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अमेरिका की टैरिफ नीति और भारत की संप्रभुता 

भारत वर्तमान में दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी महाशक्ति के रूप में उभरता हुआ नज़र आ रहा है और एशिया में चीन से प्रतिस्पर्धा कर रहा है.  लेकिन बात चाहे चीन की हो या अमेरिका की, भू-राजनीतिक परिदृश्य के इतिहास को जब भी उठाकर पढ़ोगे तो वह यही बतलाता है कि पूरी दुनिया में उसी देश ने दुनिया पर राज किया है जो सैन्य और आर्थिक रूप से मज़बूत होने के साथ-साथ, विदेश नीति भी स्वतंत्र और संप्रभु रहा हो. चाहे वह 90 के दशक में अमेरिका की बात हो, जब सोवियत संघ टूट गया था या वर्तमान में चीन हो, जो आज विनिर्माण क्षेत्र और विश्व के अधिकतर खनिजों के उत्पादन आपूर्ति को नियंत्रण में कर आज अमेरिका को आंख दिखा रहा है. 

अगर इन दोनों ही देशों की महाशक्ति बनने की यात्रा पर ध्यान दे तो पता चलता है कि यह दोनों ही देश सैन्य के साथ-साथ आर्थिक रूप से तो सशक्त हैं ही साथ ही इनकी विदेश नीति भी दूसरे देशों के प्रभाव से स्वतंत्र है और यह किसी पर निर्भर नहीं है. 

लेकिन वर्तमान में भारत सरकार के सामने आत्मनिर्भरता और संप्रभु विदेश नीति यह दोनों विषय,  आज विश्व में चल रहे अमेरिकी-ईरान युद्ध के कारण चिंता का विषय बने हुए हैं. 

भारत के समक्ष इस समय काफी बड़ी चुनौती यह है कि भारत ने जो ईरान में रणनीतिक निवेश किया था, वह ईरान और अमेरिका के बीच चल रहे युद्ध की भेंट चढ़ चुका है. चबाहार पोर्ट है, जिस पर आज अमेरिका मिसाइलें दाग रहा है, वह भारत ने ईरान में,  पाकिस्तान को बाईपास कर नॉर्थ साउथ ट्रांजिट कॉरिडोर के तहत यूरोप और रूस तक अपनी पहुंच और व्यापार बढ़ाने के लिए बनाया था. 

लेकिन बात यहीं तक सीमित नहीं है. अमेरिका काफी आगे बढ़ चुका है. अब ट्रंप प्रशासन एक ऐसा कानून लाने वाला है जो भारत पर 200 प्रतिशत तक टैरिफ लगा सकता है और अमेरिकी प्रशासन के यही फैसले कहीं ना कहीं भारत की विदेश नीति को प्रभावित कर रहे हैं. 

वर्तमान में ट्रंप प्रशासन की इस सोच के पीछे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सबसे बड़े प्रशंसक और उनके मित्र लिंडसे ग्राहम थे, जिनका अभी कुछ हफ्तों पहले देहांत हो गया है. लिंडसे ग्राहम पहले भी भारत पर लगाए गए टैरिफ के सबसे बड़े समर्थक थे. वह चाहते थे कि जो देश रूस से कच्चा तेल खरीद रहे हैं, उन पर 500 प्रतिशत तक टैरिफ लगाया जाए, ताकि रूस पर अधिक से अधिक दबाव बनाया जा सके. 

लेकिन अब लिंडसे ग्राहम के गुज़रने के बाद, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अमेरिकी प्रशासन इस कानून को लाने की पूरी तैयारी में है और इसमें सिर्फ डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी ही नहीं, बल्कि डेमोक्रेटिक पार्टी भी शामिल है. जिसका सीधा अर्थ है कि अमेरिकी संसद यानी कि सीनेट भी इस कानून को लाना चाहती है.

अमेरिकी संसद वर्तमान में इस बिल को लेकर चर्चा कर रही है और जल्दी ही इसे लाने वाली है. इसमें भारत के लिए एक अच्छी खबर यह है कि इसमें टैरिफ की दर  घटाकर 500 से 100 प्रतिशत कर दी है. लेकिन इसके साथ ही अमेरिका ने ढोंग की सभी सीमाएं लांघते हुए, अपने कुछ यूरोपीय और एशियाई मित्र देश को इस कानून से छूट भी दी है. इस कानून के तहत अमेरिका ने कहा है कि जो देश रूस के प्राकृतिक गैस क्षेत्र का 15 प्रतिशत से कम आयात करेगा, उन देशों पर यह टैरिफ नहीं लगेगा. जिसमें फ्रांस, बेल्जियम, जापान और हंगरी शामिल हैं. 

अब अमेरिकी प्रशासन की इन्हीं कार्यवाहियों से यह साफ पता चलता है कि अमेरिका का सीधा लक्ष्य भारत और चीन है. क्योंकि रूस और यूक्रेन युद्ध के दौरान  चीन और भारत, रूस के सबसे बड़े आर्थिक और व्यापारिक साझेदार बनकर उभरे थे. इसी कारण से अब अमेरिका भारत पर एक बड़ा एक्शन लेना चाहता है. 

हालांकि, अमेरिका की नीति तब स्पष्ट होकर सामने आई,  जब मार्च 2026 में दिल्ली में आयोजित रायसीना डायलॉग में, अमेरिकी उप विदेश सचिव क्रिस्टोफर लैंडो ने कहा कि भारत के संदर्भ में हम चीन जैसी गलती नहीं करेंगे, जो हमने 20 साल पहले की थी. 

दरअसल 1970 के दशक में सोवियत संघ के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका ने चीन की तरफ कदम बढ़ाए, ताकि कम्युनिस्ट विचाधारा का फैलाव न हो. इस कारण जब 1978 में चीन ने आर्थिक सुधारों की शुरुआत की, तब अमेरिका ने बढ़ चढ़कर चीन में निवेश किया. 

अमेरिका की कई बड़ी कंपनियों ने चीन में बड़ा निवेश किया, जिससे चीन का विनिर्माण क्षेत्र मज़बूत हुआ. चीन के साथ व्यापार करने की उस समय एक शर्त यह थी कि व्यापार करने वाले देश को चीन के साथ प्रौद्योगिकी साझाकरण यानी कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर भी करना पड़ता था. यही कारण था कि अमेरिका की बड़ी कंपनियों से टेक्नोलॉजी सीखकर चीन ने अपनी घरेलू कंपनियों को खड़ा किया जो आज वैश्विक स्तर पर अपनी छाप छोड़ रही हैं और चीन की अर्थव्यवस्था का एक मज़बूत आधार बनकर खड़ी हैं.  

अमेरिका की इन्हीं गलतियों के कारण आज अमेरिका भारत को भी उसी नज़र  से देखता है और अमेरिकी उप विदेश सचिव क्रिस्टोफर लैंडो का बयान अपने आप में यह दर्शाता है कि अमेरिका भारत के संदर्भ में काफी स्पष्ट नीति लेकर चल रहा है. वह भारत के साथ व्यापारिक साझेदारी तो चाहता है लेकिन वह यह कभी नहीं चाहेगा कि भारत उसका भविष्य में एक प्रतिस्पर्धी बने और चीन की तरह एक मज़बूत राष्ट्र बनकर भविष्य में अमेरिका टक्कर दे. 

जिस कारण अब अमेरिका भारत की फार्मा क्षेत्र, जो कि दुनिया का सबसे बड़ा फार्मा क्षेत्र है और विश्वभर में जेनरिक दवाइयों का सबसे बड़ा निर्यातक देश है, उस पर 200 प्रतिशत टैरिफ लगाने वाला है. 

अमेरिका का मानना है कि भारत और चीन का जो आर्थिक उत्थान हो रहा है, उसमें अमेरिकी बाजार का बहुत बड़ा हाथ है और अब उन गलतियों को न दोहराकर अमेरिका अब भारत के उभरते हुए फार्मा क्षेत्र पर टैरिफ लगाने की सोच रहा है. 

अमेरिका चाहता है कि भारत की जो फार्मा कंपनियां उन्हें अपनी दवाइयां भेजती हैं वह अमेरिका में अपना फार्मा प्लांट बनाए, ताकि अमेरिकी लोगों को रोज़गार मिले. और अगर वह ऐसा नहीं करेंगे तो उन पर 200 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा, जिसका सीधा फायदा अमेरिका की बड़ी फार्मा सेक्टर कंपनियों को मिलेगा, क्योंकि भारतीय फार्मा कंपनियों पर 200 प्रतिशत टैरिफ लगाने के बाद, भारतीय फार्मा कंपनी अमेरिकी बाजार में पिछड़ जाएगी.

हालांकि, भारत के लिए सिर्फ यही एक समस्या नहीं है, बल्कि कच्चे तेल की बढ़ती मांग भी एक बड़ी समस्या है. भारत कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा आयातक देश है  और 2019 में ईरान से तेल की खरीद बंद करने के बाद अब अब नया संकट यह है कि अगर भारत रूस से कच्चा तेल खरीदता है तो अमेरिका अपने नए कानून के तहत भारत पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा. 

जिसके बाद सवाल यह उठता है कि अमेरिका के नए कानून के बाद भारत का अगला कदम क्या होने वाला है क्या भारत रूस से कच्चा तेल खरीदेगा या नहीं. हालांकि इस तरह की परिस्थितियां बना कर अमेरिका चाहता है कि भारत अमेरिका से वह कच्चा तेल खरीदे, जो उसने अभी कुछ महीनों पहले वेनेजुएला में निकोलस मादुरो की सरकार का तख्ता पलटकर वहां के तेल पर कब्जा किया है, ताकि कच्चे तेल के बाजार में अमेरिका का प्रभुत्व बढ़ सके. 

साथ ही अमेरिका यह चाहता है कि भारत जो वर्तमान में लगभग अपने 40 प्रतिशत कच्चे तेल का आयात रूस  से कर रहा है, वह आयात वह अमेरिका से करे, ताकि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार संतुलन बना रहे. जिस पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने शासन काल की शुरुआत से ही ज़ोर देते आए हैं. उनका हमेशा से यह मानना है कि भारत अमेरिका से आयात कम करता है और अमेरिका को निर्यात ज्यादा करता है. ऐसे में यह द्विपक्षीय व्यापार भारत के लिए अधिक फायदेमंद साबित होता है. इसलिए अमेरिका यह कानून लाकर कई रास्तों से भारत को और भारत की विदेश नीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है.

इन परिस्थितियों से निपटने के लिए भारत के समक्ष एक ही रास्ता है और वह है आत्मनिर्भर बनना. यदि भारत को एशिया में एक मज़बूत राष्ट्र बनना है और वैश्विक स्तर पर एक मज़बूत देश के रूप में उभरना है तो भारत को आत्मनिर्भर होना ही पड़ेगा. क्योंकि यदि आप अपनी ऊर्जा क्षेत्र और अन्य संसाधनों के लिए दूसरे देशों के संसाधन पर निर्भर हैं तो कहीं ना कहीं इसका खामियाजा हमारी विदेश नीति की सम्प्रभुता पर आएगा. और हमने यह देखा है कि कई बार खासकर ईरान के संदर्भ में भारत ने अमेरिका के दबाव में आकर अपनी विदेश नीति की सम्प्रभुता को दांव पर लगा कर फैसले लिए हैं.

एक देश का आत्मनिर्भर ना होना जबकि वह दुनिया के सबसे मज़बूत देशों में शामिल है, यह किस तरह उस देश की साख को वैश्विक स्तर पर कमजोर करता है इसका प्रत्यक्ष उदाहरण वर्तमान में रूस है. रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद जिस तरह से यूरोपीय और अमेरिकी कंपनियों ने रूस को छोड़ा, उस आर्थिक गैप को भरने के लिए रूस को मजबूरन चीन के साथ समझौता करना पड़ा. 

आज रूस और चीन के बीच लगभग 240 बिलियन डॉलर का व्यापार है, जिसमें रूस अपने कुल वैश्विक आयात का 45 प्रतिशत अकेले चीन से आयात करता है. ऑटोमोबाइल और वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स और स्मार्टफोन्स, औद्योगिक मशीनरी और उपकरण, माइक्रोचिप व सेमीकंडक्टर से लेकर केमिकल्स और प्लास्टिक तक लगभग हर चीज रूस,  चीन से आयात करता है. वहीं चीन अपने कुल आयात का सिर्फ 3 से 4 प्रतिशत ही रूस से आयात करता है. 

हालांकि वर्तमान में भारत अपनी ऊर्जा क्षेत्र की आपूर्ति के लिए लगातार आत्मनिर्भर बनने की ओर अग्रसर है. भारत इलेक्ट्रॉनिक व्हीकल, इथेनॉल ब्लेंडिंग और सौर ऊर्जा समेत विनिर्माण क्षेत्र में लगातार अनुसंधान के विकास पर कार्य कर रहा है साथ ही विदेशी कंपनियों के साथ ज्वाइंट वेंचर कर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर की मदद से अपने देश में विनिर्माण क्षेत्र का एक मज़बूत ढांचा बनाने की ओर अग्रसर है. लेकिन अभी इसको और गति देने की आवयश्कता है.  अब आने वाले समय में देखना यह है कि भारत सरकार अमेरिका के नए कानून पर किस तरह प्रतिक्रिया करती है और आने वाली इन कठिन परिस्थितियों में भारत की विदेश नीति किस तरह से स्वतंत्र होकर फैसले लेती है.

बलराम सिंह पाल
बलराम सिंह पाल
बलराम सिंह पाल एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.