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अंतरधार्मिक विवाह में महिलाओं के सांस्कृतिक अधिकार

हाल के वर्षों में अंतरधार्मिक विवाह भारतीय समाज में एक महत्वपूर्ण सामाजिक विषय बनकर उभरे हैं. बॉलीवुड से लेकर आम जीवन तक ऐसे विवाहों को अक्सर प्रेम, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में देखा जाता है. इन दिनों प्रसिद्ध अभिनेता आमिर खान एक बार फिर अपनी किसी फिल्म नहीं, बल्कि अपने निजी जीवन को लेकर चर्चा में हैं. ख़बरों के मुताबिक 60 वर्ष की आयु में वह तीसरी बार विवाह के बंधन में बंधने की तैयारी कर रहे हैं. दिलचस्प बात यह है कि उनकी संभावित जीवनसंगिनी भी गैर-इस्लामिक पृष्ठभूमि से संबंध रखती हैं. यही तथ्य उनके वैवाहिक जीवन को लेकर एक बार फिर नई चर्चाओं और बहसों को जन्म दे रहा है. हालांकि ऐसा मामला किसी व्यक्ति के निजी जीवन और उसकी स्वतंत्र पसंद होता है, लेकिन इसके बहाने एक व्यापक सामाजिक प्रश्न भी उभरता है, अंतरधार्मिक विवाहों में महिलाओं की सांस्कृतिक पहचान, धार्मिक विरासत और उनके सांस्कृतिक अधिकारों का स्थान क्या है? क्या विवाह के बाद दोनों पक्षों की सांस्कृतिक परंपराओं को समान महत्व मिलता है, अथवा समय के साथ किसी एक पहचान का प्रभाव अधिक प्रमुख हो जाता है? यही प्रश्न इस विषय को केवल एक सेलिब्रिटी के निजी जीवन से आगे बढ़ाकर व्यापक सामाजिक विमर्श का विषय बना देते हैं.

भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था, संस्कृति और जीवनशैली के साथ जीने की स्वतंत्रता प्रदान करता है. विवाह भी इसी व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है. किंतु जब दो भिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों के लोग विवाह बंधन में बंधते हैं, तब केवल दो व्यक्तियों का ही नहीं, बल्कि परंपराओं, सांस्कृतिक विरासतों और सामाजिक पहचान प्रणालियों का भी मिलन होता है. ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि विवाह के बाद दोनों पक्षों की सांस्कृतिक पहचान को समान सम्मान और संरक्षण किस प्रकार प्राप्त होता है ?

आमिर खान की पहली पत्नी रीना दत्ता थीं, जो एक हिंदू हैं. इस विवाह से उनके दो बच्चे-जुनैद खान और ईरा खान हैं. वर्ष 2005 में उन्होंने किरण राव से विवाह किया, जिनसे उनका एक पुत्र आज़ाद खान है. अब उनका नाम गौरी स्प्रैट के साथ जोड़ा जा रहा है, जो तमिल और आयरिश मूल की गैर-इस्लामिक पृष्ठभूमि से आती हैं. इस पूरे क्रम में एक तथ्य ध्यान आकर्षित करता है कि आमिर खान की सभी प्रमुख वैवाहिक और प्रेम संबंधों की साथी गैर-इस्लामिक पृष्ठभूमि से रही हैं, जबकि उनकी संतानों की सार्वजनिक पहचान “खान” उपनाम और इस्लामिक पहचान के साथ आगे बढ़ी है. ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इसे केवल प्रेम और व्यक्तिगत पसंद का मामला माना जाए, या फिर इसके पीछे किसी व्यापक सांस्कृतिक और धार्मिक षड्यंत्र की भूमिका भी देखी जानी चाहिए ? यदि इसे केवल व्यक्तिगत पसंद माना जाए, तो यह भी विचारणीय है कि इस क्रम में महिला सांस्कृतिक पहचान, उसकी पारिवारिक विरासत और अगली पीढ़ी की सामाजिक-धार्मिक पहचान किस प्रकार निर्धारित होती है. यही प्रश्न इस विषय को किसी एक व्यक्ति के निजी जीवन से आगे बढ़ाकर व्यापक सामाजिक विमर्श का हिस्सा बनाता है.

इसी तरह, शाहरुख खान का विवाह पंजाबी हिंदू परिवार की गौरी छिब्बर  से  1991 में हुआ था. जिसने बाद में उनकी पहचान गौरी खान के रूप में की जाने लगी.  उनके तीन बच्चे हैं- आर्यन खान, सुहाना खान और अबराम खान. इसी प्रकार सैफ अली खान ने पहले अमृता सिंह से विवाह किया, जिनसे उनके दो बच्चे हैं—सारा अली खान और इब्राहिम अली खान. बाद में सैफ ने 2012 में करीना कपूर खान से विवाह किया, जिनसे उनके दो पुत्र हैं—तैमूर अली खान और जहांगीर (जेह) अली खान. फिल्म निर्देशक कबीर खान और टीवी प्रस्तोता मिनी माथुर, जिनके दो बच्चे विवान कबीर खान और साइरा खान हैं. अभिनेत्री सोनाक्षी सिन्हा और अभिनेता ज़हीर इकबाल का विवाह भी अंतरधार्मिक वैवाहिक संबंधों का एक चर्चित उदाहरण है. वहीं, अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी का विवाह अंजलि पांडे के साथ हुआ जिसने इस्लाम अपनाकर कर खुद को  आलिया सिद्दीकी कहना शुरू कर दिया. उनके दो बच्चे हैं—शोरा सिद्दीकी और यानी सिद्दीकी. इसी प्रकार  नसीरुद्दीन शाह ने वर्ष 1982 में प्रसिद्ध अभिनेत्री रत्ना पाठक शाह से विवाह किया. इस दंपति के दो पुत्र हैं—इमाद शाह और विवान शाह. भारतीय क्रिकेटर   मंसूर अली खान पटौदी की शादी बंगाली हिंदू शर्मिला टैगोर से हुई जिन्होंने इस्लाम अपनाकर अपना नाम बेगम आयशा सुल्तान रख लिया. उनके तीन बच्चे हैं—सैफ अली खान, सबा अली खान और सोहा अली खान. वहीं, 1980 के दशक में भारतीय अभिनेत्री रीना रॉय जिनका असली नाम सायरा अली, जिनके पिता सादिक़ अली एक मुस्लिम और माता सारदा रॉय एक हिंदू थी. इसी क्रम में प्रसिद्ध गीतकार और कवि जावेद अख्तर ने हनी ईरानी से विवाह किया था, जो पारसी समुदाय से संबंध रखती हैं. इस दंपति के दो बच्चे हैं—फरहान अख्तर तथा और निर्माता जोया अख्तर. दूसरी ओर, हाल ही में एक ऐसा मामला भी सामने आया है, जिसमें एक हिंदू पुरुष ने मुस्लिम महिला से विवाह करने के लिए इस्लाम कबूल कर लिया. उत्तर प्रदेश के शामली निवासी व्यापारी आयुष मलिक ने मुस्लिम महिला चांदनी कुरैशी से विवाह करने के लिए इस्लाम धर्म अपनाया और अपना नाम बदलकर मोहम्मद अली रख लिया.

बॉलीवुड और तथाकथित सेक्युलर विमर्श में आमतौर पर इन वैवाहिक संबंधों को प्रेम, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अंतरधार्मिक विवाहों के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. लेकिन जब एक ही व्यक्ति के जीवन में बार-बार विवाह टूटते हैं और प्रत्येक बार उसका भावनात्मक या वैवाहिक जुड़ाव किसी गैर -इस्लामिक महिला के साथ दिखाई देता है, तब कुछ लोगों के मन में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठते हैं. क्या यह केवल संयोग है या फिर एक ऐसा पैटर्न है जो बार-बार स्वयं को दोहराता दिखाई देता है? या फिर इसके पीछे छिपा हुआ कोई इस्लामिक एजेंडा भी हो सकता हैं? क्या इसे बॉलीवूड का धर्मांतरण मॉडल कहना उचित नहीं  होगा? क्या कारण है की उम्र के इस पड़ाव पर भी सुविधाओं से युक्त एक इस्लामिक निष्ठ व्यक्ति को गैर -इस्लामिक महिला से शादी करनी पड़े? वस्तुतः यह बहस केवल आमिर खान तक सीमित नहीं है. यह बॉलीवुड में हो रही अंतरधार्मिक विवाहों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सांस्कृतिक पहचान, पारिवारिक मूल्यों के दोहरे मानदंडों पर भी प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है. इस तरह तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग इन रिश्तों को सेक्युलर नाम देकर आवरण का काम करता है, वही  अंतरधार्मिक विवाह से जन्मे बेटे अथवा बेटी के इस्लामिक पहचान और नाम को लेकर चुपी साध ली जाती है. बॉलीवुड की दुनिया में व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रेम के नाम पर प्रस्तुत किए जा रहे संबंधों के बीच एक गंभीर सवाल यह भी है कि क्या इन रिश्तों में महिलाओं और उनकी संतानों की सांस्कृतिक एवं धार्मिक पहचान को पर्याप्त महत्व दिया जाता है? आलोचकों का मानना है कि कई मामलों में विवाह के बाद महिला की मूल सांस्कृतिक पहचान धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श से ओझल हो जाती है, जबकि बच्चों की पहचान प्रायः विशेष धार्मिक या इस्लामिक  ढांचे में परिभाषित होती दिखाई देती है.

यदि इस प्रश्न को नारीवादी और मानवाधिकार दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह केवल विवाह या धार्मिक पहचान का विषय नहीं रह जाता, बल्कि महिला की स्वायत्तता, सांस्कृतिक अधिकारों और समान प्रतिनिधित्व का प्रश्न बन जाता है. आधुनिक नारीवादी विमर्श लंबे समय से इस बात पर बल देता रहा है कि महिलाओं को केवल जीवनसाथी चुनने की स्वतंत्रता ही नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक परंपराओं और पहचान को संरक्षित रखने का भी समान अधिकार होना चाहिए. इसी प्रकार मानवाधिकारों की सार्वभौमिक अवधारणा प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संस्कृति, भाषा, परंपराओं और आस्था को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का अधिकार प्रदान करती है. ऐसे में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि अंतरधार्मिक विवाहों में महिला की सांस्कृतिक विरासत और उसकी पहचान को कितना स्थान मिलता है तथा संतानों की पहचान के निर्धारण में उसकी भूमिका कितनी प्रभावी रहती है ?

यह स्थिति कई प्रश्न खड़े करती है. एक ओर बॉलीवुड स्वयं को महिला स्वतंत्रता, महिला अधिकारों और समानता का मुखर समर्थक बताता है, वहीं दूसरी ओर अंतरधार्मिक विवाहों में महिलाओं की सांस्कृतिक विरासत और उनकी कोख से जन्मे पुत्र-पुत्रियों की धार्मिक पहचान और विकल्पों पर शायद ही कभी खुली चर्चा होती हो?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी यह चर्चा का विषय रहा है. इस्लामी परंपरा की  अनेक पारंपरिक व्याख्याओं और  इस्लामी न्यायशास्त्र (फिक्ह) में मुस्लिम पुरुषों को कुछ परिस्थितियों में गैर-मुस्लिम महिलाओं से विवाह की अनुमति दी गई है, जबकि मुस्लिम महिलाओं के लिए गैर-मुस्लिम पुरुषों से विवाह को मान्यता नहीं दी जाती. इस कारण कई देशों में विवाह के लिए धर्म परिवर्तन की सामाजिक या पारिवारिक अपेक्षाएं देखी गई हैं. रिसर्चगेट में प्रकाशित शोध ‘अंतरधार्मिक विवाह और धार्मिक रूपांतरण: सबा, मलेशिया में मुस्लिम धर्मान्तरित लोगों का एक केस स्टडी’ में पाया गया कि सबाह (मलेशिया) में अंतरधार्मिक विवाह और इस्लाम धर्म स्वीकार करने की प्रक्रिया के बीच घनिष्ठ संबंध है. अध्ययन के अनुसार, अंतरधार्मिक विवाह अनेक मामलों में धर्मांतरण का प्रमुख कारण बनता है, जिसके परिणामस्वरूप सबाह में मुस्लिम धर्मांतरितों की संख्या मलेशिया में सर्वाधिक दर्ज की गई है. अध्ययन के निष्कर्षों के अनुसार, सबाह के स्थानीय समाज में अंतरधार्मिक विवाह के कारण होने वाला धर्मांतरण एक सामान्य सामाजिक प्रवृत्ति के रूप में विकसित हो चुका है.

वैश्विक स्तर पर भी यह बहस लगातार प्रासंगिक होती जा रही है. बहुसांस्कृतिक समाजों में पहचान और विरासत को केवल व्यक्तिगत पसंद का विषय नहीं माना जाता, बल्कि उसे सांस्कृतिक अधिकारों के रूप में भी देखा जाता है. संयुक्त राष्ट्र सहित अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सांस्कृतिक विविधता और सांस्कृतिक अधिकारों के संरक्षण को मानवाधिकारों का अभिन्न अंग मानती हैं. ऐसे में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि अंतरधार्मिक विवाहों में महिला की सांस्कृतिक विरासत, उसकी धार्मिक पहचान और अगली पीढ़ी तक उसके सांस्कृतिक मूल्यों के हस्तांतरण को कितना स्थान प्राप्त हो रहा है.

वस्तुतः यह बहस किसी एक अभिनेता, परिवार या समुदाय तक सीमित नहीं है. प्रश्न यह है कि यदि अंतरधार्मिक विवाह वास्तव में समानता, प्रेम और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रतीक हैं, तो फिर अधिकांश चर्चित उदाहरणों में सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का प्रवाह एक ही दिशा में क्यों दिखाई देता है? क्यों संतानों की सार्वजनिक पहचान प्रायः एक विशेष धार्मिक ढांचे के भीतर परिभाषित होती है, जबकि मातृ पक्ष की सांस्कृतिक विरासत धीरे-धीरे सार्वजनिक विमर्श से ओझल होती चली जाती है? क्या यह केवल संयोग है, सामाजिक परंपरा है. वास्तव में इसके पीछे हिंदू देश भारत में इस्लाम को बढ़ाने की एक गहरी वैचारिक, सांस्कृतिक और संस्थागत प्रवृत्ति कार्य कर रही है. इन प्रश्नों पर गंभीर चर्चा से बचना न तो महिला अधिकारों के पक्ष में है और न ही वास्तविक सामाजिक समानता के. जब तक अंतरधार्मिक विवाहों में विवाहित महिलाओं  की सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक पहचान और अगली पीढ़ी के विकल्पों पर समान रूप से खुला विमर्श नहीं होगा, तब तक व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बहस अधूरी ही मानी जाएगी.

गजेंद्र सिंह
गजेंद्र सिंह
गजेंद्र सिंह एक लेखक, लोक नीति विश्लेषक, एवं सामाजिक विकास क्षेत्र के पेशेवर हैं, जिनके पास शासन, शिक्षा, नेतृत्व विकास और सामुदायिक सशक्तिकरण के क्षेत्र में डेढ़ दशक से अधिक का अनुभव है.