हर साल 27 फ़रवरी को में जॉर्ज ओरवेल्ल के उपन्यास 1984 के कुछ पन्ने ज़रूर पढ़ता हुं. उपन्यास में विन्स्टॉन स्मिथ कहता है कि सच होता है और जाना जा सकता है. लेकिन इनर पार्टी का सदस्य ओ ब्राइयन कहता है कि कोई सच नहीं होता. सच केवल वह होता है जिसे पार्टी कह दे कि सच है. अगर पार्टी कल उस सच को झूठ कह दे और कोई नया सच ले आए तो वही सच बन जाएगा. जब पहली बार उपन्यास पढ़ा था तो ये सब लेखक की कल्पना लगी. लेकिन बाद में जीवन में घटनाएं देखी और उनके बारे में समाचारों में कुछ और ही पढ़ा तो जाना कि उपन्यास कल्पना नहीं, बल्कि एक सत्य है.
गुजरात में स्थित गोधरा शहर की आबादी 2002 में लगभग सवा लाख थी. गोधरा रेलवे स्टेशन शहर के लगभग बीचों-बीच है. ए कैबिन के सामने रुकी हुई साबरमती इक्स्प्रेस स्टेशन से बाहर भी नहीं निकली थी. तभी कुछ मुसलमानों की भीड़ ने ट्रेन को चारों और से घेरा लिया. एस6 कोच के चारों दरवाज़ों को बंद करके उनपर पेट्रोल छिड़क दिया गया. दोनों वेस्टिब्यूल पर पेट्रोल छिड़का गया. और आग लगा दी गई. हर कोच में एक खिड़की होती है जिसमें सरिए नहीं होते. उसमें से एक दो यात्री कूद कर भागे तो उसमें भी पेट्रोल फेंक कर आग लगा दी गई और कुछ मुस्लिम वहां पहरे पर खड़े हो गए.
गोधरा का स्टेशन मास्टर और ए कैबिन का स्टाफ़ लगातार बड़ोदरा कंट्रोल रूम को आंखो देखा हाल सुना रहा था कि शहर से आई हज़ारो की भीड़ ने ट्रेन में आग लगा दी है और ट्रेन को घेरा हुआ है. पूरा रेल ट्रैफ़िक रोककर 20 मिनट में ही बड़ोदरा से मेडिकल स्पेशल ट्रेन भी चला दी गई थी. गोधरा शहर में भी फ़ाइअर ब्रिगेड को फ़ोन किया गया लेकिन घटनास्थल पर पहुंचने का रास्ता मस्लिमों के मुहल्ले से होकर गुज़रता था और उन्होंने फ़ाइअर ब्रिगेड के ट्रक रोककर उन्हीं में आग लगाने की कोशिश की और उन्हें ट्रेन तक नहीं पहुंचने दिया. जब रेलवे की मेडिकल स्पेशल ट्रेन गोधरा पहुंची तब उसपर और ए कैबिन पर भी हमले की कोशिश की गई लेकिन उसमें मौजूद आरपीएफ स्टाफ़ ने गोली चलाकर भीड़ को भगाया.
ट्रेन में दो ड्राइवर, गार्ड और लगभग 50 अन्य रेल स्टाफ़ था. सभी ने रिपोर्ट दी की शहर से आई हज़ारो की भीड़ ने ट्रेन रोककर एस6 कोच में आग लगा दी है. शाम को जब शव निकाले गए तो कुल 59 शव निकले. जिनमें एक तिहाई महिला व बच्चे थे. कुछ बच्चों के शव उनकी मां के वक्ष से चिपक गए थे और अलग नहीं किए जा सके. मां ने अंत समय तक बच्चे को बचाने की कोशिश की होगी.
यह सब बहुत ही भयानक और दिल दहलाने देने वाला था.
लेकिन उससे भी भयानक और दिल दहलाने देने वाला वह था जो अगले दिन से ही मीडिया में शुरू हुआ:
“आग कारसेवकों ने लगायी थी.”
“आग स्वयं लगी थी.”
“आग एक दुर्घटना थी.”
सोचने वाली बात यह है कि सवा लाख की आबादी वाले शहर के बीचों-बीच 59 मनुष्यों को सैकड़ों रेलकर्मियों और हज़ारों अन्य यात्रियों की उपस्तिथि में ज़िंदा जला दिया गया और भारत के घृणित स्थायी शासकवर्ग-मीडिया, बुद्धिजीवी, लुटियन दिल्ली के स्थायी नेताओं ने घोषित कर दिया कि नहीं, वैसा कुछ हुआ ही नहीं. मुसलमानों का इसमें कोई हाथ है ही नहीं. यात्री ख़ुद जल गए या कारसेवकों ने जला दिए.
उसी दिन मुझे पता चला कि आखिर कैसे मुसलमान अब तक आठ करोड़ हिंदुओं को मार चुके है और करोड़ों हिंदू महिलाओं का बलात्कार कर चुके है. ऐसा इसलिए हो पाया है क्यूंकि हिंदू नेतृत्व प्रतिकार तो दूर, ऐसा हो जाने से ही इंकार कर देता है. कॉक्रोच बन चुका हिंदू संभ्रांत वर्ग, हिंदू एलीट पिछले 1400 साल से ऐसे ही ग़रीब व मध्यमवर्गीय हिंदुओं की बलि हिंसा करने वाले लोगों को चढ़ा रहा है. और कह देता है कि जो मरे वो कभी थे ही नहीं, या स्वयं मर गए, या अन्य हिंदुओं ने जला दिए.
नहीं दूसरी तरफ हिंसा करने वाले वर्ग को कोई झूठ भी नहीं बोलना पड़ता; हिंदू पत्रकार, हिंदू बुद्धिजीवी, हिंदू नेता; ज़कात के टुकड़ों के लालच में ख़ुद ही हिंदुओं पर मुसलमानों के किए हर अत्याचार को झुठला देते है. 1984 उपन्यास कल्पना नहीं है, सच है.
उपन्यास में वर्णित पार्टी शांतिमज़हब है, कितने भी सिर काटे, लूटे, बलात्कार करे, लेकिन अगर ये कहे कि यह अमन का मज़हब है तो दुनिया को यह मानना ही पड़ेगा. बल्कि इसके शिकार हिंदू ही कहते है कि एक धर्म विशेष के लोगों ने किसी को नहीं मारा, 59 मनुष्य स्वयं ही जल मरे.
माना जाता है कि न्यायाधीश सच की उद्घोषणा करते है. लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश ने भी कह दिया कि जो मुसलमान कहता है वही सच होता है, इन्होंने किसी को नहीं मारा. एक दिन हम सब 100 करोड़ हिंदू लोग ज़िन्दा जला दिए जाएंगे और शांतिदूत कह देंगे कि उन्होंने तो किसी को मारा ही नहीं, हिंदू नाम की नस्ल तो कभी थी ही नहीं. और दुनिया उसी को सच मानेगी. यही ज़कात की ताक़त है. फ़िल्म रैंगून में नायक कहता है एक अन्य मनुष्य को: “तुम जीवित कहां हो. तुम तो मर चुके हो. अपने ही शरीर में दफ़न हो तुम.”
पत्रकार हिंदू, एनजीओ वाले हिंदू, बुद्धिजीवी हिंदू, नेता हिंदू, जज हिंदू, नौकरशाह हिंदू, पुलिस अधिकारी हिंदू अपने ही शरीर में दफ़न मृत लोग है. जो हिंदुओं की बलि देकर, हिंदू महिलाओं का सम्मान बेचकर रोज कुछ ज़कात के टुकड़े पाते है.
