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स्मित माच्छार को लेकर वामपंथी पत्रकारों की असंवेदनशीलता

स्मित माच्छार को लेकर वामपंथी पत्रकारों की असंवेदनशीलता

बुद्धिजीवी दो तरह के होते है, एक विचार वाले और दूसरे विचारधारा वाले. विचारधारा वाले बुद्धिजीवी भले ही कितने विचारशून्य क्यों न हों पर कभी भी अपनी धारा नहीं बदलते. अपनी धारा पर बने रहने के लिए वह किसी भी घटना का बचाव कर सकते है, कोई भी तर्क गढ़ सकते है. अपनी धारा के सम्मुख वह हर मूल्य को मूल्यहीन पाते हैं. कुछ ऐसा ही हाल  में ओमान के पायलट द्वारा इज़राइली नागरिकों से भरे विमान को अपहरण करने के असफल प्रयास के बाद भी देखने को मिला है. दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाई दुबई की फ्लाइट को ओमान के एक पायलट द्वारा अपहरण करने का प्रयास किया गया. उसके साथी भारतीय पायलट स्मित माच्छार द्वारा जब उसका विरोध किया गया तो उसने उन पर चाकू से वार कर दिया. गंभीर रूप से घायल स्मित ने कैबिन का दरवाजा खोला और अन्य को सूचित किया तत्पश्चात विमान में सवार ईजराइली सैनिकों ने हालातों को संभाला.

इस खबर के बाहर आने के बाद दुनिया भर में भारतीय पायलट की प्रशंसा की जाने लगी. तमाम देशों के प्रमुखों ने उनकी प्रशंसा की. सामान्यतः तो ये भारत के सभी नागरिकों के लिए ये हर्ष का विषय होना चाहिए था कि उनके देश के एक व्यक्ति ने 9/11 जैसी घटना होने से रोक लिया परंतु इन विचारधारा वाले लोगों के लिए सामान्य नियम लागू नहीं होते. वह इतनी बड़ी घटना के रुकने से प्रसन्न कम और पायलट की पहचान से आहत ज्यादा थे. उनके लिए ये घटना केवल दो पायलट के बीच झगड़े की कहानी है. ऐसा दिखाने का प्रयास किया गया कि इसका कोई भी संबंध आतंकवाद से नहीं है. इजराइल को भी बिना किसी तर्क के कोसा गया मानों उसने ही ये सब कराया हो.

पत्रकारिता की अस्मिता की स्वघोषित रक्षक, धर्मनिरपेक्षता विहीन होती राजनीति से चिंतित राणा अयूब ने अपनी विपरीत बुद्धि और कुतर्क करने के कौशल का उदाहरण देते हुए अपने एक्स हैंडल पर लिखा कि “भारतीय दक्षिणपंथ का इसराइल और नेतन्याहू के प्रति प्रेम अंततः केवल एक ही बात में निहित है: मुसलमानों के प्रति उनकी अंतर्निहित नफ़रत. मोदी और नेतन्याहू के प्रति उनकी प्रशंसा एक ही प्रेरणा से आती है—ऐसे नेता जो मुसलमानों को अपने अधीन करेंगे और दुनिया में ‘उन्हें उनकी जगह दिखाएंगे’.” उनके इस कथन का घटना से संबंध पता लगाना उतना ही कठिन है जितना राणा अयूब के कार्यों में धर्मनिरपेक्षता को जान पाना. इन्हीं की वैचारिक बहन आरफा शेरवानी ने भी इसे इजराइल द्वारा प्रायोजित बताया. उन्होंने कहा-‘दुनियाभर में मशहूर’ इजरायली प्रचार तंत्र (प्रोपेगैंडा मशीन) लगातार सक्रिय है और ऐसा लगता है कि भारतीय दर्शक बिना कोई सवाल पूछे, उसके द्वारा परोसी जाने वाली हर सामग्री को सहर्ष स्वीकार करने के लिए बेहद उत्सुक हैं”. ये कथन केवल भारत-इज़राइल मित्रता और दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के प्रति नफ़रत का भी एक परिणाम है. अपनी इस नफ़रत में वह इतनी डूबी है कि उन्हें विमान सवारों के बचने की खुशी नहीं है. उनके लिए केवल उनकी राजनीतिक सोच और उससे उपजे विरोध का महत्व है न कि निर्दोष लोगों के बचने का.

राणा अयूब केवल अकेली नहीं है जिन्होंने इस पर तर्कहीन बात कही हो. स्वयं को हिंदी की विद्वान बताने वाली मृणाल पांडे ने उनसे भी आगे जाकर इस घटना को ही झुठलाने का प्रयास किया. उन्होंने लिखा- “सुखांत में कई संयोग जुट गये थे. मसलन हाईजैक हो रहे प्लेन का यमनी को-पायलट सुरक्षा को चरका दे कर चाकू लाना, दो-दो प्रशिक्षित पायलटों की बतौर यात्री मौजूदगी, घायल पायलट का कॉकपिट का दरवाज़ा खोलते ही उनका आरोपी पर क़ाबू और भारत के कथित फ़ादरलैंड के मुखिया द्वारा भरपूर तारीफ!!” ये कथन दिखाता है कि वर्षों तक इस देश में बुद्धिजीवियों के नाम पर कैसे-कैसे महानुभावों को आगे बढ़ाया गया है. जो ये सामान्य सी बात न समझ पाए कि ऐसे जहाज में जिसमें इजराइल के सैनिक  बैठे हो वहाँ ये सब होना बहुत स्वाभाविक है. मानों उनके लिए ऐसी घटनाओं का रोका जाना ही, घटना के प्रायोजित होने की निशानी है. आतंकवाद के प्रति ये सहानुभूति कहाँ से आती है? ये तो वहीं जाने पर इतनी मूढ़ता उनकी विचारधारा से ही आती है कि वह ये नहीं समझ सकती कि यह 7 अक्तूबर के निकट जहाज को अगवा कर इजराइल में क्रैश कराने की साजिश थी. इसे समझने के लिए सामान्य समझ ही चाहिए जो संभवतः उनके पास नहीं है.

इन विमूढ़ता से भरे बयानों के अतिरिक्त इन सभी मानवता प्रेमी, शांतिदूतों के बीच शांति छायी रहीं. वे इस पर न तो कुछ बोल पाए और न ही कोई शुभकामनाएं दे पाएँ. इसके पीछे दो प्रमुख कारण प्रतीत होते है-

प्रथमतः ये कि उन्हें भारत-इज़राइल के बीच मज़बूत होते संबंधों से समस्या है. वह इस तथ्य से बिल्कुल आहत नहीं होते कि उनकी सोच वाली सरकार भी गुपचुप तरीके से इज़राइल से संबंध बढ़ाती थी. उन्हें दोनों देशों के संबंधों के साथ ही इन देशों के प्रधानमंत्रियों से भी समस्या है या यूं कहे कि नफ़रत है. ये नफ़रत उन्हें हर बात पर आलोचना करने को बाध्य करती है और जब वह आलोचना नहीं कर पाते तो फिर मौन हो जाते है. इस घटना पर भी वह मौन है क्योंकि आतंकवाद की घटना एक ऐसे देश के ख़िलाफ़ करने का प्रयास किया गया जो उनके वैचारिक आग्रहों से मेल नहीं खाता. अगर ये घटना विफल न होती तो यहीं बुद्धिजीवी स्मित के ख़िलाफ़ भी दुष्प्रचार करते. इन्हें ऐसी घटनाओं पर धर्म नहीं दिखता पर कसाब के कलावे पर यह व्याकुल रहते है. किसी को भी इस घटना में आतंकवाद नहीं दिखता.

दूसरा, यह कि इन सबका पूरा ध्यान ये सिद्ध करने पर रहता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता. यह सदा ऐसे मुद्दों को अधिक जटिल रूप देकर इसे अन्य किसी समस्या में बदलने को आतुर रहते है. किसी भी महानुभाव ने इसे आतंकवाद से जुड़ा हुआ नहीं बताया. वह इस सामान्य तथ्य से बचते नजर आए कि पायलट के पास चाकू कहां से आया? सोचिए कि अगर स्मित की जगह कोई मुस्लिम व्यक्ति होता तो उसे अभी तक शांति पुरस्कार के योग्य घोषित कर दिया जाता. इनके लिए आतंकवाद केवल राजनीति का उपकरण है. इनकी पूरी यात्रा को देखने पर सहज ही मन में यह प्रश्न उठता है कि क्या इनका प्रयास आतंकवाद को खत्म करने की जगह उसका “दिइस्लामिफिकेसन” करने का है? वह क्यों इसपर उतने मुखर नहीं है जितने वह अन्य मुद्दे पर होते है? संभवतः इसलिए क्योंकि उनके विचार सार्वभौमिक नहीं है. वह लोगों की धार्मिक पहचान से प्रभावित है.

अंत में, हमें यह समझना चाहिए कि अक्सर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग अपने विचारों में बहुत संकीर्ण होते है. उनमें यह साहस नहीं होता कि वह सत्य को उसके असल रूप में कह सकें. लिहाजा वह नए-नए तर्क गढ़ते है. इन तर्कों को वह आदर्शों में लपेटकर इस तरह  प्रस्तुत करते है कि हम सभी सहज रूप में स्वीकार कर लेते है.  इनके लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता वहीं तक है जहां तक इनसे प्रश्न न किया जाए. प्रश्न करने पर वह आपको इस ग्लानि से भर देंगे कि आप सांप्रदायिक है. इनकी प्रतिक्रियाएं और चुप्पी अवसर पर निर्भर करती है. इनसे पार पाने के लिए प्रश्न करना ही एकमात्र रास्ता है. इनके द्वारा सांप्रदायिक घोषित किए जाने पर ग्लानि नहीं होनी चाहिए क्योंकि इनकी पंथनिरपेक्षता भी सीमित अर्थों में है. जब तक ऐसा नहीं किया जाएगा वह पूर्ववत ही वैचारिक प्रदूषण फैलाते रहेंगे.