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नोएडा की श्रमिक हिंसा

मजदूरों का शोषण नाम का फ़्रौड

अगर किसी शब्द का सब से अधिक शोषण हुआ हो तो वो यह शब्द ही है – शोषण। और उसका यह शोषण वामी ठगों ने किया है।

अगर किसी ‘काम’ को शोषण कहा जा सकता है तो वह है बंधुआ मजदूरी। जहां मनुष्य से उसकी इच्छा के विरुद्ध जबर्दस्ती से कोई काम करवाया जाता है और काम करवानेवाला जो भी पैसे दें उसे अपना पारिश्रमिक मानना पड़ता है। जिस व्यवहार में जबर्दस्ती हो वो बाज़ार नहीं होता, वो व्यापार नहीं होता और ना ही वह एक मालिक – नौकर का संबंध रह जाता है। यह एक गुनाह का धंधा है, एक माफिया ऑपरेशन है।

इनके अलावा दुनिया में कोई शोषण नहीं होता। एक आदमी काम देता है, उसके लिए अपनी क्षमतानुसार वेतन ऑफर करता है। काम हो जाने पर या अगर समय के हिसाब से हो तो उतने घंटे काम करने पर जो भी दोनों के बीच तय किया हुआ वेतन हो वो दे देता है। ये एक साफ़सुथरा व्यवहार है। इसमें कोई शोषण नहीं।

जहां वेतन का प्रश्न है, न्याय वेतन क्या हो यह दुनिया में कोई भी नहीं जानता। कोई भी नहीं। यह एक मनोवैज्ञानिक बात है और सभी मनोवैज्ञानिक बातों की ही तरह उसकी कोई तय व्याख्या नहीं होती। साधारणत: हर मालिक फिलहाल जो वेतन दे रहा है उससे कम वेतन में वही काम करनेवालों की खोज में रहता है और कर्मचारी हमेशा शिकायत करता रहता है कि उसकी योग्यता, जो वेतन उसे मिल रहा है उससे अधिक पाने की है। पता नहीं, गूगल के सीईओ सुंदर पिचाई भी अपने पैकेज से असंतुष्ट हो तो उसमें मेरे लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं ।

अब आते हैं बुरी खबर पर। जो यह है कि एक कर्मचारी का वेतन उतना ही हो सकता है जिससे कम में कोई व्यक्ति वह काम करने को तैयार नहीं होगा। इसे दुबारा पढ़िये – एक कर्मचारी का वेतन उतना ही हो सकता है जिससे कम में कोई व्यक्ति वह काम करने को तैयार नहीं होगा।

तो ये सरकार द्वारा कानून बनाकर “न्यूनतम वेतन” निर्धारित करने का फ़्रौड क्या है ? उत्तर : बंधुआ मजदूरी ही है। सरकार के पास हिंसा करने का अधिकार है। उसके पास बंदूकें हैं, हथकड़ियाँ हैं, जेल हैं। इसलिए वो जो चाहे कानून बना सकती है। लेकिन अर्थशास्त्र सरकार के क़ानूनों से नहीं चलता। ना ही गणित को बंदूकों की धाक से चलाया जा सकता है। तो जो सरकार न्यूनतम वेतन का आदेश देती है तो होता इतना ही है कि उत्पादन खर्च में यह अतिरिक्त वेतन भार जोड़े जाने से जो उत्पादन महंगा हो जाता है, बिक नहीं पाता और बनानेवाले व्यक्ति या कंपनी का दिवाला निकल जाता है। श्रम एक माध्यम होता है, अपने आप में अंतिम लक्ष्य नहीं होता (इसीलिए मनरेगा सब से बड़ा फ़्रौड है)। अंतिम लक्ष्य वह उत्पादन है जो मार्केट में बिकने के लिए उतारा जाता है। निर्माता के पास सरकार के जैसी कोई ताकत नहीं होती, वो तो ग्राहकों पर निर्भर होता है। अगर वे उतने दाम नहीं देना चाहते, निर्माता धंधे से बाहर हो जाता है। बनाया हुआ उत्पादन गले का फांस अलग से। और कई ऐसे उद्यम चालू ही नहीं होते हैं जब प्लानिंग स्टेज में महंगी लेबर कॉसट पता चलती है। सो बेरोजगारी तो आनी ही है। इस तरह की सरकारी हिंसा का परिणाम वही होता है जो गुंडाओं की हिंसा का होता है। इकोनोमी खत्म और बेरोजगारी का उफान।

इसीलिए अगर आप को लगता है कि आप का शोषण हो रहा है तो कुछ भी कीजिये लेकिन वामपंथी की मदद न लीजिएगा। उसको उसकी दारू और लड़की मिल जाएगी, आप अपनी नौकरी खो देंगे।

अगर आप को लगता है कि आप का शोषण हो रहा है तो दूसरी अच्छी नौकरी खोजिए, कुछ नए हुनर विकसित कीजिये, कोई नया बिज़नस स्वयं शुरू कीजिये। कुछ नहीं तो ठेला रेहड़ी लगाये। या फिर गाँव लौट जाइए। अगर अप ने या आप के पिता जी ने अपनी सारी ज़मीन बेच डाली है तो बचत के पैसों से कुछ जमीन लीजिये। कुछ भैंस भी खरीदिए। वे अप को दूध देंगी। अपना खाना स्वयं उगाये, अपना कपास स्वयं उगाये। अपना कपड़ा स्वयं बुनिए। अपना घर खुद बाँधिए। ईंटें खरीद नहीं सकते तो मिट्टी या फूस से बनाइये। और देखिये, इसमें आप का कहीं भी शोषण नहीं हो रहा, कोई भी आप का शोषण नहीं कर रहा।

अकल्पनीय लगता है ना ? लेकिन सच तो है। एक बात समझ लीजिये, प्रकृति ने आप को कोई जन्मजात अधिकार नहीं दिये कि आप को मनचाहा काम मनचाहे वेतन के साथ मिल जाये। प्रकृति में किसी के कोई हक़, कोई अधिकार नहीं होते। ये हक़ और अधिकार हमारी मानसिकता के उपज हैं। कोई धूर्त, कोई ठग, कोई झूठा चला आयेगा और आप से कहेगा कि आप को मनचाही नौकरी और मनचाहा वेतन देना सरकार का कर्तव्य है। आप को यह अच्छा लगेगा इसलिए आप उसकी जयजयकार भी करेंगे। लेकिन सरकार भी सामूहिक कल्पना की ही निर्मिति है। सरकार कुछ लोगों का समूह है जिनको जनता ने तय शुल्क पर काम सौंपा है। उसने पास कोई नौकरियाँ आलमारियों में पड़ी नहीं होती जिनपर आप का हक़ हो। और ना ही वे कोई नौकरियाँ उत्पन्न कर सकते हैं। उनकी अपनी नौकरियाँ भी तब निर्माण हुई जब जनता को महसूस हुआ कि एक सरकार होनी चाहिए। आप जो मर्जी चाहे कितनी भी सरकारें अपनी वोट से बदल दीजिये, वे मनरेगा जैसे फ़्रौड भी चालू कर देंगी, लेकिन आप को नौकरी नहीं दे सकती। ऐसी फ़्रौड योजनाएँ केवल सरकार का दिवाला निकाल सकती हैं, और मनरेगा यही काम कर रहा है।

किसी काम को करने के लिए एक व्यक्ति की जब जरूरत होती है तब ही उसके लिए एक नौकरी का निर्माण हो जाता है। जिसने भी कोई छोटी से छोटी इकाई भी चलायी हो, यह बात को स्वानुभव ही पाएगा।

आप का विकल्प केवल आप के देश से वामपंथियों को मार भगाना है, सरकार को इकोनोमी को मुक्त कराने को विवश कराना है और धीरे धीरे आप के वेतन बढ़ने लगेंगे। नए नए उद्यम चालू होंगे, और अगर आप काबिल हैं तो वे आप को अपनी नौकरी में रखने के लिए एक दूसरे से स्पर्धा भी करेंगे जिसमें फायदा आप का ही होगा।

आप को यह स्वीकार नहीं है तो यह आप का निर्णय है। इस सुझाव को जबर्दस्ती से लागू कराने के लिए हमारे पास कोई बंदूकें नहीं हैं। लेकिन फिर यह ढलान का रास्ता है, जिसमें गरीबी और बेरोजगारी ही आने हैं।

इकोनॉमिक्स का चक्र अपनी गति से घूमता है और अत्यंत निर्मम, हृदयशून्य होता है। इकोनॉमिक्स आप के वामपंथी ठग और उनकी बंदूकों के ताबे में नहीं होता। स्टालिन जैसे क्रूर तानाशाह के परमाणु बम भी इकोनॉमिक्स का कुछ बिगाड़ नहीं सके। स्टालिन खत्म हुआ, इकोनॉमिक्स अपनी जगह अपनी गति से है। आप उसके चक्र पर सवार हो कर और सम्पन्न हो सकते हैं, या उससे कुचले जा सकते हैं।

अधिरथी
अधिरथी
अधिरथी स्वतंत्रता के रक्षक हैं.