बंटवारे के बाद दशकों तक, पश्चिम बंगाल एक ऐसा राज्य था जिसने बंटवारे का सबसे गंदा और डरावना स्वरूप देखा, लेकिन वह भारतीय संघ के अंदर मज़बूती से बना रहा, जहां हिंदुओं की साफ़ डेमोग्राफिक मेजोरिटी बनी रही और पॉलिटिक्स साफ़ सांप्रदायिक गणित के बजाय सिर्फ़ क्लास और लेफ़्ट-बनाम-कांग्रेस पर केंद्रित थी. लेकिन, समय के साथ, राज्य की धार्मिक बनावट में काफ़ी बदलाव आया है. आधिकारिक डेटा से पता चलता है कि आबादी में मुस्लिमों की हिस्सेदारी 1951 में लगभग 19.85 परसेंट से बढ़कर 2011 में लगभग 27 परसेंट हो गई, रिसर्चर्स ने बताया कि इस बढ़ोतरी का लगभग 7.5 परसेंट आज़ादी के बाद आया और इस बढ़ोतरी का दो-तिहाई हिस्सा 1971 के बाद हुआ. विशेषज्ञों का तर्क है कि यह बढ़ोतरी सिर्फ़ प्राकृतिक कारणों से नहीं हुई है, बल्कि बांग्लादेश से लगातार बॉर्डर पार अवैध प्रवास की वजह से भी काफ़ी बढ़ गई है, एक ट्रेंड जिसके बारे में विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इसने कई बॉर्डर ज़िलों में मुस्लिम-बहुल इलाकों को बनाया है और राज्य में मुसलमानों की कुल हिस्सेदारी को लगभग 30 परसेंट तक पहुंचा दिया है, अनुमान है कि उत्तर और दक्षिण बंगाल के कुछ हिस्सों में यह 60 परसेंट से ज़्यादा है.
पश्चिम बंगाल की राजनीति में अभी जो उथल-पुथल चल रही है, वह मुख्य रूप से राज्य की बदलती डेमोग्राफिक प्रोफ़ाइल से जुड़ी है और यह बात तेज़ी से साफ़ होती जा रही है कि अगर भारत राष्ट्रीय और सीमा सुरक्षा को लेकर ज़रा भी गंभीर है, तो वह सीमावर्ती राज्यों और विशेषकर बंगाल में बनी वोट-बैंक राजनीति को और नज़रअंदाज़ नहीं कर सकता.
राष्ट्रवादी आवाज़ों ने बंगाल में रही पुराने सभी सरकारों पर बार-बार आरोप लगाया है. पहले लेफ्ट फ्रंट और उससे भी ज़्यादा एग्रेसिव तरीके से ममता बनर्जी की टीमसी ने गैर-कानूनी बांग्लादेशी घुसपैठ को नज़रअंदाज़ किया और इसे जानबूझकर वोट-बैंक की रणनीति बना दिया. राज्य के बीजेपी नेता केंद्रीय गृह मंत्रालय के बयानों और अपनी फील्ड रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा करते है कि दशकों से करोड़ों गैर-कानूनी बांग्लादेशी प्रवासी बंगाल के रास्ते भारत में घुस आए हैं, नौकरियां ले रहे हैं सरकारी कल्याणकारी लाभ ले रहे हैं, जबकि स्थानीय बंगाली युवा बेरोज़गारी से जूझ रहे हैं. ये घुसपैठिए मामूली मौजूदगी नहीं रखते. उन्हें धीरे-धीरे राशन कार्ड, आधार और वोटर आईडी के ज़रिए भारत के नागरिक के तौर पर पेश किया जाता है और फिर चुनावों के दौरान पहले वामपंथी और अब टीमसी अपने पक्ष में उन्हें एक साथ इकट्ठा करती है और चुनावी लाभ लेती है. हाल ही में, जब चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) शुरू किया, तो हकीमपुर और बोंगांव में बिना डॉक्यूमेंट वाले बांग्लादेशियों के अपनी मर्ज़ी से बॉर्डर पार करके वापस जाने का नज़ारा दिखा, जिससे साफ़ पता चलता है कि ये बाते सिर्फ हवा हवाई नहीं है.
बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स के अधिकारियों के अनुसार नवंबर के बीच में रोज़ाना 150-200 लोग लौट रहे थे और 20 नवंबर तक करीब 1,700 लोग वापस जा रहे थे. इन आंकड़ों से पता चलता है कि सरकारी तंत्र का इस्तेमाल वोट के लिए बंगाल की टीएमसी सरकार कितना गलत तरीके से करती आई है. जानकारों का मानना है कि टीएमसी का घुसपैठियों के प्रति रक्षात्मक रवैया वास्तविक भारतीय नागरिकों और अवैध प्रवासियों के बीच के महत्वपूर्ण वैधानिक अंतर को धूमिल कर देता है. टीएमसी पर यह भी आरोप है कि इन दोनों समूहों को “बंगाली श्रमिक” की व्यापक श्रेणी में रखकर, वह परोक्ष रूप से उन लोगों को राजनीतिक संरक्षण प्रदान करती है जो अवैध रूप से सीमा पार कर आए हैं और अब राज्य के चुनावी तंत्र का हिस्सा बन चुके हैं.
चुनावी फायदे के लिए अवैध घुसपैठ बस चुनाव तक ही सीमित नहीं है; जांच एजेंसियों ने बार-बार कट्टरपंथी समूह नेटवर्क और बांग्लादेश से आए लोगों के बीच तालमेल पाया है. बीजेपी खगरागढ़ ब्लास्ट और बशीरहाट जैसे दंगों जैसे मामलों का हवाला देकर यह तर्क देते हैं कि गैर-कानूनी तरीके से देश में घुसे बांग्लादेशी और रोहिंग्या बंगाल में कट्टरपंथ के लिए उपजाऊ ज़मीन तैयार कर रहे हैं. पार्टी के नेताओं ने आरोप लगाया है कि रिफ्यूजी बस्तियां, जिनमें बरुईपुर जैसे इलाकों और दुर्गापुर-आसनसोल जैसे इंडस्ट्रियल बेल्ट में रोहिंग्या लोगों की मौजूदगी भी शामिल है, टीएमसी सरकार की नरमी उनके लिए वरदान जैसा है, जिससे बंगाल के कुछ हिस्से संदिग्ध कानूनी हैसियत वाले लोगों के लिए “सेफ हेवन” बन गए हैं. राष्ट्रवादी विचारकों को डर है कि ऐसे इलाके, जिन्हें उनके वोटों पर निर्भर स्थानीय नेताओं की सुरक्षा मिलती है, देश विरोधी तत्वों, हथियारों के तस्करों और सीमा पार के क्राइम सिंडिकेट के लिए सुरक्षित जगह बन सकते हैं, जिससे पहले से ही कमज़ोर सीमा पर भारतीय एजेंसियों का दबदबा और कमज़ोर हो सकता है. मुर्शिदाबाद में अशांति और इसी तरह की घटनाओं में, जहां कट्टरपंथी इस्लामी लोगों के शामिल होने और बॉर्डर पार से असर होने के आरोप सामने आए हैं, इससे यह चिंता और बढ़ गई है कि तुष्टीकरण वाली राजनीति कानून-व्यवस्था को खराब कर रही है, जबकि राज्य सरकार, केंद्र को सहयोग करने के बजाए, तुष्टीकरण और वोटबैंक की राजनीति कर रही है.
साथ ही, पश्चिम बंगाल की पहचान आम राजनीतिक हिंसा के साथ जुड़ने लगी है, और यहां फिर से राष्ट्रवादी ताकतों का तर्क है कि टीएमसी के राज में सज़ा से बचने का रिवाज, डेमोग्राफिक और वोट-बैंक में बदलाव के साथ मिलकर एक ख़तरनाक मिश्रण बना है. नेशनल मीडिया द्वारा इकट्ठा किए गए डेटा से पता चलता है कि पिछले दशक में पश्चिम बंगाल में भारतीय राज्यों में चुनाव से जुड़ी सबसे ज़्यादा हिंसक घटनाएं दर्ज की गईं, जिसमें टीएमसी लगभग तीन-चौथाई दर्ज मामलों में शामिल थी और उनमें से ज़्यादातर में भीड़ की झड़पों में सीधे तौर पर शामिल थी. 2021 के विधानसभा चुनाव और उसके बाद के हालात में पार्टी लाइन से अलग-अलग हत्याओं, आगजनी और टारगेटेड हमलों के परेशान करने वाले दृश्य देखने को मिले; बीजेपी नेताओं ने दावा किया कि चुनाव से पहले के सालों में उनके 300 से ज़्यादा कार्यकर्ता मारे गए थे और नतीजों के बाद हुई हिंसा में भी आम हिंदू समुदाय के ऊपर हमला किया गया. जिससे केंद्रीय गृह मंत्रालय को डिटेल्ड रिपोर्ट मांगनी पड़ी, जिसे राज्य सरकार ने देने से मना की. उसके बाद फिर कलकत्ता हाई कोर्ट के दखल के बाद सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन से जांच कराने का आदेश दिया. रिपोर्ट्स में बताया गया है कि लोकल दंगों के बाद हज़ारों बीजेपी वर्कर्स और समर्थकों को अपने घर छोड़कर पार्टी ऑफिस या पड़ोसी राज्यों में पनाह लेनी पड़ी.
टकराव का यह सिलसिला कम होने के बजाय, मौजूदा चुनावी मौसम में भी जारी है, जैसा कि मार्च 2026 में साउथ 24 परगना में बीजेपी और टीएमसी समर्थकों के बीच झड़पों में देखा गया, जब बसंती (SC) सीट पर बीजेपी उम्मीदवार चुनाव प्रचार कर रहे थे. लाठी लिए लोगों ने पार्टी कार्यकर्ताओं और यहां तक कि पुलिसवालों पर भी हमला किया, जिसमें एक सब-इंस्पेक्टर घायल हो गया. इस मामले में कई गिरफ्तारियां भी हुईं. द हिंदू के एक दशक के राज्य चुनावों के एनालिसिस से पता चलता है कि भीड़ की हिंसा जिसमें अक्सर देसी बम और हथियार शामिल होते हैं – बंगाल के चुनावों की एक गंभीर पहचान बन गई है, जिसमें कई घटनाएं विपक्षी नेताओं को नॉमिनेशन फाइल करने से रोकने या मतदान के दिन वोटरों को डराने की कोशिशों से जुड़ी हैं. राष्ट्रवादी धड़ा हिंसा के इस तरह नॉर्मल हो जाने और जिस तरह से रूलिंग पार्टी की लोकल मशीनरी कथित तौर पर कड़े कंट्रोल वाले इलाकों पर निर्भर करती है, जिनमें से कई में माइनॉरिटी वोटरों का अनुपात ज़्यादा है, के बीच एक सीधी लाइन खींचते हैं, ताकि असहमति को दबाते हुए ज़्यादा वोट मिल सकें. उनके हिसाब से, ऐसा पॉलिटिकल इकोसिस्टम जो चुनावी दबदबे के लिए सड़क पर आतंक को बर्दाश्त करता है, वह आज़ाद और निष्पक्ष चुनाव के संवैधानिक वादे से पूरी तरह मेल नहीं खाता, खासकर ऐसे राज्य में जिसके बॉर्डर वाले ज़िले पहले से ही गैर-कानूनी सीमा पार से आने-जाने की वजह से दबाव में हैं.
फिर भी, इस तरह की हिंसा और मनमानी ने बंगाल में बीजेपी को कड़े संघर्ष करने पर मजबूर किया है, जिससे जो बीजेपी कभी मामूली लगती थी, वह मुख्य विपक्ष बन गई है. 2018 के पंचायत चुनाव, जिसमें टीएमसं ने बड़े पैमाने पर हिंसा के बीच बिना किसी मुकाबले के 34 परसेंट सीटें जीतीं, जिसमें कम से कम 13 लोग मारे गए, इससे गांवों में गुस्से की लहर उठी जो 2019 के लोकसभा चुनावों में बदल गई, जहां टीएमसी की सीटें 34 से घटकर 22 रह गईं और बीजेपी ने राज्य में अपना अब तक का सबसे अच्छा प्रदर्शन किया. बाद के पंचायत और विधानसभा चुनाव, हालांकि खून-खराबे और धांधली के आरोपों से घिरे रहे.
भारतीय जनता पार्टी केवल वहां विपक्ष बनकर नहीं उभरी है, बल्कि आज बंगाल जैसे राज्य जहां मुस्लिम कट्टरपंथ अपने चरम पर है, जो दशकों से बंगाल में वोट बैंक के नाम पर होता आ रहा है उसका परिणाम है, के खिलाफ युवा और कट्टरपंथ का दंश झेल रहे बंगाली हिंदुओं की आवाज़ बनकर खड़ी है. आज लगभग हर चुनाव के बाद हिंदुओं पर हमले आम हो गए है. ऐसे कई मतदाताओं के लिए, बीजेपी की राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की मांग और अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर बीएसएफ की कड़ी तैनाती के लिए दबाव, अब केवल वैचारिक मुद्दे नहीं हैं, बल्कि दशकों से अपने ही देश में सुरक्षा और स्वामित्व की से वंचित स्थानीय हिंदुओं की अंतर्मन की आवाज़ है.
बंगाल की वोटर लिस्ट के इलेक्शन कमीशन के एसआईआर पर चल रहा विवाद, राष्ट्रवादी ताकतों और राज्य सरकार के बीच बढ़ते टकराव को दिखाता है. जहां बीजेपी एसआईआर को वोटर लिस्ट से गैर-कानूनी तरीके से रजिस्टर्ड विदेशी नागरिकों को हटाने के लिए एक बहुत पहले से तय कदम बता रही है, वहीं टीएमसी ने इसे माइनॉरिटीज़ को वोट देने के अधिकार से दूर करने और अपने सपोर्ट बेस को कम करने के मकसद से एक पॉलिटिकल मकसद वाली कोशिश माना है, जिससे बहस और बढ़ गई है. प्लास्टिक बैग में अपना सामान और बच्चों को साथ लिए हुए अवैध तरीके से देश में आए बांग्लादेशियों की वापस अपने देश जाते हुए खींची गईं तस्वीरें ताकतवर पॉलिटिकल सिंबल बन गई हैं. ये घुसपैठ के बारे में सालों से दी जा रही चेतावनियों को सही साबित करती हैं. टीएमसी के लिए, इन्हें एक ऐसे विच-हंट के सबूत के तौर पर दिखाया जाता है जो असली नागरिकों और संदिग्धों के बीच फर्क करने में नाकाम रहता है.
इस मायने में, टीएमसी के राज में “बंगाल मॉडल” बाकी भारत के लिए परेशान करने वाले सवाल खड़े करता है: क्या कोई राज्य सरकार सावधानी से पाले-पोसे अवैध अल्पसंख्यक प्रवासी वोट बैंक पर भरोसा करते हुए सेक्युलरिज़्म का दावा कर सकती है, जिसका आकार नागरिकता कानूनों को ढीले-ढाले तरीके से लागू करने, खुली सीमाओं और चुनिंदा जनहित फ़ायदों से बढ़ गया है? क्या कोई लोकतंत्र तब भी मजबूत रह सकती है जब उसके बड़े इलाके में चुनाव भारी हथियारों से लैस कैडर के बीच खूनी मुकाबलों में बदल जाएं, जिसमें विपक्षी कार्यकर्ता मारे जाएं, महिलाओं पर हमला हो और अगर वे किसी खास पार्टी या विचार का साथ देने की हिम्मत करें तो पूरे समुदाय को भागने पर मजबूर होना पड़े? हिंदुओं के लिए, जवाब साफ़ तौर पर नहीं है और पश्चिम बंगाल इस बात का टेस्ट केस बन गया है कि क्या भारतीय सरकार तुष्टीकरण की राजनीति के शॉर्ट-टर्म गणित पर कानून, नागरिकता और संवैधानिक व्यवस्था को फिर से अहमियत दे सकती है. 2026 का यह विधानसभा चुनाव में दांव सिर्फ़ इस बारे में नहीं है कि बंगाल में अगली सरकार कौन बनाएगा, बल्कि इस बारे में है कि क्या वहां एक ऐसी सरकार चुन के आयेगी जो अवैध घुसपैठियों को निकाल बाहर करे, जो बंगाली अस्मिता को पुनर्स्थापित करे, जो दशकों से वामपंथ और फिर गुंडाराज का दंश झेल चुके लोगों को सम्मान लौटा सके, जो कट्टरपंथी मुसलमानों के ख़िलाफ़ हिंदुओं की आवाज़ बनके खड़ा हों. बंगाल का विषय केवल राजनीति नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक प्रगति का भी है.
