उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को वक्त से पहले इसी साल नवंबर तक कराने की ख़बरों के बीच सभी दलों ने चुनाव के लिए अपनी कमर कस ली है. लंबे समय तक सत्ता से दूर रहने वाली समाजवादी पार्टी की बेचैनी उसकी जाति आधारित और लोगों को बांटने वाली रणनीति में साफ़ दिखाई देती है. अखिलेश यादव बीते कुछ सालों से पीडीए के अपने फॉर्मूले को आज़माने में लगे हुए हैं. यह फॉर्मूला पूरी तरह देश, समाज को आपस में बांटने और जातियों को एक-दूसरे से भिड़ाकर वोट बटोरने पर आधारित है. समाजवादी पार्टी जहां किसी दलित पर हिंसा होने पर बवाल मचा देती है वहीं सवर्ण और उन्य जातियों द्वारा झेले जाने वाले दुख पर चुप्पी साधे रखती है. जाति की इस ख़तरनाक चाल को चलने में अखिलेश यादव अभी तक पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं लेकिन आगामी विधानसभा चुनाव में वह इस चाल को हर संभव तरीके से पार लगाने की कोशिश करेंगे.
लोकसभा चुनावों के नतीजे में अपनी उम्मीद से बेहतर परिणाम पाने के बाद उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव में उत्साहित समाजवादी पार्टी पीडीए के अपने नवीन सिद्धांत को लेकर जीत के लिए अति उत्साहित दिखाई दे रही है.
समाजवादी पार्टी के सिद्धांत और वैचारिक रणनीति, दोनों में हमेशा से ही संदेह रहा है. लेकिन क्या पीडीए का यह सिद्धांत समाजवादी पार्टी की वैचारिक रणनीति से मेल खा सकेगा. 1992 में सपा की स्थापना के बाद से ही समाजवाद के नाम पर सपा में पूंजीपतियों का ही बोलबाला रहा है. सुब्रत रॉय सहारा, अमर सिंह और बॉलीवुड का गठजोड़ सैफई महोत्सव में पीडीए की तिलांजलि देता दिखता था. पीडीए में आने वाले तीनों समुदाय गांव, जमीन और किसान से जुड़े हुए हैं जबकि सपा का पूरा कल्चर ही भौकाल और आधुनिकता के इर्द-गिर्द घूमता है.
पीडीए की जो कई परिभाषाएं पार्टी द्वारा दी गई हैं, उनमें से पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक सबसे ज्यादा प्रचारित की जाती है. बात अगर पिछड़ों की की जाए तो समाजवादी पार्टी का पिछड़ों के नाम पर ‘यादव राज’ का इतिहास रहा है. वर्ष 2012 के चुनावों में जब सपा की आखिरी सरकार बनी थी, तो 70 से ज्यादा विधायक यादव थे.
फूलन देवी के नाम को आगे कर उन्हें पीडीए का हथियार बनाने वाली सपा, क्या दलित समुदाय से आने वाली उत्तर प्रदेश की सबसे बड़ी महिला नेताओं में से एक प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के साथ हुए ‘गेस्ट हाउस कांड’ को पीडीए के आंदोलन में स्वर्ण पदक की तरह देखेगी?, क्या उस घटना से सपा के दामन पर जो दाग लगे, उनको धो पाएगी.
यदि समाजवादी पार्टी की सरकारों के दौर को देखा जाए, तो सर्वाधिक दलित उत्पीड़न के मामले सपा के कोर वोट बैंक यादव समुदाय पर ही आते थे. संविधान की कसमें खाते हुए सपा के आज़म खान द्वारा संविधान सभा के सदस्य डॉ. बी.आर. अंबेडकर को ‘भू-माफिया’ कहना, उसके मूल दलित-विरोधी चरित्र को उजागर करता है.
बात अगर अल्पसंख्यकों की की जाए, तो तुष्टीकरण के चक्कर में 2012 के चुनावों में 4 प्रतिशत आरक्षण का वादा कर उनका वोट बटोरने वाली सपा, 5 वर्ष तक आरक्षण क्यों नहीं दे पाई. मुस्लिमों को बीजेपी का डर दिखाकर उनका एकमुश्त वोट लेने के बाद, समाजवादी पार्टी के 37 लोकसभा सांसदों में से केवल 4 सांसद मुस्लिम समुदाय से आते हैं. सपा की सरकार में मुस्लिम समाज न केवल असुरक्षित था बल्कि पीड़ित और पिछड़ा भी था. जो यह दिखाता है कि सपा के लिए मुसलमान सत्ता प्राप्ति का एक साधन है.
पीडीए के नाम पर जीत की हुंकार भरती सपा का 2024 के लोकसभा चुनावों के आधार पर जीत की उम्माद लगाना इसलिए बेहद हास्यास्पद लगता है, क्योंकि 2024 के चुनावों में बीजेपी के सांसदों के ख़िलाफ़ जन-आक्रोश साफ़ दिखता था जिसका भरपूर फायदा सपा को मिला.
इसके बावजूद, बीजेपी आज भी गैर-यादव पिछड़ों और दलितों को सर्वाधिक प्रतिनिधित्व देने वाली पार्टी बनी हुई है. बीजेपी की ही सरकार ने एससी/एसटी एक्ट पर अध्यादेश लाकर दलितों में अपना विश्वास बढ़ाया. बीजेपी के 253 विधायकों में से लगभग 100 विधायक ओबीसी समुदाय से आते हैं, जो किसी भी राजनीतिक दल के लिए गैर-यादव ओबीसी समुदाय का अब तक का सर्वाधिक अनुपात है.
बीजेपी ने अत्यंत पिछड़ा वर्ग (ईबीसी) से आने वाले स्वर्गीय कल्याण सिंह को दो बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया और खुद प्रधानमंत्री मोदी भी ओबीसी समुदाय से आते हैं. ऐसे में, यह कहना कि ओबीसी समुदाय सपा की तरफ झुक चुका है—यह मान लेना अभी बहुत जल्दबाज़ी होगी.
समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्य और ओबीसी समाज में कुर्मी समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले बेनी प्रसाद वर्मा, जो एक समय नेता जी मुलायम सिंह यादव के बाद मुख्यमंत्री पद के दावेदार माने जाते थे, को अपने परिवार को आगे रखने और यादव पॉलिटिक्स के नाम पर पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया.
2012 में पूर्ण बहुमत की समाजवादी सरकार में करीब 15 ओबीसी मंत्रियों की शपथ हुई थी, जिसमें से 9 यादव और बाकी के 6 दूसरे ओबीसी समाज से थे. क्या यह काफी नहीं है यह समझने के लिए कि समाजवादी पार्टी में कुछ भी पीडीए नहीं बल्कि सबकुछ ‘य’ है यानी यादव. समाजवादी पार्टी की 2012 की सरकार आने पर 8 राजपूत मंत्री बनाए गए थे, तो क्या समाजवादी पार्टी जो आज भाजपा के ऊपर क्षत्रियवाद का आरोप लगाती है, उसके जाल में खुद पहले ही रह चुकी है? विधानसभा अध्यक्ष का पद बसपा की सरकार में एक ओबीसी समाज के व्यक्ति के पास था, जो समाजवादी पार्टी ने एक सवर्ण विधायक को दे दिया.
अगर 2007 से 2012 का डेटा निकाल लिया जाए तो एससी-एसटी उत्पीड़न के सर्वाधिक मामले समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं पर लगाए गए थे. आज समाजवादी पार्टी के पास जितने भी विधायक और सांसद ओबीसी या एससी समाज से आते हैं, उनको नेता बनाने और बढ़ाने का काम बहुजन समाज पार्टी में हुआ; चाहे वो लाल जी वर्मा हों, राम प्रसाद चौधरी, राम अचल राजभर हों या फिर इंद्रजीत सरोज. समाजवादी पार्टी के अपने ओबीसी या एससी-एसटी नेताओं की संख्या गौण ही है. यह कहीं न कहीं दिखाता है कि अपने दम पर भाजपा से सत्ता हासिल करने में नाकाम रहने वाली सपा, बसपा के कैडर को छल-बल और धन-बल पर तोड़कर सत्ता हासिल करने की जुगत में है.
क्या यह बात समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव ठुकरा पाएंगे कि प्रमोशन में आरक्षण बिल का संसद में विरोध कर गिराने का काम समाजवादी पार्टी ने ही किया था? वास्तविकता तो यह रही है कि समाजवादी पार्टी समाज के एक ऐसे खास वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है जो लठैतवाद और बाहुबल जनित आक्रामक राजनीति को ही मानता और समझता है.
साल 2003 में जब बहुजन समाज पार्टी को तोड़कर समाजवादी पार्टी ने सरकार बनाई थी, उस वक्त उसका सबसे ज्यादा साथ राजपूत समाज से आने वाले विधायकों ने दिया था. इसी के एवज़ में राजा भैया जैसे बड़े राजपूत नेताओं को मुलायम सिंह और अखिलेश यादव दोनों ने ही अपनी कैबिनेट में स्थान दिया था, जो यह दिखाता है कि सपा सत्ता के लिए किसी भी विचार से समझौता कर सकती है. क्योंकि वो सपा, जिसकी अपनी कैबिनेट में 15 विधायक सवर्ण थे, आज रामजी लाल सुमन जैसे सांसदों के साथ खड़ी नजर आती है जो जाति के नाम पर महापुरुषों को अपमानित करते हैं.
इन सब मामलों को नज़र में रखते हुए यह कहा जा सकता है कि सपा अभी यूपी की सत्ता से न केवल कोसों दूर है, बल्कि पीडीए के मूल मंत्र की उसकी वैचारिक गवाही और पार्टी की ‘लठैत संस्कृति’ आपस में मेल खाती नहीं दिखती.
