ऋग्वेद में नेता शब्द को परिभाषित करते हुए “नयति इति नायकः” अर्थातजो आगे ले जाए वही नेता है,कहा गया है. दुनिया में जिन भी राष्ट्र ने अपनी उन्नति को गढ़ा है, उन्होंने अपने आदर्श और नेताओं को बहुत सावधानी से चुना है. नेता के चयन के बहुत दूरगामी प्रभाव होते है जो उस नेता के बाद भी उस राष्ट्र की मानसिकता पर बने रहते है. पाकिस्तान ने जिन्ना जैसे राजनैतिक इस्लाम के अनुयायी को अपना नेता चुना था जिसका परिणाम यह हुआ कि पाकिस्तान कभी भी अल्लाह, अमेरिका और आर्मी के फेर से बाहर निकल नहीं पाया. भारतीय इतिहास भी ऐसे उदाहरणों से भरा हुआ है. जिन राज्यों ने तथाकथित समाजवाद को चुना वह आज अपने आर्थिक अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं और जिन्होंने उससे इतर मूल्य चुने, वे आज ज्यादा बेहतर मार्ग पर है. भारत में अभी तक इस तरह का मुकाम केवल गांधी को मिला है या यूं कहें कि उन्हें दिया गया हैं.
मोहनदास करमचंद गांधी दशकों तक इस देश के समानार्थी बने रहे. तमाम विश्वविद्यालय, संस्थान इत्यादि उनके नाम से बनाए गए. उन्हें पाठ्यक्रमों में इस प्रकार से प्रायोजित किया गया मानों वे ही तो है जो इस राष्ट्र के आधारशिला है. नेता जी सुभाष चंद्र बोस द्वारा दी गई राष्ट्रपिता की उपाधि को उसके संदर्भ से हटाकर पेश किया गया. जब किसी व्यक्ति को सत्ता द्वारा इतना महत्वपूर्ण बना दिया जाए तो फिर उसका मूल्यांकन अति आवश्यक हो जाता है ताकि यह जाना जा सके कि उस व्यक्ति के विचारों का राष्ट्र पर क्या प्रभाव पड़ा?
गांधी के प्रभावों की यदि बात करें तो उनके विचारों ने इस देश को सामाजिक और राजनीतिक रूप से अभूतपूर्व रूप से प्रभावित किया. भारतीय राजनीति में तुष्टिकरण और धार्मिक व जातीय पहचान को राजनीति का उपकरण बनाने की संस्कृति गांधी की ही देन है. आज हम राजनीति में धार्मिक और जातीय पहचान की जिस समस्या से ग्रसित है, वह भी राष्ट्र पिता की ही संतान है. प्रथम विश्व युद्ध के प्रभावों से बदहाल देश जब संकट के दौर से गुजर रहा था, उस समय गांधी का भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय स्तर पर आगमन हुआ. खलीफा के पद से हटाए जाने से आहत भारतीय मुसलमानों के आंदोलन को पूरे देश का आंदोलन बना दिया गया. गांधी ने इस धार्मिक और भारतीय संदर्भ में मूल्यहीन विषय को राष्ट्रीय परिदृश्य में ला दिया. गांधी ने भले इसे हिंदू-मुसलमान एकता के मौके के तौर पर देखा पर मुसलमानों के लिए यह अपने धार्मिक आका के अस्तित्व को बचाने की लड़ाई थी तो वहीं हिंदू वर्ग इसे अपनी मातृभूमि को दासता से मुक्ति दिलाने के मौके के तौर पर देख रहा था. अंततः परिणाम ये हुआ कि न तो खलीफा का पद बचा, न मुस्लिम जन मानस का अपेक्षित साथ मिला और आंदोलन गांधी की राजनीतिक हैसियत को बढ़ाने के सिवा असफल ही रहा. इस आंदोलन के अन्य दो महत्वपूर्ण पक्ष भी है. पहला तो यह कि इस आंदोलन ने ये संदेश दिया कि कांग्रेस स्वाधीनता आंदोलन में मुसलमानों के सहयोग के लिए उनकी धार्मिक-राजनीतिक मांगों को मानने से भी पीछे नहीं हटेगी. इस संदेश ने हिंदुस्तान के भूगोल और राजनीति को जितना प्रभावित किया उतना शायद ही किसी ने किया हो. दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है कि इस आंदोलन के समय गांधी ने ऐलान किया कि वर्ष भर के भीतर आज़ादी मिल जाएगी. संभवतः अपनी लाश पर पाकिस्तान बनने के कथन के बाद गांधी का ये सबसे बड़ा झूठ था. न जाने मगर इतिहासकारों ने कभी इन कथनों पर गांधी का मूल्यांकन नहीं किया? वैसे भी चाटुकारिता और महिमा मंडन से उपजे धन का अपना रस होता है, शायद तमाम मूर्धन्य इतिहासकार इसी रस पान में व्यस्त रहे होंगे.
यह कोई अकेला उदाहरण नहीं है जब गांधी ने मुसलमानों के साथ को पाने के लिए अतार्किक और राजनीतिक समझदारी से हीन मार्ग को चुना. डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपनी किताब पाकिस्तान या भारत का विभाजन में विस्तार से बताया है कि कैसे गांधी की नीति दोतरफा थी. जब हिंदुओं का नरसंहार हुआ तो गांधी हसरत मोहानी के प्रभाव के कारण चुप रहे. मुसलमानों के साथ होने वाली छोटी सी घटना पर भी गांधी उद्वेलित हो जाते थे. गांधी इस नीति पर जीवन भर चलते रहे. 1940 के बाद जब पाकिस्तान की मांग को लेकर मुसलमानों में एकजुटता बढ़ने लगी तब भी गांधी ने इस नीति को नहीं छोड़ा. वे कभी भी मज़बूत तरीके से पाकिस्तान का विरोध नहीं कर पाए. कभी वे मौन व्रत धारण कर लिए तो कभी असहाय होकर हिंसा रोकने के लिए निकल पड़े लेकिन मुस्लिम तुष्टिकरण को त्यागकर देश हित में उस राजनीतिक सत्ता का प्रयोग नहीं कर सके जो उन्हें इस देश की जनता ने दी थी.
पाकिस्तान बनने के बाद भी उनकी मुसलमानों के प्रति ये अधीरता समाप्त नहीं हुई. पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के बीच गलियारा देने की बात हो या फिर पाकिस्तान द्वारा कश्मीर में हमले के बाद भी पैसे देने की, वे सदा व्याकुल रहे बिना ये सोचे कि इसका देश पर और उसके भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उनके लिए भारत में बचे मुसलमान, जो कुछ दिन पहले तक जिन्ना के भक्त थे और पाकिस्तान के लिए वोट करते थे, दया के पात्र थे परंतु वह हिंदू और सिख जो अपनी बसी बसाई दुनिया से विस्थापित कर दिए गए थे, वह किसी सहानभूति के हकदार नहीं थे. वे हिंदुओं के क्रोध के ख़िलाफ़ मुखर थे पर मुसलमानों के धार्मिक अतिवाद और उससे उपजी हिंसा पर मौन थे. अक्सर सैय्यद अहमद खान को पाकिस्तान का जनक कहा जाता है लेकिन ये सोचने का विषय है कि अहमद खान के पास राजनीतिक शक्ति नहीं थी. क्या गांधी के द्वारा स्थापित राजनीतिक मूल्यों और उनके अंध समर्थन ने अहमद खान के स्वप्न को राजनीतिक बल देकर यथार्थ में बदल दिया?
गांधी की इस नीति के लक्षण आज भी हमारी राजनीति और समाज पर दिखते है. विक्टिम कार्ड खेलने की वर्तमान प्रवृत्ति के पीछे का नैतिक साहस यहीं से आता है. भारत के प्रत्येक चुनाव में हम आज जो मुसलमानों के वोट पाने की विकलता और उसके लिए कुछ भी कर गुजरने की अधीरता देखते है, वह यहीं से जन्मी है. इस नीति के कारण ही मुसलमान न कभी अपनी आलोचना सुनने को राजी हुए और न ही कभी उनमें कोई सुधार हुआ. वे पिछड़ते चले गए. इस नीति का ही परिणाम है कि बांग्लादेशी घुसपैठियों के ख़िलाफ़ भी आवाज़ नहीं उठाई जाती ताकि मुसलमानों के बीच गलत संदेश न चला जाए. ये प्रवृत्ति भारत के लिए नित नए ख़तरे उत्पन्न कर रही है जिनसे पार पाने के लिए गांधी की नीतियों के ख़िलाफ़ जाना आवश्यक है.
गांधीवाद के इस सामाजिक आयाम के अलावा एक राजनीतिक आयाम भी है. गांधी ने अंग्रेजों के विरुद्ध जो धरना प्रदर्शन की नीति अपनाई उसने अंग्रेजों को भारत से निकालने में कितनी मदद की यह तो शोध का विषय है लेकिन आज़ाद भारत की पहली सुबह ही इस संस्कृति को खत्म कर दिया जाना चाहिए था पर ऐसा नहीं हुआ. क्या वाशिंगटन आज़ाद अमेरिका में अपनी बात को मनवाने के लिए या अपनी असहमति को दर्ज कराने के लिए रोज युद्ध छेड़ते थे? यह समझने की आवश्यकता थी कि आज़ादी पाने और देश चलाने के तरीके अलग-अलग होते है. इन प्रवृत्ति ने जिन हालातों का निर्माण किया वह किसी राष्ट्र के लिए अच्छा नहीं है.
डॉक्टर अंबेडकर ने इन धरना प्रदर्शन की प्रवृत्ति को “अराजकता का व्याकरण” कहा था. इस प्रवृत्ति ने देश को कभी भी कठिन पर आवश्यक फैसले लेने नहीं दिए. इस प्रवृत्ति का एक और दुष्प्रभाव हुआ, वह यह था कि जब भी कोई गड़बड़ होती तो उस पर आंदोलन होते और ऐसे में सरकार उन गड़बड़ को सुधारने की जगह उस आंदोलन को खत्म कराने में अपनी ऊर्जा लगाती. आंदोलन करने वाले तो इससे मालामाल हो गए पर समस्याएं वहीं की वहीं रही. कालांतर में ये कार्यों को बाधित करने का उपकरण बन गया जिसे राजनीतिक शक्तियों और बाहरी देशों द्वारा प्रयोग किया गया. इस कारण ही इस देश में एनजीओ का व्यापार बहुत फला-फूला. बड़ी मात्रा में धन देश में आया और कई गलत कार्यों में लगा. इस प्रवृत्ति ने देश में नेता बनने की एक विधि भी ईजाद कर दी. कोई भी व्यक्ति किसी भी भावुक मुद्दे को लेकर आंदोलन में बैठ जाता. सरकार दबाव वश उससे बात करती, उसकी कुछ मांग भी मानती और वे स्वयं में ही एक नेता बन जाता. तिलचट्टा नरेश अभिजीत दीपके इसके हालिया उदाहरण है. इस विधा से निकले किसी नेता ने देश का भला किया हो ऐसा ध्यान नहीं आता. उनके लिए यह सब राजनीति और सत्ता पाने का उपक्रम होता है न कि देश की भलाई का साधन यदि गांधी की भाषा में कहे तो उनका न तो साध्य पवित्र होता है और न ही साधन.
अंत में, कोई भी राष्ट्र आदर्शों से नहीं चलता और जो चलने का प्रयास करता है वह अंततः गुलामी और शोषण के उस तंत्र का शिकार बनता है जिसमें भारत सदियों तक फंसा रहा. यहां गांधी नहीं कौटिल्य और श्री कृष्ण चलते है. अब समय आ चुका है कि भारत अपने महापुरुषों का पुनः एक बार अवलोकन करें. भले ही वर्षों से जमें इस तंत्र ने गांधी को अपौरुषेय बना दिया हो पर राष्ट्र के सम्मुख कोई भी आलोचना से परे नहीं होता. अक्सर हम देखते है कि जब भी कोई नेता विदेश में गांधी से जुड़ा कोई काम करता है तो बुद्धिजीवियों का एक वर्ग उसे निशाना बनाते हुए कहता है कि “कितना भी भाग लो अंततः गांधी के सामने ही झुकना पड़ेगा”. जब वह यह कह रहे होते है तो दरअसल वह अपनी उस उपलब्धि पर दंभ भर रहे होते है जिसमें उन्होंने गांधी को बखूबी प्रायोजित किया है और सभी को उसके सामने झुकना पड़ता है. ऐसा नहीं कि गांधी का इस देश के लिए कोई योगदान नहीं है पर उन्हें देवता सदृश्य प्रायोजित करना अनुचित है. गांधी किसी व्यक्ति की निजी पसंद हो सकते है पर एक राष्ट्र के लिए वह अव्यावहारिक है, वह राष्ट्र की आत्मा को नष्ट करने जैसा है. हमें ऐसे आदर्शों की आवश्यकता है जो राष्ट्र को तमाम सामाजिक-राजनीतिक बंधनों से मुक्ति दिला सकें क्योंकि नेता वहीं होता है जो समाज को आगे ले जाए जैसा कि ऋग्वेद में कहा गया है “नयति इति नायकः”.
