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कर्मफल

बंगाल में ज़बरदस्त मुस्लिम तुष्टिकरण करना ममता को पड़ा भारी

पूरे भारत के अनेक राज्यों में से एक राज्य ऐसा है जहां की राज्य सरकार भारत को लेकर अनेकों षडयंत्र करती आई हो. वह सरकार देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा बन चुकी थी. भारत के मूल धर्म और संस्कृति उसके लिए सिर्फ एक झूठ था. हम बात कर रहे हैं ममता बनर्जी की टीएमसी सरकार की. हाल ही में संपन्न हुए बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस बुरी तरह हारी है. बीजेपी ने 206 सीटों की भारी जीत के साथ 15 साल के टीएमसी के बर्बर शासन का अंत करके सत्ता हासिल की है. पत्रकार और अन्य राजनीतिक लोग आपको सत्ता-विरोधी लहर, भ्रष्टाचार, सिंडिकेट राज, औद्योगिक पतन और शासन-विफलता जैसे कई स्पष्टीकरण देंगे. लेकिन एक कारण है जो कोई नहीं बताएगा और वह यह है कि देर सबेर ममता के नेतृत्व वाली टीएमसी को उसके किए की सज़ा मिलनी ही थी.

ममता सरकार में भगवान राम को राज्य के स्कूली पाठ्यपुस्तकों में व्यवस्थित रूप से ‘बोहिरागोतो’ यानी एक भटकने वाले बाहरी और विदेशी आक्रमणकारी के रूप में चित्रित किया गया. वही शासन जिसने अकाल बोधन, दुर्गा पूजा पर 65,000 करोड़ रुपए का व्यावसायिक साम्राज्य खड़ा किया — जिसकी शुरुआत स्वयं भगवान राम ने की थी — उसी ने बंगाल के बच्चों को यह सिखाया कि वे उन्हें एक विदेशी विजेता के रूप में देखें.

मुझे याद आता है कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक बार कहा था: ‘बीजेपी से लड़ना है तो लड़ लीजिए, लेकिन राम से मत लड़ाइए… मिट जाएंगे.’ लगता है वाजपेयी के शब्द यहां सच हो गए. शरद ऋतु की उपासना, बंगाल का सबसे बड़ा पर्व यानी दुर्गा पूजा — शरद ऋतु में इसीलिए मनाई जाती है, क्योंकि भगवान राम ने इसकी शुरुआत की थी.

नदिया जिले के फुलिया के कृत्तिबास ओझा द्वारा 15वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में रचित कृत्तिबासी रामायण में अकाल बोधन का प्रसंग मिलता है. जब भगवान राम आश्विन मास में रावण के विरुद्ध अंतिम युद्ध की तैयारी कर रहे थे, तब भगवान ब्रह्मा ने देवी दुर्गा के ‘असमय’ (अकाल) आह्वान की सलाह दी. भगवान राम ने एक मिट्टी की मूर्ति बनाई, चंडी पाठ किया, और भगवान हनुमान द्वारा लाए गए 108 नीलकमल चढ़ाए. देवी दुर्गा ने उनकी परीक्षा लेने के लिए एक कमल छुपा लिया. उसके अभाव में, भक्ति-भाव से भरे राम ने अपनी आंख अर्पित करने की तैयारी की, क्योंकि उनकी आंखें कमल के समान (पद्मलोचन) थीं. गहराई से द्रवित होकर देवी दुर्गा प्रकट हुईं, दर्शन दिए और उन्हें विजय का आशीर्वाद दिया. इसीलिए बंगाल में देवी दुर्गा की पूजा आश्विन में होती है, न कि बसंत में. इसीलिए मूर्तियां मिट्टी से बनती हैं. कुमारटुली का हर मूर्तिकार, शांतिपुर का हर बुनकर, आरती के बाद भक्तों को भोजन कराने वाला हर व्यक्ति — चाहे वे जानें या न जानें — सभी उस प्रार्थना की देन हैं, जिसे एक बंगाली कवि ने छह सदी पहले अमर कर दिया.

इस उत्सव को बनर्जी ने भव्य रोड शो और अंतरराष्ट्रीय विपणन के ज़रिए आक्रामक रूप से प्रचारित किया. परिणामस्वरूप, 2021 में यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का दर्जा प्राप्त हुआ. हज़ारों विदेशी पर्यटक उमड़ पड़े और कोलकाता एक वैश्विक दर्शनीय स्थल बन गया. लेकिन बार-बार उत्सव से जुड़े विवादों के बावजूद राज्य सरकार ने अपनी राह नहीं बदली.

इसके अलावा, 2025 में पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा अर्थव्यवस्था में योगदान का अनुमान 65,000 करोड़ रुपए है, जिसमें कोलकाता का योगदान लगभग 70% है. 2019 की ब्रिटिश काउंसिल की एक अध्ययन रिपोर्ट ने उत्सव की रचनात्मक अर्थव्यवस्था को 32,377 करोड़ रुपए आंका, जो राज्य के जीएसडीपी का लगभग 4% है. केवल मूर्ति-निर्माण और सहायक शिल्पों में ही तीन लाख से अधिक रोज़गार उत्पन्न होते हैं. भोजन की अर्थव्यवस्था, वस्त्र की अर्थव्यवस्था, पंडाल निर्माण की अर्थव्यवस्था, पर्यटन की अर्थव्यवस्था सभी शरद ऋतु की उपासना, देवी दुर्गा की पुजा से जुड़े हैं.

यह भी सर्वविदित है कि भगवान राम किसी एक भूगोल तक सीमित नहीं हैं. थाईलैंड में रामायण ‘रामकियेन’ बन जाती है — राष्ट्रीय महाकाव्य, जो आज भी राजकीय समारोहों में प्रस्तुत होता है. इंडोनेशिया में यह ‘काकविन रामायण’ का रूप लेती है, जो मंदिर-नक्काशियों और छाया-पुतली रंगमंच में जीवित है. कंबोडिया में ‘रेयामकेर’ है, तो लाओस में ‘फ्रा लक फ्रा राम’. लेकिन वामपंथी और बनर्जी सरकार के इतिहासकारों की नज़र में और स्वयं बनर्जी की नज़र में वे कौन थे? एक बाहरी, एक भटकने वाला, एक यायावर.

उद्धृत करने के लिए: कक्षा 6 की इतिहास की पाठ्यपुस्तक अतीत ओ ऐतिह्य (अतीत और विरासत) के पृष्ठ 8 पर ‘भारतीय उपमहादेशेर प्राचीन इतिहासेर धारा’ (भारतीय उपमहाद्वीप के प्राचीन इतिहास की धाराएं) शीर्षक वाले अध्याय में रामायण को बच्चों और उनके दादा (दादु) के बीच एक विस्तृत संवाद-शैली में प्रस्तुत किया गया है.

पृष्ठ 8 से मूल बांग्ला पाठ:

অনুসরণ করতে পড়ে তানিয়ার মনে প্রশ্ন তৈরি হলো. রবির দাদুর কাছে একদিন জানতে চাইল সেগুলোর উত্তর. আচ্ছা দাদু, রাক্ষসরাক্ষসীরা কি সত্যিই ভয়ানক দেখতে হয়?

অরুণ বলল, মেলার মাঠে রামরাবণের যুদ্ধ দেখেছি. রাবণ তো রাক্ষস রাজা. তাই হারুকাকা রাবণ সাজার জন্য মুখে কালি মেখেছিলেন. তিতির বলল, দাদু, রামায়ণের রাবণের সত্যিই দশটা মাথা ছিল? দাদু সবসময় ওদের প্রশ্ন শুনে খুশিই হন. বললেন, মানুষের কল্পনায় আর কথায় এভাবেই গল্পগাথা তৈরি হয়. রাক্ষসের যে বর্ণনা তোমরা জানো, সে সবই মানুষের কল্পনা. রামায়ণের গল্পকথায় কিন্তু রাবণ খুব সুন্দর দেখতে ছিলেন. আর দশটা মাথা মানে দশ দিকে যার মাথা খাটে.

उक्त पाठ का हिंदी अनुवाद:

“…अंग्रेजी में Roaming शब्द का एक अर्थ है घूमना. संस्कृत में ‘राम’ शब्द का एक अर्थ भी ‘घूमने वाला’ है. अंग्रेजी और संस्कृत दोनों शब्दों के अर्थ में समानता पर ध्यान दीजिए. एक समय था जब यायावरों का एक दल घूमते-घूमते भारतीय उपमहाद्वीप में आया. वहां के पुराने निवासियों से उनका मेलजोल शुरू हुआ. साथ ही युद्ध और संघर्ष भी हुआ. उस युद्ध में अधिकांश बार बाहर से आए लोग जीत गए. धीरे-धीरे उन्होंने उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग में बस्ती बसाई. और धीरे-धीरे दक्षिणी भाग में भी फैल गए. माना जाता है कि दक्षिणी भाग में फैलने की वही कहानी रामायण में मिलती है. युद्ध में विजय और बस्ती बसाने के इर्द-गिर्द अनेक कहानियां बनीं. ये कहानियां मुंह-जुबानी फैलती रहीं. उन कहानियों में युद्ध में हारने वाले लोगों को अलग तरीके से दिखाया गया — कभी राक्षस या असुर, कभी दैत्य. इस तरह उन्हें असभ्य या डाकू बताया गया. रामायण उन लोगों की कहानी है जो उस युद्ध में जीते. इसीलिए हारा हुआ रावण उसमें बुरा और भयानक दिखाई देता है.”

जबकि वास्तविकता यह है कि संस्कृत में राम की व्युत्पत्ति राम धातु से है, जिसका अर्थ है प्रसन्न होना, आनंदित होना, विश्राम करना, मोहित करना. इसका अर्थ है ‘प्रसन्न करने वाला’, ‘मनोहर’, ‘आनंद देने वाला.’ मोनियर-विलियम्स संस्कृत शब्दकोश इसकी पुष्टि करता है. इसका अंग्रेजी ‘roaming’ से कोई भी व्युत्पत्तिगत संबंध नहीं है, जो पुरानी अंग्रेजी ramian से आता है और जिसका अर्थ ‘भटकना’ है; संस्कृत में भटकने वाले के लिए यायावर, चारिन, पथिक जैसे शब्द हैं.

मैं कहता हूँ: यह एक घटिया, जानबूझकर किया गया विकृतीकरण था.

इंडो-यूरोपियन परिवार की दो भिन्न शाखाओं के शब्दों के बीच सतही ध्वनि-साम्य को व्युत्पत्ति नहीं कहते. इसी तर्क से तो हम यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि RAM अर्थात ‘Random Access Memory’ है. अतः भगवान राम उपमहाद्वीप में घूमते हुए डेटा संग्रहीत करने वाले एक मानवाकार कंप्यूटर चिप थे. इस सादृश्य की बेतुकापन जानबूझकर है और मूल दावे की बेतुकापन से बिल्कुल मेल खाती है. इसलिए यह दावा न केवल गलत है, बल्कि भाषाई दृष्टि से हास्यास्पद और किसी भी मूलनिवासी बंगाली (या किसी भी भारतीय) के लिए गहरा अपमानजनक है.

वैसे, इस पूर्ण बकवास को किसने प्रवर्तित किया? कक्षा 6 की संदर्भ पुस्तक प्रोफेसर नबनीता चटर्जी ने प्रकाशित की थी और संपादित की थी शिरीन मसूद ने (क्रिएटिव-इन-चार्ज, जिन्हें प्रायः कलकत्ता विश्वविद्यालय से जुड़ी इतिहास की प्राध्यापिका बताया जाता है) और अवीक मजुमदार की अध्यक्षता वाली विशेषज्ञ समिति ने इसे स्वीकृत किया था, जिसमें रथींद्रनाथ डे (डेविड हेयर ट्रेनिंग कॉलेज, कोलकाता के प्रधानाचार्य) मुख्य सदस्य थे.

अरे, कितनी अपार बौद्धिक क्षमता! प्रोफेसर शिरीन मसूद, नबनीता चटर्जी, अवीक मजुमदार और रथींद्रनाथ डे के सिरों पर इतना और मार्क्सवादी द्वंद्ववाद रहा होगा कि वे मूलभूत संस्कृत भाषाविज्ञान — जहां राम का अर्थ ‘प्रसन्न करने वाला’ या ‘मनोहर’ है, जो गहराई से भारतीय परंपरा में रचा-बसा है — को ही भूल गए, साथ ही किसी भी गंभीर रामायण-अध्ययन या भरत-भूमि पर महाकाव्य के भूगोल को भी.

तथ्यों या सभ्यतागत निरंतरता की क्या ज़रूरत, जब एक औपनिवेशिक-शैली का प्रवास-कल्पना और ‘परिकल्पना’ वैचारिक पटकथा में इतनी सटीक बैठती हो? इसी तरह उन्होंने मर्यादा पुरुषोत्तम, बंगाल के ‘रघु’ को, एक विदेशी आक्रमणकारी में बदल दिया और रामायण को एक विजय-कथा में उलट दिया. यह दशकों के उस दौर का क्लासिक परिणाम है जिसमें मार्क्सवादी ढ़ांचों ने, कांग्रेस-वाम पारिस्थितिकी के समर्थन से, भारत भर में, विशेषकर बंगाल में, पाठ्यपुस्तकों, विश्वविद्यालयों और पाठ्यक्रमों पर कब्जा कर लिया. इस बात से प्रतिष्ठित राजनीतिक वैज्ञानिक प्रताप भानु मेहता भी सहमत हैं.

फिर भी, वास्तविक इतिहासकारों, भाषाविदों और परंपरागत विद्वानों ने वर्षों से इन दावों को खारिज किया है. भगवान राम एक मूलनिवासी सांस्कृतिक प्रतीक और सभ्यतागत नायक हैं, न कि कोई आयात; बंगाल के मार्क्सवादियों को पुरुलिया का अयोध्या पहाड़, सीता कुंड, नया गांव के चित्रकार और एक बार ओझा की रामायण पढ़नी चाहिए — तब उन्हें ‘सम्यक ज्ञान’ मिलेगा.

टीएमसी सरकार के सुसंगत ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए, विशेषज्ञ और आलोचक बताते हैं कि तमाम आक्रामण के पीछे शुद्ध तुष्टीकरण की राजनीति है. यह बंगाल की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक जड़ों को वोट-बैंक की संवेदनशीलताओं के अनुरूप व्यवस्थित रूप से कमजोर करने का एक पैटर्न है. इस प्रकार के तुष्टीकरण में: हिंदू मंदिर औपनिवेशिक काल से ही देबोत्तर विभाग के माध्यम से कड़े सरकारी नियंत्रण में रहे, जिनका राजस्व स्वतंत्रता के बाद राज्य के खज़ाने में चला जाता था. लेकिन मदरसों और इस्लामिक संस्थाओं को सीधे अनुदान, आधुनिकीकरण योजनाएं और अधिक स्वायत्तता मिलती रही. इमामों को 2,500 रुपए मासिक वेतन पहले और ऊंची दर पर मिला, जबकि हिंदू पुरोहितों को आठ साल इंतजार करना पड़ा जो उनके एक अंश को — यानी 55,000 इमामों की तुलना में 8,000 पुरोहितों को — आधी दर पर मिलती थी.

यहां तक की त्योहारों के दौरान मुहर्रम जूलूस के लिए देवी दुर्गा की मूर्ति-विसर्जन के समय को प्रतिबंधित कर दिया गया, जिसके विरुद्ध कलकत्ता उच्च न्यायालय को 2016 और 2017 दोनों के आदेश रद्द करने पड़े और उन्हें “बहुसंख्यक वर्ग की कीमत पर अल्पसंख्यक वर्ग को पुचकारने और तुष्ट करने का स्पष्ट प्रयास” कहना पड़ा. मुसलमानों के बड़े वर्गों को ओबीसी कोटे में शामिल करने के प्रयास किए गए, जिन्हें न्यायालयों ने रोका या चुनौती दी — ये धार्मिक पहचान को आर्थिक अधिकार में बदलने के क्लासिक उदाहरण हैं.

इन सबके ऊपर, पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यक मामलों और मदरसा शिक्षा का बजट 2010-11 के 472 करोड़ रुपए से बढ़कर 2026-27 में 5,713 करोड़ रुपए हो गया. 15 वर्षों में 12 गुना अधिक, 1,100% की वृद्धि. अकेले टीएमसी ने अपने कार्यकाल में इस एकमात्र मद पर 40,000 से 60,000 करोड़ रुपए के बीच खर्च किया. इसे परिप्रेक्ष्य में रखें तो: 2026-27 के बजट में यह एकमात्र आवंटन उद्योग और वाणिज्य (1,400-1,483 करोड़ रुपए), आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स (217 करोड़ रुपए) और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी (82 करोड़ रुपए) के संयुक्त बजट से अधिक था. जबकि केंद्र सरकार का पूरे देश के लिए कुल अल्पसंख्यक कल्याण आवंटन 2025-26 में लगभग 3,400 करोड़ रुपए था, टीएमसी-शासित पश्चिम बंगाल ने अकेले एक ही वर्ष में 5,713 करोड़ रुपए आवंटित किए.

टीएमसी केवल राजनीतिक विरोधियों से नहीं लड़ रही थी. वह कक्षाओं में, भाषा नीति में और शासन में बंगाल की सभ्यतागत स्मृति के विरुद्ध एक निरंतर युद्ध में थी. उन्हें विश्वास था कि वे इस भूमि की आत्मा का अपमान कर सकते हैं, उसकी विरासत को कमज़ोर कर सकते हैं, और फिर भी उसके उत्सवों और आस्था को सत्ता और लाभ के लिए भुना सकते हैं. कर्म की कोई विचारधारा नहीं होती. उसके पास केवल सटीक हिसाब होता है.

4 मई, 2026 को बिल चुकाना पड़ा और पश्चिम बंगाल ने अपना फैसला सुना दिया. 50 वर्षों के व्यवस्थित सांस्कृतिक क्षरण, तुष्टीकरण और पाखंड का यह सामूहिक अंत हो गया. साथ ही यह भी साबित हुए कि कर्म वापस लोटकर ज़रूर आता है कभी सज़ा के रूप में, कभी हार के रूप में. बंगाल की विरासत को सत्ता के लिए तोड़ने-मरोड़ने का युग समाप्त हो गया. कर्म अपना काम कर चुका है.