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इकोसिस्टम के चुनाव आयुक्त – एस वाई कुरैशी

पूर्व चुनाव आयुक्त कुरैशी का मुसलमान और घुसपैठियों के लिए प्रेम

कुछ स्वार्थी लोग देश की सामाजिक संरचना के साथ छेड़छाड़ करने की घिनौनी कोशिशों में लगे हैं, जिससे भारत की लोकतांत्रिक संरचना को ख़तरा है’
‘भारत का लोकतंत्र कमज़ोर होता जा रहा है.एसआईआर प्रक्रिया भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय है.

एक जैसे दिखने वाले इन दोनों बयानों को यदि कोई बिना संदर्भ के पढ़े तो निश्चित ही यह मान लेगा कि दोनों बयानों को देने वाला व्यक्ति एक ही होगा लेकिन ऐसा नहीं है. पहला बयान है भारतीय मुसलमानों के आदर्श, 1947 में मौका होने के बावजूद दूसरे मुल्क न जाकर भारत राष्ट्र को कृतज्ञ कर देने के स्वप्न में रहने वाले मौलाना अरशद मदनी का और दूसरा बयान है सेंट स्टीफन और जामिया मिलिया जैसे आधुनिक संस्थानों से पढ़े, तरक्की पसंद परिवार से आने वाले और खुद को लोकतंत्र का पैगंबर मानने वाले पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी का. निजी जीवन में उपलब्धियों के दो अलग ध्रुवों पर होने के बावजूद भी इतनी वैचारिक समानता आखिर क्यों है? इसका एकमात्र कारण इन तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि में बसी वैचारिक मतांधता है और इसके उदाहरण आमिर खान, पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी से लेकर वर्तमान में एस वाई कुरैशी तक है जो पहले सत्ता सुख भोग लेने के बाद जब स्वयं को उससे दूर पते है तो फिर संविधान, लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों के द्वारा अपनी निजी कुंठा को व्यक्त करते है. बाकी अपनी बात को तर्क और तथ्य से कटता देख विक्टिम कार्ड खेलने का हुनर तो इनमें है ही. पूर्व चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी भी इसी लीग के माहिर खिलाड़ी है.

कुरैशी साहब हाल में चुनाव आयोग के आलोचक के रूप में उभरे है मगर इनके इस उभार और विपक्ष द्वारा चुनाव आयोग को निशाना बनाए जाने का समय समान है. अद्भुत संयोग है कि यह समानता केवल समय की ही नहीं बल्कि दोनों के विचारों की भी है. 2023 में जब सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून बनाया तो इन्होंने उसे मनमाना और सरकार का चुनाव आयोग में बढ़ते प्रभाव के रूप में देखा और आलोचना की. मगर इन्होंने बहुत बारीकी से इस तथ्य को नजरंदाज कर दिया कि 2023 से पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य आयुक्तों की नियुक्ति केवल सरकार करती थी. शायद कुरैशी साहब ये भूल गए कि 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने जब इनकी नियुक्ति की थी तो उस पर हस्ताक्षर उस समय के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद के थे न कि भारत के राष्ट्रपति के और उस नियुक्ति पर उस समय के विपक्ष की भी कोई सहमति नहीं ली गई थी. इन सबसे इतर 2023 का बिल न केवल नियुक्ति की अंतिम शक्ति राष्ट्रपति को देता है बल्कि चयन प्रक्रिया में विपक्ष के नेता को भी शामिल करता है. कुरैशी साहब ने अपनी मतांधता में इन तमाम तथ्यों को छोड़ दिया और केवल नाहक विरोध का रास्ता चुना.

अपने लगभग हर इंटरव्यू में इनका एक चित परिचित बयान होता है कि इन्होंने अपने समय में विपक्ष को विशेष सहयोग दिया और कभी भी सरकार के किसी दबाव में नहीं आए. पहली बात तो यह है कि चुनाव आयोग का काम किसी पक्ष को समर्थन या किसी पर नकेल कसना नहीं होता. वह केवल निष्पक्ष और शांतिपूर्वक चुनाव कराने और चुनाव की अन्य तैयारी करने के लिए होता है. और जहां तक बात इनके द्वारा बराबरी के व्यवहार की है तो कुरैशी साहब के कार्यकाल में तमाम शिकायतों के बावजूद कभी भी एक एफआईआर तक दर्ज नहीं हुई बल्कि हर बार नोटिस या चेतावनी देकर बात को निपट दिया गया. इनके पूरे कार्यकाल की उपलब्धि ये रही है कि इन्होंने एक दफा सलमान खुर्शीद द्वारा चुनाव में प्रलोभन देने पर उन्हें सेंसर किया था. आज कल चुनाव आयोग पर सरकार का पिट्ठू होने का आरोप लगते हुए वह नहीं बताते कि कैसे सलमान खुर्शीद पर कार्यवाही करने के बाद इन पर दबाव बनाया गया और थक हार कर आखिर में इन्हें राष्ट्रपति से हस्तक्षेप करने की मांग करनी पड़ी. अपनी किताब इंडिया एण्ड आई: ए हंड्रेड मेमोरीज पर इसी विवाद के संबंध पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा आत्महत्या करने की बात कहने का दावा किया गया. यहां यह दिखाने का प्रयास करते है कि कांग्रेस और मनमोहन सिंह कितने बड़े लोकतंत्रवादी थे मगर वह इस तथ्य को बड़ी चतुराई से छिपा जाते है कि जब कुरैशी साहब कुछ चुनाव व्यवस्था में कुछ करना चाहते थे और तत्कालीन कानून मंत्री वीरप्पा मोइली इसका समर्थन कर रहे थे तो उन्हें हटाकर सलमान खुर्शीद को कानून मंत्री बनाया गया जिनका उन सुधारों के प्रति कोई रुझान नहीं था.

कुरैशी साहब हर बार जब चुनाव आयोग पर आरोप लगाते है तो वह कहानी का अपना हिस्सा बताते है और अन्य हिस्से को बहुत चालाकी से छिपा लेते है. हर बार उनके पास अपने अनुभव के रूप में लिप्त हुआ कोई पुराना घिसा पिटा सिद्धांत होता है जिसे वह अपनी अति गम्भीर मुद्रा में यों बताते है कि मानों उनके जैसा चुनाव आयुक्त न कभी हुआ है न कभी होगा, बिल्कुल न भूतों न भविष्यति वाले भाव से. किसी भी चुनाव से संबंधित तकनीकी मुद्दे पर अपने ज्ञान का प्रयोग वह ऐसे करते है कि उनकी और विपक्ष की सोच लगभग समान ही होती है. जब कभी सत्ता पक्ष की तरफ से चुनाव आयोग पर कोई टिप्पणी की जाती है तो वह उस सवाल को चुनाव आयोग की गरिमा से जोड़ते है और अपनी व्याकुलता से अधीर हो अपनी आहत आत्मा के साथ चुनाव आयोग के सम्मान में खड़े हो जाते है, बड़े-बड़े लेख लिखे जाते है, संस्थाएं ही राष्ट्र की धरोहर है का ज्ञान दिया जाता है मगर जब विपक्ष द्वारा क्रमबद्ध तरीके से रणनीति बनाकर चुनाव आयोग पर हमला किया जाते है तो वह अचानक से लोकतांत्रिक हो उठते है, उनके अंदर का नागरिक भाव जग उठता है और वह अभिव्यक्ति की आजादी, उत्तरदायित्व, आलोचना इत्यादि के महत्व पर बखान देते हुए पाए जाते है.

लोकतंत्र पर उनका विलाप भी चयनात्मक होता है. उदाहरण के लिए पश्चिम बंगाल के पिछले चुनावों में हुई हिंसा और बांग्लादेश से बंगाल में घुसने वाले मुस्लिमों पर वह कुछ नहीं कहते पर वहां शांति के लिए उठाए गए कदमों के मनोवैज्ञानिक प्रभाव के स्वरूप मतदाताओं पर पड़ने वाला प्रभाव उन्हें चिंतित कर देता है. इसका एक अन्य उदाहरण ईवीएम को लेकर फैलाए जा रहे झूठ पर इनकी चुप्पी भी है. चुनावी मामलों पर अपनी विशेषज्ञता को सर्वोपरि मानने वाले पूर्व चुनाव आयुक्त कभी भी गलत तथ्यों पर जवाब देते नहीं मिलें. उस समय इन्हें न तो चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा का ध्यान आता है और न ही अपनी विशेषज्ञता याद आती है. पश्चिमी हिप हॉप संगीत के शौकीन कुरैशी साहब इस बात का सदैव खयाल रखते है कि उनका राजनीतिक धुन वाम की तरफ ही रहे.

इनकी यह धुन प्रियता इलेक्टोरल बॉन्ड मामले में भी देखने को मिली. सरकार ने चुनावी फन्डिंग को बैंकिंग सिस्टम के माध्यम से करवाने के लिए नियम बनाया जिसमें 2000 रुपए से ऊपर के चंदे के लिए बैंकिंग माध्यम का उपयोग अनिवार्य किया. इससे पूर्व चंदा देने का कोई भी आधिकारिक रास्ता नहीं था. 2024 फरवरी में सर्वोच्च न्यायालय ने सूचना के अधिकार और अभिव्यक्ति की आजादी और चंदे की इस व्यवस्था में विरोध बताकर निरस्त कर दिया. निरस्त करते समय न्यायालय ने कोई भी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं दी. ऐसे में भारतीय चुनाव व्यवस्था के स्वघोषित जानकार ने इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए वरदान बताते हुए न्यायालय की जयकार-जयकार में स्वयं को लीन कर लिया. यहां वे एक बार फिर अपने ज्ञान और समझ से विमुख हो गए. संभवतः वे भूल गए कि भारतीय चुनाव व्यवस्था में नगद का कितना दुरुपयोग होता है. वे उस वक़्त को भूल गए जब संसद में रुपए लहराए गए थे. इन्होंने न्यायालय के समर्थन में लेख लिखे, बड़े-बड़े सेमिनारों में भाषण दिए लेकिन यह नहीं बताया कि अब चंदे का माध्यम क्या होगा और उसका हिसाब-खिताब किस प्रकार रखा जाएगा?

कुरैशी काले धन के प्रयोग पर भी पूरी तरह मौन रहे. यहां उनके इस अंध समर्थन का कारण सिवाय राजनीति के कुछ भी नहीं था. यदि 2004-05 और 2012-13 के बीच का समय देखा जाए तो इस पूरे दौर में राजनीतिक पार्टियों की कुल कमाई का लगभग 73 प्रतिशत ऐसे स्रोतों से आया जिनके बारे में जानकारी नहीं थी. इस समय में कुरैशी साहब चुनाव आयुक्त के पद पर थे. उन्होंने इससे निपटने के लिए क्या किया? इसका जवाब किसी के पास नहीं है.

हर चुनाव में प्रत्याशी तय सीमा से ज्यादा खर्च करते है, इस पर भी इनके कारनामों का कोई लेखा-जोखा नहीं है. दरअसल इनके कार्यकाल में किसी भी ऐसे काम की बानगी नहीं है जिसने भारतीय चुनाव व्यवस्था में आमूल चूल परिवर्तन किया हो. भले ही इनकी निजी उपलब्धि शून्य हो पर उपदेश देने पर इनका कोई सानी नहीं है और अपनी इसी आदत की वजह से वह स्वयं को पर्याप्त आलोचना का पात्र बना चुके है पर ‘बदनाम होंगे तो नाम न होगा’ का अमर मंत्र तो कुरैशी साहब ने पहले ही सीख लिया था.

2020 में दिल्ली चुनाव के दौरान कुछ नेताओं के तथाकथित हेट स्पीच से व्याकुल कुरैशी ने चुनाव आयोग की आलोचना में लेख लिखा पर उस समय चुनाव आयोग ने जवाब देते हुए इन्हें ‘चयनात्मक भुलक्कड़’ घोषित किया और बताया कि इनके समय सम्पन्न हुए चुनावों में तमाम शिकायतों के बावजूद भी एक एफआईआर तक नहीं दर्ज कराई गई. उस समय ‘मौन भी अभिव्यक्ति है’ को मंत्र मानते हुए इन्होंने उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और बात आई गई हो गई.

हाल में इन साहब को चुनाव आयोग द्वारा किए जा रहे विशेष गहन पुनिरीक्षण प्रक्रिया यानी एसआईआर से व्यथित देखा जा रहा है. लगभग हर सप्ताह किसी न किसी अखबार में लेख लिखकर या फिर अन्य माध्यमों में इंटरव्यू देकर एसआईआर की आलोचना के बहाने चुनाव आयोग और सरकार को कोसते नजर आते है. इनके तर्क सदा ही या तो उलझाऊ होते है या फिर इनकी विशेषज्ञता में लिपटे हुए किसी झूठ की तरह गलत और निराधार. सर्वप्रथम तो इन्होंने चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया संचालित करने की शक्ति पर ही सवाल खड़े कर दिए. इनके अनुसार संविधान में चुनाव आयोग को ऐसी कोई शक्ति ही नहीं दी गई है जिसके तहत वह एसआईआर की प्रक्रिया कर सके और न ही ऐसा कोई कानून है. शायद अपनी वैचारिक सनक के चलते वह ये भूल गए कि जन प्रतिनिधित्व कानून के अंतर्गत चुनाव आयोग को साफ तौर पर मतदाता सूची से संबंधित सभी शक्तियां प्राप्त है.

इन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर पिछली कांग्रेस सरकारों के समय भी एसआईआर प्रक्रिया की गई है. इतना ही नहीं इन्हें इस बात से भी समस्या है कि एसआईआर प्रक्रिया को न्यायालय के संज्ञान में रखकर क्यों किया जा रहा है? वह इसे अनावश्यक और गलत बताते है क्योंकि ये न्यायालय का समय खराब करेगा और उसके अनावश्यक दखल को बढ़ाएगा. एसआईआर प्रक्रिया पर न्यायालय के संज्ञान को अनुचित बताते हुए कहते है कि ये ठीक वैसे ही है जैसे किसी चौराहे पर जाम लग जाने पर सेशन जज को भेज दिया जाए. इनकी यह उपमा सुनकर हिंदी व्याकरण और तर्कशास्त्र दोनों लज्जित महसूस करें. पहली बात तो यह कि न्यायालय का संज्ञान इसलिए आवश्यक है ताकि बाद के वाद विवादों में न्यायालय को संदर्भ पता रहें और दूसरा, किसी चौराहे पर लगे जाम से दुनिया के सबसे बड़े और पुराने लोकतंत्र की मतदाता सूची के निरीक्षण की तुलना करना ठीक वैसे ही है जैसे बच्चों के चोर पुलिस के खेल से ईरान इजराइल युद्ध की तुलना करना मगर कुरैशी साहब तो दोनों ध्रुवों को एक साथ साधने वाले ठहरे तो ये तुलना भी कर बैठे.

यह पहली बार नहीं ही जब इन्होंने ऐसी विरोधाभासी बात कही हो. एसआईआर प्रक्रिया के दौरान ही इन्होंने कहा कि भारत का लोकतंत्र खतरे में है और एसआईआर प्रक्रिया पूरी तरह से फर्जी है. यहां तक कि इन्होंने इस प्रक्रिया में शामिल लोगों के ख़िलाफ़ आपराधिक केस दर्ज कर कार्यवाही करने की मांग करी. इन्होंने अंदेशा जताया कि एसआईआर प्रक्रिया के माध्यम से मुसलमानों को निशान बनाया जाएगा और उन्हें मत के अधिकार से वंचित किया जाएगा. कुरैशी साहब की उम्मीदों पर खरा उतरने में जब चुनाव आयोग सफल नहीं हो पाया तो इन्होंने एक नए तरीके से आलोचना करने की ठानी और दिल्ली की एसआईआर प्रक्रिया के ड्राफ्ट से कटे नामों को भारत की जनसंख्या में 15 प्रतिशत की कमी से जोड़कर जनसंख्या नियंत्रण की शुभकामनाएं तक दे डाली.

इनकी इस उपमा को देखकर इस बात की खुशी हुई कि इन साहब का शौक पश्चिमी हिप हॉप म्यूजिक में है अन्यथा यह साहित्य का क्या हाल करते? यहां ये दो तरीके से गलत थे, पहला यह कि जो नाम कटे है उनमें सिर्फ मुसलमान ही नहीं है बल्कि हिंदू भी है और वो भी मुसलमानों से संख्या में अधिक. ऐसे में विक्टिम कार्ड और चुनाव आयोग पर मुसलमान विरोधी होने के आरोप लगाने की सभी संभावनाएं तो खतम हो गई. दूसरा पहलू इसका ये है कि यहां पर ये साहब भी केवल डर फैलाकर अपने को विपक्ष की लाइन से जोड़ना चाहते है अन्यथा केवल रफ ड्राफ्ट के आधार पर 15 प्रतिशत आबादी के नाम कटने की बात कहना कितना तर्कसंगत है? चुनाव आयोग ही कम से कम दो मौके देगी जहां कोई व्यक्ति अपनी पात्रता सिद्ध करके नाम जुड़वा सकता है. इसके बाद भी चुनाव आयोग और न्यायालय दोनों ही इस विषय पर मामले सुनकर निस्तारण करते है. अतः ऐसे में इसे जनसंख्या नियंत्रण से जोड़ कर स्वयं को महान व्यंग्यकार समझना उचित नहीं है.

दरअसल अपनी विशेषज्ञता के भाव में मुग्ध इन साहब को यह नहीं पता कि 140 करोड़ के देश में एसआईआर जैसी प्रक्रिया का जटिल होना निश्चित है और इसलिए ही इसे इस तरह से संयोजित किया जाता है कि ये विभिन्न चरणों में हो और नाम जुड़वाने के भी कई मौके मिले. न्यायालय और चुनाव आयोग भी अपने स्तर से इन मामलों को सुनने की व्यवस्था करता है. साथ ही साथ हर चुनाव के पहले नाम जुड़वाने की प्रक्रिया भी आजादी के बाद से चली या रही है मगर सामान्य जानकारी से विमुख होकर राजनीतिक फायदे के लिए डर फैलाकर स्वयं को विपक्ष के विचार से जोड़ने की विकलता सब कुछ भूला देती है.

इनके अनुसार एसआईआर प्रक्रिया बहुत ही मृदु और लिबरल तरीके से हो जैसा की पहले होता था मगर इस मृदुता की कीमत क्या होगी? इसकी कीमत उन करोड़ों लोगों के मतदाता बनने के रूप में होगी जो इस देश के नागरिक नहीं है. भारत में पहले से ही घुसपैठ की समस्या है जो राष्ट्र के संसाधनों पर दीमक के साथ-साथ सुरक्षा की भी चुनौती पेश करते है. जब से दुनिया में प्रतिस्पर्धा बढ़ी है तब से देशों का दूसरे देशों में अलगाव आंदोलनों को प्रोत्साहित करने की प्रवृत्ति देखी गई है. उदाहरण के लिए मणिपुर में हिंसा के पीछे का समर्थन म्यांमार से घुसपैठ के ज़रिए आता है इसलिए बहुत आवश्यक है कि एसआईआर और एनआरसी जैसी प्रक्रियाएं हो. वरना कुछ लोगों के राजनीतिक स्वार्थ के कारण राष्ट्र की एकता भंग हो जाएगी. कुरैशी साहब शायद इस महत्वपूर्ण पक्ष को नजरअंदाज करते है क्योंकि यह उनकी विचारधारा के अनुकरणीय है और शायद इसलिए ही वह इस काम में जितनी बाधा डाल सकते है पूरी शिद्दत से डालते है तभी तो वह यह आरोप लगाते है कि व्हाट्स अप मैसेज के ज़रिए अधिकारियों को नाम काटने के निर्देश मिलते है यानि लाखों नाम काटने का निर्देश किसी ने मैसेज के ज़रिए किया था. इस आरोप की गंभीरता और व्यावहारिकता ही इसकी सत्यता बता देती है.

कुरैशी साहब की कार्यप्रणाली पर निशान साधते हुए उन्हें गोड्डा से सांसद निशिकांत दुबे ने मुस्लिम आयुक्त कहा था. बाद में अपने एक इंटरव्यू में बताया 2009 में उनकी लोकसभा में मुसलमान लगभग 2 लाख थे जो आज 4 लाख के करीब है. कुरैशी के कार्यकाल में मुस्लिम वोटरों की संख्या में 170% की वृद्धि हुई जबकि हिंदू वोटरों में मात्र 12% की वृद्धि हुई.

इन तमाम तथ्यों, तर्कों से गुजरने के बाद आसानी से यह जाना जा सकता है कि भले ही कुरैशी पूर्व में भारत के चुनाव आयुक्त रहें हो पर आज वे केवल विपक्षी इकोसिस्टम के चुनाव आयुक्त बनकर रह गए. हर घटना पर उनकी प्रतिक्रिया उनके अवसरवादी होने का प्रमाण देती जहां वह केवल अपने वैचारिक आग्रहों से संचालित दिखते है न कि तर्क और तथ्य से. वे अपने पूर्वाग्रहों को सही साबित करने के लिए कुतर्क तक की सीमा तक जाते है. वे न तो तकनीकी पक्ष को स्वीकार करते है और न ही चुनावी प्रक्रियाओं के महत्व को स्वीकार करते है. वे चुनाव आयोग पर आरोप तो लगते है पर कोई तथ्य नहीं देते, सब कुछ उनके अनुभव पर आधारित होता है और उनके अनुभव तो उपरोक्त प्रकरणों से जाने ही जा सकते है.                    

नित्य नगीना मिश्र
नित्य नगीना मिश्र
नित्य नगीना मिश्र भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली में पत्रकारिता के छात्र हैं.