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भारत के लिए क्यों ख़तरनाक हैं सोनम वांगचुक

‘अगर चीन भारत पर आक्रमण करता है तो हम उसे रेकेंगे नहीं बल्कि चीन को भारत के भीतर घुसने का रास्ता दिखाएंगे’, यह कहना था जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल करने वाले सोनम वांगचुक का. सोनम बीते एक महीने से भारत की मीडिया में चर्चा में हैं. कॉकरोच जनता पार्टी के नीट पेपर लीक पर कथित विरोध प्रदर्शन में सोनम को हथियार की तरह मंच पर सजाया गया था. प्रदर्शन में शामिल लोगों का कहना है कि यह नीट के छात्रों के लिए न्याय मांग रहे हैं जबकि पूरे प्रदर्शन स्थल पर छात्र ही कहीं नहीं दिख रहे. दूसरा सवाल यहां यह है कि नीट पेपर लीक होने के बाद पेपर वापस सफलतापूर्व करा लिया गया और उसका रिज़ल्ट भी आ गया. जहां नीट पेपर देने वाले छात्र अपनी पढ़ाई में लगे थे, तो प्रदर्शन कर कौन रहा है. जवाब आसान है, मंच पर आकर भारत और हिंदू धर्म विरोधे नारे लगाने वालों के बारे में जानकर सभी भ्रम दूर हो जाएंगे.

थ्री इडियट फिल्म देखने बाद आज तक हम इसी भ्रम में थे कि सोनम ही फूंगसुक वांग्डू है जबकि वास्तव में न तो सोनम वांगचुक फूंगसुक वांग्डू है और न ही जंतर-मंतर पर थ्री इडियट पिक्चर चल रही है. वे सभी भारत विरोधी विचार और धर्म विरोधी नारे इस प्रदर्शन की हकीक़त है.  

सोनम वांगचुक के भारत विरोधी काम पढ़ते-पढ़ते आप चौंक जाएंगे. कैसे एक व्यक्ति अपने ही देश के विरोध में इस स्तर तक नीचे आ सकता है. नैरेटिव यही काम करता है. सही को गलत और गलत को सही बना देता है.

पिछले कुछ दिनों से दिल्ली के जंतर-मंतर पर नीट पेपर लीक के विरोध के नाम पर जो धरना-प्रदर्शन और भूख हड़ताल किया जा रहा था उसने अनजाने में ही सही, सोनम वांगचुक के पर्यावरणविद और इनोवेटर की छवि पर से धीरे धीरे पर्दा उठाना शुरू कर दिया है. छात्रों के जायज गुस्से की आड़ लेकर खुद को चमकाने की उनकी कोशिश उल्टा उन पर ही भारी पड़ने लगी है. अब देश के सजग आलोचकों और आम लोगों ने वांगचुक के पुराने बयानों और उनका पूरा इतिहास खंगालना शुरू कर दिया है. नतीजा यह है कि आज उनका वह कड़वा सच जनता के सामने आ रहा है, जहां वे खुलेआम सनातन संस्कृति और हिंदुत्व के विरोध में गलत बयानबाजी करते हुए देखे जा सकते हैं. मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम और माता सीता जैसी पूजनीय आस्थाओं पर की गई उनकी अमर्यादित टिप्पणियों से लेकर उनके भारत-विरोधी बयानों तक, हर एक परत अब धीरे-धीरे उतरने लगी है. इतना ही नहीं लद्दाख के प्रसिद्ध ‘आइस स्तूप’ और पारंपरिक मिट्टी के घरों के निर्माण को लेकर वांगचुक का झूठ भी समाने आ गया. इन आविश्कारों की मूल नींव चेवांग नोरफेल जैसे अनुभवी स्थानीय इंजीनियरों और वहां की पारंपरिक कला की देन थी, जिसे बाद में सोनम वांगचुक ने व्यापक पीआर के ज़रिए खुद के नाम से प्रचारित किया. आइस स्तूप का निर्माण चेवांग नोरफेल ने 1980 में ही कर दिया था. 2012 तक उन्होंनें ऐसे 12 ग्लेशियर बना दिए थे. जिन आइस स्तूप को बनाकर सोनम खुद को साइंटिस्ट बताते हैं उसी आइस स्तूप के ख़िलाफ़ खुद लद्दाख के लोग आवाज़ उठा रहे हैं. कथित तौर पर सोनम इन का फायदा उन्हीं लोगों को लेने दे रहे हैं जो उनके एनजीओ के साथ जुड़े है. साथ ही, अतीत में सीमाओं की संवेदनशीलता और सांस्कृतिक विषयों पर उनके द्वारा दिए गए कुछ बयान भी देश में विभाजन पैदा करने की उनकी कोशिशों का सबूत है.

इतना ही नहीं वांगचुक का एक और झूठ है कि इन्होंने पहाड़ों में लाईफाई (LIFI) का आविश्कार कर दिया. असलियत यह है कि नव वायरलैस टैक्नोलॉजी नाम की कंपनी के सीटीओ हार्दिक सोनी ने खुद बताया कि कंपनी ने खुद इनको संपर्क किया था. और लाईफाई लगवाया था. सवाल है कि इसमें सोनम का इंन्वेशन कहां है.

सोनम वांगचुक का खेल इतने पर ही खत्म नहीं होता. सोनम लद्दाख में एक इंस्टीट्यूशन चलाते थे, नाम था हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ एल्टरनेटिव्स, लद्दाख (HIAL). यह बिना किसी यूजीसी या एआईसीटी की लीगल मान्यता के चल रहा था और धड़ल्ले से फर्जी डिग्रीयां बांट रहा था. लद्दाख के जीन बच्चों ने यहां पढ़ाई की उन्हें बाद में बता चला कि उनकी डिग्री बस एक कागज का टुकड़ा भर है. नेरेटिव की ताक़त ऐसी ही काम करती है, जो व्यक्ति वास्तव में विलेन होता है लोगों के बीच हीरो बना दिया जाता है. जो इंसान अपने ही लद्दाख के छात्रों को ठग चुका है वह आज जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल कर राजनीतिक रोटी सेक रहा है.     

इन दिनों सोनम वांगचुक और धर्मेंद्र प्रधान की एक फोटो भी सोशल मीडिया पर खूब देखी जा रही है जिसमें सोनम प्रधान को सहयोग के लिए धन्यावद देते दिख रहे हैं. वास्तव में वांगचुक का मोदी और भाजपा विरोध उनकी फंडिग रोके जाने के बाद अपने उग्र रूप में आया है. सरकारी दास्तावेज़ों के अनुसार केंद्र सरकार ने कुछ समय पहले सोनम के एनजीओ को लद्दाख में करोड़ो की सरकारी ज़मीन और भारी भरकम फंड दिया था. लेकिन सोनम ने ज़मीन अलॉटमेंट की शर्तों को पूरा नहीं किया और न ही इंस्टीट्यूशन ही दो साल में पूरा बन पाया. यहां तक की बकाया राशि भी 37 करोड़ कर कर दी. जिसके बाद लद्दाख प्रशासन ने सोनम का एग्रीमेंट रद्ध कर दिया, जिसके बाद से सोनम मोदी विरोध और सरकार विरोध का प्रमुख चेहरा बन गए. जब तक सत्ता से मलाई मिल रही थी तब तक सब सही था, जहां सरकार ने शिकंजा कसा तो विरोध बाहर आ गया.        

वांगचुक के इस आंदोलन के अंतरराष्ट्रीय जुड़ाव और उनके पुराने दौरों को लेकर भी सवाल खड़ा होना लाज़मी है. विशेष रूप से उनकी पुरानी पाकिस्तान यात्रा भी उनकी प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करती हैं. इसके साथ ही, लद्दाख जैसी सामरिक रूप से संवेदनशील सीमा पर चीन के संदर्भ में दिए गए उनके कुछ पुराने बयानों को देखते हुए उनके भारत हितैषी होने का भ्रम दूर हो जाता है. सीमावर्ती क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास जैसे संवेदनशील मुद्दों पर इस तरह के आंदोलन कहीं न कहीं रणनीतिक हितों को प्रभावित कर सकते हैं. इसके अलावा, जंतर-मंतर के मंच पर अरुंधति रॉय, मेधा पाटकर और विपक्ष के प्रमुख नेताओं जैसे अरविंद केजरीवाल, डिंपल यादव, सुप्रिया सूले, पवन खेड़ा की सक्रियता और समर्थन ने इस पूरे घटनाक्रम को एक विशुद्ध राजनीतिक रंग दे दिया है. परीक्षा सुधार जैसे विशुद्ध छात्र-हितैषी मुद्दे का वैचारिक और राजनीतिक इस्तेमाल करके व्यवस्था के ख़िलाफ़ एक बड़ा सियासी मोर्चा खड़ा करने की कोशिश की जा रही है, जिससे इस आंदोलन के वास्तविक उद्देश्यों को लेकर आम जनता के मन में गहरे सवाल खड़े हो गए हैं. इस पूरे आंदोलन का नीट के छात्रों के हितों से कोई लेना देना नहीं है.

जंतर-मंतर पर चल रहे तथाकथित छात्र आंदोलन में लेफ्ट पार्टी के नेताओं का बड़ा हाथ है. वही इस आंदोलन की रूपरेखा भी लिख रहे हैं ऐसा कहना भी गलत नहीं होगा. एम. ए बेबी और वृंदा कारत जैसे वामपंथी नेता सामने आकर पूरे आंदोलन को लीड करते दिखाई दे रहे हैं. यही वामपंथी नेता बीते दिनों चीन के दूतावास में एक कार्यक्रम में दिखाई दिए. उस कार्यक्रम में मौजूद एसएफआई के दो नेता सीजेपी के प्रदर्शन की सभी तैयारियों का काम संभाल रहे है. द पल्स इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार इन युवा नेताओं को दूतावास से कथित तौर पर कुछ तौहफे भी दिए गए थे. यहां सवाल यह खड़ा होता कि इस आंदोलन के बीच में चीन दूतावास में लेफ्ट के नेताओं को क्यों बुलाया गया और दोनों के बीच क्या, किस तरह के समझोते हुए हैं.

सिर्फ इसलिए कि सोनम वांगचुक भूख हड़ताल कर रहें हैं इसका मतलब यह नहीं है कि वे देश के प्रति वफादार हैं. उनका भूखे रहना उनकी वफादारी का कोई सबूत नहीं है. सोनम की चालाकी को यहां तक की कांग्रेस पार्टी की सरकार के समय ही सामने आ गई थी. 2007 में यूपीए सरकार ने एफसीआरए से आए विदेशी चंदे को लेकर, गैर कानूनी तरीके से 25 एकड़ ज़मीन हथियाने और चीन के साथ देश विरोधी गतिविधियों में साथ रहने पर सोनम को फटकार लगाई थी. लद्दाख पुलिस ने बीते साल सोनम वांगचुक से जुड़े एक पाकिस्तानी इंटैलिजेंस ऑपरेटिव को गिरफ्तार किया था. इसके बावजूद भी यह व्यक्ति भारत खुला घूमता है, पाकिस्तान में कॉन्फ्रेंस करता है और भारत को राष्ट्रवाद पर भाषण देता है.    

सिर्फ इतना ही नहीं चीन की सरकार और सेना के हित के लिए सोनम वांगचुक ने भारत में गोरखा सैनिकों के चीन के साथ मिल जाने के झूठ को भी जमकर फैलाया था. जिससे भारतीय सेना में फूट पड़ सके. और तीन की सेना फूट का फायदा उठा सके. सोनम सिर्फ इस्लाम और इफ्तार के ही दिवाने नहीं है वह पाकिस्तान के भी दिवाने है, इसलिए 2025 में भारत विरोधी ‘डाउन मीडिया ग्रुप’ के कार्यक्रम में शामिल होने पाकिस्तान भी गए थे. इतना ही नहीं जहां भारत के सैनिक पाकिस्तान से लड़ने में अपनी जान लगा देते हैं वहीं सोनम खुले तौर पर पाकिस्तान द्वारा कब्जा किए स्कर्दू-बल्टिस्तान को पाकिस्तानी सरकार द्वारा स्वायत्ता देने की तारीफ करते हैं.  

वांगचुक की हिंदू धर्म को लकेर अज्ञानता और चिढ़ भी हमसे छिपी नहीं है. वांगचुक ने कुछ समय पहले अपने अक बयान में कहा था, ‘राम ने सीता को भरे बाज़ार में बिकने के लिए छोड़ दिया.’         

जंतर-मंतर पर छात्र आंदोलन के नाम पर सजे इस मंच से जो तस्वीरें सामने आ रही हैं, वे कई गंभीर सवाल खड़े करती हैं. प्रदर्शन स्थल पर वास्तविक पीड़ित छात्रों की मौजूदगी से ज्यादा, उन चेहरों की सक्रियता दिख रही है जिन्हें अक्सर व्यवस्था-विरोधी और वैचारिक रूप से विवादित माना जाता रहा है. इस मंच पर अरुंधति रॉय, मेधा पाटकर और एस.क्यू. इलियास, कुनाल कामरा, नंदिता नारायण जैसे वामपंथियों की अग्रिम पंक्ति में मौजूदगी और साथ ही कांग्रेस, आप, सपा जैसे विपक्षी दलों के खुले समर्थन ने इसे एक छात्र आंदोलन के बजाय पूरी तरह राजनीतिक रंग दे दिया है. राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग इसे चुनी हुई केंद्र सरकार को अस्थिर करने और वैचारिक विभाजन पैदा करने की एक सोची-समझी रणनीति के रूप में देख रहा है. समीक्षकों का कहना है कि जब छात्र हितों के नाम पर बने मंच से कथित तौर पर सनातन संस्कृति और धार्मिक आस्थाओं को निशाना बनाया जाने लगे, तो यह साफ हो जाता है कि इस आंदोलन का झुकाव नीट के छात्रों की वास्तविक समस्याओं के समाधान से हटकर, विशुद्ध रूप से एक राजनीतिक अखाड़ा तैयार करने की ओर हो चुका है.

इस पूरे प्रायोजित आंदोलन के आर्थिक पहलुओं को लेकर भी हाल के दिनों में मीडिया और वित्तीय विश्लेषकों के बीच एक नई बहस छिड़ गई है. दरअसल, केंद्र सरकार द्वारा विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के नियमों में किए गए हालिया संशोधनों और एनजीओ की विदेशी फंडिंग पर बढ़ाई गई सख्त डिजिटल निगरानी के बाद से कई सामाजिक संगठनों की कार्यप्रणाली चर्चा में है. सोनम वांगचुक और उनसे जुड़े शैक्षणिक व पर्यावरण प्रोजेक्ट्स जैसे SECMOL जो लंबे समय से विभिन्न अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों और विदेशी अनुदानों से जुड़े रहे हैं, वे भी इस नए पारदर्शी तंत्र के प्रभाव से अछूते नहीं हैं. कई स्वतंत्र विश्लेषकों और मीडिया रिपोर्ट्स में यह अंदेशा जताया जा रहा है कि विदेशी धन के प्रवाह पर कानूनी कड़ाई और खातों की सख्त मॉनिटरिंग के इस दौर में, इस तरह के बड़े सार्वजनिक प्रदर्शनों का सहारा लेकर कहीं न कहीं संभावित जांच या प्रशासनिक कार्रवाई से ध्यान भटकाने और इसे एक राजनीतिक रंग देने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि भविष्य में होने वाली किसी भी कानूनी प्रक्रिया को ‘राजनीतिक बदले की कार्रवाई’ के रूप में पेश किया जा सके.

कुछ समय पहले सोनम के एनजीओ का विदेशों से फंडिग लेने के को लेकर एफसीआऱए रद्ध कर दिया गया था. लेकिन इसके बाद भी सोनम का एनजीओ विदेश से पैसे लेता रहा. सोनम ने स्वीडन से ‘भारतीय संप्रभुता’ पर रिसर्च करने के लिए फंड लिया जिसमें से उन्होंने 6.5 करोड़ रूपए एफसीआरए अकाउंट से अपने निजी अकाउंट में ट्रांसफर कर लिए. उनके एनजीओं एचआईएएल ने कथित तौर पर 1.5 करोड़ रूपए बिना एफसीआरए लाइसेंस के लिए. एचआईएएल के सात बैंक अकाउंट है जिनमें से चार का खुलासा नहीं किया गया. एसईसीएमओएल के 9 अकाउंट हैं जिनमें से 6 का खुलासा नहीं किया गया. वागंचुक के खुद के 9 बैंक अकाउंट हैं जिनमें से 8 के बारे में किसी को नहीं बताया गया. आविश्कार से लकेर एनजीओ तक सोनम वांगचुक पूरी तरह से झूठ और फरेब के ताने-बाने के बीच उलझे हुए है. ऐसे में छात्र हितों की बात ऐर प्रदर्शन भी इसी फरेब की एक और कड़ी है.       

इस आंदोलन के समय और इसके पीछे के राजनीतिक निहितार्थों को लेकर भी एक गंभीर चर्चा का विषय सामने आया है. कुछ राजनीतिक लोग और पत्रकार इस पूरे घटनाक्रम की तुलना देश के राजनीतिक इतिहास के कुछ पुराने आंदोलनों से कर रहे हैं. उदाहरण के तौर पर यह तर्क दिया जा रहा है कि जिस प्रकार सालों पहले अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन की पृष्ठभूमि से एक नई राजनीतिक शक्ति (आम आदमी पार्टी) का उदय हुआ था, ठीक उसी प्रकार वर्तमान में नीट परीक्षा के मुद्दे को आधार बनाकर एक नए राजनीतिक विकल्प या संगठन जैसे ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के लिए जमीन तैयार करने की कोशिश की जा रही है. विश्लेषकों का मानना है कि दिल्ली की सत्ता में काबिज राजनीतिक शक्तियों पर लग रहे प्रशासनिक और राजनीतिक आरोपों के बाद, यह नया प्रयास कहीं न कहीं अपनी खोई हुई सियासी ज़मीन को पुनर्जीवित करने की एक रणनीति हो सकता है. आलोचकों का साफ कहना है कि छात्रों की वास्तविक चिंताओं और उनके गुस्से का इस्तेमाल राजनीतिक दल अपने हितों को साधने और आगामी चुनावों में सत्ता समीकरणों को प्रभावित करने के लिए कर रहे हैं.

साथ ही इस आंदोलन को हवा देने के लिए जिस तरह से कांग्रेस, वामपंथी दल, समाजवादी पार्टी, टीएमसी समेत पूरा का पूरा विपक्ष अचानक एक सुर में लामबंद हो गया है, वह उनकी किसी छात्र-हितैषी सोच को नहीं बल्कि विशुद्ध राजनीतिक स्वार्थ को उजागर करता है. दरअसल, इन तमाम विपक्षी दिग्गजों की नजरें सीधे तौर पर साल 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव और साल 2029 के लोकसभा चुनाव की बिसात पर टिकी हुई हैं. परीक्षा सुधार तो केवल एक बहाना है, असली मकसद युवाओं की भावनाओं और गुस्से को भड़काकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकना है, ताकि 2027 में देश के सबसे बड़े राज्य यूपी में अस्थिरता पैदा की जा सके और उसी के सहारे 2029 के आम चुनाव के लिए केंद्र सरकार के ख़िलाफ़ एक मज़बूत सियासी मोर्चा खड़ा किया जा सके. छात्रों के कंधे पर बंदूक रखकर चलाने वाला यह पूरा एजेंडा विपक्ष की इसी सोची-समझी चुनावी रणनीति और सत्ता हथियाने के स्वार्थ का एक खुला सबूत है.

फिलहाल जंतर-मंतर पर चल रहे इस प्रदर्शन स्थल से जब प्रशासन ने सुरक्षा और स्वास्थ्य कारणों का हवाला देकर प्रदर्शनकारियों को हटाने और अनशन पर बैठे कार्यकर्ताओं को अस्पताल भेजने की कार्रवाई की, तो इसके बाद तथाकथित आंदोलनकारियों ने इस आंदोलन को खींचने के लिए नए पैंतरे आज़माने शुरू कर दिए गए हैं. ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नेतृत्व ने इस पुलिसिया कदम की कड़ी आलोचना करते हुए इसे लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने का प्रयास बताया है. संगठन के प्रमुख अभिजीत दीपके ने खुद अनशन पर बैठने का एलान कर यह संकेत दे दिया है कि वे इस गतिरोध को आसानी से खत्म होने देने के मूड में नहीं हैं.

एक बात तो साफ है कि पर्यावरण, समाजसेवा और छात्र भलाई के आकर्षक नारों के साथ शुरू हुए इस तमाशे की मियाद अब धीरे-धीरे पूरी होती दिख रही है. विदेशी पैसों पर कसता सरकारी शिकंजा हो या फिर आगामी विधानसभा और आम चुनावों को देखकर विपक्ष द्वारा बिछाई जा रही सियासी रोटियां इस पूरे घटनाक्रम के पीछे के वास्तविक राजनीतिक समीकरण अब खुलकर सामने आने लगे हैं. जिससे अब आम जनता के बीच इस आंदोलन के नाटक के प्रति जो असंतोष देखा जा रहा है उससे यह तो स्पष्ट है कि देश की सजग जनता अब केवल बाहरी रंग-रूप पर भरोसा नहीं करने वाली. छात्र आंदोलन के नाम से चलाए जा रहे इस एजेंडे की परतें जैसे-जैसे उतर रही हैं, वैसे-वैसे आम नागरिकों का यह यकीन और पक्का हो गया है कि देश की साख, सुरक्षा और जनता की आस्था को दांव पर लगाकर शुरू की गई कोई भी नौटंकी भारतीय लोकतंत्र में बहुत दिनों तक टिक नहीं सकती.