भारत के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ और पूर्व सेना प्रमुख बिपिन रावत ने 2017 में एक इंटरव्यू के दौरान ढाई मोर्चे से लड़ने की बात कही थी. पहला और दूसरा मोर्चा पारंपरिक बाहरी दुश्मन चीन और पाकिस्तान और आधा, देश के भीतर राष्ट्रविरोधी ताक़ते. भारत में इस मोर्चे को बनाने और देश के ख़िलाफ़ काम करने में वामपंथी पत्रकारों को एक बड़ा समूह दिन रात मेहनत करता है. देश को लेकर झूठी खबरे चलाना, विदेशों में देश की इमेज़ गिराना, हिंदुओं को निशाने पर लेना इनका पसंदीदा काम है.
भारत में रहकर भारत के ही ख़िलाफ़ काम करने वाले पत्रकारों की सूची में सबसे पहला नाम ‘द वायर’ की आरफा ख़ानम शेरवानी का आता है. वह अक्सर अपने बयानों को लेकर विवादों से घिरी रहती हैं. क्योंकि उनका हिंदू समाज, राष्ट्रवाद और बहुसंख्यक समुदाय से जुड़े मुद्दों पर चयनात्मक रवैया उनके दोगलेपन और झूठे सेक्युलरिज्म को सामने ले आता है.
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने वाली आरफा ने पहले राज्यसभा टीवी में भी काम किया है, लेकिन वर्तमान में कट्टर वामपंथी विचार वाले द वायर के साथ जुड़ी हुई हैं, जिसका फाउंडर और एडिटर सिद्धार्थ वरदराजन जैसा लेफ्टिस्ट आदमी है. आरफा अपने आप को एक स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकार बताने का कोई मौका नहीं छोड़ती हैं, लेकिन सच्चाई यह है कि वह सेलेक्टिव आउटरेज करने में माहिर हैं.
मुझे एक पुराना वाकया याद आता है, 2023 में क्रिकेट विश्व कप के दौरान अरफ़ा ख़ानम शेरवानी ने भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों के व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए लिखा था, कि उन्हें भारतीय होने पर शर्म आ रही है. उन्होंने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा था, “Deplorable behaviour of many cricket fans during World Cup matches, makes me feel embarrassed & ashamed as an Indian.”
यहां सवाल ये उठता है कि एक पत्रकार के रूप में आरफा को भारतीय प्रशंसकों के खराब व्यवहार की आलोचना करने का अधिकार है, लेकिन अगर हम इसी बयान को उनके व्यापक सार्वजनिक रुख के संदर्भ में देखते हैं तो सवाल उठता है कि यदि कुछ भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों के व्यवहार से एक भारतीय पत्रकार को “शर्म” महसूस होती है, तो इस्लामिक आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता और हिंसा के मामलों में भी आरफा को एक मुसलमान के रूप में शर्म आती होगी? इसका सीधा जवाब है नहीं. क्योंकि आरफा के लिए भारत से पहले उसका धर्म आता है जिसे बचाने के लिए वह किसी भी हद तक घटिया तर्क दे सकती है.
लेकिन यह सवाल इसलिए ज़रूरी है क्योंकि पत्रकारिता का मूल्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि पत्रकार किस मुद्दे पर बोलता है, बल्कि यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह किन मुद्दों पे चुप रहता है.
अगर आप आरफा की पत्रकारिता देखेंगे तो पाएंगे कि आरफा मुस्लिम पीड़ितों के मामले में धर्म को मुख्य वजह बताकर भारत के हिंदुओं को कटघरे में खड़ा कर देती हैं जबकि मुस्लिम अपराधियों से जुड़े मामलों में अपराध को व्यक्ति तक सीमित कर दिया जाता है.
इसके विपरीत, जब किसी हिंदू व्यक्ति या हिंदू संगठन से जुड़ा विवाद सामने आता है, तो उसे व्यापक सामाजिक या राजनीतिक संदर्भ से जोड़ कर पेश करती है. आरफ़ा की पत्रकारिता का यही घटियापन उनकी हर रिपोर्ट में नज़र आता है.
सवाल वही है कि अगर किसी समुदाय के कुछ लोगों के अपराध पर पूरे बहुसंख्यक समाज से आत्ममंथन की अपेक्षा की जाती है, तो आतंकवाद या धार्मिक कट्टरता के मामलों में भी समान स्तर की आत्मालोचना होनी चाहिए.
सीधे शब्दों में समझे तो पुलवामा और पहलगाम जैसे हमलों के बाद भी आरफा जैसे लोग ये मानते हैं कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, फिर यही लोग भगवा आतंकवाद जैसे कथित शब्दों का आविष्कार करते हैं और हिंदू धर्म में फूट डालने के लिए दलित पर पंडितो के अत्याचार की कहानियां लिखते हैं. सोफ्ट आतंकवाद जैसे विचार रखने वाली आरफा की नज़रों में हिंदू को मारने वाले मुस्लिम का कोई धर्म नहीं होता लेकिन दलित पर अत्याचार करने वालों की एक विशेष जाति होती है. अगर आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता तो आतंकवाद का रंग कैसे होगा?
आरफा का दोगलापन और धर्मांधता यहीं तक सीमित नहीं है. आरफा ख़ानम शेरवानी के हालिया बयानों में ‘लव जिहाद’ का मुद्दा भी प्रमुख रहा है. 21 अप्रैल को उन्होंने एक्स अकाउंट पर लिखा, “The idea of ‘Love Jihad’ is a profound insult to Hindu women—their dignity & intelligence.”
उन्होंने आगे इसे महिलाओं की स्वतंत्रता और पसंद के अधिकार से जोड़ते हुए कहा कि यह धारणा हिंदू महिलाओं को ऐसी महिलाओं के रूप में प्रस्तुत करती है जिन्हें अपने निर्णय लेने में सक्षम नहीं माना जाता और जिन्हें किसी “रक्षक” की ज़रूरत है.
यहां विवाद का मूल प्रश्न महिला की स्वतंत्रता है. किसी वयस्क महिला को अपने जीवनसाथी या संबंध का चुनाव करने का अधिकार है. लेकिन इस व्यक्तिगत स्वतंत्रता के सिद्धांत के साथ धोखे, झूठी पहचान, ब्लैकमेल, यौन शोषण या जबरन धर्म परिवर्तन जैसे आरोपों को भी अलग-अलग मामलों में जांचना चाहिए.
दरअसल ‘लव जिहाद’ शब्द को पूरी तरह साम्प्रदायिक आविष्कार बताकर खारिज करने से उन वास्तविक मामलों पर भी संदेह पैदा हो सकता है, जिनमें किसी महिला ने धोखे या दबाव की शिकायत की हो. ऐसे संबंध में सामने आए गंभीर अपराध के आरोपों को केवल साम्प्रदायिक राजनीति कहकर खारिज करना किसी भी तरह से उचित नहीं हो सकता. आए दिन पूरे देश में, खासकर केरल में हमें लड़कियों को जबरन या झूठे वादे और पहचान के दम पर धर्म परिवर्तन कराने के मामले देखने को मिलते है.
अगर महिला की पसंद और स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, तो क्या उसकी पसंद को धोखे या दबाव से प्रभावित करने वाले व्यक्ति की भी उतनी ही स्पष्ट आलोचना नहीं होनी चाहिए? भले ही वो व्यक्ति किसी भी धर्म का हो.
दरअसल यह ट्वीट नासिक की टीसीएस कंपनी से संबंधित आरोपों के बारे में था. इसमें कुछ हिंदू महिला कर्मचारियों द्वारा अपने मुस्लिम सहकर्मियों के ख़िलाफ़ उत्पीड़न, धार्मिक टिप्पणियों और धर्म परिवर्तन के दबाव जैसी शिकायतों का संदर्भ दिया गया है.
इस मामले के बाहर आने के बाद, आरफा के अपने ट्विटर हैंडल पर पोस्ट किया, “A new wave of targeting Muslims—not the paan vendor or street hawker this time, but the educated, skilled, employed. The aim is clear: make even the few who’ve secured jobs in this majoritarian system unemployable.”
नासिक वाले मामले में बिना किसी जांच के, आरफा ने पहले ही कह दिया कि अब पढ़े लिखे मुसलमानों को टार्गेट किया जा रहा है, लेकिन आरफा शायद कुछ ही महीने पहले पुरानी दिल्ली में लाल किले के पास हुए बम धमाके का ज़िक्र करना भूल गईं. उस बम धमाके के मास्टरमाइंड न सिर्फ पढ़े लिखे थे, बल्कि पेशे से डॉक्टर थे. पढ़ा लिखा आदमी भी आतंकवादी हो सकता है, इसके लिए आरफा को ओसामा बिन लादेन की जीवनी पढ़नी चाहिए.
अरफ़ा ख़ानम शेरवानी ने एक पॉडकास्ट में जेएनयू की प्रोफेसर निवेदिता मेनन से भी द वायर के लिए ‘लव जिहाद’ पर चर्चा की थी. इस चर्चा में आरफ़ा का प्रश्न था, कि हिंदू लड़कियों को मुसलमान मर्द ही क्यों पसंद आते हैं?
इसके जवाब में निवेदिता मेनन ने हंसते हुए कहा, मुस्लिम मर्द होंगे इतने अट्रैक्टिव और उनको अपने धर्म में अट्रैक्टिव मर्द नहीं मिलते होंगे.
यहां यह चर्चा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उनके अनुसार यहां जिस महिला की स्वायत्ता की रक्षा करने की बात की जा रही थी, उसी चर्चा में हिंदू महिलाओं और हिंदू पुरुषों को एक व्यापक सामुदायिक स्टीरियोटाइप के भीतर रखा गया.
यदि किसी पत्रकार का उद्देश्य महिलाओं की स्वतंत्रता की रक्षा करना है, तो अंतरधार्मिक संबंधों को हिंदू बनाम मुस्लिम पुरुषों का आकर्षण या सामुदायिक प्रतिस्पर्धा के रूप में प्रस्तुत करना भी उचित नहीं होना चाहिए. ये शर्मनाक है.
कुछ महीने पहले, एनडीटीवी की एक डिबेट में शुभी ख़ान ने आतंकवादी हमले में मुस्लिम डॉक्टरों की कथित संलिप्तता का संदर्भ देते हुए आरफा से पूछा कि क्या ऐसे मामले में उन्हें उसी तरह सामूहिक शर्म महसूस हुई, जिस तरह वे भारतीय क्रिकेट प्रशंसकों के व्यवहार को लेकर शर्म महसूस कर रही थीं. लेकिन इस सवाल का जवाब देने की बजाय आरफा ने कहा “This is a really funny question.”
यदि बहुसंख्यक समुदाय के कुछ लोगों के व्यवहार के लिए पूरे समाज से आत्ममंथन की अपेक्षा की जाती है, तो धार्मिक कट्टरता से जुड़े आतंकवाद के मामलों पर सवाल पूछे जाने को “funny” कहकर खारिज करना एक अलग कसौटी का संकेत देता है. क्या आतंकवाद के मामले में भी धार्मिक समुदायों के भीतर आत्ममंथन की मांग समान रूप से नहीं की जानी चाहिए?
इसके अलावा आरफा मजबूती से मुस्लिम महिलाओं के बुर्के या पर्दे से जुड़े अधिकारों का समर्थन करती हैं, जबकि स्वयं विदेश यात्राओं के दौरान पश्चिमी परिधान में दिखाई देती हैं. आरफा ख़ानम शेरवानी की सबसे बड़ी आलोचना उनके पत्रकार होने से नहीं, बल्कि उनकी पत्रकारिता की वैचारिक दिशा से जुड़ी है, जो दिशा पहली ही नज़र में कहीं तक भी भारत की भलाई करने वाली बिलकुल नहीं लगती.
दरअसल वह ऐसी पत्रकार हैं जो हिंदू राष्ट्रवाद, भाजपा और मोदी सरकार की आलोचना में बेहद मुखर हैं, लेकिन मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद कट्टरता और सामाजिक समस्याओं पर अल्पसंख्यकों के धार्मिक अधिकारों का रोना रोती हैं.
कुछ महीने पहले जब जोहरान ममदानी न्यूयॉर्क का मेयर बना तो आरफा ऐंड गैंग ने तो ऐसे सेलिब्रेट किया जैसे वो मेयर नहीं बल्कि अमेरिका का राष्ट्रपति बना हो. जोहरान के पागलपन की हम किसी अन्य लेख में चर्चा करेंगे अभी आरफा को याद दिलाना ज़रूरी है कि न्यूयोर्क के इस नए मेयर ने कुरान पर हाथ रखकर शपथ ली थी. लेकिन अगर भारत में कोई गीता पर हाथ रखकर शपथ लेना चाहे तो वह तुरंत हिंदुत्ववाद, भगवा आतंक और अनेक झूठे डर पेश करने लगेगी.
आरफा न्यूयार्क गई भी, लेकिन जोहरान से मिल नहीं पाई. या हो सकता है न्यूयोर्क शहर का कूड़ा साफ कराने की जिम्मेदारी उठाने वाला जोहरान इस नकली भारतीय से दूरी बनाना चाह रहा हो. जोहरान जैसे लोगों को सपोर्ट करने का आरफा के पास दो कारण है, पहला ये की जोहरान मुसलमान है दूसरा वो लेफ्टिस्ट है.
आरफ़ा सिर्फ जोहरान को ही नहीं बल्कि उमर खालिद और शरजील इमाम की वक़ालत करती रहती है, वही उमर खालिद जिसने अजमल कसाब को निर्दोष बताया और देश विरोधी नारे लगाए और वो शरजील इमाम में नॉर्थ ईस्ट इंडिया को अलग करने के सपने देख रहा था.
आरफा का सूडो फेमिनिज्म, सेलेक्टिव आउटरेज और सेक्युलरिज्म का ढोंग इस बात की तस्दीक करता है कि आरफा जैसे लोग ही असली दिमागी नक्सल हैं जिसका जिक्र प्रधानमंत्री मोदी में अपने 15 अगस्त के भाषण में किया था.
इन्हें इस मुल्क से खास लगाव है नहीं और हिंदुओं से तो नफरत ही करते हैं, ये समाज में विचारों के जरिए ज़हर घोल रहे हैं.
आरफा की घटिया पत्रकारिता का आधार हमेशा से ऐसा सेक्यूलेरिज़्म रहा है जो भारत के मूल धर्म ‘हिंदू’ धर्म के विरोध पर आगे बढ़ता है. सेक्यूलेरिज़्म का अर्थ भारत की मूल संस्कृति, सभ्यता और धर्म को खत्म करना नहीं है. लेकिन वामपंथी विचार और विक्टिम कार्ड खेलने की आदत आरफा और उस जैसे शहरी नक्सलियों के ज़हरीले विचारों को सबके सामने ला देती है.
भारत में रहकर, भारत का नमक खाकर, भारत की धार्मिक पहचान के विरूद्ध काम करने वाला, भारत के मान-सम्मान को नीचा दिखाने वाला उनका पूरा गैंग हर घड़ी सिर्फ देश विरोधी विचारों को पालते-पोसते रहते हैं. यही वक्त है हम ऐसे हर झूठे और वामपंथी पत्रकार के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएं और देश के मूल को इन लोगों से बचाएं.
