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डूसू चुनाव में राष्ट्रवाद की गूंज, एसएफआई-आईसा का सफाया

बीते दिनों भारत की अग्रणी और दशकों से भारत की राजनीति में अपना प्रभाव रखने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ के चुनाव के नतीजे आए. इन चुनावों के नतीजे इस संदर्भ में भी महत्वपूर्ण थे क्योंकि पिछले कुछ माह में युवा पीढ़ी को जेन-ज़ी का नाम देकर एक अजूबे की तरह पेश करने का प्रयास किया गया. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की केंद्र सरकार को चुनावी राजनीति में हराने की अधूरी इच्छा के साथ युवा पीढ़ी को ढाल बनाकर राजनीति करने की कोशिश हुई. इन चुनावों ने उन सभी प्रयासों को बेनकाब कर दिया.

दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनाव में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अध्यक्ष, सचिव और संयुक्त सचिव के पद जीते. निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शोकीन ने उपाध्यक्ष का पद जीता. अध्यक्ष पद पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के यश डबास ने जीत दर्ज की है तो वहीं, सचिव पद पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की रिया छाबरी ने जीत दर्ज की है. संयुक्त सचिव पद पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के लक्ष्यराज चौधरी जीते हैं. इस प्रकार दिल्ली विश्वविद्यालय की केन्द्रीय समिति के प्रमुख चार पदों में से किसी पर भी अब कांग्रेस समर्थित लोग नहीं हैं जिसे कांग्रेस मुक्त दिल्ली विश्वविद्यालय भी कहा जा सकता है. इस बार के चुनाव को केवल दिल्ली विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं रखा जा सकता क्योंकि इन चुनावों का आधार इस बार विश्वविद्यालय के बाहर तैयार करने का प्रयास किया गया.  

जंतर-मंतर पर हुए तिलचट्टा आंदोलन के बाद मानों विपक्ष ने स्वयं को युवाओं का स्वघोषित हितैषी मान लिया था. देश भर में ‘छात्रों की गूंज’ के ज़रिए अपनी राजनैतिक कुंठा की अभिव्यक्ति की गई. हाल के जंतर-मंतर के आंदोलन के बाद देश में ये माहौल बनाया गया कि देश का युवा वर्ग पूर्णतया नरेन्द्र मोदी के ख़िलाफ़ हो चुका है और उसने विपक्ष को अपने नेता के रूप में चुन लिया है. यहां पर इस आंदोलन और हाल के दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनावों की तुलना दिलचस्प हो जाती है. जहां आंदोलन मुख्यतः सोशल मीडिया और तुलनात्मक रूप से सीमित छात्रों का आंदोलन था तो वहीं ये विश्वविद्यालय देश के कोने-कोने से आए छात्रों का जमावड़ा है. केवल चार पदों के लिए पड़े नोटा वोट की संख्या ही लगभग 23,000 थी. जहां आंदोलन में समर्थन का बड़ा भाग सोशल मीडिया से आया तो वहीं चुनाव लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा था. अगर इसे ‘अराजकता के व्याकरण’ बनाम लोकतांत्रिक प्रक्रिया तथा संख्याबल की दृष्टि से देखा जाए तो इसे निश्चित रूप से विपक्ष, एसएफआई औऱ आईसा की हार ही माना जाएगा. इसमें कोई दो राय नहीं है कि भले तात्कालिक रूप से विपक्ष की अराजकता विजयी मान ली गई हो मगर असल परीक्षाओं में उसकी हार ही हुई है. इतिहास गवाह है कि लोकतंत्र से लिए गए निर्णय ही सार्थक होते है, अराजकता तो कुछ पल के लिए ही प्रभावी होती है. इतिहास के असल निर्णय जनसमूह द्वारा लिए जाते है न कि अराजक भीड़ द्वारा.

मगर हार का जीत की तरह आनंद लेना तो विपक्ष और वामपंथ की पुरानी आदत रही है. इसी आदत का एक उदाहरण देखने को मिला जब हार की शाम को ही इंदौर में छात्रों की गूंज कार्यक्रम आयोजित किया गया और स्वयं को युवाओं का नेता दिखाने का प्रयास किया गया बिना, इस सत्य का संज्ञान लिए हुए कि युवाओं ने उन्हें भारत के प्रमुख विश्वविद्यालय से बाहर का रास्ता दिखा दिया है. ये विडंबना केवल यहीं तक सीमित नहीं था. उसी मंच से बताया गया कि कैसे भारतीय जनता पार्टी परिवारवाद और अपने लोगों को प्राथमिकता देती है. भले ही इस संबंध में वह कोई मजबूत बात न कह पाए हो मगर इस हार की समीक्षा करते हुए तमाम पत्रकारों ने कांग्रेस की कलई खोल दी.

दरअसल इन चुनावों के पीछे हार का एक मुख्य कारण कांग्रेस का परिवारवाद और गुटबाजी है जिसका परिणाम यह हुआ कि उम्मीदवारों के चयन ने ही हार को अवश्यंभावी बना दिया. दीपांशु शोकीन लगभग तीन वर्षों से चुनाव की तैयारी में लिप्त थे मगर उन्हें प्रत्याशी केवल इसलिए नहीं बनाया गया क्योंकि वह कन्हैया कुमार की आत्ममुग्धता को पुष्ट नहीं कर सकें और उसकी परिणति उनको टिकट न मिलने के रूप में हुई. ऐसे ही अन्य उम्मीदवारों के चयन में भी योग्यता के स्थान पर चाटुकारिता और दरबारी होने की कला को प्राथमिकता दी गई. इसी कार्यक्रम के दौरान राहुल गांधी ने शिक्षा सुधार पर कार्यक्रम आयोजित कर उसे केवल अपने राजनीतिक हित साधने के लिए प्रयोग किया.

उन्होंने प्रधानमंत्री का मजाक बनाया जिसमें उन्हें विदेशी मेहमानों के जबरन गले पड़ते हुए दिखाया मगर वह ये भूल गए कि इसी प्रधानमंत्री ने युद्ध में रत दुनिया और विशेषकर अरब मुल्कों को एक मंच पर लाकर उनमें सहमति बनवाकर दिल्ली घोषणा पत्र जारी किया है. वह पश्चिम की स्वीकृति के लिए अधीर होने की जगह अपनी संस्कृति के गौरव के साथ विश्व मंच पर जाते हैं. राहुल गांधी ने इस कृत्य के साथ यह दिखा दिया है कि छात्र उनके लिए केवल मोदी विरोध का एक उपक्रम है.

इनके साथ ही वामपंथी संगठन की भी इन चुनावों में शर्मनाक हार हुई. उनकी हार कोई नई बात नहीं है और शायद अब वह उनके लिए भी प्रभावहीन हो चला है इसलिए ही जहां हार के बाद राहुल गांधी इंदौर में अपनी कपोल कल्पना में लीन थे तो वहीं वामपंथी छात्र संगठन आइसा जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में जश्न-ए-इंकलाब मना रहे थे. संभवतः उनके इंकलाब का जश्न अब हार के साथ ही मनाया जाता है. वैसे भी जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के अतिरिक्त उन्हें किसी और विजय की आवश्यकता नहीं है और वे वहीं पर अपनी ढपली, माइक के साथ शाम को नारे और संगीत के साथ अपने क्रांति भाव से संतुष्ट रहते है. वैसे भी ऐसे जगहों पर वह मज़बूती से चुनाव क्यों लड़ेंगे जहां पर लड़ने से कांग्रेस को नुकसान होगा. यहां पर यह तथ्य ध्यान योग्य है कि जंतर-मंतर पर सर्वाधिक सक्रिय यहीं वामपंथी दल थे जिन्होंने छात्रों के नाम पर शुरू हुए आंदोलन को न जानें कितने वीभत्स आयाम दे दिए. ये कहना गलत नहीं होगा कि इन्हीं साम्यवादी दलों ने ग्राउन्ड सीडिंग का काम किया था मगर दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों ने इसे नकार दिया.

इसी प्रकार इस हार पर तिलचट्टा संघ भी चुप रहा सिवाय सौरभ दास के. उन्होंने तर्क शास्त्र के सभी तर्क लगाकर कहा कि किसी एक विश्वविद्यालय के छात्रों की पसंद को सारे देश की पसंद नहीं कहा जा सकता. यानि अमेरिका से लौटे अब तक अज्ञात डिग्री के स्वामी अभिजीत दीपके, महंगे घर में रहकर अभावों की पत्रकारिता करते सौरभ दास, हर बात पर नृत्य कर सरकार को हिलाने वाले विजेता दहिया सभी छात्रों के नेता हो सकते है मगर अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर देश के श्रेष्ठ विश्वविद्यालय में आने वाले छात्रों का चुनाव ही छात्रों के रुझानों को व्यक्त नहीं करता. हरिशंकर परसाई ने आध्यात्मिक पागलों की बात तो लिखी थी परंतु ऐसे वैचारिक पागलों की कल्पना उन्होंने भी नहीं की होगी. यह दिखाता है कि वह आंदोलन केवल सरकार के अंध विरोध में था वरना छात्रों के लोकतांत्रिक चयन का अपमान कोई भी छात्र हितैषी नहीं करता.

इन चुनावों ने विपक्ष की अप्रासंगिकता की एक और मिशाल दी है. इन चुनावों में चारों पदों पर कुल 23,942 छात्रों ने नोटा चुना, जिसमें अध्यक्ष पद पर 4,310, उपाध्यक्ष पर 4,359, सचिव पर 7,884 और संयुक्त सचिव पर 7,389 वोट पड़े. नोटा पर पड़े वोट बताते है कि विपक्षी दल अपनी नकारात्मक राजनीति और झूठ के कारण अब विकल्प भी नहीं रह गए हैं. इन मतों का अर्थ है कि 23,000 से अधिक ऐसे छात्र थे जो अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से संतुष्ट नहीं थे परंतु उन्हें कांग्रेस इत्यादि पर भी भरोसा नहीं था.

कुछ ही महीनों पहले हुए कॉकरोच आंदोलन की अगुआ रही एसएफआई और आईसा का डूसू चुनाव में हर बार की तरह सूपड़ा ही साफ हो गया. चार में से दो सीटों पर आईसा-एसएफआई के उम्मीदवार को नोटा से भी कम वोट मिलें. उपाध्यक्ष पद के उम्मीदवार अक्षत शिखर को 2383 वोट मिले, जबकि नोटा को 4359 वोट मिलें. सह सचिव पद के उम्मीदवार को बी पारिजात को 5837 वोट मिले और नोटा को 7389 वोट मिले.  

कॉकरोच आंदोलन में खुद को युवा बताकर देश में अव्यवस्था फैलाने वाले वामपंथी असली चुनाव में, असली युवाओं के सामने अपनी ज़मानत भी मुश्किल से बचा पाए. देश का युवा वामपंथ और विपक्षी की घटिया राजनीति से परिचित है इसलिए उन्होंने इन दलों को कैंपस से बाहर रखने का फैसला किया है.

कितना हास्यास्पद होगा कि जिसे छात्र अपने राजनीतिक चुनाव का विकल्प तक नहीं मानते, वह अपने को छात्रों का नेता होने का दंभ भरते है. ये जितना हास्यास्पद है उतना ही आत्मचिंतन का विषय भी परंतु आत्म मुग्धता आत्मा चिंतन की शत्रु होती है और यहीं कारण है कि हार का इतिहास रचने के बाद भी सुधार की कोई बात विपक्ष के भीतर नहीं है.

अंत में, यह समझने की आवश्यकता है कि जिस प्रकार इस देश को तरह-तरह के आदर्शवादी विचारों की आड़ में बांट कर रखा गया, वह अब संभव नहीं है. जेन-ज़ी को महिमा मंदित करने वाले नहीं जानते कि अमेरिका और भारत अलग है. केवल इंस्टाग्राम चलाने से सुधार नहीं होते. छात्रों को राजनीति का उपक्रम मानने वालों को छात्र ही उनके सत्य से सामना कराते है. वे भले ही उससे मुंह चुराते रहें पर वे इससे बच नहीं सकते. सच से बचने के इस नाहक प्रयास में वे हर बार हार का सामना करते रहेंगे ठीक वैसे ही जैसे दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ के चुनावों में किया है.