उत्तर प्रदेश, भारत का सबसे अधिक जनसंख्या वाला राज्य होने के साथ लंबे समय से जातिगत राजनीति का प्रमुख केंद्र रहा है. यहां की सियासत दशकों से ‘कास्ट मैनेजमेंट’ के समीकरणों पर निर्भर रही है. मंडल राजनीति के दौर से लेकर दलित-पिछड़ा एकता के नारों तक, हर चुनाव जातीय आंकड़ों की गणना और जातिगत नाराज़गी के प्रबंधन के खेल की तरह होता रहा. लेकिन 2017 में सपा सरकार के जाने के बाद जब योगी आदित्यनाथ प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने जाति की रेखाओं से ऊपर उठकर शासन देने का एक नया मॉडल प्रस्तुत किया, ऐसा मॉडल जिसमें जनता की जाति नहीं, जनता की जरूरतें प्राथमिकता बनी.
योगी आदित्यनाथ ने सत्ता में आते ही अपने काम करने के ढंग से स्पष्ट कर दिया कि उनकी राजनीति केवल बहुमत की राजनीति नहीं, बल्कि ‘सर्वसमावेशी सुशासन’ की राजनीति होगी. उन्होंने प्रशासन, कानून व्यवस्था और विकास को जातिगत दबावों से मुक्त करने की दिशा में कई ठोस कदम उठाए. उसका परिणाम यह हुआ कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में पहली बार यह धारणा बनी कि किसी एक जाति के वर्चस्व के बिना भी स्थिर और प्रभावी शासन दिया जा सकता है. योगी सरकार ने पुलिस, प्रशासनिक अधिकारियों और योजनाओं की लाभार्थी संरचना में जातिगत संतुलन बनाए रखा. सपा या बसपा की सरकारों में जिस तरह से विशेष जातियों को तरजीह देने के आरोप लगते थे, योगी सरकार ने उन छवियों को ध्वस्त कर दिया. चाहे डीएम-एसपी स्तर की नियुक्तियां हों या ग्राम विकास योजनाओं का क्रियान्वयन, योगी आदित्यनाथ ने इन्हें योग्यता और पारदर्शिता आधारित रखा, जिससे ‘जाति आधारित हकदारी’ की धारणा कमज़ोर होने लगी. एक महत्वपूर्ण पहल जो योगी सरकार के सामाजिक दृष्टिकोण को रेखांकित करती है, वह यह है कि दलितों को मंदिरों में पुजारी नियुक्त किया गया. वर्ष 2021 में गोरखपुर, कुशीनगर, गोंडा, बस्ती और सिद्धार्थनगर जिलों के 500 से अधिक मंदिरों में दलितों को पुजारी बनने का प्रशिक्षण दिया गया और उन्हें मंदिरों में नियुक्त भी किया गया जो कि परंपरागत रूप से उच्च जातियों के लिए आरक्षित माने जाते थे. यह केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत थी जिसमें पूजा जैसे धार्मिक कार्यों में सामाजिक समावेश सुनिश्चित किया गया. योगी सरकार ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि अब सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराएं भी लोकतांत्रिक और समावेशी होंगी.
पूर्ववर्ती सरकारों की जातिगत वफादारी पर आधारित सत्ता संरचना ने क्षेत्रीय असमानता को गहरा किया था. समाजवादी पार्टी की सरकारों में ‘यादव बेल्ट’ माने जाने वाले इटावा, मैनपुरी, फिरोज़ाबाद, और कन्नौज जैसे जिलों को योजनाओं, बजट और प्रशासनिक नियुक्तियों में विशेष प्राथमिकता दी जाती थी. 2012-17 के दौरान इटावा को प्रति व्यक्ति योजना व्यय में औसतन 4,000 रुपए अधिक बजट आवंटन मिला, जबकि पूर्वांचल के जिलों में यह आंकड़ा 1,200 से 1,500 रुपए के बीच रहा. इसी तरह मायावती सरकार के दौरान भी दलित प्रतीकों और मूर्तियों पर करोड़ों रुपए खर्च किए गए. 2007-12 के बीच लखनऊ और नोएडा में अंबेडकर पार्क, कांशीराम स्मारक आदि पर 6,000 करोड़ से अधिक खर्च किया गया, लेकिन बुंदेलखंड और पूर्वांचल जैसे क्षेत्रों की पानी, सड़क और स्वास्थ्य सेवाओं जैसी मूलभूत जरूरतों पर अपेक्षाकृत बहुत कम निवेश हुआ. विकास की गति जातीय और क्षेत्रीय आधार पर नियंत्रित होने के कारण पश्चिमी और कुछ केंद्रीय जिलों में निवेश पर अधिक ध्यान दिया गया जबकि सोनभद्र, चंदौली, बलिया, श्रावस्ती, सिद्धार्थनगर, संत कबीर नगर जैसे पूर्वी जिलों को योजनाओं में बार-बार नज़रअंदाज किया गया. नीति आयोग द्वारा 2018 में जारी किए गए ‘एस्पिरेशन डिस्ट्रिक इंडेक्स’ में उत्तर प्रदेश के आठ सबसे पिछड़े जिले पूर्वांचल और बुंदेलखंड से थे, जो पूर्ववर्ती सरकारों की प्राथमिकता सूची में कभी शामिल नहीं रहे. योगी सरकार ने इस असंतुलन को सुधारते हुए ‘एक जनपद एक उत्पाद, हर गांव तक सड़क, हर घर नल योजना, फ्लाईओवर और हवाई अड्डा निर्माण’ जैसे विकास कार्यक्रमों का क्षेत्रीय संतुलन के आधार पर पुनर्विन्यास किया. 2017 से 2024 तक बुंदेलखंड में 30,000 करोड़ से अधिक की परियोजनाएं पूरी की गईं, जिनमें बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे और डिफेंस कॉरिडोर शामिल हैं.
सरकार में जातिगत प्रतिनिधित्व को भी योगी सरकार ने संतुलन के साथ साधा. सभी को साथ रखने की नीति अपनाते हुए योगी सरकार में हर समुदाय के नेताओं को मंत्रिमंडल और संगठन में स्थान दिया गया. 2022 के विधानसभा चुनाव के बाद बनी दूसरी योगी सरकार में 52 मंत्रियों में से लगभग 60% ओबीसी, दलित और पिछड़े समुदायों से हैं. एक और महत्वपूर्ण बिंदु यह रहा कि योगी सरकार के दौरान जातिगत टकराव के मामले लगभग समाप्त हो गए हैं. वर्ष 2017 से 2023 के बीच राज्य में साम्प्रदायिक या जातीय दंगों की घटनाओं में 80% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई. एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, जहां 2016 में दंगे संबंधित अपराध 6,100 के करीब थे वहीं 2022 तक यह घटकर लगभग 1,000 रह गए. मुजफ्फरनगर, मैनपुरी, आगरा, प्रतापगढ़ जैसे क्षेत्रों में जहां पहले अक्सर जातीय हिंसा की खबरें आती थीं, वहां प्रशासनिक सख्ती और निष्पक्षता ने हालात को नियंत्रित किया. कानून व्यवस्था को जाति-निरपेक्ष बनाया गया, अपराधी चाहे किसी जाति का हो, उस पर कार्रवाई सुनिश्चित की गई. इससे समाज में न्याय के प्रति विश्वास बढ़ा और जातिगत ध्रुवीकरण की राजनीति को करारा झटका लगा.
शिक्षा और रोज़गार के क्षेत्र में भी जाति आधारित भेदभाव को कम करने की दिशा में योगी सरकार ने प्रयास किए. मिशन रोज़गार, स्किल डेवलपमेंट, और युवा हब जैसी योजनाओं में मेरिट और पारदर्शिता को प्राथमिकता दी गई, जिससे हर जाति के युवाओं को समान अवसर मिले. पिछड़े और दलित वर्ग के छात्रों को छात्रवृत्ति, कोचिंग और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए विशेष सुविधाएं दी गईं. इसके अतिरिक्त प्रदेश में ग्रामीण स्तर पर चल रही प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला योजना, स्वच्छ भारत मिशन आदि के लाभार्थियों की सामाजिक प्रोफाइल यह दर्शाती है कि लाभ वितरण में जाति या धर्म कोई बाधा नहीं रहा. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बड़ी संख्या में दलित, अति पिछड़े और अल्पसंख्यक लाभार्थियों को योजनाओं से जोड़ा गया. योगी आदित्यनाथ की शैली में प्रशासनिक निर्णयों में धर्म या जाति का कोई सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं होता. यह एक नया राजनीतिक संदेश भी है कि सत्ता का उद्देश्य समाज के सभी वर्गों तक समान अवसर पहुंचाना है, न कि केवल अपनी जाति या समर्थक वर्ग को उपकृत करना.
सामाजिक समरसता की दिशा में ‘हर घर तिरंगा’, ‘एक जनपद–एक उत्पाद’, ‘कांवड़ यात्रा में सरकारी सहयोग’ और बुंदेलखंड और पूर्वांचल जैसे उपेक्षित क्षेत्रों में विकास को प्राथमिकता देने जैसे कदमों ने भी यह संदेश दिया कि सरकार जाति या क्षेत्र नहीं, ज़रूरत और न्याय को प्राथमिकता दे रही है. हालांकि उत्तर प्रदेश को जाति की राजनीति से पूरी तरह मुक्त कर पाना एक दीर्घकालीन प्रक्रिया है लेकिन योगी सरकार ने जातिगत राजनीति की निर्णायकता को कमज़ोर ज़रूर किया है. आज उत्तर प्रदेश में यह धारणा मज़बूत हुई है कि ‘सशक्त नेतृत्व’ और ‘दृढ़ प्रशासन’ जाति से ऊपर होता है. उत्तर प्रदेश जैसे जातिगत राजनीति के गढ़ में यह बदलाव केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि वैचारिक और सांस्कृतिक परिवर्तन का संकेत है. यह परिवर्तन ‘सामाजिक न्याय’ की परंपरागत परिभाषा को एक नया आकार देता है जिसमें जाति की पहचान से ऊपर उठकर व्यक्ति को उसकी ज़रूरतों, क्षमताओं और नागरिकता के आधार पर देखा जाता है. जातिवाद के महासागर में संतुलन की नैया को सुरक्षित पार ले जाने वाला नेतृत्व उत्तर प्रदेश को पुराने गुंडाराज और लचर व्यवस्था से बाहर निकालने में काफी हद सफल रहा है.
