उत्तर भारत के कई इलाकों में कुछ दिनों में सर्दियां शुरू हो जाएंगी, लेकिन यूपी में इसके उलट चुनावी सरगर्मी दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है. कहते हैं, दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर जाता है, ऐसे में यूपी विधानसभा का चुनाव कोई आम चुनाव नहीं रह जाता. इस चुनाव में सबसे कड़ा संघर्ष होगा योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली बीजेपी और अखिलेश यादव की पारिवारिक विरासत वाली समाजवादी पार्टी के बीच.
ऐसे में उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर अपने सबसे बड़े राजनीतिक हथियार पीडीए को धार देना शुरू कर दिया है. पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए पीडीए का मतलब लंबे समय तक पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक रहा है. इसी सामाजिक गठजोड़ के सहारे समाजवादी पार्टी ने अपने पारंपरिक यादव-मुस्लिम आधार से आगे बढ़ने की कोशिश की है. लेकिन इस कहानी में सबसे बड़ा ट्विस्ट आया 30 सितंबर को, जब अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनावों से कुछ महीने पहले हो रहे राज्यसभा चुनावों के लिए अपने उम्मीदवार घोषित किए. यूपी में 10 सीटों पर राज्यसभा चुनाव होने हैं और संख्याबल के हिसाब से देखें तो अखिलेश यादव अपने समर्थन से 2 उम्मीदवारों को आराम से संसद के उच्च सदन में पहुंचा सकते हैं. 30 सितंबर को जब इंडिया ब्लॉक की मीटिंग से किनारा करके अखिलेश यादव ने 2 राज्यसभा उम्मीदवारों के नाम घोषित किए तो उन्हीं के पीडीए पर सवाल उठना शुरू हो गया. दरअसल, अखिलेश यादव ने अपने चाचा राम गोपाल यादव और रिलायंस के धनराज नाथवानी को उम्मीदवार बनाया, यानी एक टिकट तो अपने परिवार में ही दिया और दूसरा एक बड़े बिजनेस एक्जीक्यूटिव को.
2027 के चुनावों से पहले ही उनकी पीडीए की राजनीति शिगूफा साबित होती नज़र आ रही है. इससे पहले एक ब्राह्मण सम्मेलन में बोलते हुए अखिलेश यादव ने कहा था कि पीडीए के पी में पंडित भी आते हैं. अखिलेश अपने वर्डप्ले से भले ही खबरों में जगह बना लें, लेकिन समाजवादी पार्टी का पूरे समाज के प्रति क्या रवैया रहा है, यह किसी से छिपा नहीं है. इनके प्रवक्ता राजकुमार भाटी ने एक टीवी शो में ब्राह्मण वर्ग की तुलना वेश्याओं से की थी और इनके तमाम पदाधिकारी अक्सर हिंदू धर्म और उनकी आस्था पर सवाल उठाते रहते हैं.
खैर, चुनाव से पहले अखिलेश यादव के पीडीए प्रयोग को खारिज करना भी तथ्यों के लिहाज से सही नहीं होगा. 2024 के लोकसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी ने उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 37 पर जीत दर्ज की. उसका वोट शेयर करीब 33.6 प्रतिशत रहा. कांग्रेस के साथ गठबंधन को जोड़ने पर विपक्षी गठबंधन ने राज्य में महत्वपूर्ण प्रदर्शन किया.
यह परिणाम समाजवादी पार्टी के लिए 2022 के विधानसभा चुनाव की तुलना में एक बड़ा बदलाव था. 2022 में भाजपा ने 255 विधानसभा सीटें जीती थीं, जबकि समाजवादी पार्टी 111 सीटों तक सीमित रही थी.
इसलिए पीडीए को केवल एक असफल चुनावी नारा बताना सही नहीं होगा. 2024 के परिणाम ने यह ज़रूर दिखाया कि समाजवादी पार्टी यादव और मुस्लिम आधार से आगे जाकर दलित, गैर-यादव पिछड़े और अन्य सामाजिक समूहों में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश में कुछ सफलता हासिल कर सकती है. लेकिन 2024 का लोकसभा चुनाव और 2027 का विधानसभा चुनाव एक जैसे नहीं हैं. बीजेपी के कई पदाधिकारियों ने बाद में स्वीकार किया कि उम्मीदवार चुनने में उनसे कुछ भूल हुई थी. 2024 में समाजवादी पार्टी कांग्रेस के साथ गठबंधन में थी और ‘संविधान बदल देंगे’ जैसे भ्रामक नारों ने उनके पक्ष में खूब वोट बटोरे थे.
2027 में सीट बंटवारे और गठबंधन की तस्वीर अलग हो सकती है. चुनाव से पहले ही कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय को हटाकर आराधना मिश्रा मोना को यूपी कांग्रेस की कमान सौंपी गई है. इस पर कुछ ऐसे ही सवाल उठ रहे हैं कि क्या अब अखिलेश समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस के फैसले भी लेंगे.
अभी तक कांग्रेस और सपा में सीट शेयरिंग को लेकर बात नहीं बन पाई है. कांग्रेस लगातार दावा कर रही है कि पार्टी 150 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, वहीं समाजवादी पार्टी 50 से 70 के बीच का गणित मान कर चल रही है. विधानसभा चुनाव लोकसभा से अलग होते हैं. विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार, स्थानीय संगठन, जातीय समीकरण और क्षेत्रीय मुद्दे कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं. इसलिए असली सवाल यह है कि क्या 2024 में दिखाई दिया पीडीए का सामाजिक गठजोड़ 2027 के विधानसभा चुनाव तक कायम रह पाएगा? पीडीए की शुरुआती राजनीतिक व्याख्या अपेक्षाकृत स्पष्ट थी – पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक.
यह रणनीति समाजवादी पार्टी की एक पुरानी समस्या का समाधान खोजने की कोशिश थी. पार्टी की राजनीति लंबे समय तक यादव और मुस्लिम मतदाताओं के मजबूत आधार पर टिकी रही. भाजपा के बढ़ते प्रभाव और गैर-यादव पिछड़ी जातियों के बड़े हिस्से के उसके साथ जाने के बाद समाजवादी पार्टी के सामने अपना सामाजिक आधार विस्तृत करने की चुनौती थी. यहीं से पीडीए को एक नए राजनीतिक सूत्र के रूप में पेश किया गया. लेकिन समय के साथ इसके अर्थ में विस्तार दिखाई दिया. अखिलेश यादव ने अलग-अलग मौकों पर पीडीए को व्यापक सामाजिक और राजनीतिक वंचना से जोड़ने की कोशिश की. पंडितों को पीडीए में शामिल करने की बात ने भी इस विस्तार को चर्चा में ला दिया.
अगर पीडीए केवल पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक गठजोड़ है, तो इसमें पंडितों को शामिल करने का तर्क अलग से समझाना होगा. वहीं अगर पीडीए का अर्थ हर उस वर्ग से है जो खुद को ‘पीड़ित’ या ‘अपमानित’ मानता है, तो फिर यह किसी निश्चित सामाजिक गठजोड़ के बजाय एक व्यापक राजनीतिक छतरी बन सकता है, लेकिन क्या समाजवादी पार्टी सच में इसके लिए तैयार है? यहीं से पीडीए की राजनीति पर पहला सवाल खड़ा होता है – क्या यह सामाजिक प्रतिनिधित्व की स्पष्ट अवधारणा है या चुनावी जरूरत के अनुसार फैलाया जा सकने वाला राजनीतिक ब्रांड? हाल ही में राज्यसभा चुनावों में टिकट वितरण के बाद वो सवाल और बड़ा हो गया है.
अगर आप समाजवादी पार्टी की राजनीति को समझना चाहते हैं तो आपको यादव समुदाय की भूमिका समझनी पड़ेगी. पार्टी के गठन के बाद से यादव समुदाय उसका सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक आधार रहा है. अखिलेश यादव के नेतृत्व में भी पार्टी की संगठनात्मक और चुनावी राजनीति में यादवों की भूमिका महत्वपूर्ण बनी हुई है.
पीडीए का दावा इसी पारंपरिक आधार को व्यापक करने का है. लेकिन किसी भी सामाजिक गठजोड़ की वास्तविक परीक्षा उसके नारों से नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व से होती है.
2027 के लिए समाजवादी पार्टी दलित समुदायों को अधिक टिकट देने की योजना पर काम कर रही है. रिपोर्टों के अनुसार पार्टी कम से कम 100 दलित उम्मीदवार उतारने की रणनीति पर विचार कर रही है. सामान्य सीटों पर भी अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की योजना इसी विस्तार का हिस्सा बताई गई है. यह देखना दिलचस्प होगा कि कितने दलित, कितने गैर-यादव पिछड़े, कितने यादव, कितने मुस्लिम और अन्य सामाजिक समूहों के उम्मीदवारों को टिकट मिलता है. यही आंकड़ा बताएगा कि पीडीए केवल भाषणों में है या पार्टी के संगठन और टिकट वितरण में भी दिखाई देता है.
दरअसल समाजवादी पार्टी की रणनीति पर शुरू से सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस तरीके से उन्होंने मुसलमानों को आगे बढ़ाया वैसे दलितों को क्यों नहीं बढ़ाया और ओबीसी समुदाय में यादवों जैसे मौके गैर-यादव ओबीसी जैसे कुर्मी, मौर्य, पाल आदि को क्यों नहीं मिले. जबकि यह सामाजिक किलेबंदी बीजेपी में स्पष्ट नजर आती है, कभी यूपी में बीजेपी को ब्राह्मण-बनियों की पार्टी कहा जाता था पर अभी उन्होंने सभी सामाजिक समीकरण साध लिए हैं.
अब बात करते हैं पीडीए में ‘ए’ यानी अल्पसंख्यक वर्ग की, जो उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे अधिक बहस का विषय रहा है. समाजवादी पार्टी का तर्क है कि मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देना सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक भागीदारी का हिस्सा है. दूसरी ओर भाजपा कहती है कि यह समाजवादी पार्टी के अल्पसंख्यक तुष्टिकरण का तरीका है. 2027 में यह मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण होगा क्योंकि उत्तर प्रदेश में मुस्लिम आबादी का राजनीतिक प्रभाव कई विधानसभा क्षेत्रों में निर्णायक हो सकता है.
समाजवादी पार्टी के लिए मुस्लिम मतदाता अब महत्वपूर्ण सामाजिक आधार हैं, खासकर पश्चिमी यूपी में. इसलिए पीडीए का ‘ए’ हिस्सा केवल प्रतीकात्मक नहीं है. यह समाजवादी पार्टी की चुनावी रणनीति के केंद्र में है. यहां ध्यान देने लायक बात यह भी है कि समाजवादी पार्टी मुस्लिम वोट को रिझाने के लिए हिंदू हितों से समझौता करने के लिए जानी जाती है और उनकी पिछली सरकार में ऐसे दर्जनों उदाहरण भरे पड़े हैं.
इसके अलावा समाजवादी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चुनौती दलित राजनीति रही है. उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक दलित राजनीति का सबसे प्रमुख चेहरा बहुजन समाज पार्टी और मायावती रही हैं. चूंकि मायावती की बसपा अब अपने राजनीतिक ढलान पर है, ऐसे में सपा और बीजेपी दोनों ही दलित वोटों (जाटव + नॉन-जाटव) पर सेंधमारी कर रही हैं. लेकिन समाजवादी पार्टी में टिकट के मामले में, पार्टी में अहम पदों के मामले में और उनकी सरकार के दौरान दलितों पर हुए अत्याचार के बाद ये वर्ग एक मुसीबत बना हुआ है. ऐसे में समाजवादी पार्टी के लिए दलित मतदाताओं के बीच जगह बनाना आसान नहीं रहा.
लेकिन यहां भी एक सवाल है, क्या दलित मतदाता स्थायी रूप से समाजवादी पार्टी के साथ जुड़ेंगे? यह कहना अभी जल्दबाजी होगी. दलित राजनीति एकरूप नहीं है. अलग-अलग दलित जातियों के सामाजिक और राजनीतिक हित अलग हो सकते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अवध, बुंदेलखंड और पूर्वांचल में इनके राजनीतिक व्यवहार में भी अंतर हो सकता है. इसलिए केवल ‘दलित’ शब्द को पीडीए में शामिल कर देने से पूरे दलित समाज का समर्थन स्वतः हासिल नहीं हो जाता.
पीडीए का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा शायद ‘पिछड़ा’ है. उत्तर प्रदेश की पिछड़ी जातियों के भीतर यादव समुदाय के अलावा कई बड़े सामाजिक समूह हैं. भाजपा ने पिछले एक दशक में गैर-यादव पिछड़ी जातियों के बीच अपना आधार मज़बूत किया है. केशव प्रसाद मौर्य जो कोइरी समाज से आते हैं, उनको 2017 में प्रदेश अध्यक्ष बनाया और लगातार 2 बार से वो प्रदेश में डिप्टी सीएम भी हैं.
समाजवादी पार्टी के लिए इन्हीं समुदायों में विस्तार सबसे बड़ी राजनीतिक ज़रूरत है. अखिलेश यादव का पीडीए इसी दिशा में प्रयास है. लेकिन यहां भी सवाल प्रतिनिधित्व से आगे जाता है. क्या गैर-यादव पिछड़े समुदाय खुद को समाजवादी पार्टी में उतना ही प्रतिनिधित्व प्राप्त महसूस करते हैं जितना यादव समुदाय को मिलता रहा है? बिल्कुल भी नहीं. अगर आप समाजवादी पार्टी में गैर-यादव और गैर-मुस्लिम बड़े नेताओं का नाम लेंगे तो शायद बेनी प्रसाद वर्मा के अलावा कोई याद भी न आए.
2027 का चुनाव इस सवाल की परीक्षा करेगा. अगर पार्टी टिकट वितरण, संगठन और स्थानीय नेतृत्व में गैर-यादव पिछड़ों को पर्याप्त जगह देती है, तो पीडीए का दावा अधिक ठोस दिखाई देगा. यदि सामाजिक समीकरण केवल चुनावी भाषणों और नारों तक सीमित रहता है, तो विरोधियों को इसे केवल चुनावी रणनीति कहने का आधार मिलेगा.
पीडीए पर बहस केवल जातीय समीकरण तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. अखिलेश यादव 2012 से 2017 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे. इसलिए 2027 की राजनीति में उनके पुराने शासन रिकॉर्ड की भी समीक्षा स्वाभाविक है.
यहां सरकारी ऑडिट रिपोर्टें राजनीतिक आरोपों से अधिक उपयोगी होगी. नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी सीएजी की उत्तर प्रदेश पुलिस आधुनिकीकरण से जुड़ी रिपोर्ट में पुलिस बल और बुनियादी ढांचे में कई कमियां दर्ज की गई थीं. रिपोर्ट में पुलिस थानों और स्वीकृत पदों के मुकाबले उपलब्ध संसाधनों की कमी का उल्लेख था.
इसी तरह सड़क निर्माण और प्रबंधन से जुड़ी सीएजी की रिपोर्ट में ठेकों और परियोजनाओं के प्रबंधन से संबंधित कई कमियां दर्ज की गई थीं. इन रिपोर्टों का इस्तेमाल कर यह ज़रूर पूछा जा जाएगा कि सामाजिक न्याय की राजनीति के साथ शासन और संस्थागत क्षमता को कितना महत्व दिया गया.
किसी भी सामाजिक गठबंधन की राजनीति केवल यह नहीं बताती कि किसे सत्ता में हिस्सेदारी मिलनी चाहिए. उसे यह भी बताना होता है कि सत्ता मिलने के बाद रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था, कृषि और बुनियादी ढांचे जैसे मुद्दों पर क्या किया जाएगा.
यहीं पीडीए की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल सामने आता है. किसी भी चुनाव में सामाजिक गठबंधन बनाना असामान्य नहीं है. भाजपा ने भी अलग-अलग पिछड़ी, दलित और अन्य सामाजिक जातियों के बीच अपना गठबंधन बनाया है. कांग्रेस ने भी विभिन्न सामाजिक समूहों को साथ लाने की कोशिश की है. इसलिए केवल जातीय गठबंधन बनाने के कारण समाजवादी पार्टी की आलोचना नहीं की जा सकती.
सवाल यह है कि क्या पीडीए के पीछे कोई स्थायी राजनीतिक कार्यक्रम है? अगर पीडीए का मतलब सिर्फ चुनाव के समय अलग-अलग समुदायों को एक साथ लाना है, तो यह एक चुनावी रणनीति है. अगर इसके साथ शिक्षा, रोजगार, प्रतिनिधित्व, आरक्षण, प्रशासनिक सुधार और आर्थिक अवसरों की स्पष्ट नीतियां जुड़ी हैं, तो यह सामाजिक-राजनीतिक कार्यक्रम का रूप ले सकता है. 2027 में समाजवादी पार्टी को इसी सवाल का जवाब देना होगा. 2024 की सफलता को 2027 में दोहराना अलग चुनौती है.
2024 के लोकसभा चुनाव ने अखिलेश यादव को यह भरोसा दिया कि पीडीए की राजनीति को चुनावी समर्थन मिल सकता है. लेकिन विधानसभा चुनाव की सामाजिक और राजनीतिक संरचना अलग होती है. लोकसभा चुनाव में एक संसदीय क्षेत्र के भीतर कई विधानसभा क्षेत्र आते हैं. विधानसभा चुनाव में उम्मीदवार की व्यक्तिगत पहचान, स्थानीय संगठन और जातीय समीकरण ज्यादा सीधे असर डालते हैं.
इसके अलावा 2024 में कांग्रेस के साथ गठबंधन भी था. इसलिए 2024 के परिणाम को सीधे 2027 के विधानसभा चुनाव पर लागू करना उचित नहीं होगा. 2027 में PDA की वास्तविक परीक्षा पांच स्तरों पर होगी— पहला, क्या समाजवादी पार्टी दलित मतदाताओं में अपना आधार बढ़ा पाती है? दूसरा, क्या वह गैर-यादव पिछड़ी जातियों में स्थायी समर्थन बना पाती है? तीसरा, क्या मुस्लिम मतदाता उसके साथ पहले की तरह जुड़े रहते हैं? चौथा, क्या यादव आधार और नए सामाजिक समूहों के बीच संतुलन कायम होता है? पांचवां, क्या पीडीए के साथ पार्टी कोई स्पष्ट शासन और आर्थिक एजेंडा भी पेश कर पाती है?
समाजवादी पार्टी के लिए असली चुनौती यह होगी कि वह पीडीए को केवल जातीय गणित से आगे ले जाए. किसे टिकट मिलता है, संगठन में किसे जगह मिलती है, किस समुदाय को कितना प्रतिनिधित्व मिलता है और उन समुदायों के लिए पार्टी का ठोस नीति कार्यक्रम क्या है—इन सवालों के जवाब पीडीए की वास्तविक प्रकृति बताएंगे. 2024 ने पीडीए को एक चुनावी संभावना के रूप में ज़रूर स्थापित किया. लेकिन 2027 यह तय करने का अवसर देगा कि यह संभावना एक स्थायी सामाजिक गठजोड़ में बदलती है या चुनावी परिस्थितियों के साथ बदलने वाला राजनीतिक सूत्र बनी रहती है. आखिरकार पीडीए की सबसे बड़ी परीक्षा उसके नाम में नहीं, बल्कि उसके प्रतिनिधित्व, संगठन, नीतियों और शासन के वादे में होगी.
