साल 2014 भारत की राजनीति और मीडिया, दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था. देश में पहली बार किसी गैर-कांग्रेसी दल को लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिला था. इसी दौर में सूचना और संचार तकनीकों के विस्तार के साथ डिजिटल मीडिया का भी तेजी से विकास हो रहा था.
इसी दौरान कई स्वतंत्र और डिजिटल-फर्स्ट न्यूज प्लेटफॉर्म अस्तित्व में आए. ‘द वायर’ भी इसी दौर में शुरू हुआ ऐसा ही एक मंच था. मई 2015 में शुरू हुए इस पोर्टल ने राजनीति, अर्थव्यवस्था, मानवाधिकार, विज्ञान, तकनीक, समाज और विदेश नीति से जुड़े मुद्दों पर रिपोर्टिंग की है. हालांकि, इसकी कई रिपोर्टें और संपादकीय रुख लगातार विवादों के केंद्र में भी रहे.
दरअसल ‘द वायर’जैसे डिजिटल संस्थानों की कार्यशैली पारंपरिक मीडिया संस्थानों से कुछ अलग दिखाई देती है. पारंपरिक मीडिया में आम तौर पर समाचार और संपादकीय टिप्पणी के बीच स्पष्ट अंतर रखने की कोशिश की जाती है. वहीं, ‘द वायर’ की रिपोर्टिंग और टिप्पणियों को लेकर अक्सर यह बहस होती रही है कि उसकी खबरों में भी एक स्पष्ट वैचारिक फ्रेमिंग दिखाई देती है.
भाजपा, आरएसएस, नरेन्द्र मोदी सरकार, हिंदुत्व, कश्मीर और नागरिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर उसकी आलोचनात्मक रिपोर्टिंग को इसी संदर्भ में देखा जाता है. ‘द वायर’ पूरी तरह से लेफ्ट-लिबरल मीडिया इकोसिस्टम का हिस्सा है. दूसरी ओर, वह खुद को स्वतंत्र, गैर-लाभकारी और सत्ता से सवाल पूछने वाले मीडिया संगठन के रूप में पेश करता है, जो एक मज़ाक से अधिक कुछ नहीं लगता.
वायर जिस बेपरवाही से देश के ख़िलाफ़ रिपोर्टिंग करता है और जिस तरह भारत के भीतरी ताने-बाने को तोड़ने की कोशिश कर रहा है वह देखकर हम सभी के मन में सवाल आना लाज़मी है कि आखिर कौन इस भारत विरोधी वेबसाइट को सपोर्ट करता है, उसका फंडिंग मॉडल क्या रहा, उसके संपादकीय रुख को लेकर विवाद क्यों उठते रहे हैं?
द वायर की स्थापना पत्रकार सिद्धार्थ वरदराजन, सिद्धार्थ भाटिया और एम.के. वेणु ने की थी. तीनों इसके संस्थापक संपादक रहे हैं. पोर्टल ने शुरुआत से ही खुद को स्वतंत्र और गैर-लाभकारी मीडिया संगठन के रूप में पेश किया.
इसके संचालन के लिए सितंबर 2015 में फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट जर्नलिज़म (FIJ) को कंपनी अधिनियम की धारा 8 के तहत एक गैर-लाभकारी कंपनी के रूप में शामिल किया गया. सिद्धार्थ वरदराजन इससे पहले ‘द हिंदू’ संपादक रह चुके थे. वायर के शुरुआती दिनों में इसके संस्थापकों ने भारतीय मीडिया के मौजूदा कारोबारी मॉडल पर सवाल उठाए थे. उनका तर्क था कि मीडिया संस्थानों के अन्य कारोबारी हितों और राजनीतिक तथा कॉरपोरेट प्रतिष्ठानों से संबंध संपादकीय स्वतंत्रता को प्रभावित कर सकते हैं. द वायर का संचालन फाउंडेशन फॉर इंडिपेंडेंट जर्नलिज़म करता है. इसके बोर्ड में संस्थापक संपादक एम.के. वेणु, सिद्धार्थ भाटिया और सिद्धार्थ वरदराजन शामिल हैं.
हालांकि, इसकी आय केवल पाठकों के योगदान तक सीमित नहीं रही. 2016 में इंडिपेंडेंट एंड पब्लिक स्पिरीटिड मीडिया फाउंडेशन (IPSMF) ने FIJ को 1.95 करोड़ रुपए का अनुदान दिया था. मार्च 2017 में 1.75 करोड़ रुपए की दूसरी किस्त मिलने के बाद IPSMF से प्राप्त कुल राशि 3.7 करोड़ रुपए हो गई. इसके बाद अगले वर्ष के लिए 3.26 करोड़ रुपए की सहायता दिए जाने का भी द वायर ने उल्लेख किया था.
पोर्टल ने यह भी बताया था कि उसकी विज्ञान संबंधी कवरेज को रोहन मूर्ति से मिले विशेष अनुदान से मदद मिली. दिसंबर 2015 में 50 लाख रुपए और मई 2017 में 50 लाख रुपए की दूसरी राशि मिलने का उल्लेख किया गया था. इसके अलावा द वायर ने यूट्यूब और फेसबुक से होने वाली सीमित विज्ञापन आय का भी जिक्र किया था. फंडिंग को लेकर बहस का मुख्य सवाल यह रहा है कि जब किसी मीडिया संस्था को नॉन प्रॉफिट फाउंडेशन से आर्थिक मदद मिलती है, तो क्या इसका असर उसकी संपादकीय प्राथमिकताओं पर पड़ सकता है. इसी आधार पर द वायर के फंडिंग मॉडल और संपादकीय स्वतंत्रता पर सवाल उठाते रहे हैं.
वामपंथी विचारों से गहराई से प्रभावित सिद्धार्थ वरदराजन द वायर के संस्थापक संपादकों में शामिल हैं और भारतीय पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक समय से सक्रिय रहे हैं. उन्होंने कोलंबिया यूनिवर्सिटी, न्यूयॉर्क में अर्थशास्त्र में पीएचडी के लिए दाखिला लिया था. उन्होंने सोवियत अर्थव्यवस्था पर शोध शुरू किया, लेकिन सोवियत संघ के विघटन के बाद इसे पूरा नहीं किया. इसी दौरान उन्होंने न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र पढ़ाया और फ्रंटलाइन के लिए अंतरराष्ट्रीय मामलों पर स्वतंत्र लेखन किया. भारत लौटने के बाद उन्होंने 1995 में द टाइम्स ऑफ इंडिया से पत्रकारिता की शुरुआत की. उनका करियर केवल डेस्क तक सीमित नहीं रहा. उन्होंने जम्मू-कश्मीर, अफगानिस्तान और 1998 में यूगोस्लाविया में नाटों की बमबारी जैसे संघर्ष वाले क्षेत्रों से रिपोर्टिंग की.
2004 में वे द हिंदू में स्ट्रैटिजिक अफेयर्स एडिटर बने और 2011 में अखबार के संपादक नियुक्त हुए. वे द हिंदू के करीब 150 साल के इतिहास में परिवार से बाहर से आने वाले पहले संपादक थे. 2013 में उन्होंने पद छोड़ दिया. वरदराजन के नेतृत्व में द हिंदू भी लेफ्ट और लिबरल विचारधारा का माउथपीस बना रहा. वरदराजन की वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए उनका एलएसई (LSE) का दौर भी महत्वपूर्ण है. उपलब्ध जीवन संबंधी विवरणों के अनुसार, लंदन में पढ़ाई के दौरान वे वहां की लेफ्ट-विंग राजनीति के संपर्क में आए और इसका उनकी सोच पर प्रभाव पड़ा. इसी वजह से उनकी सार्वजनिक पत्रकारिता और राजनीतिक टिप्पणियों में लेफ्ट-लिबरल दृष्टिकोण की छाप दिखाई देती है.
वरदराजन भारतीय मीडिया में बढ़ते कॉरपोरेटीकरण और सरकारी दबाव के आलोचक रहे हैं. 2016 में एलएसई के साथ एक बातचीत में उन्होंने कहा था कि मीडिया के कॉरपोरेटीकरण ने पत्रकारिता की गुणवत्ता को प्रभावित किया है और बाजार की ताकतों के कारण गंभीर रिपोर्टिंग के लिए उपलब्ध जगह कम हुई है.
2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के ख़िलाफ़ जेएनयू में आयोजित एक कार्यक्रम में वरदराजन के साथ सीपीआई(एम) के तत्कालीन नेता प्रकाश करात, सीपीआई नेता एनी राजा और वामपंथी कार्यकर्ता कविता कृष्णन जैसे वक्ताओं के शामिल होने की घोषणा हुई थी इसे वरदराजन की वामपंथी राजनीतिक हलकों से निकटता के उदाहरण के तौर पर देखा जा सकता है. जो आदमी निष्पक्ष पत्रकारिता की बात करता है लेकिन ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारों को बल देने वाले छात्र संगठनों के कार्यक्रम में जाता है उससे निष्पक्षता की उम्मीद रखना बेमानी है.
सिद्धार्थ वरदराजन के बारे में बात हो उनकी पत्नी नंदिनी सुंदर का जिक्र न आए ऐसा कैसे हो सकता है. नंदिनी अपने वामपंथी विचारों और कार्यों की वजह से विवादों रही हैं. नंदिनी सुंदर दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में समाजशास्त्र की प्रोफेसर हैं. वह अपने पति के ‘द वायर’ समेत विभिन्न मंचों पर लिखती रही हैं. मई 2016 में नंदिनी सुंदर कथित तौर पर ‘रिचा केशव’ नाम से जेएनयू की प्रोफेसर अर्चना प्रसाद और जोशी रिसर्च इंस्टीट्यूट के विनीत तिवारी के साथ माओवादी प्रभावित बस्तर गई थीं. उन्होंने वहां ग्रामीणों को सरकार के ख़िलाफ़ भड़काने की कोशिश की. दावा किया गया था कि यदि ग्रामीणों ने माओवादियों का समर्थन नहीं किया तो प्रोफेसरों ने उनके घरों को जलाने की धमकी दी.
बस्तर के तत्कालीन एसपी ने जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपतियों को लिखे एक पत्र में आरोप लगाया था कि नंदिनी सुंदर और अर्चना प्रसाद ने ग्रामीणों को पुलिस के ख़िलाफ़ भड़काने की कोशिश की. पत्र के मुताबिक, उन्होंने ग्रामीणों से कहा था कि यदि गांवों में पुलिस कैंप स्थापित किए गए तो उनकी बेटियां और बहनें सुरक्षित नहीं रहेंगी. पत्र में ग्रामीणों के हवाले से कहा गया था कि उन्होंने नंदिनी सुंदर और अर्चना प्रसाद से बातचीत की थी. ग्रामीणों ने बताया कि गांव में नक्सली उन्हें पीटते हैं, उनके पैसे और राशन लूटते हैं और उन्हें परेशान करते हैं. ग्रामीणों का दावा था कि वे नक्सलियों के ख़िलाफ़ एकजुट हैं और गांव में पुलिस कैंप चाहते हैं.
ग्रामीणों के अनुसार, नंदिनी सुंदर, अर्चना प्रसाद और उनके साथ मौजूद सीपीएम नेता संजय पराते ने उनसे कहा कि पुलिस और प्रशासन ग्रामीणों के लिए कुछ नहीं करेंगे. उन्होंने कथित तौर पर कहा कि यदि ग्रामीण नक्सलियों की मदद नहीं करेंगे तो इसका नुकसान उन्हें ही उठाना पड़ेगा. उन्होंने ग्रामीणों से अपने हित में नक्सलियों के कहे अनुसार काम करने के लिए फोर्स किया था. इस मामले के बाहर आने के बाद तब के भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के नेता सीताराम येचुरी ने नंदिनी सुंदर और अन्य के बचाव में सामने आते हुए पत्र को ‘फर्जी’ बताया था.
मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, नंदिनी सुंदर दोबारा सुकमा के नक्सल प्रभावित इलाके में गई थीं. वहां उन्होंने कथित तौर पर ‘रिचा केशव’ नाम से एक बैठक की. इसके दो दिन बाद आदिवासी व्यक्ति श्यामनाथ बघेल ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. शिकायत में कहा गया कि सुंदर, जिन्हें बघेल ने ‘रिचा केशव’ के रूप में पहचाना, और अन्य लोगों ने ग्रामीणों से पुलिस का समर्थन नहीं करने तथा नक्सलियों के साथ जुड़ने को कहा.
शिकायत में यह भी कहा गया था कि नंदिनी की तरफ से नक्सलियों का विरोध करने पर बघेल को गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई थी. उन्होंने अपनी शिकायत में कहा था कि यदि उनकी हत्या होती है तो इसके लिए नंदिनी सुंदर और अन्य लोग जिम्मेदार होंगे. इसके बाद 4 नवंबर, 2016 को शिकायत करने वाले श्यामनाथ बघेल की हत्या कर दी गई थी.
उस समय बस्तर पुलिस ने नंदिनी सुंदर और अन्य लोगों के ख़िलाफ़ हत्या, आपराधिक साजिश और दंगा करने के आरोपों में मामला दर्ज किया था. मई 2017 में पोडियम पांडू उर्फ पांडा नाम के एक माओवादी ने छत्तीसगढ़ पुलिस के सामने आत्मसमर्पण किया था. पांडा ने नंदिनी सुंदर, सामाजिक कार्यकर्ता बेला भाटिया और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं पर नक्सली कमांडरों से मिलने का आरोप लगाया था. पुलिस के अनुसार, पांडा माओवादियों के शहरी नेटवर्क से भी परिचित था और शहरों से आने वाले माओवादी समर्थकों तथा जंगल में मौजूद माओवादियों के बीच बैठकें कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था. पांडा ने दावा किया था कि वह नंदिनी सुंदर और अन्य लोगों को मोटरसाइकिल पर माओवादी नेताओं से मुलाकात के लिए ले जाता था. इनमें हिडमा भी शामिल था, जिसके बारे में माना जाता है कि उसने छत्तीसगढ़ के सुकमा में 25 सीआरपीएफ जवानों की हत्या की साजिश रची थी. हालांकि इसी साल हिडमा को भारतीय सुरक्षा बलों ने मार गिराया है.
2018 में ‘शहरी माओवादी’ नेटवर्क पर कार्रवाई के दौरान हुई छापेमारी के बाद नंदिनी सुंदर ने वायर में एक लेख लिखा. इसमें उन्होंने सरकार की कार्रवाई की आलोचना करते हुए लिखा था, “सरकार चाहे जितनी कोशिश कर ले, वह उनकी आवाज़ों को दबाने या इन गिरफ्तारियों के ज़रिए दूसरों को डराने में सफल नहीं होगी. आपातकाल दो साल चला था, मोदी का अघोषित आपातकाल शायद अधिक समय तक चल सकता है; लेकिन आतंक अंततः विफल होता है. लोकतंत्र और कानून का शासन अंततः कायम रहेगा.”
नंदिनी ने अपने लेख में मोदी सरकार की तुलना सीधे आपातकाल से कर दी थी और अर्बन नक्सल के नेटवर्क को बढ़ावा दिया था. इतना ही नहीं, 7 अक्टूबर, 2023 को हमास के भयावह आतंकी हमले के जवाब में गाजा में हमास के ख़िलाफ़ इज़रायली सैन्य कार्रवाई की गई. इसी बीच 2023 में करीब 1,900 से अधिक समाजशास्त्र के ‘प्रोफेसरों’ ने गाजा और फिलिस्तीनियों के समर्थन में एक खुले पत्र पर हस्ताक्षर किए थे. इस पत्र में जिन लोगों के हस्ताक्षर थे, नंदिनी सुंदर भी उनमें से एक थीं. कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी विश्वविद्यालय में बच्चों को पढ़ाता हो और नक्सलियों से सहानुभूति भी रखता हो, ऐसे लोगों के लिए ही प्रधानमंत्री मोदी ने इस साल 15 अगस्त को लाल किले से दिमागी नक्सली शब्द का प्रयोग किया था.
शुरुआत से ही द वायर ने राजनीतिक सत्ता, कॉरपोरेट प्रभाव, नागरिक स्वतंत्रता और सरकारी नीतियों से जुड़े मुद्दों पर आलोचनात्मक रिपोर्टिंग को अपनी पहचान का हिस्सा बनाया. आधार, निजता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सरकारी निगरानी, मीडिया स्वामित्व, किसान आंदोलन और अल्पसंख्यकों से जुड़े मुद्दों पर इसकी रिपोर्टिंग ने इसे दूसरे डिजिटल मीडिया संस्थानों से अलग पहचान दी.
समय के साथ पोर्टल ने हिंदी में भी अपना विस्तार किया. हालांकि, भाजपा, आरएसएस, नरेन्द्र मोदी सरकार और हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों पर उसका बेईमानी वाला रुख उसकी संपादकीय पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है. बात सिर्फ किसी राजनीतिक दल तक नहीं है, वायर हिंदू धर्म को लेकर अपनी किलस और गुस्से को छिपा नहीं पाता. वह चिढ़ उनकी लगभग हर रिपोर्ट में देखी जा सकती है.
भाजपा, आरएसएस और हिंदुत्व की आलोचना को वायर बहुत अधिक तवज्जो देता आया है. वहीं, द वायर की ओर से ऐसी सामग्री को राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों पर संपादकीय टिप्पणी के रूप में देखा जाता है. अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वायर ने कश्मीर में संचार प्रतिबंध, हिरासत, राजनीतिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर लगातार नकारात्मक, लोगों में डर पैदा करने वाली और भारत सरकार की मंशा को कटघरे में खड़ा करने वाली रिपोर्टिंग की.
इसकी कवरेज में केंद्र सरकार के अगस्त 2019 के फैसले की आलोचनात्मक जांच प्रमुख रही. यह कवरेज द वायर के व्यापक सरकार-विरोधी और लेफ्ट-लिबरल संपादकीय रुख रही. राम मंदिर और अयोध्या विवाद में भी द वायर का स्टैंड न सिर्फ देश, धर्म बल्कि कोर्ट में दिए सबूतों को भी नज़र अंदाज कर रहा था.
2019 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मंदिर निर्माण शुरू हुआ. द वायर ने इस घटनाक्रम को केवल धार्मिक उपलब्धि या मंदिर निर्माण की खबर के रूप में नहीं, बल्कि भाजपा, हिंदुत्व राजनीति, अयोध्या और भारतीय धर्मनिरपेक्षता के व्यापक राजनीतिक संदर्भ में पेश किया. पोर्टल ने 2019 के सुप्रीम कोर्ट के अयोध्या फैसले को कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण और बाबरी मस्जिद के विध्वंस के संबंध में अन्यायपूर्ण बताया, जबकि हर एक सबूत विवादित स्थल पर मंदिर होने की गवाही दे रहा था.
इसी संदर्भ में द वायर ने “Justice A.K. Ganguly: ‘If Babri Masjid Was Still Standing, Would SC Have Had it Demolished?” शीर्षक से एक विवादित लेख भी प्रकाशित किया था. राम से जुड़ी भारत की अस्मिता, धर्म, न्याय और विरासत को झूठा साबित करने में द वायर पूरा ज़ोर लगा दिया था.
द वायरके विवादों का इतिहास भी लंबा रहा है. शुरुआती बड़े विवादों में से एक 2017 में सामने आया, जब पोर्टल ने तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बेटे जय शाह के कारोबारी मामलों पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की.
रिपोर्ट में उनकी कंपनी के कारोबार में तेज वृद्धि को लेकर सवाल उठाए गए थे. इसके बाद जय शाह ने द वायर के ख़िलाफ़ आपराधिक मानहानि का मुकदमा दायर किया. यह मामला प्रेस की स्वतंत्रता और मानहानि कानून की सीमा को लेकर भारतीय मीडिया में बड़ी बहस का हिस्सा बना.
यह अकेला मामला नहीं था. अलग-अलग समय में भाजपा नेताओं, कारोबारी समूहों और अन्य प्रभावशाली व्यक्तियों से जुड़े मानहानि के मामले भी द वायर के ख़िलाफ़ सामने आए. 2018 में संस्थापक संपादकों ने दावा किया था कि उसके खिलाफ 11 मानहानि और सेंसरशिप संबंधी मामले चल रहे थे और इन मामलों में मांगी गई कुल क्षतिपूर्ति लगभग 440 करोड़ रुपए थी.
वायरऔर भाजपा नेता तथा कारोबारी राजीव चंद्रशेखर के बीच भी कानूनी विवाद हुआ. पोर्टल ने चंद्रशेखर के राजनीतिक और कारोबारी हितों के संभावित टकराव पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी. चंद्रशेखर ने इन रिपोर्टों को मानहानिकारक बताते हुए अदालत का रुख किया था.
2022 में वायरने ‘टेक फॉग’ नाम के कथित ऐप पर एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की. रिपोर्टों में दावा किया गया कि इस ऐप का इस्तेमाल भाजपा से जुड़े साइबर कार्यकर्ताओं द्वारा सोशल मीडिया पर ट्रेंड प्रभावित करने, कंटेंट को स्वचालित रूप से फैलाने और आलोचकों को निशाना बनाने के लिए किया जाता था.
रिपोर्टों ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचा. बाद में इन दावों के समर्थन में पेश किए गए सबूतों पर गंभीर सवाल उठे. मेटा से जुड़े विवाद के बाद द वायर ने टेक फॉग की रिपोर्टों को भी समीक्षा के लिए अपनी वेबसाइट से हटा दिया. बाद में उसने इसके लिए औपचारिक माफी भी मांगी. इस विवाद के बाद वायर की खूब किरकिरी होना लाज़मी थी और विश्वसनीयता पर भी सवाल उठे थे.
अक्टूबर 2022 में द वायर ने मेटा के ‘एक्सचैक’ कार्यक्रम से जुड़ी कई रिपोर्टें प्रकाशित कीं. रिपोर्टों का मुख्य दावा था कि भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय को इंस्टाग्राम की सामग्री हटाने के मामले में विशेष अधिकार प्राप्त थे. मेटा ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि द वायर की रिपोर्ट गलत थी और उसमें इस्तेमाल किए गए दस्तावेज कथित रूप से फर्जी थे. इसके बाद विवाद और बढ़ा, जब द वायर ने एक कथित मेटा कर्मचारी के ईमेल और आंतरिक सिस्टम से जुड़े अन्य सबूत प्रकाशित किए. मेटा, ने इन सामग्रियों की प्रामाणिकता पर भी सवाल उठाया.
जांच के दौरान दो विशेषज्ञों ने द वायर द्वारा उनके नाम से किए गए सत्यापन संबंधी दावों से दूरी बनाई. इसके बाद पोर्टल ने अपनी रिपोर्टों की आंतरिक समीक्षा शुरू की और 23 अक्टूबर, 2022 को मेटा से संबंधित रिपोर्टें औपचारिक रूप से हटा दीं. बाद में द वायर ने माना कि उसे दी गई सामग्री में धोखाधड़ी हुई थी और उसकी अपनी सत्यापन प्रक्रिया भी पर्याप्त नहीं थी. पोर्टल ने शोधकर्ता देवेश कुमार के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत भी की. पुलिस के अनुसार, शिकायत में फर्जी दस्तावेज तैयार करने और इस्तेमाल करने के आरोप लगाए गए थे.
मेटा ने अपनी ओर से कहा कि जिस सामग्री को द वायर ने आंतरिक इंस्टाग्राम सिस्टम का प्रमाण बताया था, वह वास्तव में बाहरी तौर पर बनाया गया मेटा वर्कप्लेस अकाउंट था. मेटा ने इसे जानबूझकर बनाया गया फर्जी सबूत बताया. यहां एक महत्वपूर्ण अंतर है. मेटा ने सामग्री को फर्जी बताया, जबकि द वायर ने अंततः अपनी रिपोर्टें वापस लेकर अपनी सत्यापन प्रक्रिया की विफलता स्वीकार की और शोधकर्ता पर धोखे का आरोप लगाया. इसी वजह से यह विवाद द वायर की रिपोर्टिंग में गंभीर संपादकीय चूक और उसकी सत्यापन प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों का प्रमुख उदाहरण बन गया. बात यहीं खत्म नहीं होती. वायर भारत, भाजपा, हिंदु और हिंदुत्व को घेरने उन्हें नीचे गिराने के लिए इतना उत्साहित हो जाता है कि रिपोर्ट की सच्चाई, सबूतो को छिपाने में पीछे नहीं रहता.
मेटा विवाद के बाद तत्कालीन भाजपा आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने द वायर के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई. अक्टूबर 2022 में दिल्ली पुलिस ने पोर्टल, उसके संस्थापक और संपादकों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की. इसमें धोखाधड़ी, जालसाजी, मानहानि और आपराधिक साजिश समेत कई धाराएं लगाई गईं.
31 अक्टूबर, 2022 को दिल्ली पुलिस ने द वायर के कार्यालय और कुछ कर्मचारियों के घरों में तलाशी ली और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण जब्त किए. इस कार्रवाई की लेफ्ट मीडिया और वामपंथी पत्रकार संगठनों ने आलोचना की. मेटा प्रकरण के बाद द वायर ने अपनी सत्यापन प्रक्रिया की समीक्षा की और माना कि उसे प्राप्त दस्तावेजों और स्रोतों की जांच में कमियां थीं. यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि इससे पहले उसी पत्रकारिता टीम से जुड़ी टेक फॉग रिपोर्टें भी समीक्षा के घेरे में आ चुकी थीं. एडिटर्स गिल्ड ने बाद में टेक फॉग से जुड़ी अपनी पूर्व टिप्पणियां हटा दीं और न्यूजरूम को संवेदनशील खबरों में तेजी के बजाय स्थापित पत्रकारिता मानकों और स्वतंत्र जांच पर जोर देने की बात कही.
द वायर के कानूनी विवाद 2022 पर खत्म नहीं हुए. 2023 में दिल्ली हाई कोर्ट ने एक पूर्व जेएनयू प्रोफेसर अमृता सिंह द्वारा दायर आपराधिक मानहानि मामले में द वायर के संपादकों के ख़िलाफ़ जारी समन रद्द कर दिए थे. जुलाई 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस फैसले को पलटते हुए समन रद्द करने के आदेश को दोबारा विचार के लिए हटा दिया और मामले को आगे बढ़ने दिया.
इस तरह द वायर के ख़िलाफ़ कानूनी मुकदमे उसके कामकाज का स्थायी हिस्सा बने रहे हैं. पोर्टल इन्हें अक्सर स्वतंत्र पत्रकारिता पर दबाव के तौर पर देखता है, जबकि शिकायतकर्ता पक्षों का तर्क रहा है कि पत्रकारिता की स्वतंत्रता किसी व्यक्ति या संस्था को गलत या मानहानिकारक सामग्री प्रकाशित करने की छूट नहीं देती.
2025 में द वायर के सामने एक नया कानूनी विवाद तब आया जब ऑपरेशन सिंदूर से संबंधित एक रिपोर्ट को लेकर असम पुलिस ने पोर्टल के संपादक सिद्धार्थ वरदराजन के ख़िलाफ़ भारतीय न्याय संहिता की धारा 152 के तहत एफआईआर दर्ज की. यह धारा भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित है.
द वायर और वरदराजन ने इस प्रावधान की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने वरदराजन और Foundation for Independent Journalism को उस FIR में किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से अंतरिम सुरक्षा दी.
इसी महीने असम पुलिस ने एक दूसरी एफआईआर में वरदराजन और वरिष्ठ पत्रकार करण थापर को भी बुलाया. इस मामले में भी धारा 152 सहित कई धाराएं लगाई गई थीं. 22 अगस्त, 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने वरदराजन, थापर और संस्था के सदस्यों को कोअर्सिव एक्शन से अंतरिम सुरक्षा दी और जांच में सहयोग करने को कहा.
इस विवाद ने पुराने राजद्रोह कानून की जगह लाई गई बीएनएस की धारा 152 को लेकर व्यापक बहस छेड़ी. द वायर का पक्ष था कि इस तरह के प्रावधान पत्रकारिता और अभिव्यक्ति पर ‘चिलिंग इफैक्ट’ डाल सकते हैं. दूसरी ओर, पुलिस की कार्रवाई कानून में निर्धारित राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े प्रावधानों के तहत हुई.
ऑपरेशन सिंदूर द वायर के लिए एक और महत्वपूर्ण वैचारिक परीक्षा के रूप में सामने आया. मई 2025 में पाकिस्तान और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी ठिकानों पर भारत की सैन्य कार्रवाई के बाद वायर ने सैन्य कार्रवाई, उसके परिणाम, सरकार के दावों और पाकिस्तान के साथ तनाव पर सवाल उठाने वाली रिपोर्टिंग और चर्चाएं प्रकाशित कीं. जो पहली जो पहली बार देखने पर भारत की बजाए पाकिस्तान के पक्ष में अधिक थी. ऑपरेशन सिंदूर के शुरुआती घंटों में वरदराजन और वायर पर पाकिस्तान के नैरेटिव को जमकर बढ़ावा दिया.
बाद में वायर ने भारतीय इंडोनेशिया में भारत के रक्षा अटेची कैप्टन शिव कुमार के उस बयान को प्रकाशित किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि शुरुआती चरण में भारतीय वायुसेना के विमान इसलिए खोए क्योंकि राजनीतिक नेतृत्व ने पाकिस्तानी सेना के ठिकानों और एयर डिफेंस को निशाना बनाने पर प्रतिबंध लगाया था.
भारतीय दूतावास ने उसी दिन इस बयान को संदर्भ से बाहर लिए जाने की बात कही और द वायर ने अपनी रिपोर्ट में बाद में स्पष्टीकरण जोड़ा. इस रिपोर्ट के बाद असम पुलिस ने बीएनएस की धारा 152 के तहत मामला दर्ज किया. जुलाई 2026 में, ऑपरेशन सिंदूर के एक साल बाद द वायर ने “If Operation Sindoor Produced a Winner, It Wasn’t India” शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया. इस तरह ऑपरेशन सिंदूर पर उसकी कवरेज भी उसके व्यापक आलोचनात्मक संपादकीय दृष्टिकोण की बहस का हिस्सा बनी.
द वायर की संपादकीय पोज़िशनिंग पर बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि वह मुस्लिम कट्टरपंथ और हिंदुत्व जैसे विषयों को किस फ्रेम में प्रस्तुत करता है.
द वायर ने मुस्लिम कट्टरपंथ या इस्लामी चरमपंथ पर कभी रिपोर्ट और लेख भी प्रकाशित किए. उदाहरण के लिए, 2016 में उसने “Why Sufism is Not the Answer to the Radicalisation of Muslims” शीर्षक से एक लेख प्रकाशित किया था, जिसमें मुस्लिम समाज में कट्टरपंथ और भारत में इस्लामी विचारधाराओं के विभिन्न रूपों पर चर्चा की गई थी. 2019 में द वायर ने “Why Indian Muslims Reject Extremist Doctrines” शीर्षक से भी एक लेख प्रकाशित किया, जिसमें भारतीय मुसलमानों के ट्रांसनेशनल चरमपंथी विचारधाराओं से दूरी बनाए रखने पर चर्चा की गई. वायर का इस तरह की स्टोरी करने का कारण भारत के मुसलमानो को एक अच्छी छवि में पेश करना था. आतंकवाद, कट्टरता, जिहाद और हिंसा वाली भारतीय मुस्लिम की इमेज को मिटाने और देश भक्त दिखने की कोशिशों में इस तरह के लेख बड़ी चालाकी से जनता के ज़हन में उतार दिए गए.
हालांकि, ऐसे विषयों की कवरेज में भी द वायर का व्यापक एडिटोरियल फ्रेम अक्सर मुस्लिम समुदाय को भेदभाव, हिंदुत्व की राजनीति का पीड़ित ही बताता है. इसका उदाहरण 2022 का एक लेख है, जिसका शीर्षक था, “Given the State of Indian Muslims Today, the Possibility of Radicalisation Cannot be Ruled Out.” लेख में भारतीय मुसलमानों के बीच कट्टरपंथ की संभावना पर चर्चा की गई, लेकिन इसके साथ ही लेखक ने आक्रामक हिंदुत्व, राजनीतिक बहिष्कार और समुदाय के प्रति कथित भेदभाव को भी कट्टरपंथीकरण के संदर्भ में प्रमुख कारणों के रूप में रखा.
इसी तरह द वायर पर प्रकाशित एक अन्य लेख का शीर्षक था, “Why Hindutva’s Dark Fantasy About India’s Muslims Could Become Real”, जिसमें 2014 के बाद भारतीय मुसलमानों को लेकर बनाए गए राजनीतिक और सामाजिक नैरेटिव की आलोचना की गई. अगर आप इस पैटर्न को देखेंगे तो पाएंगे कि द वायर भारत में इस्लामिक चरमपंथ और कट्टरता को खारिज कर देता है, जो संभावना भी पेश करता है उसकी जड़ में हिंदुत्व को दिखाने की कोशिश करता है.
द वायर की वैचारिक पोज़िशनिंग का दूसरा पक्ष हिंदुत्व और हिंदू समाज से जुड़े मुद्दों की उसकी भाषा और फ्रेमिंग में दिखाई देता है. उदाहरण के लिए, 2023 में द वायर पर प्रकाशित एक लेख का शीर्षक था, “Muslim Life in India Has Become Dangerously Uncertain.” लेख में भारत में मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ हिंसा पर चर्चा करते हुए यह सवाल उठाया गया कि क्या हिंसा हिंदू समाज के जीवन का हिस्सा बनती जा रही है. लेख के शीर्षक और तर्क ने हिंदू समाज के बारे में व्यापक जेनरलाइजडेशन के रूप में प्रस्तुत किया. हिंदू धर्म को लेकर झूठ और मनगढ़ंत बाते वायर के हर दूसरे लेख का हिस्सा होती हैं. हिंदुओं की अल्पसंख्यकों को लेकर हिंसक छवि पेश करना और सीधे तौर पर भारत की मूल रूप से अहिंसक जनता को लगभग एक दानव के रूप में पेश करना वायर की घटिया आदत है.
द वायर पर हिंदुत्व की आलोचना से जुड़े कई ओपीनियन आर्टिकल प्रकाशित हुए हैं. राहुल गांधी के संसद में भगवान शिव का अपमान करने के बाद, वायर ने भाजपा-आरएसएस के हिंदुत्व की तुलना करने वाले लेख का शीर्षक था, “Rahul Gandhi’s Humane Hinduism Totally Differs from Violent and Hateful Hindutva of BJP-RSS.” इन उदाहरणों के आधार पर यह कहना अधिक उचित होगा कि द वायर की ओपीनियन जर्नलिज़म में हिंदुत्व की आलोचना ही एक प्रमुख थीम रही है.
