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सेंट ज़ेवियर पर युवा पत्रकार की टिप्पणी पर मचा बवाल

हाल ही में युवा पत्रकार, लेखक और धार्मिक मामलों पर अपनी बात रखने वाले गौतम खट्टर के ख़िलाफ़ गोवा पुलिस ने केस दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर लिया है. उन पर आरोप है कि उन्होंने सेंट फ्रांसिस ज़ेवियर को लेकर ऐसी बात सामने रखी, जो उन्हें नहीं बोलनी चाहिए थी.  

उन्होंने ज़ेवियर को लेकर टिप्पणी की और कहा, ‘इस धरती पर, फ्रांसिस ज़ेवियर नाम का एक आतंकवादी, बर्बर, क्रूर शासक था. एक जगह है जहां उसकी मृत्यु हो गई. उसका शरीर कीटों द्वारा भस्म हो गया है. न तो उसका शरीर और न ही आत्मा अब मौजूद है. उसकी हड्डियों को कीड़ों ने धूल में कुचल दिया है. फिर भी, हर साल उनके लिए एक उत्सव आयोजित किया जाता है. लाखों सनातनी वहां हाथ जोड़कर जाते हैं. उसी व्यक्ति के लिए जिसने अपना जीवन सनातनियों को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने में बिताया था.’ उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई पहले की एक वीडियो में भी बताया था कि ‘फ्रांसिस ज़ेवियर हिंदुओं का उत्पीड़न करता था, उन्हें ईसाई बनाता था. जो हिंदू ईसाई बनने से इनकार कर देते थे उनके नाखून खींच लेता था.’

गौतम की इस टिप्पणी पर गोवा समेत देश के अन्य ईलाकों के ईसाई समुदाय में काफी गुस्सा देखने को मिला. फ्रांसिस ज़ेवियर भारत में 16वीं शताब्दी 1542ईस्वी में भारत आया था. ईसाई धर्म का प्रचार करने के लिए एक मिशनरी के रूप में जेवियर को पुर्तगाल के राजा ने भारत भेजा था. वे एक पुर्तगाली इसाई थे जिनका कार्य मूल निवासी लोगों के बीच ईसाई धर्म का प्रचार करना और उनका धर्म परिवर्तन करना बनाना था.

1545  में फ्रांसिस ज़ेवियर ने पुर्तगाल के राजा, किंग जॉन तृतीय को एक पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने गोवा में एक ‘इनक्विजिशन’ स्थापित करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया था. इस पत्र का अनुवाद स्टीफन नील द्वारा लिखित पुस्तक ‘A History of christianity in India’ के पृष्ठ160  पर देखा जा सकता है.

उन्होंने आगे लिखा, ‘मैंने महामहीम को इसलिए लिखा है कि भारत में उपदेशकों की कितनी अधिक आवश्यकता है. भारत में दूसरी आवश्यकता, यदि वहां रहने वालों को अच्छा ईसाई बनाना है, तो यह है कि यहां ‘पवित्र इनक्विजिशन’ की स्थापना करनी चाहिए; क्योंकि वहां ऐसे बहुत से लोग रहते हैं जो मूसा के नियम या मुहम्मद के नियम के अनुसार जीवन जीते हैं और जिनके मन में न तो ईश्वर का कोई भय है और न ही मनुष्यों के सामने कोई लज्जा.’

सीता राम गोयल द्वारा लिखित पुस्तक ‘Francis Xavier: The Man and His Mission’ में फ्रांसिस ज़ेवियर के अपने ही कुछ लेखों का संग्रह किया गया है. इन लेखों में भारत के लोगों के प्रति उनके विचारों को और इस बात को दर्शाया गया है कि किस प्रकार उन्हें कैथोलिक धर्म में दीक्षित किए जाने की आवश्यकता थी. पृष्ठ 10-11  से उद्धरण, 20  जनवर,1548  को लिखे गए एक पत्र में ज़ेवियर ने एक अन्य जेसुइट पादरी को संबोधित करते हुए लिखा, ‘मेरे अनुभव के अनुसार, भारत में धर्म फैलाने का एकमात्र प्रभावी तरीका यह है कि राजा एक आदेश के माध्यम से भारत में अपने सभी अधिकारियों के बीच यह घोषणा करे कि वह केवल उन लोगों पर भरोसा करेगा जो अपनी शक्ति के हर संभव साधन का उपयोग करके ईसाई धर्म के शासन का विस्तार करने के लिए प्रयास करेंगे. राजा को निश्चित रूप से उन्हें आदेश देना चाहिए कि वे केप कोमोरिन (कन्याकुमारी) में ईसाइयों की संख्या बढ़ाने के लिए पूरे उत्साह के साथ प्रयास करें, ताकि सीलोन द्वीप को भी यीशु मसीह के विश्वास की ओर आकर्षित किया जा सके और सभी धर्मपरायण लोगों को इकट्ठा किया जा सके—चाहे वे हमारे समाज (जेसुइट्स) के सदस्य हों या कोई अन्य जो धर्म के प्रचार के लिए उपयुक्त प्रतीत हों… यदि राजा ऐसा आदेश जारी करता है और जो लोग इसका उल्लंघन करते हैं उनके साथ सख्ती से पेश आता है, तो बड़ी संख्या में मूल निवासी यीशु मसीह के विश्वास को अपना लेंगे; अन्यथा किसी भी सफलता की उम्मीद नहीं की जा सकती.’

इसके बाद ज़ेवियर ने पुर्तगाल के राजा को सीधे एक पत्र लिखा. उन्होंने लिखा:  ‘कृपया यह आदेश दें कि, जब भी वायसराय और सरकार पत्र लिखें, तो वे आपको वर्तमान धार्मिक स्थितियों के बारे में विस्तार से बताएं— जिसमें धर्मांतरित लोगों की संख्या और उनका प्रकार और अधिक लोगों को धर्मांतरित करने की संभावनाएं तथा ऐसा करने के लिए अपनाए जाने वाले साधन शामिल हों. कृपया यह आदेश दें कि, धर्म के संबंध में, केवल उन्हीं अधिकारियों के पत्रों पर विचार किया जाएगा. यदि किसी देश या प्रांत में, जहां वे अपना अधिकार क्षेत्र रखते हैं, उनके प्रशासन के तहत धर्मांतरित लोगों की संख्या में कोई वृद्धि स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती है- क्योंकि यह स्पष्ट है कि यह संख्या किसी भी समय और किसी भी देश में असीमित रूप से बढ़ सकती है, बशर्ते शासक उनके धर्मांतरण के पक्ष में हों- आपकी गरिमा उन्हें इसके लिए जिम्मेदार ठहराएगी और उन्हें दंडित करेगी; यह बात उन नियमों में पूरी गंभीरता से घोषित की जानी चाहिए जिनके द्वारा उन्हें अधिकार प्रदान किए गए हैं. जब तक भारत के वायसराय और गवर्नर, बड़ी संख्या में ‘काफिरों’ के धर्मांतरण के लिए काम न करने पर अपनी संपत्ति और अपने पदों को खोने के डर के प्रभाव में नहीं आते, तब तक आपकी महिमा को भारत में सुसमाचार के प्रचार से किसी बड़े फल की उम्मीद नहीं करनी चाहिए- सिवाय इसके कि बड़ी संख्या में लोग बैपटिस्म के लिए आएं और जो लोग पहले से ही बैपटिस्म ले चुके हैं, वे कोई धार्मिक प्रगति करें.’

कई ईसाई इतिहासकरों ने ज़ेवियर के अत्याचारों के बारे में बहुत विस्तार से बताया है. उनके अनुसार ज़ेवियर को जब भी किसी व्यक्ति के बारे में मूर्तियां बनाने या मूर्ति-पूजन की जानकारी मिलती थी तो वह स्वयं वहां जाकर उन्हें तुड़वा देता था. यदि उसके बाद भी कोई ईसाई मूर्तियां बनाने का कार्य जारी रखता था तो ज़ेवियर उस व्यक्ति को गांव छोड़कर जाने के लिए बाध्य कर देता था. एक दिन ज़ेवियर को किसी घर में मूर्ति-पूजा की सूचना मिली तो उसने पूरी झोपड़ी को जला देने का आदेश दिया ताकि दूसरों को सबक मिल सके.

भारत में अंबेड़करवादियों और वामपंथियों द्वारा आए दिनों ब्राह्मणों को गाली देने और नीचा दिखाने के मामले सामने आते रहते है. बीते कुछ समय से ऐसा और अधिक बढ़ गया है. ब्राह्मणों को लेकर उनके मन में ज़हर इस कदर भरा है कि वे इस वर्ग को भारत का मूल निवासी भी नहीं मानते. इसका मुख्य कारण है ब्राह्मणों द्वारा धर्मांतरण का हमेशा से विरोध करते आना है. ज़ेवियर को धर्मांतरित करने में सबसे ज्यादा समस्या भी ब्राह्मण ही उत्पन्न कर रहे थे.

पेरिस में ‘सोसाइटी ऑफ जीसस’ को लिखे गए एक अन्य पत्र में, उन्होंने ब्राह्मणों को ईसाई धर्म के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा माना. उनके अनुसार, ‘इन इलाकों में गैर-ईसाइयों के बीच एक ऐसा वर्ग है जिसे ब्राह्मण कहा जाता है. वे इतने दुष्ट और कुटिल लोग हैं जितने कहीं और नहीं मिल सकते. अगर ये ब्राह्मण न होते, तो सभी गैर-ईसाई हमारे धर्म को अपना चुके होते.

पुर्तगाली शोधकर्ता एंटोनियो जोस साराइवा के अनुसार, हिंदुओं को ही सबसे अधिक सताया गया और उन्हें उनके धर्म के कारण दंडित किया गया. उनका अनुमान है कि सज़ा पाने वालों में से 74% से अधिक पर जेसुइट्स द्वारा धर्मांतरण किए जाने के बाद भी हिंदू रीति-रिवाजों का पालन जारी रखने का आरोप लगाया गया था, 1578 से 1588 तक भारत में रहे इतालवी यात्री और व्यापारी फिलिपो सैसेटी ने लिखा है कि चर्च के पादरियों ने हिंदुओं पर उनके पवित्र ग्रंथों का हवाला देने और अपने धर्म का पालन करने के लिए आरोप लगाए. वे लिखते हैं, “उन्होंने हिंदू मंदिरों को नष्ट कर दिया और लोगों को इतना परेशान और प्रताड़ित किया कि वे बड़ी संख्या में शहर छोड़कर चले गए, क्योंकि वे ऐसी जगह पर और नहीं रहना चाहते थे जहां उन्हें कोई स्वतंत्रता नहीं थी और यदि वे अपने पूर्वजों के देवताओं की पूजा करते तो उन्हें कारावास, यातना और मृत्यु का सामना करना पड़ता.’ ज़ेवियक के क्रूरता के प्रमाण आज भी गोवा में देखे जा सकते हैं. गोवा में चौंक-चौराहों पर बड़े-बड़े खंबे लगे हैं जिन्हें हथकत्रो खंब कहा जाता है. जहां पर ज़ेवियार के आदेश के अनुसार जो व्यक्ति ईसाई बनने से इनकार कर देता था उसके हाथ काटकर वहां लटका दिए जाते थे.

ये वही सेंट फ्रांसिस ज़ेवियर जिनके नाम पर भारत में हजारों स्कूल, कॉलेज और संस्थाएं चल रही हैं. ज़ेवियर ने भारत में, खासकर गोवा में बड़े पैमाने पर हिंदुओं का धर्मांतरण कराया. वर्तमान समय में भी धर्मांतरण के मामले आए दिन देखने को मिलते रहते हैं. भारत में मुस्लिम समुदाय द्वारा धर्मांतरण को रोकने के साथ-साथ ईसाई मिशनरियों पर भी लगाम लगाने की सख्त ज़रूरत है.

वरुण कांत बाजपाई
वरुण कांत बाजपाई
वरुण कांत बाजपाई छत्रपति शिवाजी महाराज यूनिवर्सिटी से सोशियोलॉजी की पढ़ाई कर रहे हैं.