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राहुल गांधी क्यों नहीं चलने देना चाहते सदन?

इस समय भारतीय संसद का मानसून सत्र चल रहा है लेकिन, विपक्षी दलों के लगातार हंगामे, नारेबाजी और बार-बार सदन स्थगित होने से एक बार फिर संसद में विपक्ष के रवैये पर सवाल उठ रहे हैं. संसद की कार्यवाही प्रभावित होने से भारत सरकार की न सिर्फ धनराशि का नुकसान होता है बल्कि बहुत से ज़रूरी विधेयक पास नहीं हो पाते न ही उनपर चर्चा हो पाती है.

संसद के मौजूदा मानसून सत्र 2026 में नीट पेपर लीक और राम मंदिर चंदा चोरी जैसे मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए हैं. सरकार को अंदाजा हो गया था कि राहुल गांधी की अगुवाई वाला विपक्ष सत्र को ढंग से चलने नहीं देगा इसलिए धर्मेंद्र प्रधान का न सिर्फ इस्तीफा हुआ बल्कि संसद में नकल रोकने के लिए एक विशेष कानून भी पास हुआ. इसके अलावा राम मंदिर मामले में भी सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में एसआईटी जांच कर रही है, लेकिन सवाल यह है भारत का विपक्ष क्या कर रहा है और वो आखिर क्या चाहता है?

संसद में शोर-शराबा हो रहा है. हिंदू धर्म को अपमानित करने वाले घटिया नाटक किए जा रहे हैं, जिनमें पप्पू यादव जो खुद एक माफिया हैं वो हिंदू साधू बनने का ढोंग का रहे हैं. इस मामले पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ ने भी कहा है कि कोई भी साधु संत चंदा चोरी मामले में सम्मिलित नहीं है, सिर्फ कर्मचारियों की गिरफ्तारी हुई है.

लेकिन राहुल गांधी और विपक्ष की इन्हीं बचकानी हरकतों की वजह से लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही बार-बार बाधित हुई है. बीजेपी सांसद संबित पात्रा ने आरोप लगाया है कि विपक्ष के विरोध के कारण प्रश्नकाल और शून्यकाल लगातार बाधित हुए हैं. इससे सांसदों को जनता से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दे उठाने का मौका नहीं मिल पाया.

राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दल संसद को मनमाने ढ़ग से चला रहे हैं. वे जब चाहे किसी भी मुद्दे पर बेवजह नारेबाजी करना शुरू कर देते हैं. अपने गलत तथ्य रखना और बिना जवाबदेही के भाग जाना इस समय विपक्ष की सबसे बड़ी खूबी बनी हुई है. मानों भारत की संसद की गरिमा को गिराने का जिम्मा विपक्ष ने अपने कंधो पर लिया हुआ है. विपक्ष की महिला सांसदो, खासकर कांग्रेस की महिला सांसदो को सदन और सदन के बाहर का रवैया बेहद निंदनीय रहा है.

विपक्षी दल भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी से नफ़रत में इस कदर खो चुके हैं कि देश के लोगों के लिए काम करने वाली संसद को भी चलने वहीं दे रहे. विपक्ष बहुत अच्छी तरह से जानता है कि अगर संसद सुचारू रूप से चली तो एक के बाद एक रुके हुए बिल पास होते जाएंगे और जनता के बीच सरकार की छवि और बेहतर होती जाएगी, इसलिए संसद को चलने ही मत दो.

संसद की कार्यवाही न सिर्फ विधेयकों की दृष्टि से बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण है. संसद की कार्यवाही पर होने वाले खर्च को लेकर करीब 2.5 लाख रुपए प्रति मिनट का अनुमान बताया जाता है. यह आंकड़ा 2012 में तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री पवन कुमार बंसल द्वारा बताए गए आंकड़ों पर आधारित है.

इस हिसाब से संसद की कार्यवाही चलाने में करीब 1.5 करोड़ रुपए प्रति घंटे और छह घंटे की बैठक में करीब 9 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है, जब दोनों सदन एक साथ चलते हैं. यह अनुमान 2008 में लोकसभा सचिवालय के एक आकलन से निकाला गया था.

अब सोचिए जिस सदन को चलने लिए भारत की जनता के टैक्स के रुपयों का 1.5 करोड़ खर्च हो रहा हो उसे विपक्ष क्यों नहीं चलने देना चाहता. दरअसल ये कांग्रेस और राहुल गांधी का पुराना आदत है. अगर आपके पास बहुमत नहीं है तो आप किसी भी विधेयक को पास होने से नहीं रोक सकते, लेकिन चर्चा तो कर सकते हैं. राहुल गांधी ऐसा नहीं करते, वो भगवान शंकर की फोटो संसद में लाकर हिंदू आस्था के साथ खिलवाड़ करते हैं, प्रधानमंत्री मोदी पर निजी टिप्पणियां करते हैं और संसद से बायकॉट कर भारत की सदियों पुरानी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करते हैं.

बार-बार होने वाले हंगामे से संसद के कानून बनाने और सरकार की जवाबदेही पर असर डालते हैं. 20 जुलाई से शुरू हुए मौजूदा मानसून सत्र के पहले सप्ताह में लोकसभा केवल 1.6 घंटे चली, जो उसके निर्धारित समय का करीब 5 प्रतिशत था. वहीं, राज्यसभा करीब 1.7 घंटे चली, जो निर्धारित समय का लगभग 6 प्रतिशत था. जबकि केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री किरण रिज़ोजु ने पहले दिन से सभी पार्टियों से निवेदन किया है कि लोकतंत्र में भागीदार बनें न कि सिर्फ नारेबाजी और प्रदर्शन करें. लगातार हंगामे के कारण इस सत्र में प्रश्नकाल और शून्यकाल भी ठीक से नहीं चल पाए हैं.

27 जुलाई को दोनों सदनों की कार्यवाही पूरे दिन के लिए स्थगित कर दी गई। वहीं, 31 जुलाई को लोकसभा में जन्म और मृत्यु पंजीकरण (संशोधन) विधेयक  बिना चर्चा के पारित हुआ। इसके बाद दोनों सदनों की कार्यवाही समय से पहले स्थगित कर दी गई।

किसी भी विधेयक का बिना चर्चा के पास हो जाना लोकतंत्र की हार है, लेकिन सवाल ये भी है कि क्या सदन चलाना सिर्फ सरकार का कार्य है? बिल्कुल नहीं, जब तक विपक्ष अपनी कुंठित मानसिकता और बड़बोलेपन से बाहर नहीं आएगा तब तक सदा चलाने में दिक्कत आएगी.

‘पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च’ की एक रिसर्च अनुसार, संसद की कार्यवाही बाधित होने से सरकार के कामकाज की जांच, कानूनों पर चर्चा और जनता से जुड़े मुद्दों को उठाने का मौका कम हो जाता है. जब संसदीय समय बर्बाद होता है, तो सांसद, मंत्रियों से प्रभावी तरीके से सवाल नहीं पूछ पाते. कई विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो जाते हैं या लंबित रह जाते हैं.

लेकिन ये प्रदर्शन कोई नए नहीं हैं, संसद में विरोध प्रदर्शन और गतिरोध लंबे समय से राजनीति का हिस्सा रहे हैं. राजनीतिक दल अक्सर महत्वपूर्ण मुद्दों को उठाने के लिए सदन में विरोध करते हैं. हालांकि, पूर्व राज्यसभा सभापति एम. वेंकैया नायडू ने 2021 में कहा था कि सदन में व्यवधान को संसदीय अधिकार नहीं माना जा सकता.

राम जेठमलानी स्मृति व्याख्यान में बोलते समय नायडू ने इस बात का जिक्र किया था कि संसद की कार्यवाही में बाधा डालना सदन की अवमानना के बराबर है और इससे संसद अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पाती. उन्होंने कहा कि सांसदों को मिले विशेषाधिकार इसलिए हैं ताकि वे अपने विचार रख सकें और अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याएं उठा सकें.

नायडू के अनुसार, हंगामे से दूसरे सांसदों को अपनी बात रखने का मौका नहीं मिलता, कानून बनाने में देरी होती है और संसद का कामकाज प्रभावित होता है. उन्होंने कहा कि जनता का प्रभावी प्रतिनिधित्व करने के लिए संसद का सुचारू रूप से चलना ज़रूरी है.

नायडू ने राज्यसभा की घटती उत्पादकता पर भी चिंता जताई थी. उन्होंने कहा कि 1978 से 1996 के बीच कई वर्षों में राज्यसभा की उत्पादकता 100 प्रतिशत से अधिक रही थी. लेकिन समय के साथ इसमें गिरावट आई. 2004-14 के दौरान उत्पादकता करीब 78 प्रतिशत रही, जबकि इसके बाद यह घटकर लगभग 65 प्रतिशत रह गई. इसका सीधा-सीधा ये मतलब है कि जब भाजपा विपक्ष में थी तब संसद ज्यादा काम करती थी, आज के दिन कांग्रेसी नेताओं का गतिरोध उसपर असर डाल रहा है.

संसद में हंगामे का मुद्दा केवल काम के घंटों और पैसों के नुकसान तक सीमित नहीं है. ‘पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च’ के अनुसार, लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है और संसद ऐसी जगह है जहां मतभेदों पर चर्चा और सहमति बनाने की कोशिश होनी चाहिए. हर लोकतंत्र में विवादित मुद्दे होते हैं, लेकिन संसद को ऐसे मुद्दों पर चर्चा के लिए पर्याप्त जगह देनी चाहिए.

नायडू ने राजनीतिक दलों और सभी संबंधित पक्षों से आत्ममंथन करने और संसद की गरिमा और विश्वसनीयता बहाल करने की दिशा में काम करने की अपील भी की थी.

लगातार हंगामे के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या संसद सरकार को जवाबदेह बनाने, कानून बनानो और जनता की आवाज़ उठाने की अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी कर पा रही है. किरण रिज़ोजु ने कई बार संसद चलने के लिए राहुल गांधी से खुद संपर्क करने की कोशिश की लेकिन बात नहीं बनी. कभी अरुण जेटली ने कहा था संसद चलान सरकार का काम है लेकिन जब विपक्ष ही नकारा हो तो सरकार के बस में भी ज्यादा कुछ नहीं रह जाता.

आदित्य
आदित्य
आदित्य एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.