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राहुल गांधी के अधूरे ज्ञान से देश परेशान

राहुल गांधी के अधूरे ज्ञान से देश परेशान

22 अगस्त, 2026 को छात्रों की गहमागहमी के बीच राहुल गांधी ने मनुस्मृति के एक श्लोक के आधार कर पूरे हिंदू धर्म को पितृसत्तात्मक और महिला-विरोधी रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की. यह अफसोस की बात है दुनिया के प्राचीनतम और सहिष्णुतम सनातन धर्म को नकारात्मक ढंग से चित्रित किया गया. क्या किसी धर्म और उसकी हजारों वर्ष पुरानी परंपरा का मूल्यांकन इस तरह एकपक्षीय ढंग से किया जाना उचित है? इस कार्यक्रम की आड़ में प्राचीन धार्मिक ग्रंथ मनुस्मृति को कटघरे में खड़ा करना अधूरे ज्ञान और चयनित राजनीति का उदाहरण है.

इस पूरे विवाद का मूल प्रश्न है — क्या राहुल गांधी ने मनुस्मृति वास्तव में पूरा पढ़ा और समझा है? जिसके आधार पर वे सनातन के धार्मिक-सांस्कृति परंपरा पर टिप्पणी कर रहे हैं? उनका उद्देश्य क्या है? वास्तव में राहुल गांधी ने मनुस्मृति पर आपत्तिजनक टिप्पणी किया. इसे महिलाओं की स्वतंत्रता के विरुद्ध बताया. परंतु उसी मनुस्मृति में महिलाओं के सम्मान को लेकर कहा गया है—

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः.
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः॥”

(जहां नारियों का सम्मान होता है, वहां देवता निवास करते हैं; और जहां उनका सम्मान                                               नहीं होता, वहां किए गए सभी शुभ कर्म निष्फल हो जाते हैं.)

यहां यह चर्चा भी महत्वपूर्ण है कि दुनिया में शायद ही किसी अन्य धर्म में देवताओं के साथ-साथ इतनी देवियां पूजी जाती है, जितना सनातन धर्म में. महिलाओं की स्वतंत्रता और गरिमा का विचार सनातन धर्म के मूल में हैं. 

स्वयं महात्मा गांधी मनुस्मृति के उपलब्ध पाठ के अंतर्विरोध और बाद में जोड़ी गई सामग्री की संभावना पर प्रश्न उठा चुके हैं. वे कह चुके हैं कि जब किसी के पास इसकी मूल प्रति उपलब्ध नहीं है, तब आज मनुस्मृति के किसी एक श्लोक को अंतिम और निर्विवाद सत्य मानकर प्रस्तुत करने से पहले क्या उसके पाठ-इतिहास और विभिन्न पांडुलिपियों की जानकारी लेना आवश्यक नहीं है?

महात्मा गांधी ने 4 मई 1928 को पी. टी. पिल्लै को लिखे पत्र में मनुस्मृति के संबंध में लिखा था. संपूर्ण गांधी वाङ्मय, खंड 26, पृष्ठ 348 में उनके विचार दर्ज हैं – “मनुस्मृति में बहुत कुछ प्रशंसनीय है, जबकि उसके वर्तमान स्वरूप में कुछ बातें ऐसी हैं जिन्हें स्वीकार नहीं किया जा सकता.”

यहां यह भी ध्यान देने योग्य बाात है कि सर विलियम जोन्स ने 1794 में Institutes of Hindu Law; or the Ordinances of Manu का प्रकाशन किया था, जो संस्कृत मूल और कुल्लूक भट्ट की टीका के आधार पर अंग्रेजी अनुवाद था.

चर्चा से पहले ज्ञान आवश्यक है. राहुल गांधी ने विवादित बात कही. अतः उन्हें स्रोत और प्रमाण को सार्वजनिक करना चाहिए. यह स्पष्ट है- मनुस्मृति की अपनी जटिल पांडुलिपि-परंपरा है. इसलिए किसी एक अनुवाद या चयनित श्लोक के अर्थ को अंतिम और निर्विवाद प्रतिनिधि मान लेना गंभीर भूल होगा.

राहुल गांधी को बताना चाहिए कि उन्होंने मूल संस्कृत अथवा अनुवाद कौन-सा संस्करण पढ़ा. क्या उन्हें मनुस्मृति की विभिन्न पांडुलिपियों और उसके ऐतिहासिक विकास की जानकारी है? यदि किसी ग्रंथ को सार्वजनिक विमर्श में कटघरे में खड़ा किया है, तब उनसे इसकी जिम्मेदारी लेने की उम्मीद की जाती है.

क्या राहुल गांधी नहीं जानते धर्म और धार्मिक ग्रंथ चर्चा अत्यंत संवेदनशील विषय हैं. किसी प्राचीन धार्मिक ग्रंथ जैसी संवेदनशील विषय पर चर्चा करनी ही है, तो उसका समग्र संदर्भ सामने रखना उचित है. ना कि केवल चुने अंश, जो उनके राजनीतिक बहस के अनुकूल हो. और क्या किसी प्राचीन ग्रंथ का मूल्यांकन केवल चुनिंदा पंक्तियों के आधार पर किया जाना चाहिए? प्राचीन मनुस्मृति को उसके ऐतिहासिक संदर्भ से काटकर, केवल चुनिंदा अंशों के आधार पर प्रस्तुत करना समाज में अनावश्यक विवाद और असहजता पैदा कर सकता है. यहां राहुल गांधी पर यह मुहावरा बिल्कुल सही बैठता है – अध जल गगरी छलकत जाए.

किसी धर्मग्रंथ की भ्रामक आलोचना समाज में अनावश्यक धार्मिक तनाव और विभाजन पैदा कर सकता है. योग्य नेताओं का उद्देश्य समाज को जोड़ना होना चाहिए, किसी की आस्था को आहत करना या समाज में अशांति नहीं. भारत के नागरिक, भारत का शासन और न्याय-व्यवस्था संविधान और आधुनिक कानूनों से चलते है.

वहीं भारत में आज भी मुस्लिम समुदाय में कुछ व्यक्तिगत और पारिवारिक मामलों में शरीयत यानी मुस्लिम व्यक्तिगत विधि अनुप्रयोग अधिनियम, 1937 लागू है, जिसके अंतर्गत विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार और अन्य व्यक्तिगत मामलों का उल्लेख है. इसमें कई बातें महिला अधिकारों से संबंधित है. Indian Code

भारत सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के संदर्भ में तीन तलाक पर कानूनी सुधार के साथ-साथ हज में मेहरम की अनिवार्यता हटाना, शिक्षा एवं कौशल-विकास, नेतृत्व और उद्यमिता के अवसर तथा महिला सुरक्षा की व्यवस्थाएं जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं.

तो फिर प्रश्न स्वाभाविक है — यदि उद्देश्य महिलाओं की स्वतंत्रता, समानता और गरिमा की रक्षा करना है, तो इन वास्तविक और वर्तमान कानूनी-सामाजिक प्रश्नों पर भी समान गंभीरता से चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए? राहुल गांधी ने महिला सशक्तीकरण से जुड़े इन महत्वपूर्ण विषयों को छोड़कर मनुस्मृति को ही आलोचना का केंद्र क्यों बनाया?

प्रायः हर समाज व धार्मिक परंपराओं में पुरुषप्रधान संरचनाएं है, फिर राहुल गांधी ने एक को निशाना क्यों बनाया? यह बौद्धिक दमन, बौद्धिक वर्चस्व और पूर्वनिर्धारित राजनीतिक रणनीति है. राहुल गांधी को उत्तर तथ्यों और प्रमाणों के साथ देना चाहिए.

कार्यक्रम मुख्यतः छात्राओं से संवाद था. राहुल गांधी ने अपनी बात अंग्रेजी में रखी. यह उनकी भाषायी पसंद हो सकती है. अंग्रेजी में बोलना अपने आप में कोई दोष नहीं है. लेकिन प्रश्न है, जब विषय भारतीय समाज, धर्म, महिलाओं और युवाओं के जीवन से जुड़ा हो, तब ऐसी भाषा चुनना उचित होता, जिसे देश की बड़ी आबादी सहजता से समझ सके.

ऐसे संवेदनशील विषय पर संवाद हिंदी और स्थानीय भारतीय भाषाओं में अधिक व्यापक हो सकता था. भाषा संवाद का माध्यम होना चाहिए, चयनित लोगों तक सीमित रहने का नहीं. 

क्या इस भाषण से पहले वहाँ उपस्थित सभी छात्राओं को यह जानकारी थी कि महिला सशक्तीकरण और पितृसत्ता के नाम पर होने वाली चर्चा की शुरुआत हिंदू धर्म के एक महत्वपूर्ण प्राचीन ग्रंथ मनुस्मृति की आलोचना से होने वाली है? यह प्रश्न छात्राओं की नीयत पर नहीं, राजनीतिक संवाद की पारदर्शिता पर है.

यदि छात्राओं को पहले से मालूम होता कि कार्यक्रम के आड़ में एक विशेष धार्मिक ग्रंथ को राजनीतिक बहस के केंद्र में लाया जाएगा, तो क्या वे उसी रूप में इस कार्यक्रम का हिस्सा लेती? क्या उनकी प्रतिक्रिया तब भी वही होती? यह जानना उन छात्राओं का अधिकार था.

इस कार्यक्रम में युवा महिलाओं का आगे आकर अपनी बाते रखना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है. लेकिन उनकी आवाज को किसी राजनीतिक आख्यान का हिस्सा बनाने से पहले यह ज़रूरी था कि उन्हें पूरे संदर्भ की जानकारी दी गई हो. क्या उन्हें सचमुच पूरी जानकारी थी? यह प्रश्न उन छात्राओं से पूछा जाना चाहिए.

राहुल ने महिला सशक्तीकरण की कसौटी सबके लिए समान क्यों नहीं रखी? जबकि सभी समुदायों की महिलाओं को समान अधिकार देने की बात होनी चाहिए, धर्म विशेष की नहीं. शाह बानो प्रकरण इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है. Shayara Bano v. Union of India Indian Kanoon मामले में 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने 3:2 के बहुमत से तलाक-ए-बिद्दत, अर्थात तत्काल तीन तलाक, को निरस्त कर दिया. राहुल गांधी को चयनात्मक सुधार के बदले सार्वभौमिक सुधार को लक्ष्य करना चाहिए था. स्पष्ट है की उन्होंने ऐसा नहीं किया.

भारत में महिला-सशक्तीकरण की प्रक्रिया केवल एक धर्म या समुदाय तक सीमित नहीं है. भारत सरकार महिला आरक्षण, आवास योजना, उज्ज्वला योजाना, वित्तीय समावेशन और मिशन शक्ति जैसी अनेक योजनाएँ धर्म की पहचान के आधार पर नहीं, बल्कि पात्रता के आधार पर महिलाओं तक पहुँचती हैं.यह  महिला सशक्तिकरण और लैंगिक न्याय (Gender Justice) के प्रति एक बेहद प्रगतिशील और व्यावहारिक दृष्टिकोण को रेखांकित करता है. इसलिए  सभी महिलाओं के लिए समानता, गरिमा, स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकार मिलने की  बात होनी चाहिए.

क्या राहुल गांधी स्वयं को सामाज-सुधारक के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं?                                           स्पष्ट है कि राहुल गांधी सुधारात्मक नहीं आलोचना राजनीति कर रहे हैं. वे सभी समुदायों के महिलाओं के अधिकारों के लिए समान रूप से मुखर नहीं है. अतः युवाओं को भ्रमित करने से अच्छा है कि विषयों के जानकारों और विद्वानों के साथ बैठकर शास्त्रार्थ और गंभीर चर्चा किया जाये.

धर्म और समुदाय के पहचान की नीति गहरे षड्यंत्र की ओर इशारा करता है. यह पहलगाम के क्रूर दुर्घटना की याद दिलाता है. जो दिखाता है कि केवल धार्मिक पहचान से देखने की मानसिकता कितनी खतरनाक हो सकती है. यह भारत जैसे सर्वधर्म समभाव देश में सामाजिक अलगाव पैदा करती है.

सनातन धर्म जीवन जीने की सुसंस्कृत शैली है. जो कर्म प्रधान सिद्धांत, विचारों की स्वतंत्रता, प्रकृति और स्त्री शक्ति का सम्मान और सह अस्तित्व यानी “वासुदेव कुटुंबकम” सिखाता है. यह मानवता, प्रकृति और ब्रह्मांडीय सत्य के सार्वभौमिक नियमों पर आधारित है.

इस धर्म में विचारों की अभिव्यक्ति के लिए शास्त्रार्थ, विचार-विमर्श, परिचर्चा की स्वस्थ परंपरा है ना कि सजा, क्रूस या फतवा की. यह आर्य समाज, राधा स्वामी और रामकृष्ण मिशन जैसे सुधारवादी संगठनों, बौद्ध, जैन, सिख आदि  कई धर्मों का उद्गम है. इस धर्म में नए धर्मों, नए विचारों को स्वागत  होता है ना  की विरोध.

प्रीतिश नंदी और जावेद अख़्तर के 1998 के Face to Face/Face Off ऐतिहासिक इंटरव्यू में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक गहरी बात कही थी – “भारत इसलिए धर्म निरपेक्ष (सेक्युलर) नहीं है क्योंकि संविधान में ऐसा लिखा है बल्कि भारत इसलिए सेक्युलर है क्योंकि इसकी आत्मा और इसके बहुसंख्यक हिंदू स्वभाव से ही सेक्युलर है.”

मनुस्मृति, जिसे मानव धर्मशास्त्र भी कहा जाता है, भारतीय समृद्ध स्मृति-परंपरा का एक प्राचीन और महत्वपूर्ण ग्रंथ है. इसमें धार्मिक आचरण, व्यक्ति के कर्तव्य, सामाजिक व्यवस्था, शासन, न्याय, दंड और राज्य-संचालन जैसे जीवन के अनेक महत्वपूर्ण पक्षों पर विस्तार से वर्णन मिलता है. इसके रचनाकाल और वर्तमान पाठ-रूप को लेकर विद्वानों के विभिन्न मत हैं तथा इसकी अनेक पांडुलिपियाँ और पाठांतर उपलब्ध हैं.

मनुस्मृति का सप्तांग राज्य सिद्धांत विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिसमें राज्य को एक शरीर के समान मानते हुए स्वामी, मंत्री, पुर अथवा दुर्ग, राष्ट्र, कोष, दंड और मित्र — इन सात अंगों को राज्य के सुचारु संचालन के लिए आवश्यक माना गया है.

जिस काल में मनुस्मृति जैसी रचना अस्तित्व में आई, उस समय विश्व के अन्य किसी धार्मिक और बौद्धिक परंपराओं, में विधि, समाज और राज्य-व्यवस्था को  इतने व्यापक रूप में प्रस्तुत करने वाले ग्रंथ शायद हीं उपलब्ध थे. मनुस्मृति में जीवन और समाज के अनेक क्षेत्रों पर जिस विस्तार से विचार किया गया है, वह प्राचीन भारतीय बौद्धिक परंपरा की व्यापकता दर्शाता है.

ऐसे ग्रंथ की कमियाँ खोजने के बजाय उसके ऐतिहासिक महत्व, ज्ञान-परंपरा और समग्र विचार-विस्तार को भी देखना आवश्यक है. अगर उसकी आलोचना हो, तब वह तथ्य, संदर्भ और तुलनात्मक अध्ययन के आधार पर हो — क्योंकि किसी प्राचीन ग्रंथ का मूल्यांकन केवल आज की कसौटी से करना उसके ऐतिहासिक महत्व को अधूरा समझना होगा.

मनुस्मृति पर पश्चिमी विद्वानों और लेखकों की हमेशा गंभीर रुचि रही है.

फ्रेडरिक नीत्शे, जर्मन दार्शनिक – “बाइबिल को बंद करो और मनुस्मृति को खोलो. मनुस्मृति का दृष्टिकोण बेहद स्वस्थ, विस्तृत और जीवन को सकारात्मक रूप से स्वीकार करने वाला है.” उन्होंने माना कि यह ग्रंथ समाज को व्यवस्थित और अनुशासित रखने के लिए एक उत्कृष्ट आचार संहिता है.  The Twilight of the idols (1889)

सर विलियम जोन्स, ब्रिटिश भाषाविद् और कानूनविद – “मनुस्मृति एक अत्यंत प्राचीन, व्यापक और अद्भुत कानूनी तथा सामाजिक ग्रंथ है. इसके नियम और न्याय व्यवस्था मानव स्वभाव की गहरी समझ पर आधारित हैं.” Institutes of Hindu Law, or the Ordinances of Manu

मॉरिस मेटरलिंक, बेल्जियम के लेखक व नोबेल पुरस्कार विजेता – “मनुस्मृति में दी गई ब्रह्मांड की उत्पत्ति और आत्मा की विकासवादी यात्रा के विचार आधुनिक विज्ञान की खोजों से बहुत मेल खाते हैं.” The Great Secret 1922

लुई जैकोलियट, फ्रांसीसी लेखक और वकील – “रोम और ग्रीस के प्राचीन कानून भी मनुस्मृति के सामने फीके लगते हैं. आधुनिक दुनिया के कई कानूनी सिद्धांतों की नींव अनजाने में इसी प्राचीन ग्रंथ में मिलती है.”La Bible dans l’Inde” The Bible in India: Hindoo Origin of Hebrew and Christian Revelation 1869

पी. डी. औस्पेंस्की, रूसी दार्शनिक – “मनु का आचारशास्त्र केवल सामाजिक नियमों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह इंसानी चेतना और मानसिक विकास को ऊंचा उठाने का एक जरिया है.”A new model of the Universe 1931

अनेक भारतीय  प्राचीन और मध्य काल विद्वान जैसे मेधातिथि (9वीं शताब्दी), कुल्लूक भट्ट (13वीं शताब्दी), विज्ञानेश्वर और जीमूतवाहन (11वीं-12वीं शताब्दी) और अनेको वर्तमान विद्वानों जैसे  – महात्मा गांधी, महर्षि दयानंद सरस्वती (आर्य समाज), डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, गांधीजी ने  मनुस्मृति  को सामाजिक दर्शन और न्यायशास्त्रीय का  महत्वपूर्ण ग्रंथ बताया है.

देश को विभाजित करने की राजनीति आज के भारत को स्वीकार्य नहीं है. बचकानी, भ्रामक और गैर-जिम्मेदाराना बात  करने वालों तथा देश के युवाओं को भ्रमित  करने वालों के लिए सरकार को कुछ स्पष्ट नियम और जवाबदेही के प्रावधान बनाने  चाहिए, विशेषकर सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों और नेताओं के लिए.   क्योंकि देश को प्रश्न पूछने वाले, सोचने-विचारने वाले और सच का साथ देनेवाले युवा चाहिए, ना कि भ्रमित और केवल नारे दोहरानेवाले.

ऐसी जवाबदेही के प्रावधान सार्वजनिक संवादों को अधिक जिम्मेदार बनाएगी. लोगों में भी सोच-समझकर और विवेकपूर्ण ढंग से बोलने की प्रवृत्ति विकसित होगी.

राहुल गांधी नेता प्रतिपक्ष के संवैधानिक पद पर हैं. उनका परिवार भी लंबे समय से राजनीति और सार्वजनिक जीवन से जुड़ा रहा है, इसलिए उनके वक्तव्यों की जिम्मेदारी और भी अधिक है.

नेता प्रतिपक्ष का पद सरकार के कामकाज पर नजर रखने, उसकी नीतियों और निर्णयों की समीक्षा करने और सही-गलत पर सार्थक प्रश्न उठाने के लिये होता है. विपक्ष का काम केवल सरकार का विरोध कर देश में अनावश्यक अशांति व  भ्रम फैलाने का नहीं है.किसी भी राष्ट्र को मजबूत बनाए रखने के लिए भीतर की चुनौतियों से निपटना उतना ही जरूरी है जितना सीमाओं की रक्षा करना.देश की आंतरिक सुरक्षा बाहरी सुरक्षा जितनी ही महत्वपूर्ण है.

 

रेखा रानी
रेखा रानी
डॉ. रेखा रानी लेखिका, परामर्शदाता और पूर्व प्रोफेसर हैं.