अराजकता का अपना रस होता है जो किसी को एक मद में ले जाता है. इसमें मदांध व्यक्ति किसी नियम को नहीं मानता. वह स्वयं को अभूतपूर्व समझता है. उसे बने बनाए नियम अप्रासंगिक मालूम पड़ते है. वह सदा क्रांति भाव में रहता है और सब कुछ बदल देने को आतुर रहता है. उसे व्यवस्था अपनी दुश्मन लगती है. वह अपनी धरोहर को ही अपनी समस्या की जड़ समझता है. संस्कृति तो मानो उसे अपनी शत्रु प्रतीत होती है. अराजकता का ये रस यूं ही उत्पन्न नहीं होता. कुछ लोग होते है जो इस रस की आड़ में अपनी सियासी रोटियां सेंक रहे होते है. वह अपने हितों के लिए कुछ भी कर गुज़रने को तैयार होते है. वे सवाल करते है पर अपनी सुविधा के अनुसार, वे विरोध करते है पर अवसर के अनुसार. ये सारे काम वे विचारों की आड़ लेकर करते है.
उनके विचार भी उनके खुद के नहीं होते. उनके विचार किसी जंगल के नियम से उत्पन्न समाज के होते है लिहाजा जब कभी वे खुद को ऐसी हालत में पाते है जहां उनके सारे पैंतरे असफल हो जाते है वहां वे अराजकता का मार्ग अपनाते है. वे इसे अराजकता नहीं कहते, वे इसे आंदोलन की आड़ में शुरू करते है. वे कहते है कि “जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती”. फिर इस अराजकता से कोई एक व्यक्ति निकल कर आता है जो खुद को समाज की आवाज, लोकतंत्र का रक्षक बताता है. वैसे तो वो इन सबसे अलग नहीं होता लेकिन उसे बुद्धि हीन बुद्धिजीवियों द्वारा नायक बनाया जाता है. आज कल कुछ ऐसा ही भारतीय राजनीति में हो रहा है और इस बार हार से कुंठित लोगों की नायिका बनी है- नेहा बोरा
नेहा बोरा का मूल संबंध उत्तराखंड के उधम सिंह नगर जिले के खटीमा कस्बे से है. उनका परिवार एक सैन्य पृष्ठभूमि से जुड़ा है; उनके पिता भारतीय सेना में सेवारत रहे हैं. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी स्नातक की डिग्री पूरी की. स्नातक के बाद उन्होंने अंबेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली से मास्टर डिग्री हासिल की. इसके बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली के ‘स्कूल ऑफ आर्ट्स एंड एस्थेटिक्स’ में पीएचडी में दाखिला लिया. नेहा बोरा पहली बार चर्चा का केंद्र तब बनी जब उन्होंने तिलचट्टों के साथ अपना समानांतर आंदोलन प्रारंभ किया. वे रोज प्रातः काल आंदोलन प्रारंभ करती और सायं काल अपने घर लौट जाती. ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की अध्यक्ष होने के नाते सभी वामपंथी उनके आंदोलन में आते रहे. वैसे भी वामपंथियों को एक ही स्थान पर ढपली वादन में आनंद नहीं मिलता लिहाजा आंदोलन उनके लिए एक उपर्युक्त स्थान था.
आंदोलन तो समाप्त हो गया लेकिन नेहा बोरा उस तरह से पहचान नहीं पा सकी जैसी उनकी कामना थी. जब झारखंड में पेपर लीक के ख़िलाफ़ आंदोलन प्रारंभ हुए तो नेहा बोरा ने पहले तो इसे अपने स्तर का नहीं समझा. कहां वो गरीब घर के बच्चे और कहां महान लोकतंत्र चिंतक नेहा बोरा. जब पूरे देश में उनके इस वैचारिक द्वैध की बात होने लगी तो उन्होंने वहां जाने का फैसला लिया. वहां जाकर उन्होंने आंदोलन कर रहे छात्रों का समर्थन नहीं किया बल्कि अपना एक समांतर आंदोलन प्रारंभ कर दिया. संभवतः अभाव में पले, गांव, गरीब, जंगल की पृष्ठभूमि वाले बच्चे इनकी नज़र में उस स्तर के नहीं रहे होंगे कि वे उनके साथ मंच साझा करें.
जब बात सरकार से बात करने की आई तो सरकार ने उन बच्चों को आमंत्रित नहीं किया बल्कि नेहा बोरा को किया और “जिसकी जितनी हिस्सेदारी उसकी उतनी भागेदारी” वाले विचार से आने वाली नेहा बोरा बिना छात्रों से परामर्श किए अकेले ही सरकार से मिलने चली गई. चूंकि सरकार भी अपनी ही थी तो सब कुछ बिना शोर मचाए हो गया. यहां पर दो महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए पहला यह कि नेहा बोरा को छात्र नेता, युवाओं की आवाज़ घोषित कर दिया गया और दूसरा यह कि अभिनय और नाटक में शोध करने वाली नेहा के ऊपर वहां स्याही फेंकी गई जिसके बाद नेहा बोरा ने अपने आप को सहनशीलता, समन्वय की प्रतिमूर्ति दिखाते हुए कहा- “उनके लिए स्याही अपमानित करने का एक जरिया है. हम इसी स्याही से अपना भविष्य लिखेंगे! मैं इस स्याही को गर्व के साथ दिखाती हूं.” इसके बाद सारे वामपंथ ने मानो उन्हें अपना नेता मान लिया. वैसे भी इस प्रकार के वैचारिक सुख के वह पुराने आदी है. उभरते हुए नेताओं को सही से उभारने के लिए स्याही का इस्तेमाल कोई नया नहीं है हालांकि थप्पड़ वाली पटकथा अभी शेष है.
नेहा बोरा जैसे लोगों के लिए उनके काम, विचार इत्यादि दर्शन नहीं प्रदर्शन का विषय है. इसके प्रदर्शन के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती है. सैन्य सेवाओं से आने वाले नेहा के पिता नेहा के विचारों से सहमत नहीं है. वैसे भी सेना के किसी व्यक्ति का मार्क्सवाद जैसी वैचारिक मूर्खता से सहमत होना लगभग नामुमकिन है. इसके अतिरिक्त किन्हीं भी दो पीढ़ियों के बीच वैचारिक भिन्नता होना स्वाभाविक है परंतु उसे किसी उपलब्धि की तरह दिखाना तर्कसंगत नहीं है. नेहा इसे अपनी उपलब्धि की तरह दिखाती है. वह कहती है कि “मेरे घर में पापा-मम्मी भाजपा विचारधारा के हैं. उनसे मेरी राजनीतिक मुद्दों पर खूब बहस होती है. मेरे पिता भारतीय सेना में हैं, लेकिन मेरी वामपंथी विचारधारा के कारण वह मुझे ‘देशद्रोही’ की नज़र से देखते हैं…… इस वैचारिक मतभेद और टकराव के कारण पिता और बेटी के रिश्ते के बीच एक गहरी खाई पैदा हो चुकी है, स्थिति यहां तक है कि हमारे बीच बातचीत तक बंद हो गई है.” अपने पिता से भिन्नता स्वाभाविक हो सकती है पर उपलब्धि कतई नहीं. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ये सिपाही अपनी निजी जिंदगी में कितने सहनशील है, इस बात से बखूबी जाना जा सकता है.
ये वैचारिक द्वैध केवल यहीं तक सीमित नहीं है. जिस लोकतंत्र को बचाने की ये कसमें खाते है, उसके सबसे बड़े दुश्मन यही है. मार्क्स, लेनिन की शान में कसीदे पढ़ने वाली ये जमात कभी भी अधिनायक वाद की आलोचना नहीं करते. अल्पसंख्यक के अधिकारों पर चिंतित ये लोग नक्सलियों के हाथों मारे जाने वाले लोगों पर मौन हो जाते है. लोकतंत्र से इनकी पुरानी शत्रुता है और ये शत्रुता और मुखर रूप से सामने आई जब नेहा बोरा जंतर मंतर पर चुनाव आयोग के ख़िलाफ़ आयोजित आंदोलन में पहुंची.
आंदोलन में वह “वन पीस” टी शर्ट पहन कर आई जिसका संबंध अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए द्वारा किए गए तख्ता पलट से है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति का इतिहास गवाह रहा है कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए अक्सर दुनिया भर में सत्ता बदलने या ‘कलर रिवोल्यूशन’ कराने के लिए जानी जाती है. सोशल मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच यही इन दोनों का सबसे बड़ा कनेक्शन बनता है. आलोचकों का मानना है कि युवाओं का यह सांस्कृतिक जुनून असल में विदेशी ताकतों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला एक ‘सॉफ्ट पावर टूल’ बन जाता है.
जहां एक तरफ आम युवा ‘वन पीस’ की टी-शर्ट पहनकर खुद को व्यवस्था को चुनौती देने वाला सच्चा स्वाभिमानी और क्रांतिकारी समझता है, वहीं पर्दे के पीछे वह अनजाने में सीआईए जैसे बड़े भू-राजनीतिक खिलाड़ियों के उस एजेंडे का मोहरा बन रहा होता है, जिसका अंतिम मकसद जन-कल्याण नहीं बल्कि अपनी पसंद की कठपुतली सरकार स्थापित करना होता है. जहां नेहा बोरा जैसे लोग अपनी महत्वाकांक्षा से भरे हुए लोग हो वहां ये काम और आसानी से हो जाता है. लोकतंत्र पर दिन रात ज्ञान देने वाले लोग यह भूल जाते है कि लोकतंत्र में सरकार जनता की पसंद से ही बनती है. उसे तानाशाह कहना जनता के चुनाव पर प्रश्न करना है. लेकिन यह केवल प्रश्न करने तक सीमित नहीं है. इन्हें सड़कों पर आकर अराजकता फैलाकर अपनी पसंद की सरकार को काबिज कराना है क्योंकि जनता को अपनी बात समझाने में ये असफल रहे है.
हाल ही में बीबीसी ने नेहा बोरा का इंटरव्यू किया जिसमें उन्होंने अराजकता को बहुत गौरवमयी तरीके से प्रस्तुत किया. उन्होंने कहा कि “सड़कों ने हमेशा इस देश की राजनीति का रुख तय किया है और वे आगे भी ऐसा ही करती रहेंगी, खासकर आने वाले कुछ वर्षों में……… यदि हम हाल के अतीत के सामाजिक बदलावों को देखें, तो वे सामाजिक बदलाव संसद में बैठे लोगों से नहीं आए; वे सड़कों से आए हैं.”
सड़कों पर उतर आने की ये अधीरता सरकार के ख़िलाफ़ नफ़रत से उत्पन्न होती है. कोई भी सरकार अराजकता से निपटने के लिए बल प्रयोग करेगी ही और तब ये अपना विक्टिम कार्ड खेलकर सरकार को तानाशाह कह देंगे. इनके इस उपक्रम का एक नमूना देखने को मिला जब नेहा बोरा ने कहा कि “यह सरकार संवाद करने से डरती है. तानाशाही रवैया यह है कि जो भी युवा रोजगार, शिक्षा और पारदर्शिता की बात करे, उसे देशद्रोही घोषित कर दो. देश इस तरह की मनमानी और दमन को लंबे समय तक बर्दाश्त नहीं करेगा.” संवाद को आतुर नेहा बोरा को देश 1942 के समय जैसा लगता है. वह कहती है कि “इतिहास खुद को दोहरा रहा है. जैसे 1942 में अंग्रेजों द्वारा नेताओं को जेल में ठूंसने से भारत छोड़ो आंदोलन नहीं रुका था, वैसे ही आज की सरकार की पुलिस हिरासत से हमारा छात्र आंदोलन खत्म होने वाला नहीं है.” शायद वह यह भूल गई कि 1942 के आंदोलन में 3 दिन के भीतर सारी कांग्रेस जेल में थी न कि उनकी तरह आज़ाद घूमकर अराजकता फैलाने को प्रोत्साहित कर रही थी. वह जनता द्वारा चुने गए नेताओं को भी नहीं स्वीकार करती. हर उपलब्धि को नकारने के आदी इस गिरोह को पहले और अब में अंतर नहीं नजर आता. नसबंदी, जेल, मीडिया दमन के दौर वाले आपातकाल से तुलना करती हुए कहती है कि “देश में इस वक्त आपातकाल जैसी स्थिति है. लेकिन यह देश और यहां का लोकतंत्र किसी पार्टी या संगठन की मोहताज न कभी रही है, और न कभी रहेगी. लोकतंत्र इस देश के आम लोगों का है. वह एक तरफ तो आपातकाल जैसी हालत पाती है तो दूसरी तरफ वे भारतीय लोकतंत्र पर भी भरोसा करते हुए कहती है कि “यह देश और यहां का लोकतंत्र कभी भी भाजपा या आरएसएस की मोहताज न कभी रही है और न कभी रहेगी. लोकतंत्र इस देश के आम लोगों का है.”
आम लोगों को लोकतंत्र का मूल बताने वाली नेहा यह भूल जाती है कि इन्हीं आम लोगों ने नरेन्द्र मोदी की सरकार को चुना है जिसे वह सड़कों पर आकर हटा देना चाहती है. वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए लंपट जैसे शब्द प्रयोग करती है. नरेन्द्र मोदी को तानाशाह कहना तो मानों इनकी दिनचर्या का हिस्सा बन चुका है. इतना सब कह लेने के बाद मतभेद, मनभेद का ज्ञान देना भी इनकी ही निशानी है. केवल अपनी पसंद की सरकार न होने के कारण अराजकता द्वारा सरकार लाने को प्रयासरत ये गिरोह लोकतांत्रिक मर्यादा को लेकर अक्सर चिंतित पाया जाता है. ये न तो लोकतांत्रिक है और न ही मर्यादित.
अंत में, अराजकता और आंदोलन में अंतर होता है. आंदोलन के लिए सही प्रेरणा और सही मुद्दा आवश्यक होता है. अराजकता तो महज अपनी कुंठा को व्यक्त करने का माध्यम है. आंदोलन की सफलता सुधार लाती है जबकि अराजकता का परिणाम अगली बार के लिए अराजकता की स्थिति का तैयार होना है. अराजकता कोई मूल सुधार नहीं करती बस सुधार होने का काल्पनिक क्षणिक सुख देती है. एक बार अराजकता को राजनीतिक उपकरण की तरह प्रयोग कर लिए जाने पर वह सदा के लिए एक विकल्प बन जाती है जो विनाश के सिवा कुछ नहीं लाती और जैसा कहा गया है विनाश काले विपरीत बुद्धि, अतः ऐसी विपरीत बुद्धियों को पूरी तरह से नकारा जाना चाहिए और ससमय खारिज कर दिया जाना चाहिए.
