बड़े लंबे समय से देश के सभी विपक्षी दल कामना कर रहे थे कि देश का युवा, जैन ज़ी सड़को पर उतरे और वर्तमान सरकार के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शन शुरू करे, डंडे खाए, जेल जाए और विपक्ष के नेता और कार्यकर्ता अपने एसी वाले कमरों में बैठकर उनके समर्थन में सोशल मीडिया पर कंटैंट छापते रहें. लेकिन उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो रही, क्योंकि जैन ज़ी को सड़कों पर लाना नेपाल और बांग्लादेश जितना आसान काम नहीं है. हां, लेकिन इस जैनरेशन को सोशल मीडिया वाली क्रांति में शामिल करना विपक्ष के लिए आसान रहा. मात्र कुछ ही दिनों पहले सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी नाम से एक अकॉउंट बनाया गया जिसपर देखते ही देखते करोड़ों फॉलोअर आ गए. इसके इंस्टाग्राम पेज़ पर फॉलोअर्स की संख्या देश की सबसे बड़ी पार्टी भारतीय जनता पार्टी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस से भी अधिक हो गए. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर इसके अकॉउंट को एक्स ने बंद कर दिया लेकिन इंस्टाग्राम पर यह तेंज़ी से बढ़ रहा है. कहा जा रहा है कि देश का जैन ज़ी इस क्रांति में काफी दिलचस्पी दिखा रहा है. और इस नए नवेले आंदोलन को खुलकर प्रमोट कर रहा है.
भारत की राजनीति और समाज में नई-नई क्रांतियों का उदय होता रहता है, लेकिन कुछ ऐसी क्रांतियां भी हैं जो न सिर्फ लोकतंत्र, देश, समाज, सभ्यता की गरिमा को कलंकित करती हैं, बल्कि पूरे देश की एकता को भीतर तक नुकसान पहुंचाती हैं. कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ऐसी ही षडयंत्रकारी दिखावटी क्रांति है. घृणा इसके नाम में नहीं बल्कि इसके इरादों से पैदा हो रही है, जो देश में अशांति, हिंसा, आक्रोश, चिढ़ और हिंदू विरोधी भावना पैदा करने की कोशिश कर रही है.
भारत और विदेश में बैठे वामपंथियों के गिरोह के दिमाग की उपज यह सोशल मीडिया वाली पार्टी देश के लोगों को भटकाने और भड़काने के लिए इजाद की गई है. इसके मुख्य कर्ता-धर्ता आम आदमी पार्टी का कार्यकर्ता अभिजीत दीपके है. जिसके साथ ध्रूव राठी, अर्पित शर्मा जैसे अन्य वामपंथी भी शामिल हैं. विदेश में बैठे इस गिरोह ने भारत की शांति भंग करने की कसम तो बहुत पहले से खाई हुई थी लेकिन इस बार इनके हाथ देश का युवा वर्ग लग गया है जिसका अब यह गिरोह हर गलत तरह से इस्तेमाल कर रहा है. वह युवा वर्ग जिसकी तासीर में ही गर्मी होती है, जो खुद को हर प्रकार की सही, गलत क्रांति में झोंकने के लिए तैयार बैठा रहता है. जिसे सिर्फ इतना मालूम है कि सरकार ने नौकरी नहीं दी और क्राइम कम नहीं कर पा रही. इससे आगे वह सोचने की क्षमता रखता ही नहीं है. नन्हें दिमाग में बस इतना ही ज्ञान आ सकता है. हालांकि, नौकरी, महंगाई और क्राइम जैसे विषयों पर पूरी तरह परिपक्व होने में इनके सारे बाल सफेद हो जाएंगे तब भी भारत जैसे देश को समक्ष नहीं पाएंगे.
विदेश में बैठे आकाओं के साथ अगर सीजेपी के इंस्टाग्राम पेज़ के फॉलोअर्स को भी देखें तो अधिक हैरानी नहीं होगी क्योंकि वहां पर अच्छी खासी संख्या पाकिस्तानी और बांग्लादेशी लोगों की है. आंदोलन विदेशी से चलाया जा रहा है, आंदोलन के सबसे अधिक समर्थक भारत विरोधी देशों के लोग हैं, आंदोलन का तरीका भी विदेश ही है. ये सभी बातें किसी बड़ी साजिश की ओर इशारा कर रही हैं.
कॉकरोच जनता पार्टी का मामला तब शुरू हुआ जब सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस सूर्यकांत शर्मा ने एक मामले की सुनवाई के दौरान कथित तौर पर बेरोज़गार युवाओं, आरटीआई कार्यकर्ताओं और वकीलों की तुलना कॉकरोच और परजीवी से की थी. दिल्ली हाईकोर्ट के एक वकील द्वारा वरिष्ठ पदनाम की मांग वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए चीफ़ जस्टिस ने कहा कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जिन्हें कोई काम नहीं मिलता और वे सिस्टम पर सोशल मीडिया के ज़रिए परजीवी की तरह हमला करते रहते हैं. हालांकि इस बयान के बाद चीफ़ जस्टिस के दफ्तर से स्पष्टीकरण जारी किया गया. जिसमें साफ किया गया कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है. उनका इरादा जाली और फर्जी डिग्री लेकर वक़ालत, मीडिया और अन्य पेशों में घुसने वाले युवाओं की आलोचना करना था.
इस बयान के बाद अमेरिका में रहने वाले आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ता अभिजीत ने सोशल मीडिया पर मौके का फायदा उठाते हुए कॉकरोच जनता पार्टी नाम से एक पेज़ बना दिया. जिस पर देखते ही देखते करोड़ो फॉलोअर्स हो गए. माना जा रहा है कि इनमें सबसे अधिक जैन ज़ी हैं. जिनपर श्री लंका, नेपाल की क्रांति के बाद भारत के विपक्षी पार्टी के नेताओं की खासा नज़र गढ़ी हुई हैं, कि वे भी एक हिंसक क्रांति करके देश में सत्ता परिवर्तन कर दें. लेकिन अफसोस सोशल मीडिया वाली झमाझम क्रांतियां जल्द ही ट्रैंड से बाहर भी हो जाती हैं.
यहां सोचने वाली यह है कि जिस क्रांति के दुहाई सीजपी के समर्थक दे रहे हैं वो आखिर कैसी क्रांति है जो सिर्फ बीजेपी पर निशाना साधकर ही की जा रही है. सोशल मीडिया प्लैटफार्म एक्स पर वामपंथी अर्पित शर्मा लिखते है कि ‘सभी सोशल मीडिया हैंडल्स से बीजेपी को अनफोलो कर दो. अपने माता-पिता को समझाओं कि किस तरह भाजपा देश के वर्तमान और भविष्य से खिलवाड़ कर रही है. वीडियों बनाकर सोशल मीडिया पर पोस्ट करो और सीजेपी को टैग करो.’
जर्मनी में बैठकर भारत में फूट डालने की कोशिश करने वाला ध्रूव राठी, अमेरिका में बैठकर भारत को टुकड़ों में देखने की इच्छा पालने वाला अभिजीत दीपके और आयरलैंड में रहकर हिंदुओं को भड़काने वाला अर्पित शर्मा देश के युवा को सड़क पर उतरकर डंडे खाने के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगा रहें हैं और खुद विदेश में परिवार के साथ मज़े का जीवन जी रहे हैं. यही है इस देश में घुटन पैदा करने वाली क्रांति की सच्चाई. विदेश में बैठकर भारत में रक्त युक्त युद्ध देखना इन वामपंती यूट्यूबर्स का सबसे बड़ा ख्वाब है. जीवन खराब होगा जैन ज़ी का होगा, जेल जाएगा जैन ज़ी, बर्बाद होगा जैन ज़ी और उसका पूरा परिवार. बाद में इन सभी से स्टोरी निकाल-निकालकर वीडियों बनाकर लाखों रूपए बनाएंगे टुकड़े-टुकड़े गैंग के ये यूट्यूबर्स.
आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया, सलीम उर्फ योगेंदर यादव जैसे लोगों ने सीजेपी के समर्थन में वीडियों बनाकर पोस्ट की जिसमें उन्होंने इस आंदोलन को समर्थन देने के लिए कहा और इसे देश का भविष्य बताया. लेकिन सवाल यह है कि जिस पेज़ के फॉलोअर्स ही पाकिस्तान और बांग्लादेश से अधिक है वे भारत का भविष्य कैसे तय करेंगे. इस तरह के आंदोलन की यही खास बात होती है कि भारत के विरोधी ही भारत का भविष्य तय करने की ठानते हैं. लेकिन सफल नहीं हो पाते. आंदोलन चलाने वाले अभिजीत दीपके जिसे ठीक से बोलना भी नहीं आता, वह इतनी बड़ी संख्या में इतनी तेज़ी से लोगों तक इसलिए नहीं पहुंच रहा कि वह एक बड़ी क्रांति ला रहा है, वह इसलिए ऐसा कर पाया क्योंकि भारत विरोधी सभी ताक़तों को इस आंदोलन में एक उम्मीद की किरण दिखी है जिसे वे हर स्तर पर समर्थन और हर प्रकार की सहायता देकर मज़बूत बनाना चाहते है.
अभिजीत दीपके न सिर्फ एक अलगाववादी है बल्कि आम आदमी पार्टी के कई नेताओं की तरह हार्ड कोर हिंदू विरोधी भी है. और ऐसा मूवमैंट खड़ा करना चाहता है जो देश के युवाओं को उनकी सभ्या, संस्कृति, धर्म, परिवार और सामज से दूर ले जाकर बर्बाद कर देगा. केजरीवाल की तारीफों के पुल बांधने वाले अभिजीत को कौन और कहां से फंडिंग कर रहा है यह जानना सरकार और देश के लिए बेहद ज़रूरी है. इस तरह के मज़ाक लगने वाले सोशल मीडिया आंदोलन के पीछे किस तरह की अलगाववादी ताक़तें है यह सच्चाई सामने आनी चाहिए.
गहराई से जांचने पर यह साफ पता चलता है कि यह अकॉउंट किसी बड़ी साजिश की फिराक में है. एसी कमरों में बैठे पोलिटिकल इंफ्लूएंसर आतंकवादी सोच से ग्रसित है यह हम सभी अच्छे से जानते हैं. इतने बड़े स्तर पर भारत में ही, भारत विरोधी आंदोलन को खड़ा कर देना हमारी उदासीनता को दर्शाता है. लेकिन यह मामला अब हाथों से फिसलता दिखाई दे रहा है.
हर ईमानदार नागरिक को समझना चाहिए कि सीजेपी सिर्फ कोई क्रांति नहीं, बल्कि एक मानसिकता है, गंदगी की, अवसरवाद की, विनाश की मानसिकता. ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसे सोशल मीडिया पर किए गए मज़ाक में थ्रिल ढूंढने वाले लोग वास्तविक जीवन से पक चुके हैं. जो फ़ोन में आए क्रांति के एक नए तरीके से फूले नहीं समा रहे.
एक सच्चाई यह भी है कि यह जैन ज़ी मुख्यतः इलीट और अपर मिडिल क्लास मानसिकता से निकला वह युवावर्ग है, जिसके लिए विरोध भी कई बार एक वैचारिक प्रतिबद्धता नहीं, बल्कि ऑनलाइन ट्रेंड और व्यक्तिगत ब्रांडिंग का हिस्सा बनकर रह गया है. इन्हें क्रांति भी एक एसथैटिक की तरह लगती है और देश, धर्म, व्यवस्था की गहराईयों का सच इनके सर के ऊपर से निकल जाता है.
आज का एक बड़ा ‘डिजिटल एक्टिविज़्म’ वाला वर्ग ज़मीन पर संघर्ष से ज्यादा सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में व्यस्त रहता है. इसलिए इस जैन ज़ी को यह समझना होगा कि बिना ठोस राजनैतिक दिशा और वैचारिक प्रतिबद्धता के सिर्फ नारों, मीम्स और ऑनलाइन भीड़ से व्यवस्था परिवर्तन नहीं होता है.
वास्तविकता यह है कि असली व्यवस्था परिवर्तन हमेशा संगठित ज़मीनी राजनीतिक संघर्ष से आता है, केवल डिजिटल एक्टिविज़्म से नहीं. यहां सवाल यह भी है कि किस तरह का व्यवस्था परिवर्तन चाहता है यह जैन ज़ी. जिस समय पूरी दुनिया के कई बड़े देश अस्थिरता से गुज़र रहे हैं उस समय भारत बिना रुके अपने सभी काम आसानी से कर रहा है. मज़बूत राजनैतिक नेतृत्व है, बढ़ती अर्थव्यवस्था है, ऐसे में किस तरह की क्रांति की उम्मीद इस युवा वर्ग से लगाई जा रही है, देश को विकास की राह से भटकाने की, लोगों को जातियों में बांटकर दंगे करवाने की, खूनी हिंसा फैलाने की क्रांति. युवाओं को भड़काकर कुछ ही दिन माहैल बनाया जा सकता है. विश्व के सबसे बड़े देश और सबसे पुरानी सभ्यता को चार दिनों में ही भटका देना बच्चों को खेल नहीं है, यह बात विदेशों में बैठे आकाओं को इस टाइम पास आंदोलन के बाद शायद समझ आ जाएगी.
