नरसंहार के 35 साल

19 जनवरी, 1990 में कश्मीर के हिंदुओं को अपने घरों और कश्मीर से भागने के लिए मजबूर किया गया था. जब उनकी हत्या की गई, उनके साथ बलात्कार किया गया और उन्हें यातनाएं दी गईं, तब उनके साथ हुए अत्याचार के बारे में किसी को पता नहीं चला, उनके दर्द को समझने की उम्मीद रखना तो बहुत दूर की बात है. आज, 35 साल बाद, कम से कम यह बदलाव आया है कि जहां उनके ‘नरसंहार’ पर राष्ट्रीय टेलीविजन और सोशल मीडिया पर चर्चा की जा रही है.

और हिंदू होने के कारण उन्हें हाशिए पर नहीं धकेला जा रहा है. अब उनके आंसुओं को भी पूरे देश के लोगों के सामने लाया जा सकता है. सच्चाई सामने लाई जा रही है कि कश्मीर में अपने आखिरी दिनों में उनके पड़ोसी करीम चाचा ने उनकी बेटियों को अगवा करने की चेतावनी दी थी और उनमें से कुछ को अगवा भी कर लिया था. हिंदू उस समय के साक्षी हैं जब भारत के कुछ हिस्सों को 1947 में और दूसरी बार 1971 में, पाकिस्तान ने अपने कब्जे में ले लिया था.

1914-24 के बीच अर्मेनियाई लोगों ने भी देखा कि कैसे उनके पड़ोसी, कश्मीरी हिंदुओं के पड़ोसियों की तरह, उनके अपने ही राज्य में, जहां वे रहते आ रहे थे और आगे भी खुशहाल रहने का सपना देख रहे थे, में मस्जिदों से ‘जिहाद’ का ऐलान किए जाने के बाद, उन्हें मारने के लिए आए, लेकिन यहां धर्म की बात आती है. जिसे कश्मीरी हिंदुओं के पड़ोसी मानते थे.

अगर आप नहीं पढ़ते, तो इस्लामवादियों का कसूर नहीं है. कुरान में आयत 9.123 और 58.22 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अल्लाह का आदेश है कि तुम (विश्वासी) काफिरों पर आक्रमण करो. जो कोई उनके प्रति नरमी बरतेगा, वह अल्लाह के क्रोध का सामना करना पड़ेगा. (कुरान 4.144).

मैं अक्सर सुनता हूं कि कश्मीरी हिंदुओं ने जिहादियों का सामना क्यों नहीं किया और भागने का रास्ता क्यों चुना? उन्होंने उनके खिलाफ लड़ाई क्यों नहीं लड़ी? सचमुच? क्या हम इतने मूर्ख हैं? 1400 साल बीत गए और हम अब भी इस्लाम के नाम पर चल रहे नरसंहारों की सच्चाई को समझना नहीं चाहते?

इसका जवाब सेना के लोग आपको देंगे. सेना में कार्यरत अपने परिवार के सदस्यों/दोस्तों से बात करें, तो आपको पता चलेगा कि इसमें शांति काल में स्टेशन और फील्ड पोस्टिंग नामक एक प्रणाली होती है. शांति काल में, यदि आवास उपलब्ध हो तो सेना अधिकारी अपने परिवार को अपने साथ रख सकता है. लेकिन युद्धक्षेत्र में तैनाती के दौरान परिवार को साथ नहीं रखा जा सकता क्योंकि झड़प होने की संभावना रहती है. और क्या आपने कभी किसी सैनिक के परिवार को देश के शत्रु के खिलाफ लड़ने के लिए युद्ध के मैदान में जाते देखा है?

यही बात उन कश्मीरी हिंदुओं पर भी लागू होती है, जो अपने कश्मीर में अपने परिवारों, रिश्तेदारों के साथ रह रहे थे, जब तक कि उन्हें वहां से जाने (चालिब), धर्म परिवर्तन करने (रलिब) या मरने (गलिब) के लिए मजबूर नहीं किया गया. खुद को उनकी स्थिति में रखकर देखें और जो चाहें कह लें.

कश्मीरी हिंदुओं पर हमला करने वाले लोग किसी सामान्य परिवार के सदस्य नहीं थे, बल्कि एक मिलिशिया थे यानी सैन्य प्रशिक्षण प्राप्त लोगों का एक समूह. उस समूह का हर सदस्य संभावित हत्यारा, क्रूर कातिल और अमानवीय बलात्कारी था. निशाने पर वह हिंदू व्यापारी भी था, जिसका अपना परिवार था, वह नन्हा बच्चा भी था जो कुछ ही समय पहले इस दुनिया में आया था और वह महिला भी थी जो अपने पति के साथ जीवन बिताना चाहती थी. लेकिन कोई भी उनके निशाने से नहीं बचा.

किसी उग्रवादी समूह का मुकाबला केवल उग्रवादी समूह ही कर सकता है, कोई सामान्य परिवार के सदस्य नहीं. एक सामान्य हिंदू ने 10,000 साल पहले ही हिंसा का त्याग कर दिया था. वह ऐसा कभी-कभी करता है, ज्यादातर तब जब उस पर पहली बार उन लोगों की भीड़ द्वारा हमला किया जाता है जिन्हें मीडिया ‘विशेष समुदाय’ कहता है.

एक ऐसा समुदाय जिसने 1947 में पाकिस्तान और 1971 में बांग्लादेश पर कब्जा किया और अब उसने भारत को एक इस्लामी राज्य में बदलने का लक्ष्य रखा है. आशा है आपको पीएफआई का इंडिया विजन 2047 दस्तावेज़ याद होगा. इस जिहादी संगठन का मुकाबला करने के कई तरीके हैं. लेकिन इसके लिए, हममें से प्रत्येक को सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि ऐसा संगठन मौजूद है, सच्चाई को समझना होगा और इसे अपने मित्रों और परिवार के सदस्यों को भी समझाना होगा. फिर देखिए चमत्कार कैसे होता है.


कौशलेश राय एक कल्चरल कमेंटेटर और द डॉसियर के फाउंडर हैं.