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वो जो छूट जाता है.…!

मैं वापिस आऊंगा; स्मृतियों, प्रेम और बंटवारे के दर्द की सिनेमाई रचनात्मकता.

कुछ न कुछ छूट ही जाता है. शायद यही नियति है या फिर जीवन-चक्र का अपरिहार्य नियम. कल समय से वक़्त चुरा के ख़ुद के लिए कुछ बुना और मेरी सोच फिर कहीं नदी के किनारे जा बैठी. बड़े पर्दे पर भावनाओं की धारा बहते देख में भी अपनी सोट के संग बह गई. इम्तियाज़ अली की हर फ़िल्म आपको भीगने पर मजबूर नहीं करती, वह आपसे कहती है चलो थोड़ी देर ख़ुद के साथ भीग जायें उन भावनाओं के समंदर में ख़ुद को टटोलें. मैं वापिस आऊंगा भी एक बड़े पर्दे पर छायी फ़िल्म नहीं भावनाओं का समंदर है जहां बंटवारे की दर्दनाक पृष्ठभूमि है और उसी कीचड़ में खिलता है प्रेम का वो कमल जो आखरी सांस तक हलक में अपनी ख़ुशबू को दबाए रखता है. वक़्त का ख़ंजर बार-बार यही कहता है तुम्हें लौटना है उस कमल के पास जो वहीं है.

इम्तियाज़ अली की फ़िल्म मैं वापस आऊँगा केवल एक प्रेम कहानी नहीं है, बल्कि स्मृति, विभाजन, विस्थापन और उस अधूरेपन की ऐसी कथा है जो इतिहास की त्रासदियों के बाद पीढ़ियों तक मनुष्य के भीतर जीवित रहता है. भारत-विभाजन की पृष्ठभूमि में बुनी गई यह फ़िल्म प्रेम और खोए हुए घर की तलाश को एक साथ साधती है. कहानी पर्दे पर चलती है और दिमाग पर्दे पर कई मर्तबा कृष्ण सोबती, अमृता प्रीतम, भीष्म साहनी और मंटो की रचनाओं के पन्ने पलटने लगता है. 

फ़िल्म का मुख्य किरदार है ईशर सिंह ग्रेवाल (नसीरुद्दीन शाह), जो जीवन की अंतिम दहलीज़ पर उस फूल की ख़ुशबू को हलक में दबाए खड़ा एक ऐसा व्यक्ति है जिसकी चेतना बार-बार सरगोधा की गलियों में लौट जाती है. सरगोधा के बगीचे में खिली और पली उसकी स्मृतियों में बसी है जिया/अफ़साना (शरवरी) और वह प्रेम जो बंटवारे की हिंसा में अधूरा रह गया. युवा ईशर की भूमिका में वेदांग रैना संवेदनशील, सौम्या,सहज और प्रभावशाली हैं, जबकि नसीरुद्दीन शाह अपने अनुभव और अभिनय कौशल से चरित्र को ऐसी गहराई देते हैं कि कई दृश्य लंबे समय तक दर्शक के भीतर बने रहते हैं. हमेशा की तरह करैक्टर में डूब जाने की उनकी प्रतिभा इस फ़िल्म में मील का पत्थर साबित हुई है. 

इम्तियाज़ अली की सबसे बड़ी ताक़त हमेशा से भावनाओं को कविता की तरह परदे पर रचने और बहने में रही है. मैं वापस आऊंगा में भी वे प्रेम को केवल दो व्यक्तियों के बीच नहीं, बल्कि मनुष्य और उसकी मिट्टी, उसकी स्मृतियों और उसके अतीत के बीच के रिश्ते के रूप में देखते हैं. फ़िल्म यह प्रश्न उठाती है कि क्या कोई वास्तव में अपने घर से विस्थापित हो जाता है, या घर जीवन भर उसके भीतर बसा रहता है.

फ़िल्म बार-बार स्मृतियों के दरवाज़े पर दस्तक देती है कुछ छूटे हुए को फिर से मिलाने के लिए. जीवन में उस छूटे हुए से फिर मिलने की चाह में हम जाने कितनी बार स्वयं को खो देते हैं. नई मायाएं गढ़ते हैं, नए अर्थ तलाशते हैं, नए सपनों की इमारतें खड़ी करते हैं. और जब लगता है कि अब भीतर कोई तसल्ली बैठ गई है, कोई रिक्तता भरने लगी है, तभी कहीं पीछे से एक आवाज़ पुकारती है.

वो छूटा हुआ कल चुंबक की तरह हमें अपनी ओर खींचता है. वह बेचैन करता है, विचलित करता है. हम वर्तमान में रहते हुए भी पूरी तरह वर्तमान में नहीं रह पाते. सांस चलती रहती है, पर उसका एक सिरा कहीं अतीत के किसी अधूरे क्षण में अटका रहता है.

कितनी ही बार हमारे आसपास सब कुछ बिखरता है. कभी हम उससे भयभीत होकर भागते हैं, कभी उसे समेटने की जिद में और अधिक उलझ जाते हैं. पर जीवन की विडम्बना देखिए, जिसे नियति दूर ले जाकर पटक देती है, वह भी किसी अदृश्य डोर से हमारे भीतर बसा रह जाता है.

समय आगे बढ़ता है, ऋतुएं बदलती हैं, लोग बदल जाते हैं, लेकिन कुछ अभाव इतने गहरे होते हैं जो स्मृति की छाप लिए हमारे साथ-साथ चलते रहते हैं. वे अनुपस्थित होकर भी उपस्थित रहते हैं. शायद इसलिए जो हमारे पास है, उससे अधिक हमारा अपना वह होता है जो हमसे पीछे छूट गया.

मैं वापस आऊंगा उन फ़िल्मों में से है जो थिएटर से निकलने के बाद भी समाप्त नहीं होतीं. यह दर्शक के भीतर एक प्रश्न, एक टीस और एक स्मृति बनकर रह जाती है. विभाजन पर बनी अनेक फ़िल्मों के बीच यह फ़िल्म इतिहास की राजनीतिक बहसों से अधिक मनुष्य के भावनात्मक भूगोल को समझने का प्रयास करती है.

ए. आर. रहमान का संगीत और इरशाद कामिल का गीत फ़िल्म की आत्मा है. गीत और पृष्ठसंगीत कथा के भावनात्मक प्रवाह को गहरा करते हैं और कई बार संवादों से अधिक प्रभावशाली हो उठते हैं. रहमान का पाश्चात्य और सांस्कृतिक संगीत का ऐसा ऋणानुबंध है जो फ़िल्म की नदी के प्रवाह को समय समय पर गति देता है. 

हालांकि फ़िल्म की आधुनिक समयरेखा कुछ स्थानों पर कम प्रभावशाली लगती है. विभाजन के दर्द और उससे उपजे द्वंद्व को जिस गहराई और कलात्मकता से 1973 में बनी गर्म हवा ने अभिव्यक्त किया था, उसकी स्मृति अनायास ही मन में उभर आती है. एम. एस. सत्यू के निर्देशन और बलराज सहानी के अभिनय ने उस फ़िल्म को एक मील का पत्थर बना दिया था. मैं वापस आऊंगा समकालीन प्रयोगों को कथा में शामिल करने का प्रयास करती है, किंतु स्टैंड-अप कॉमेडी के माध्यम से इतिहास और वर्तमान के बीच सेतु बनाने की कोशिश हर जगह समान प्रभाव नहीं छोड़ पाती. कुछ पंचलाइनें अपेक्षित तीक्ष्णता से वंचित रह जाती हैं, जबकि इम्तियाज़ अली अपनी फ़िल्मों रॉकस्टार और तमाशा में इस प्रकार के प्रयोगों को कहीं अधिक प्रभावी ढंग से साध चुके हैं. फिर भी फ़िल्म का भावनात्मक प्रभाव इन कमियों पर भारी पड़ता है. इसकी संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टि इसे विशिष्ट बनाती है.

यह फ़िल्म उन लोगों के लिए है जो सिनेमा में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि स्मृति, संवेदना और मानवीय अनुभव की गूंज तलाशते हैं. मैं वापस आऊंगा अंततः प्रेम के लौट आने की कहानी नहीं है; यह उन स्मृतियों की कहानी है जो कभी लौटती नहीं, क्योंकि वे कहीं जाती ही नहीं. वे हमारे भीतर घर बना लेती हैं. वो जो छूटता है, वही सबसे क़रीब रह जाता है.

“जीवन में जो छूट जाता है, वह कभी पीछे नहीं रह जाता. वह हमारे भीतर आकर बस जाता है. शायद इसलिए एक ही जीवन में हम अनेकों बार लौटते हैं.”

डॉ. शुभ्रा पंत कोठारी
डॉ. शुभ्रा पंत कोठारी
डॉ. कोठारी दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज (सांध्य) के राजनीतिक विभाग में सहायक प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं. हिंदी साहित्य, सिनेमा और समाज के अंतर्संबंधों पर गहरी समझ रखती हैं.