back to top

चुनाव नहीं, 370 हटाने और राम मंदिर प्रशासन में ज्ञानेश कुमार की बड़ी भूमिका से बौख़लाया इकोसिस्टम

आज दिल्ली की सड़कों पर पहले की तरह उपद्रव दिखाई नहीं दे रहा. पुलिस और प्रशासन पूरी तरह सतर्क है और कॉकरोच जनता पार्टी, एसएफआई, आईसा और वाम दलों से जुड़े लोगों की करतूतों को देखकर पहले से बेहतर तैयारी के साथ मैदान में उतरे है. दिल्ली और देश के हर कौने से अशांति फैलाने वाले वामपंथियों को फिर से देश में दंगे कराने से पूरी तरह रोका जा रहा है, जिससे न सिर्फ लेफ्ट लॉबी बल्कि पूरा विपक्ष भी पूरी तरह बौख़ला गया हैं.

दिल्ली पूरी तरह से नियंत्रण में हैं और देश की नियति लिख रही है जहां देश विरोधी ताक़तों के तख्तापलट अभियान को मिट्टी में मिलाया जा रहा है. नीट पेपर लीक के दम पर एक दबाव समूह के रूप में अपनी गहरी पैठ बना चुकी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) अब कोई साधारण पार्टी नहीं रही. इसकी आड़ में यह जनता के बीच एक कहानी गढ़कर, भीड़ इकट्ठी कर धीरे-धीरे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़ी चुनौती बन रही है.

सीजेपी के सदस्य अभिजीत दीपके, सौरभ दास और आशुतोष रांका जनता को बरगलाकर देश की संवैधानिक संस्थाओं पर चयनित सरकारी अफसरों को पूर्णतः दोषी साबित करने से पहले ही इस्तीफा देने के लिए दबाव बना रहे हैं. इस बार, 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर दिल्ली पुलिस द्वारा अनुमति ना मिलने के बावजूद लोकतंत्र की भावना को छिन्न-भिन्न करते हुए सीजेपी आंदोलन करने की कोशिश कर रही है. इस बार  सीजेपी ने जंतर-मंतर पर अपने प्रदर्शन में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग में सुधार हेतु कुछ मांगे रखी हैं. जिसमें प्रमुख मांग है ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा.

लेकिन जब आप कहते हो कि लोकतंत्र में आंदोलन और विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है  तो यह भी समझना ज़रूरी है कि सीजेपी कहीं से भी एक लोकतांत्रिक तरीके से अपने आंदोलन को नहीं चला रही है. सीजेपी सोशल मीडिया, न्यूज वेबसाइट पर लोगों के बीच त्रुटिपूर्ण जानकारी और असत्य तथ्यों के आधार पर लोगों के बीच एक कहानी बनाकर उनके दृष्टिकोण को बदल कर सच्चाई से उन्हें दूर कर रही है, ताकि वह इस आंदोलन में सीजेपी का साथ दें.

लेकिन यह समझना ज़रूरी है कि लोकतंत्र में फैसला न्यायपालिका करती है और न कि एक व्यक्ति और कोई संगठन. कोई व्यक्ति आरोपी है कि नहीं इसका फैसला भी न्यायपालिका करती है. लेकिन लोगों के बीच गलत कहानी बताकर, तथ्यों को तोड़-मरोड़ के पेश कर जबरन धरने पर बैठकर इस्तीफा मांगना कहीं से भी एक संवैधानिक पद पर चयनित व्यक्ति, प्रशासन और लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है. क्योंकि यह लोकतंत्र है, तानाशाही नहीं.

वर्तमान में जो सीजेपी कर रही है, यह लोकतंत्र के रूप में एक तानाशाही है, जहां सीजेपी अपनी भीड़ जुटाने के दम पर सरकार पर दबाव डालकर एक ऐसी संवैधानिक निकाय के व्यक्ति का इस्तीफा मांग रही है, जिस पर अभी आरोप है और वह सिद्ध नहीं हुआ है. क्योंकि आरोपों सही हैं या गलत साबित करने का हक न्यायपालिका का है.

अब यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या सीजेपी सुप्रीम कोर्ट से भी सर्वोच्च बन गई है? क्या गलत है और क्या सही? क्या इस फैसले को लेने का अधिकार सीजेपी ने अपने हाथ में ले लिया है? क्या भारत के लोकतंत्र में सीजेपी अपने आप को सर्वोच्च समझ बैठी है? यह सब आम जनता को समझने की ज़रूरत है.

दरअसल मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर जो आरोप लगे हैं, वह द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के आधार पर हैं. जहां इस रिपोर्ट के मुताबिक मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के अतिरिक्त अन्य दो चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने लगभग 10 महीनों में कम से कम 14 बार एसआईआर, यानी Special Intensive Division, से संबंधित फैसलों और निर्देशों पर अपनी आपत्तियां दर्ज की थीं.

हालांकि मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंच चुका है. जहां सुनवाई में चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि अदालत केवल अखबार की रिपोर्ट के आधार पर आदेश पारित नहीं कर सकती. भारत के चीफ जस्टिस का यह बयान अपने आप में यह बतलाता है कि अदालत अपने निर्णय, तथ्यों और सबूतों के आधार पर करती है. समाज में उठती भावनाओं, सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनल्स पर एक कहानी गढ़कर, उसके आधार पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराती. 

सुप्रीम कोर्ट ने यहां कार्यवाही करते हुए केंद्र सरकार और चुनाव आयोग से जवाब मांगा है. सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई करते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी समेत अन्य संबंधित चुनाव आयोग अधिकारियों को भी नोटिस जारी किया है.  ऐसे में बिना जांच पड़ताल के सीजेपी द्वारा ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा मांगना कहां तक तार्किक है. अगर निर्णय गलत लिए गए हैं और वह असंवैधानिक हैं, तो उसको निरस्त करने का अधिकार भी सुप्रीम कोर्ट का है, किसी पार्टी का नहीं.

लेकिन वर्तमान में जिस तरह सीजेपी बहुत ही असंवेदनशील होकर, बिना प्रदर्शन की अनुमति मिले, जंतर-मंतर पर धरना प्रदर्शन कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर अड़ी है, वह यह दर्शाता है कि सीजेपी का टारगेट चुनाव आयोग में सुधार नहीं, बल्कि उनका टारगेट तो खुद ज्ञानेश कुमार हैं. और इसको लेकर कई अखबारों एवं राजनीतिक विशेषज्ञों में चर्चा भी चल रही है.  इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि पूरा विपक्ष और लेफ्ट-लिबरल गुट चुनाव आयुक्त के पीछे आखिर क्यों पड़ा है. इसका जबाव आपको जम्मू कश्मीर से 370 हटाने और राम मंदिर से जुड़ी कुछ खबरों में मिल जाएगा. वामपंथ और कांग्रेस को सुलगा देने वाले इन दोनों ही मामलों में ज्ञानेश कुमार की बड़ी भूमिका रही है.  

370 और 35A हटाना भारत के पूरे सेक्युलर, लेफ्ट-लिबरल, पाकिस्तान परस्त, कम्युनिस्ट पत्रकारों, विदेशों से चलने वाले एनजीओ और विपक्षी राजनैतिक दलों के लिए गहरा आघात था. विदशों में बैठी ताक़तों और भारत के विकास से वैश्विक स्तर पर बढ़ने वाली प्रतिस्पर्धा को हज़म न कर पाने वाली सरकारों के भारत को हमेशा हिंसा में धकेले रखने के सपने को तोड़ दिया गया था. जिसकी बौख़लाहत अभी तक भी इस प्रदर्शनों में हमें दिखाई दे रहा है.

प्रधानमंत्री और गृह मंत्री तक सीधे पहुंच पाना इन ताक़तों के लिए मुश्किल है इसलिए चुनाव आयुक्त इनके लिए एक सीढ़ी और अपने आकाओं को खुश करवने का एक तरीका है.

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश्वर कुमार जो मार्च 2024 में मुख्य निर्वाचन आयुक्त बने, उससे पहले वह देश के कई ऐसे महत्वपूर्ण पदों पर रहे और ऐसे कानूनों के तैयारी में प्रशासनिक तौर पर कार्यरत रहे, जो वर्तमान में उनको कांग्रेस, सीजेपी तथा देश की अन्य विपक्षी पार्टियों एवं वामपंथी दलों का निशाना बना देती है.

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अगस्त 2019 में जब केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 से जुड़े संवैधानिक बदलावों के लिए जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन की प्रक्रिया शुरू की थी, उस समय गृह मंत्रालय के जम्मू-कश्मीर प्रभाग में संयुक्त सचिव थे. इसलिए वे इस प्रक्रिया से जुड़े और प्रशासनिक कामकाज में महत्वपूर्ण पद पर थे. और जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 का मसौदा तैयार करने में भी इनकी बड़ी भूमिका रही थी. 

वहीं इस कानून के अलावा जो इन्होंने दूसरा पद संभाला वह भी कांग्रेसी, सीजेपी और वामपंथी दलों के गले नहीं उतरा था. 9 नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या भूमि विवाद पर फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को मंदिर निर्माण के लिए ट्रस्ट स्थापित करने का निर्देश दिया था. 

5 फरवरी, 2020 को प्रधानमंत्री ने संसद में ट्रस्ट के गठन की घोषणा की. उस समय ज्ञानेश कुमार गृह मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव पद पर थे और अयोध्या डेस्क का नेतृत्व कर रहे थे. उन्होंने ट्रस्ट के गठन से संबंधित प्रशासनिक कार्य में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट को चलाने के ड्राफ्ट को भी ज्ञानेश कुमार ने ही बनाया था.

ऐसे में जम्मू-कश्मीर से 370 हटाने वाले कानून का मसौदा तैयार करना और राम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट के गठन में प्रशासनिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाना, यह दोनों ऐसे मुद्दे थे, जहां ज्ञानेश कुमार जो  कांग्रेसी नेताओं, सीजेपी समर्थित पार्टी और नेताओं तथा वामपंथी दलों के निशाने पर पहले से ही थे, जब चुनाव आयुक्त वाला मुद्दा चर्चा में आया, तब इन कांग्रेसी, सीजेपी एवं वामपंथी दलों ने इसे दोनों हाथों से समेटा और अपनी हुई खीज को सामने ले आए, जिस कारण आज यह आंदोलन अपने सबसे चरम और उपद्रवी अवस्था में है.

लेकिन क्या सड़क का आंदोलन और कुछ लड़को की भीड़ भारत के प्रमुख चुनाव आयुक्त को हटाने का दम रखती है. जहां सीजेपी अपने भीड़तंत्र, सोशल मीडिया नैरेटिव और तुष्टीकरण की राजनीति के दम पर दबाव बनाकर इस्तीफा लेना चाहती है. क्या वास्तव में आंदोलन करके एक संवैधानिक निकाय पर आसित व्यक्ति को हटाया जा सकता है.

दरअसल भारतीय संविधान के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके पद से निष्कासित करने की शक्ति संसद के पास है. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरह हटाया जा सकता है जिस तरह से उच्चतम न्यायालय के न्यायाधिकारियों को हटाया जाता है. सरल शब्दों में, ‘दुर्व्यवहार’ एवं ‘अक्षमता’ के आधार पर संसद के दोनों सदनों द्वारा विशेष बहुमत से संकल्प पारित करने के बाद राष्ट्रपति द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त को उसके पद से निष्कासित किया जा सकता है. 

यद्यपि यहां यह जानना भी ज़रूरी है कि निरंतर आंदोलन के कारण यदि सरकार के हर एक सदस्य समय-समय पर इस्तीफा देते रहे तो यह अपने आप में लोकतंत्र के लिए एक बड़ी चुनौती है. और यदि यही प्रक्रिया निरंतर रही तो यह विपक्ष और देश के दुश्मनों को हर बार बढ़ावा देगी, इसका परिणाम यह होगा कि जब भी देश हित में ऐसा कानून या फैसले लिए जाएंगे जो इन पार्टी और देश के दुश्मनों को अंदरूनी नुकसान पहुंचाएंगे, तब फिर से यही समूह भीड़ लेकर, एक झूठी कहानी बनाकर, भीड़तंत्र की आड़ में सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश करेंगे. किसान आंदोलन के समय यह परिस्थिति हम देख चुके हैं. 

हालांकि भारत में सभी को अपनी बात रखना, शांतिपूर्वक आंदोलन करना, संगठन बनाने जैसे कई अधिकार भारतीय संविधान में दिए गए हैं. लेकिन सीजेपी के पिछले आंदोलन के अनुभव यह बताते हैं कि इस पार्टी के आंदोलन कभी भी शांतिपूर्वक नहीं रहे हैं.

नीट पेपर लीक के आंदोलन में तथा बीते 8 अक्टूबर को हुए कांग्रेस पार्टी समर्थित आंदोलन में जिसमें राहुल गांधी और प्रियंका गांधी थी, उसमें जिस तरह पुलिस कर्मियों पर हमला किया गया और उनकी वर्दी फाड़ी गई, यह बतलाता है कि आंदोलन के बीच से ही भीड़ ने हमले किए, और सीजेपी का यह आंदोलन भी कोई शांतिपूर्वक नहीं होने वाला है.

इन्हीं आंदोलनों की आड़ में भीड़ का चेहरा ओढ़े ऐसे उपद्रवी लोग आते हैं जो देश के सुरक्षा बलों पर हमले की पहल करते हैं और सुरक्षात्मक कार्यवाही में सुरक्षाकर्मियों पर सवाल उठाकर, देश में सरकार बनाम जनता की एक आंतरिक और मानसिक विचारों की जंग को बढ़ावा देते हैं. तत्पश्चात होता यह है कि यही छोटी-छोटी घटनाएं धीरे-धीरे एक बड़े उपद्रव का मोड़ ले लेती हैं. 

वहीं वर्तमान में भारत के ख़िलाफ़ देशविदेश में जो भूराजनीतिक स्तर पर हालात चल रहे हैं, उसमें इस तरह के हिंसक आंदोलन, बाहरी ताकतों को न चाहते हुए भी देश की आंतरिक सुरक्षा को भेदने का एक मौका दे देते हैं. बीते वर्ष बांग्लादेश में जन विद्रोह कैसे सरकार के तख्तापलट में परिवर्तित हुआ, उस घटना से भारत की जनता को देखने और सीखने योग्य अनुभव लेना होगा. 

वहीं बात करें अगर सीजेपी की तो ऐसा नहीं है कि सीजेपी इस संविधान और चुनाव आयुक्त के निष्कासन की प्रक्रिया को जानती नहीं है. वह यह भी जानती है कि यदि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग से संबंधित जांच में कुछ असंवैधानिक लगता है तो सुप्रीम कोर्ट अपने फैसले से चुनाव आयुक्त के उन फैसलों को निरस्त कर सकती है. लेकिन यह सब जानने के बावजूद सीजेपी अपनी राजनीतिक रोटी सेकने और एक ज्वलंतशील मुद्दे और उसके समर्थित राजनीतिक दलों को फायदा पहुंचाने के लिए भीड़ का इस्तेमाल कर फिर से देश में उपद्रव फैलाकर सरकार पर दबाव बना रही है.


बलराम सिंह पाल
बलराम सिंह पाल
बलराम सिंह पाल एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.