जुम्मा-जुम्मा विरोध प्रदर्शन

शुक्रवार ही क्यों बनता है प्रदर्शन वाला दिन

20 दिसंबर, 2019 में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के विरोध में हज़ारों प्रदर्शनकारी जुम्मे की नमाज़ के बाद जामा मस्जिद के बाहर जमा हुए. इसके बाद एक कांस्टेबल की कार में आग लगा दी गई और प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर पत्थर फेंकना शुरू कर दिया. भारतीय जनता पार्टी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के पैगंबर मोहम्मद के बारे में दिए गए तथ्यात्मक रूप से सही बयान के विरोध में शुक्रवार को भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में कई जानलेवा विरोध प्रदर्शन हुए.

दिसंबर 2019 में सीएए के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन भी हर शुक्रवार को ही हुआ करते थे और जैसा कि हमने बीते लंबे समय से देखा है, कश्मीर में जुम्मे को होने वाले इसी तरह के विरोध प्रदर्शन दंगों और भारतीय सुरक्षा बलों के साथ झड़पों में तब्दील हो गए.

सवाल यह है कि इस दिन में ऐसी क्या ख़ास बात है? वास्तव यह अर्थशास्त्र से जुड़ा है, धर्म से नहीं. मुझे याद है मेरे गुरु ने मुझे अपने बचपन की एक कहानी सुनाई थी. उनके गांव में, चार दशक से भी अधिक समय पहले, एक मुस्लिम लोहार रहा करता था. वह भूसा काटने वाली मशीन के ब्लेड को तेज किया करता था.

मेरे गुरु, अन्य बच्चों के साथ उनकी दुकान से ब्लेड की धार तेज करा कर लाने का काम करते थे. हालांकि, उन्हें शुक्रवार को उनकी दुकान पर जाने से मना किया गया था, क्योंकि उस दिन लोहार पास के कस्बे में प्रार्थना करने जाता था.

इसलिए उस दिन उसकी दुकान बंद रहती थी. लोहार के इस संगठित धर्म में, लोग सप्ताह के किसी भी दिन, किसी भी समय, 10 मिनट के भीतर एकत्रित हो सकते हैं. लेकिन शुक्रवार को, चूंकि उनके व्यावसाय बंद रहते हैं, इसलिए उन्हें किसी भी प्रकार के वित्तीय नुकसान की कोई संभावना नहीं होती.

उनकी ज़रूरत सिर्फ इतनी रहती है कि सही योजना बनाकर, रणनीति तैयार कर उन्हें अंजाम दिया जाए, साथ ही मीडिया और कार्यकर्ताओं के सामने खुद को सिर्फ सच्चे नागरिक के रूप में पेश किया जाए. फिर, मीडिया और कार्यकर्ता उनका बचाव करने में जुट जाते हैं. पूरा हंगामा खड़ा करने के बाद, यह लोग खुद को पीड़ित के रूप में पेश करने का खेल शुरू कर देते हैं. और आखिर में स्थिति जब नियंत्रण से बाहर हो जाती है तब पुलिस को आगे आना पड़ता है, जैसा कि कई जगहों पर देखा गया है. पुलिस की जांच के दौरान कैमरों में सफेद टोपियां और दाढ़ियां ही दिखाई देती हैं. इसके अलावा, चूंकि यह लोग सप्ताह के पांचवें दिन पूरी तरह से अपने-अपने क्षेत्र में ही उपस्थित रहते हैं. इसलिए, किसी भी प्रकार की जवाबी कार्रवाई में फंसने की संभावना बहुत कम हो जाती है. 

इसीलिए अधिकतर मुस्लिम प्रदर्शनकारी शुक्रवार को प्राथमिकता देते हैं. मैंने कई लोगों को यह कहते सुना है कि एक मुस्लिम अपने धर्म के लिए व्यापार करता है, जबकि एक हिंदू अपने धर्म में भी व्यापार की तलाश करता है. यह सच है, लेकिन इसमें एक अंतर है, एक मुस्लिम का विश्वास उसके व्यवसाय को भी मज़बूत करता है, जबकि एक हिंदू का व्यवसाय उसके धर्म को नष्ट कर देता है. इसका कारण बुद्धि और दूरदर्शिता में अंतर होना है. आखिरकार, दूरदर्शिता ही है जो मनुष्य को जानवरों से अलग करती है.


कौशलेश राय एक कल्चरल कमेंटेटर और द डॉसियर के फाउंडर हैं.