5-6% और बढ़ जाए और देश की आबादी का कुल 54-55% हो जाए. उसके बाद ग्रोथ घटनी शुरू ना हो तब आप नार्थ को पॉपुलेशन एक्सप्लोजन के लिए गाली दो तो समझ भी आए. पर अभी क्यों दे रहे हो?
जब साउथ पीक ग्रोथ के फेज़ में था उस समय नार्थ अपनी ग्रोथ के सबसे निचले फेज़ में था. और उसी समय डिलिमिटेशन पर रोक लगा था.
एक बार हम रीजनल पॉपुलेशन ग्रोथ और नेशनल पॉपुलेशन ग्रोथ का डेटा देखते हैं. 1881-1951 तक भारत की नेशनल पॉपुलेशन ग्रोथ 1881 के डेटा के हिसाब से 68.61% बढ़ी है. वहीं ईस्ट ने 89.33%, वेस्ट ने 67.74%, साउथ ने 104%, और नार्थ ने इन चारों में सबसे कम, मात्र 44.12% की ग्रोथ की है. यानी शुरू के 70 सालों में ग्रोथ के मामले में फर्स्ट रैंक साउथ इंडिया, सेकंड रैंक ईस्टर्न इंडिया, थर्ड रैंक वेस्टर्न इंडिया और फोर्थ रैंक नॉर्दर्न इंडिया की रही है.
अगर हम 1881 से 1971 तक का डेटा देखें तो पूरे भारत की 155.97% एवरेज़ ग्रोथ हुई, ईस्टर्न इंडिया की 212.69%, वेस्टर्न इंडिया की 167.98%, साउथ इंडिया की 193.16% और नार्थ इंडिया की 115.16 परसेंट. यानी ग्रोथ के मामले में शुरू के 10 साल के डेटा के हिसाब से फर्स्ट रैंक ईस्टर्न इंडिया, सेकंड रैंक साउथ इंडिया, थर्ड रैंक वेस्टर्न इंडिया की रही.
आपको डेमोग्राफ़िक ट्रांजीशन याद है? फेज़ वन हाई बर्थ रेट, हाई मोर्टेलिटी रेट, लो पॉपुलेशन ग्रोथ. फेज़ टू हाई बर्थ रेट लो मोर्टेलिटी रेट पॉपुलेशन ग्रोथ. फेज़ थ्री लो बर्थ रेट लो मोर्टेलिटी रेट डिक्लाइनिंग टीएफआर. भारत के चारों रीजन्स में ये डेमोग्राफ़िक ट्रांजीशन का फेज़ अलग-अलग समय में आया. जैसे सबसे पहले साउथ फेज़ टू में पहुंचा फिर ईस्ट, फिर वेस्ट और 1961 में जब साउथ फेज़ थ्री में जा रहा था तब नार्थ डेमोग्राफिक ट्रांजीशन के फेज़ टू में एंटर कर रहा था. ईस्टर्न इंडिया थर्ड स्टेज में 1971 में पहुंचा और वेस्टर्न इंडिया 2011 में सेकंड फेज़ के पीक पर था.
आप इसे ऐसे समझिए कि एक मां के चार बेटे थे. एक बेटा जो पहलवान था, वो खाना खाने के लिए आने में थोड़ा लेट हो गया. इतने में बाकी तीनों बेटे खाना खाने बैठ गए. और जब तक चौथा बेटा आया तब तक उसके तीनों भाई फटाफट अपना खाना खा चुके थे. जब वो खाने बैठा तो बाकी के तीन कहने लगे कि कितना खाएगा. सभी ने खा लिया इसका पेट ही नहीं भर रहा पेटू कहीं का, अभी तक खा ही रहा है. आवाज सुनके पड़ोसी आ गए तो उनको भी लगा की बाकी तीन तो हाथ धोके खड़े है चौथा खा ही रहा है. तो उनके भी मन में यही परसेप्शन बना की ये वाला लड़का ज़्यादा खाता है. ये चौथा लड़का इस कहानी में नार्थ इंडिया है. जो उसके साथ हो रहा था वही डेलिमिटेशन और पॉपुलेशन डिबेट में नार्थ इंडिया के साथ हो रहा है.
एक और डेटा आपके सामने रखता हूं. जिससे देश के बुद्धिजीवियों में जो विचार घर कर गया कि नार्थ इंडिया में जनसंख्या पर नियंत्रण नहीं रखा गया और दक्षिण भारत ने बड़ी आसानी से नियंत्रण पा लिया, इसकी सच्चाई सामने आ सके.
भारत का पहला राज्य कौनसा था जिसने अपनी आबादी 1881 के आकड़ो के हिसाब से दोगुनी कर ली थी? केरल था, 1931 में इसकी आबादी डबल हो चुकी थी. फिर 1931 वाली डबल आबादी 1971 तक फिर डबल हो गई. यानी 1971 में इस भाई का भरपेट भोजन हो चुका था. अगर देखा जाए तो केरल की आबादी 2011 तक 1881 की तुलना में 7 गुना बढ़ी है.
मद्रास का भी देख लेते है. आजादी के बाद इसे आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में विभाजित किया गया था. 1881 में मद्रास की आबादी 3 करोड़ थी. जो 1951 में बढ़कर 5 करोड़ यानी 60 परसेंट बढ़ चुकी थी.
मैसूर आजादी के बाद कर्नाटक का केंद्र बन गया. 1881 में इसकी आबादी 42 लाख थी जो 1951 में बढ़ के 80 परसेंट ग्रोथ के साथ 73 लाख पहुंच चुकी थी.
ऐसे ही हैदराबाद जो बाद में आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में विभाजित हुआ इसकी आबादी 1881 में 1 करोड़ से कम थी जो 1951 आते-आते 66 परसेंट बढ़कर 1.63 करोड़ हो गई थी. तमिलनाडु की आबादी 1901 में 1.92 करोड़ थी जो 2011 में 275 परसेंट की ग्रोथ के साथ 7.2 करोड़ हो गई थी.
अगर हम पूरे दक्षिण भारत की पॉपुलेशन ग्रोथ देखे तो 1881 के मुकाबले में आबादी साढ़े पांच गुना बढ़ी है.
वही हिंदी बेल्ट, उत्तर भारत के उत्तर प्रदेश राज्य की 1881 से 1921 के बीच मुश्किल से ग्रोथ हुई. 1881 में आबादी 4 करोड़ 50 लाख थी, जो 1921 में 40 वर्षों में 4 करोड़ 66 लाख हुई. यानी 40 साल में मात्र 16 लाख की ग्रोथ. वहीं इन्हीं 40 सालों में साउथ की आबादी 1881 में 4 करोड़ 62 लाख से बढ़कर 6 करोड़ 42 लाख 28 हज़ार 692 हो गई यानी 2 करोड़ की वृद्धि.
साउथ की तुलना में नार्थ की धीमी ग्रोथ का फेज़ 1961 तक चला. 1971 के सेन्सस में उत्तर प्रदेश की आबादी भारत की कुल आबादी की सिर्फ 15.30% थी. 1881 में ये 20.94% थी.
इस समय में ईस्ट इंडिया की ग्रोथ 535.78%, वेस्टर्न इंडिया की 500.59% रही. साथ ही साउथ की कुल पॉपुलेशन ग्रोथ 444% रही.
नार्थ की मात्र 427% यानी चारों में सबसे कम ग्रोथ रही. वास्तव में कुल एवरेज से भी 39% कम और साउथ से 17% कम. ईस्ट इंडिया से पूरे 108.78% कम और वेस्टर्न इंडिया से 73.59% कम.
यानी पिछले डेढ़ सौ सालों के सेन्सस डेटा से साफ़ साबित हो रहा है कि उत्तर भारत को जनसंख्या के मामले में जिस तरह विलेन बनाया जा रहा था वह पूरी तरह गलत है.
यह सब प्रोपेगंडा का कमाल है. उत्तर भारत के बारे में परसेप्शन बनाया हुआ है कि यहां गंवार लोग रहते है, गोबर ही उठाते है, गंदगी में रहते है, इकोनॉमी में कुछ कंट्रीब्यूट नहीं करते, देश पर पैरासाइट्स की तरह हैं, डिप्लोमेसी, फॉरेन पालिसी इकॉनमी जीडीपी ग्रोथ आदि कुछ नहीं समझते हैं. यह झूठ फैलाने में वामपंथियों का सबसे बड़ा हाथ रहा है. दुनिया भर में वामपंथियों ने पिछले 100 सालों में 10 करोड़ लोगों की हत्या की. लेकिन वर्तमान समय में सबसे ज़्यादा नॉन वायलेंस के पोस्टर बॉय बनकर हिंसा का विरोध करते हुए वही दिखते हैं.
शुरू में ही मैंने पॉपुलेशन बॉम्ब वाली पॉल अहलरीच और बढ़ती जनसंख्या से खाने के लाले पड़ जाएंगे वाली बात को मैंने इसलिए झूठा साबित कर दिया था कि पॉपुलेशन ग्रोथ को आप लोग नेगेटिव टर्म्स में ना देखें. पहले की तरह अकाल नहीं पड़ते, हम ना ही पहले की तरह लाखों लोग अनाज की कमी से मर रहे हैं. बढ़ती हुई आबादी रिसोर्स भी तो हो सकती है. इसलिए दक्षिण भारत की आबादी बढ़ी, ईस्ट इंडिया की आबादी बढ़ी, वेस्टर्न इंडिया की आबादी बढ़ी तो इसमें शर्मिंदा होने की ज़रूरत नहीं है.
1960 के दशक में जब अनाज का संकट हुआ था जब लाल बहादुर शास्त्री के आह्वाहन पर देश में लोगों ने एक समय का भोजन करना बंद करके एक टाइम का व्रत रखना शुरू कर दिया था. उस खाद्य संकट के लिए भी जवाहर लाल नेहरू की समाजवादी नीतिया दोषी थी. उस समय सोशलिस्ट नीतियों के चक्कर में प्लानिंग कमीशन ने पूरे 1950 के दशक में एग्रीकल्चर सेक्टर को छोड़कर सारा ज़ोर इंडस्ट्रिलाइज़ेशन पर लगा दिया था. जो सफेद हाथी से अधिक कुछ साबित नहीं हुए.
दक्षिण भारत ने नेता एक और हाय तौबा मचा रहे हैं कि डेलिमिटेशन से दक्षिण के राज्यों की लोकसभा की सीटें घट जाएंगी. देश के ग्रह मंत्री ने आश्वासन दिया है कि सीटें किसी की नहीं घटेंगी. फिर भी डर पैदा किया जा रहा है. एक बार को मान भी लिया की घट ही जाएंगी सीटें तो क्या आफ़त आ जाएगी? 1971 के डेलिमिटेशन में उत्तर प्रदेश की सीटें भी तो घटी थीं, उसी डेलिमिटेशन में केरल और कर्नाटक की 2-2 लोकसभा सीटे बढ़ी थी. तब किसी ने हाय तौबा नहीं मचाई थी.
1951 में एक लोकसभा सीट लगभग 7.38 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करती थी. 1971 में 10.58 लाख लोग, 2014 में 23.11 लाख, 2019 में 25 लाख और 2024 में 26.55 लोगों का प्रतिनिधित्व करती है.
2011 के सेन्सस में राजस्थान की आबादी थी 6,85,48,437 और लोकसभा सीटें 25 थी. वहीं कर्नाटक की 2011 के सेन्सस में आबादी थी 6,10,95,297 और लोकसभा सीटें 28 थी. यानी जनसंख्या राजस्थान से कम पर लोकसभा की सीटे राजस्थान से तीन ज़्यादा.
ऐसे ही 2011 में मध्य प्रदेश की आबादी 7,26,26,809 और लोकसभा सीटें 29 थीं. वहीं दूसरी तरफ तमिलनाडु की आबादी थी 7,21,47,030 पर सीटें 39 थीं. यानी आबादी मध्यप्रदेश से कम पर लोकसभा सीटें मध्यप्रदेश से 10 ज़्यादा.
मैंबर ऑफ पार्लियामेंट लोकल एरिया डिवेलपमैंट स्कीम (एमपीलैड) नाम की एक बॉडी होती है. यह सांसदों को विकास कार्य के लिए फंड्स एलोकेट करती है और ये फंड जनसंख्या के आधार पर नहीं दिए जाते. यानी एक लोकसभा जिसमे 12 लाख लोग है उन्हें जितना फंड मिलेगा उतना ही उस लोकसभा को मिलेगा जिसकी आबादी 27 लाख है. यह बड़ी लोकसभाओं में विकास कार्यों को प्रभावित करता है.
1951 में देश में कुल एससी आबादी 14.39% थी और एसटी आबादी 5.36% थी. 2011 में एससी आबादी बढ़कर 16.6% हो गई और एसटी आबादी भी बढ़कर 8.6% हो गई. 1951 में दोनों का कुल प्रतिशत 19.75% था जो 2011 में बढ़कर 25.2% हो गया. जब डेलिमिटेशन होगा तो इन लोगों की भी तो रिजर्व्ड सीटें बढ़ेंगी.
तो ये डिलिमिटेशन का विरोध कर रहे स्टालिन, राहुल गांधी आदि तमाम जितने भी नेता है क्या ये दलितों का हक नहीं मारना चाह रहे हैं? महिला आरक्षण बिल भी डेलिमिटेशन के बाद पूर्णतः लागू हो सकेगा. क्या ये देश की आधी आबादी मातृ शक्ति के संसद में बढ़ते रिप्रज़ेंशन का विरोध नहीं कर रहे?
इन सीटों का घटना बढ़ना तय कैसे होगा? बाबा साहेब के बनाए हुए संविधान से न? वास्तव में सेन्सस और डेलिमिटेशन दोनों ही बाबा साहेब के ही तो संविधान में है. फिर डेलिमिटेशन का विरोध करने वालो को बाबा साहेब द्वारा बनाए संविधान का विरोधी क्यों ना कहा जाए?
तथाकथित संविधान के रक्षक ही संविधान सम्मत डेलिमिटेशन का विरोध कर रहे हैं और तथाकथित संविधान का हत्यारा, संविधान बदलने का आरोप सुनने वाली सरकार संविधान सम्मत डेलिमिटेशन लागू करना चाह रही है. तथाकथित संविधान रक्षक पहले तय कर लें कि संविधान की रक्षा करनी है या विरोध करना है.
