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चारू मजूमदार – नक्सलवाद का जनक

भारत में खूनी क्रांति को फैलाने वाला असफल माओवादी   

Destruction of State power is today the first and principal task of the peasant movement.                 

– Charu Majumdar 

साल 2004 से लेकर 2025 तक लगभग 9,000 मौतें और भारत सरकार को होने वाला सालाना 2000 करोड़ रुपए प्रति वर्ष का नुकसान, यह आंकड़े माओवादी विचारधारा से शुरू हुए, नक्सलबाड़ी आंदोलन से हुए नुकसान को बताते हैं. वामपंथी सनक के कारण ने केवल देश के सैनिक शहीद हुए, बल्कि यह देश को सामाजिक और आर्थिक विकास की दौड़ में भी पीछे ले गया.

भारत में वामपंथी विचारधारा का अपना एक इतिहास रहा है और भारत में माओवादी आंदोलन की शुरुआत भी एक वामपंथी संगठन की विचारधारा से ही उत्पन्न हुई थी. भारत की आजादी के पहले से ही वामपंथी संगठनों का देश के तत्कालीन स्वतंत्रता सेनानियों के साथ संबंध कुछ खास नहीं था. भारत के इतिहास में वामपंथी दल की शुरुआत का जिक्र करें तो कम्यूनिस्ट पार्टी (सीपीआई) का औपचारिक गठन 1925 में कानपुर में हुआ. 

हालांकि इस बीच एक विवाद और छिड़ा जब 1942 का ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ हुआ, तब भारतीय कम्युनिस्ट गांधी के इस आंदोलन के समर्थन में नहीं थे, क्योंकि 1941 में नाजी जर्मनी ने सोवियत संघ पर हमला किया. उसके बाद सीपीआई ने द्वितीय विश्व युद्ध को ‘जनता के युद्ध’ के रूप में देखना शुरू किया, क्योंकि सोवियत संघ अब मित्र राष्ट्रों के पक्ष में था. इसलिए 1948 में जब गांधी और कांग्रेस ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया, तो सीपीआई उस आंदोलन के साथ नहीं खड़ी हुई. 

भारत की आज़ादी के बाद और 1950 के दशक की शुरुआत में सीपीआई पार्टी में एक बड़ा बदलाव आया और उन्हें यह समझ में आया कि भारत की परिस्थितियां चीन या रूस जैसी नहीं हैं और भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप उन्हें राजनीतिक रणनीति विकसित करनी होगी. 

जिसका परिणाम यह हुआ 1950 के दशक के अंत तक भारत और चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर सीपीआई पार्टी दो गुटों में बंटती दिख रही थी. एक दक्षिणपंथी एवं राष्ट्रवादी गुट, जिसमें एस.ए. डांगे, ए.के. गोपालन और भूपेश गुप्ता जैसे नेताओं का मानना था कि भारत की संप्रभुता और सीमाओं की रक्षा हमारी प्राथमिकता है और चीन की आक्रामक नीति गलत है. वहीं दूसरी ओर वामपंथी एवं चीन समर्थक गुट, इनका झुकाव चीन और माओ जेडोंग की तरफ अधिक था. इसमें ई.एम.एस नंबूदिरीपाद, ज्योति बासु, बी.टी रणदीवे, पी सुंदराया समेत अन्य प्रमुख नेता शामिल थे.

इस गुट का यह तर्क था कि एक कम्युनिस्ट देश, यानी चीन, कभी किसी गैर-साम्राज्यवादी देश पर आक्रामण नहीं कर सकता, अतः उनका मानना था कि भारत सरकार की नीति ही चीन को उकसा रही है. इसी के चलते यह हुआ है कि 1962 में भारत और चीन के बीच जब युद्ध शुरू हुआ, तब सीपीआई के भीतर मतभेद अपने चरम पर पहुंच गया और एस.ए डांगे गुट ने युद्ध में भारत सरकार का समर्थन करने का प्रस्ताव पारित किया, जिसका चीन समर्थक गुट ने विरोध किया. 

चीन समर्थक गुट के कुछ नेताओं द्वारा चीन के पक्ष में और भारत के रक्षा प्रयासों के ख़िलाफ़ बयान दिए जाने की खबर आई, जिससे पूरे देश में जनाक्रोश फैल गया. जिसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने ई.एम.एस.नंबूदिरीपाद समेत कई बड़े चीन समर्थक वामपंथी नेताओं को गिरफ्तार करवाया. जिसमें एक कट्टर वामपंथी नेता था चारू मजूमदार. इसी विचारधारा के मतभेद का परिणाम यह हुआ कि 1964 में सीपीआई का विभाजन हुआ, जहां सीपीआई दो हिस्सों में बंट गई सीपीआई और सीपीआई (एम) अर्थात सीपीआई मार्क्सिस्ट. 

चारू मजूमदार 

साल 1964 में सीपीआई के विभाजन के बाद वामपंथी गुट में एक नया कट्टर वामपंथी नेता उभरकर आ रहा था, जिसका नाम था चारू मजूमदार. चारू मजूमदार वह नेता थे जिसने नक्सलबाड़ी आंदोलन को एक विचारधारा प्रदान की. लेकिन चारू मजूमदार सीधे 1967 के नक्सलबाड़ी नेता नहीं बना था, बल्कि चारू मजूमदार की भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी में जुड़ने की शुरुआत 1940 के दशक से शुरू हुई, जब वह किसानों के बीच काम करने लगे और 1942 तक वे जलपाईगुड़ी जिला कमिटी में पहुंच चुके थे.

लेकिन उनकी कम्युनिस्ट विचाराधारा में साल 1946-1947 ने एक महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की. जहां तेभागा आंदोलन चारू मजूमदार के विचारों की एक नई प्रयोगशाला बना. तेभागा आंदोलन बंगाल के बंटाईदार किसानों का बड़ा आंदोलन था. इसकी मुख्य मांग थी कि फसल में किसान का हिस्सा बढ़ाया जाए. सामान्य व्यवस्था में बंटाईदार किसान को उत्पाद का लगभग आधा हिस्सा मिलता था. तेभागा आंदोलन ने मांग की कि दो-तिहाई हिस्सा किसान को मिले और उपज का नियंत्रण भी किसान के हाथ में हो. इस आंदोलन से चारू मजूमदार जुड़े और यहीं से उनके मन में एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक निष्कर्ष निकला : अगर किसान आंदोलन केवल मांगों तक सीमित रहा और राज्य जमींदार की ताक़त के सामने कमज़ोर रहा, तो वह स्थायी परिवर्तन नहीं ला सकता. 

यही विचार बाद में उनके माओवादी राजनीतिक दर्शन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा बना. एक अकादमिक स्रोत के अनुसार तेभागा आंदोलन के अनुभव ने चारू मजूमदार को इस निर्णय पर पहुंचा दिया कि किसानों को सशस्त्र राज्य दमन का सामना करने में सक्षम होना चाहिए, तभी वह अपनी मांग को पूरा कर पाएंगे. 

साल 1948 सीपीआई पार्टी पर बैन लगा और चारू मजूमदार लगभग 3 साल तक जेल में रहे. 

लेकिन 1950 -1960 के दशक में चारू मजूमदार को कम्युनिस्ट आंदोलन को लेकर वैचारिक द्वंद्व देखने को मिला. जहां इस समय अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट आंदोलन में दो बड़े केंद्र उभर रहे थे : सोवियत संघ (मॉस्को) और चीन (माओ जेडोंग). 

लेकिन चारू मजूमदार धीरे-धीरे चीनी क्रांति और माओ जेडोंग की रणनीति के अधिक करीब होते गए. उनका यह मानना था कि भारत जैसे देश में केवल चुनाव लड़कर एवं संसदीय प्रक्रिया के तहत क्रांति नहीं लाई जा सकती. 

साल 1962 में भारत-चीन का युद्ध हुआ और चारू मजूमदार समेत कई कम्युनिस्ट नेताओं को गिरफ्तार किया गया. युद्ध के बाद भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन में यह सवाल बेहद महत्त्वपूर्ण बन गया कि क्या भारतीय कम्युनिस्टों को सोवियत संघ की विचारधारा अपनानी चाहिए या चीनी विचारधारा? लेकिन चारू मजूमदार का उत्तर धीरे-धीरे स्पष्ट हो गया था कि वह माओ की विचारधारा को अपनाएंगे. 

साल 1964 में सीपाआई का विभाजन हुआ और वह दो गुटों में बंट गई. चारू मजूमदार सीपीआई (एम) से जुड़े, क्योंकि उन्हें लगा कि इस दल की भी विचारधारा उसी तरह की है, जिस तरह की चीनी विचारधारा है, लेकिन समस्या यह थी कि सीपीआईएम खुद भी संसदीय राजनीति से पूरी तरह से अलग होने के पक्ष में नहीं थी. वहीं दूसरी ओर चारू मजूमदार को संसदीय प्रणाली से क्रांति लाने का सपना कहीं से भी पूरा होता हुआ नहीं दिख रहा था. 

अब यहीं से चारू मजूमदार और पार्टी नेतृत्व के बीच संघर्ष तेज़ हुआ. चारू मजूमदार के लिए एक बड़ा प्रश्न यह था कि क्या कम्युनिस्ट पार्टी चुनाव लड़कर सत्ता में आने की कोशिश करे या सशस्त्र किसान क्रांति की तैयारी करे. जिस तरह से उनके पिछले कम्युनिस्ट आंदोलन के अनुभव थे, उन्होंने उनको दूसरा रास्ता चुनने में मजबूरी किया. और उनके विचारों के इसी टकराव का नतीजा था – “आठ ऐतिहासिक दस्तावेज़”.

आठ ऐतिहासिक दस्तावेज़ 

चारू मजूमदार के द्वारा लिखे गए आठ ऐतिहासिक दस्तावेज़ यह सिर्फ एक किताब नहीं है, बल्कि यह 1965 से अप्रैल 1967 के बीच चारू मजूमदार द्वारा लिखे गए आठ राजनीतिक वैचारिक दस्तावेजों का संग्रह है. बाद में इन्हें एक साथ प्रकाशित संकलित किया गया और बाद में नक्सली आंदोलन की वैचारिक दिशा में इसे पनपते हुए देखा गया. यह माना जाता है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन को जो अपनी दिशा मिली, वह इन्हीं वैचारिक दस्तावेजों से प्राप्त हुई. 

पहला दस्तावेज़ 

“Our Tasks in the Present Situation”

यह पहला दस्तावेज़ 28, जनवरी 1965 का है. जहां चारू मजूमदार तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों को कम्युनिस्ट नज़रिए से देखते हैं, जहां 1960 से 70 के दशक में कांग्रेस सरकार के द्वारा कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं की लगातार गिरफ्तारियों को वह राजनीतिक दमन के रूप में देखते हैं. उनके अनुसार केवल संगठनात्मक रूप से मौजूद होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि पार्टी को वास्तविक क्रांतिकारी कार्यक्रम भी करने चाहिए. 

उनकी नज़र में भारतीय कम्युनिस्ट नेताओं ने क्रांतिकारी संघर्ष की जगह संसदीय व्यवस्था को प्राथमिकता दे दी थी. इस संदर्भ में उनका जोर ऐसी पार्टी बनाने पर था जो सत्ता परिवर्तन को वास्तविक लक्ष्य माने. आखिरकार उनका पहला दस्तावेज अधिकतर वैचारिक संघर्ष के आधार पर था. 

दूसरा दस्तावेज़ 

Make the People’s Democratic Revolution Successful by Fighting Against Revisionism”

यह उनका दूसरा दस्तावेज़ था और यहां पर उनके विचार में काफी कुछ स्पष्टता दिखाई देती है. यहां वे जिस ‘लोकतांत्रिक क्रांति’ की बात कर रहे थे, वह पश्चिमी संसदीय लोकतंत्र के अर्थ में नहीं थी. उनकी अवधारणा में इसका अर्थ था: जमींदारों/ सामंती संबंधों का अंत, ग्रामीण वर्ग-संबंधों में बदलाव, किसानों को राजनीतिक शक्ति, साम्राज्यवाद का विरोध, क्रांतिकारी शक्ति का निर्माण. लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में संशोधनवादी कम्युनिस्ट नेतृत्व सबसे बड़ी राजनीतिक बाधा बन गया था.

यहां संशोधनवादी का अर्थ समझना ज़रूरी है. दरअसल कम्युनिस्ट पार्टी के कुछ बड़े नेता पुराने तौर-तरीकों को बदलना चाहते थे, लेकिन उनके इस रवैये की वजह से पूरे काम में सबसे बड़ी राजनीतिक रुकावट आ रही थी. Revisionist कम्युनिस्ट नेतृत्व (संशोधनवादी नेता): कम्युनिस्ट विचारधारा में ‘Revisionist’ (संशोधनवादी) उन नेताओं को कहा जाता है जो मूल कम्युनिस्ट सिद्धांतों (जैसे क्रांति या पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण) को छोड़कर उसमें बदलाव करने लगते हैं. सबसे बड़ी राजनीतिक बाधा:  यानी बदलाव या सुधार की इस पूरी प्रक्रिया में बाहरी लोग नहीं, बल्कि पार्टी के अंदर के यही बड़े नेता ही राजनीति की वजह से सबसे बड़ा रोड़ा बन गए थे.

तीसरा दस्तावेज़ 

“What is the Source of the Spontaneous Revolutionary Outburst in India?”

तीसरा दस्तावेज़ 9 अप्रैल, 1965 का है और यहां चारू मजूमदार एक महत्त्वपूर्ण सवाल उठाते हैं कि भारत में अचानक किसान, मजदूर और युवा आंदोलनों का उभार क्यों हो रहा है. इस जवाब का उत्तर देते हुए वह बताते हैं कि समाज में मौजूद वास्तविक वर्ग-विरोध इन आंदोलनों को जन्म दे रहा है. यहां वह कहते हैं कि सिर्फ जनता के अचानक भड़क उठने या बिना किसी तैयारी के शुरू हुए आंदोलन से बड़ा बदलाव नहीं आ सकता. यही उनका एक प्रसिद्ध वैचारिक अंतर दिखाई देता है : 

बिना स्पष्ट क्रांतिकारी नेतृत्व के संघर्ष और राजनीतिक रूप से निर्देशित एवं सत्ता प्रायोगिक दिशा में बढ़ता संघर्ष. यहां चारू मजूमदार का यह मत था कि जनता के अचानक भड़क उठने वाले इन आंदोलनों को क्रांतिकारी राजनीतिक संघर्ष में बदलने का काम कम्युनिस्ट पार्टी का है.

चौथा दस्तावेज़ 

“Carry on the Struggle Against Modern Revisionism”

यहां चारू मजूमदार के विचार और ज्यादा आक्रामक हो जाते हैं.

उनका का तर्क था कि संशोधनवाद के ख़िलाफ़ संघर्ष केवल पार्टी के भीतर बहस तक सीमित नहीं रहना चाहिए. वे “area-wise seizure of power” की रणनीति की बात करते हैं—अर्थात किसी एक इलाके में सत्ता-संरचना को चुनौती देकर क्रांतिकारी आधार तैयार करना. यहीं से एक महत्त्वपूर्ण रणनीतिक अवधारणा विकसित होती है, कि पूरे भारत में एक साथ क्रांति नहीं.

बल्कि—  एक क्षेत्र → संघर्ष → सत्ता पर कब्जा → आधार क्षेत्र → दूसरे क्षेत्रों में विस्तार.

यह माओवादी चीनी क्रांति के अनुभव से प्रेरित रणनीति थी.

पांचवां दस्तावेज़ 

“What Possibility The Year 1965 is Indicating?”

यह दस्तावेज़ भी साल 1965 का है. अपने पांचवें दस्तावेज़ में चारू मजूमदार उन सभी लोगों की आपत्तियों का जवाब देते हुए दिखते हैं जो उनकी विचारधारा पर प्रश्न उठाते हैं. जिस सशस्त्र संघर्ष की बात चारू मजूमदार करते हैं, क्या यह एक तरह का “दुस्साहस” नहीं है? इस संदर्भ में मजूमदार का कहना था कि सशस्त्र संघर्ष की संभावना को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि परिस्थितियां अभी पूरी तरह तैयार नहीं हैं.

और यहीं से वह एक महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि क्रांति के लिए परिस्थितियों की परीक्षा करने की बजाय क्रांतिकारी परिस्थितियां बनाने की तैयारी करनी चाहिए. यह एक महत्त्वपूर्ण बिंदु था जो आगे जाकर नक्सलबाड़ी आंदोलन और नक्सली गतिविधियों में दिखा, जहां माओवादी अपनी किसी भी आतंकी आत्मघाती घटना को अंजाम देने के लिए परिस्थितियों का इंतज़ार नहीं करते थे, बल्कि वह खुद ऐसी क्रांतिकारी परिस्थितियां बनाते थे, जहां वह आमजन और सैनिकों पर आत्मघाती हमले कर सकें. 

छठा दस्तावेज़ 

“The Main Task Today is the Struggle to Build Up the True Revolutionary Party Through Uncompromising Struggle Against Revisionism”

चारू मजूमदार का छठवां दस्तावेज़ 8 दिसंबर, 1966 को आया. अब मजूमदार के विचारों में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा था. अब ज़रूरत सिर्फ सही विचार तक सीमित नहीं थी, बल्कि अब ज़रूरत थी एक नई क्रांतिकारी पार्टी की. अब चारू मजूमदार को यह महसूस होने लगा था कि अपने विचारों के अनुरूप सीपीआईएम को अब अंदरूनी रूप से बदलना असंभव है, इसलिए अब उन्होंने एक नई क्रांतिकारी पार्टी के गठन पर ज़ोर दिया.

सातवां दस्तावेज़ 

“Taking this opportunity to Build Armed Partisan Struggle by Fighting Against Revisionism”

सातवें दस्तावेज़ में चारू मजूमदार के विचारों में हथियारबंद संघर्ष का विचार और स्पष्ट हो जाता है. और इस समय उनका ध्यान युवाओं और छात्रों के आंदोलनों पर भी था. उनका मानना था कि युवाओं की ऊर्जा को केवल शहरों के राजनीतिक आंदोलनों तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि उनको गांव और किसानों के बीच भी जाना चाहिए.

यही रणनीति बाद में बंगाल के हजारों छात्रों को प्रभावित करने वाली बनी, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के अध्ययन के अनुसार नक्सल आंदोलन ने भारत में माओवादी विचारधारा को एक नई तरीके से लोकप्रिय बनाया. मजूमदार ने माओ की ‘Little Red Book’ को अपने कार्यकर्ताओं के लिए विशेष महत्व दिया. 

आठवां दस्तावेज़ 

“Carry Forward the Peasant Struggle by Fighting Revisionism”

अप्रैल 1967 का यह दस्तावेज़ आखिरी और सबसे निर्णायक दस्तावेजों में से एक था, क्योंकि यह सीधे नक्सलबाड़ी के किसान संघर्ष के ठीक पहले आता है. इसमें चारू मजदूरदार सीपीआई पार्टी के नेतृत्व की चुनावी दिशा की आलोचना करते हैं और किसान संघर्ष को आगे बढ़ाने की बात करते हैं. वह एक तरह से इस चुनाव प्रक्रिया, संसदीय प्रणाली इन सब चीजों को नकार कर इस किसान संघर्ष को एक उग्र, सशस्त्र और हिंसक आंदोलन की ओर ले जाना चाहते हैं और यही हुआ. मई 1967 में उनका यह विचार धरातल पर एक उग्र विद्रोह के रूप में सामने आया.

मई 1967 नक्सलबाड़ी 

मई 1967 इतिहास में एक निर्णायक मोड़ लेकर आता है. पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में एक नक्सलबाड़ी नामक ग्रामीण क्षेत्र था. यहां भूमि जमींदार और आदिवासी-किसान संबंधों को लेकर संघर्ष पहले से ही मौजूद था. चारू मजूमदार और इसके प्रमुख वैचारिक नेता थे, जबकि कानू सान्याल और जंगल संथाल ने जमीन पर किसान को इकट्ठा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई. 

फिर हुई हिंसक विद्रोह की शुरुआत. 25 मई, 1967 को पुलिस कार्रवाई के दौरान इस संघर्ष में पुलिसकर्मी और किसान मारे गए. इस घटना ने स्थानीय किसान संघर्ष को राष्ट्रीय राजनीतिक प्रतीक में बदल दिया और यहीं से नक्सलवादी शब्द भारतीय राजनीति में स्थाई रूप से प्रवेश करता है. 

चीन से मित्रता 

देश और किसान हितों की बात करने वाले यही माओवादी बाद में उसी चीन के नेता से मिलने गए, जिसकी आक्रामक क्षेत्र हड़प नीति के कारण,  भारत-चीन युद्ध हुआ. 

कई लेखों और अखबारों में इस बात का उल्लेख है कि नक्सलबाड़ी आंदोलन के प्रमुख नेता कानू सान्याल समेत कई माओवादी नेता दिसंबर 1967 में नेपाल के रास्ते चीन गए, वहां उन्हें Chinese Revolutionary Guerrilla Organization की कई गतिविधियां दिखाई गईं और गुरिल्ला युद्ध कैसे लड़ा जाता है, इसकी ट्रेनिंग भी दी. 

Chinese archive material पर आधारित एक अध्ययन का दावा है कि 13 दिसंबर, 1967 की बैठक में माओ जेडोंग ने भारतीय माओवादी नेताओं से, पुलिस से हथियार छीनने और छोटे पुलिस दलों पर अचानक हमले जैसी गुरिल्ला दांव-पेच अपनाने की बात कही थी और विगत दशकों में हमें भारत में हुए सभी माओवादी नक्सली हमलों में यही तरकीबें देखने को मिली, जहां हमारी सेना और पुलिस स्टेशनों पर हमला कर, नक्सलियों द्वारा उनके हथियार छीने गए थे.

नई क्रांतिकारी पार्टी का गठन

नक्सलबाड़ी में हुए आंदोलन के बाद सीपाआईएम पार्टी से अलग हुए क्रांतिकारी वामपंथी समूह ने 1969 में अलग से एक पार्टी का गठन किया, जिसका नाम था भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी-लेनिनवादी (सीपाआईएमएल).

चूंकि अब मजूमदार एक क्रांतिकारी पार्टी के केंद्रीय नेता थे, अब उनके विचारों का सबसे विवादस्पद हिस्सा सामने आने लगता है. जहां वह खुलकर हिंसा की बातें करते हैं, जहां वे एक आंदोलन में “annihilation of class enemies line” बोलते हैं, जिसका अर्थ है वर्गशत्रुओं की हत्या. अतः यहां वे वर्ग शत्रुओं की हत्या व उनको खत्म करने की बात करते हैं.

इसमें मुख्यतः ज़मींदार, बड़े जोतदार, पुलिस और राज्य के प्रतिनिधि, चाहे वह सरकारी अफसर या कोई भी एवं उनकी क्रांतिकारी पार्टी से अलग सोचने वाले राजनीतिक विद्वान, इन सभी को वर्ग शत्रु के रूप में देखा जा सकता है. यहीं से चारू मजूमदार की विचारधारा अपने आप में गलत साबित होनी शुरू हुई. मजूमदार ने यह सोचा था कि क्रांतिकारी हिंसा करके वह जनता को प्रेरित करेंगे और उसके बाद राज्य कमज़ोर होगा. किसान उठ खड़े होंगे और क्रांति इस तरह लंबे समय तक फैलेगी.

लेकिन वास्तविकता ठीक इसके उलट निकली. सीपाआईएमएल के गठन के बाद नक्सली आंदोलन कई राज्यों में फैलने लगा. सन 1970 से लेकर 1972 तक पश्चिम बंगाल, बिहार, ओड़िशा, उत्तर प्रदेश और पंजाब आदि राज्यों में कई अन्दोलन हुए, लेकिन राज्य सरकार की प्रतिक्रिया भी अत्यंत कठोर थी. पुलिस और सुरक्षा बलों की कार्यवाही, गिरफ्तारियां, मुठभेड़ और राजनीतिक दमन ने नक्सली आंदोलन को भारी नुकसान पहुंचाया. वहीं दूसरी ओर संगठन में भी इस अति हिंसक विचारधारा को लेकर मतभेद पैदा होने शुरू हो गए थे, जिस कारण संगठन कमजोर हुआ और सीपाआईएमएल पार्टी के लीडरशिप में बिखराव हुआ. 

इस बीच 16 जुलाई 1972 को चारू मजूमदार को गिरफ्तार किया गया और उन्हें कलकत्ता पुलिस के लॉकअप में रखा गया. जहां 28 जुलाई, 1974 को उनकी मृत्यु हो गई. चारू मजूंदार की मृत्यु के बाद नक्सली आंदोलन खत्म नहीं हुआ, बल्कि यह कई धाराओं में बंट गया. यहां से भारत में वामपंथी समूह दो बिल्कुल अलग रास्तों पर दिखाई देने लगे थे. एक जो संसदीय लोकतंत्र पर विश्वास रखता था, उसमें दो पार्टियां थीं: सीपीआई और सीपाआईएम. दूसरी जो सशस्त्र क्रांतिकारी वामपंथ, अर्थात उग्रवादी विचारधारा में विश्वास करती थी, वो थी सीपाआईएमएल. 

इस समय सीपाआईएमएल आंदोलन कई गुटों में बंट गया. जिसमें से कुछ समूह ने चुनाव का रास्ता बनाया,- कुछ ने जमीनी स्तर पर हाथियारों से जंग जारी रखी,- कुछ ने मजदूर-किसान संगठन बनाने पर ध्यान दिया. जैसे सीपाआईएमएल पार्टी में से ही अलग गुट बना, जो बाद में एक नया राजनीतिक दल बना. उसका नाम था सीपाआईएमएल लिबरेशन. यह एक संसदीय राजनीतिक दल के रूप में सामने आया. 

इस बीच 1970 से 1990 के दशक के बीच में नक्सली आंदोलन का विस्तार और विखंडन होता रहा. लेकिन आंध्रप्रदेश और बिहार ऐसे राज्य उभरकर आए जहां अलग-अलग माओवादी नेताओं ने कब्ज़ा किया. 22 अप्रैल, 1980 को सीपाआईएमएल के भीतर ही एक नया गुट बना, जिसका नाम था पिपल्स वॉर ग्रुप. इसका आधार वर्तमान का उत्तरी तेलंगाना था. इसकी विचारधारा थी कि ग्रामीण गरीब किसानों को इकट्ठा करना, राज्य सरकार की पुलिस एवं सेना से गोरिल्ला संघर्ष लड़ना, राज्य को कमज़ोर करना और फिर आखिर में सत्ता पर कब्जा करना.

इस People’s War Group के प्रमुख नेता थे कोंडापल्ली सीतारमैया. उन्होंने 1980 से 90 के दशक के अंत तक कई आत्मघाती हमले किए, जिसमें नागरिक और पुलिस समेत हज़ारों लोगों की जान गई. वहीं इसी माओवादी क्रांति का दूसरा केंद्र बना बिहार. जहां पर Maoist Command Center (MCC) की शुरुआत हुई और इसके प्रमुख नेता थे, कनाई चटर्जी. साल 2004 में एमसीसी और पिपल्स वॉर ग्रुप का विलय हुआ और यह नया संगठन बना सीपीआई (माओवादी). यही संगठन बाद में भारतीय माओवादी सशस्त्र आंदोलन का सबसे महत्त्वपूर्ण संगठन बना. जिसको भारत सरकार के गृह मंत्रालय ने बैन कर दिया.

इसके अलावा चारू मजूमदार की मृत्यु के बाद कई क्षेत्रों में कई ऐसी हिंसक विचारधारा वाले माओवादी नेता सामने निकल कर आए, जिन्होंने सशस्त्र संघर्ष को जारी रखा. जिनमें मुपल्ला लक्ष्मण राव, मल्लोजुला कोटेश्वर राव उर्फ किशन जी, चेरुकुरी राजकुमार उर्फ आजाद और नंबाला केशवराव उर्फ बसवराज शामिल थे. बसवराज ज़मीनी स्तर पर माओवादी संगठन की सेना का लीडर था. यहां तक कि NIA के रिकॉर्ड में भी माओवादी आतंकियों से संबंधित मामलों में उसे टॉप का माओवादी लीडर माना जाता था.

लेकिन इस हिंसक सशस्त्र क्रांतिकारी संगठन में भी कुछ ऐसे थे जो बंदूक से नहीं, बल्कि अपनी कलम के दम पर इन माओवादी-नक्सली आत्मघाती घटनाओं को समर्थन देते थे. 

हम सभी 2018 से एक शब्द से परिचित हैं ‘अर्बन नक्सल’. यह वही लोग हैं जो रहते तो शहरों में हैं, विद्वान हैं, लेखक हैं, कोई शिक्षक है, कई छात्र हैं, पत्रकार हैं, लेकिन वह वैचारिक रूप से नक्सली घटनाओं और देश विभाजन के विचार का समर्थन करते हैं, लेकिन इसकी भी शुरुआत 1970 के दशक से शुरू हुई थी. 

जहां मजूमदार की मृत्यु के बाद से विश्वविद्यालयों में विद्वानों, लेखकों, विश्वविद्यालयों के छात्रों का एक ऐसा समूह बनने लगा था जो कहीं ना कहीं इस माओवादी विचारधारा का समर्थन करता था. जो अपने लेख, अपने काव्य और अपने बयानों से सरकार के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाते थे और इन हिंसक माओवादी गतिविधियों का समर्थन करते थे.

इसमें वरवर राव समेत कई ऐसे कवि, लेखक मौजूद थे जो अपने लेखों में माओवादी विचाधारा का समर्थन करते थे. इस संदर्भ में एक VIRASAM के नाम से एक संस्था भी बनी. एक हालिया अकादमिक शोध प्रबंध में VIRASAM को नक्सलबाड़ी और श्रीकाकुलम विद्रोह से प्रेरित एक बौद्धिक समूह बताया गया है और कहा गया है कि उसके कवि और उपन्यासकारों ने माओवादी संघर्ष के समर्थन में व्यापक टीका टिप्पणी तैयार की थी. 

लेकिन यहां यह ध्यान देना ज़रूरी है कि धीरे-धीरे कैसे यही माओवादी वामपंथी विचारधारा से पीड़ित लेखकों ने, हिंदू धर्म पर तीखे हमले करने शुरू कर दिए. मार्क्सवादी विचारधारा धर्म को “जनता की अफीम” मानती है और माओवादी और वामपंथी मानते हैं कि धर्म इंसान को उसके असली अधिकारों और सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों से भटकाता है.

इस संदर्भ में वामपंथियों का तर्क है कि सनातन धर्म की प्राचीन व्यवस्थाओं (जैसे वर्ण व्यवस्था) ने समाज में असमानता और शोषित वर्ग (दलित और पिछड़े) का उत्पीड़न किया है. इसलिए वे धर्म और उसके इतिहास को शोषक ढांचे के रूप में देखते हैं. जो कि वास्तव में सच्चाई से कोसो दूर है. 

अब वामपंथियों का यह तर्क तब और विस्तृत और कठोर रूप में सामने आया जब भारत में 1980 और 1990 के दशक में दक्षिणपंथी राजनीति और राम मंदिर आंदोलन का उभार हुआ, तब वामपंथी विचारकों ने इसे अपने राजनीतिक और वैचारिक ढांचे के लिए खतरा माना. 

वहीं विशेषकर माओवादी (नक्सलवादी) जल, जंगल और जमीन की लड़ाई के नाम पर आदिवासियों को हिंदू धर्म की मुख्यधारा और भारत के प्रशासनिक ढांचे से अलग करने के लिए यह प्रचार करते रहते हैं कि हिंदू धर्म और संस्कृतियां आदिवासियों की मूल संस्कृति का शोषण करती हैं, जबकि सच्चाई ठीक इसके उलट है.

उनकी इस पिछड़ी सोच का एक प्रमाण तब मिलता है जब 1980 के दशक में पहली बार हिंदुत्व बनाम लेफ्ट का टकराव देखा गया. तब बाबरी मस्जिद/ रामजन्म भूमि विवाद में और 1986 में ताला खुलने को लेकर कांग्रेस की नीतियों की सीपीआईएम ने खुलकर आलोचना की. 

वहीं रामजन्मभूमि को लेकर एक अयोध्या की कहानी में एक ऐसा अध्याय भी है, जो वामपंथी सोच की एक झलक दिखाता है. ये कहानी है बाबा लाल दास की. बाबा लाल दास अयोध्या के ऐसे महंत थे जिनकी कहानी बाबरी मस्जिद–रामजन्मभूमि विवाद में काफी असामान्य है. 1981 में अदालत ने उन्हें विवादित परिसर में स्थित रामलला की मूर्तियों का मुख्य पुजारी बनाया था. यानी वे उस समय रामलला की पूजा कराने वाले महंत थे.

लेकिन राजनीतिक रूप से वे विश्व हिंदू परिषद् और रामजन्मभूमि आंदोलन के विरोधी बन गए. उपलब्ध शोध के अनुसार वे स्थानीय सीपीआईएम के सचिव रहे थे और मजदूर वर्ग के अधिकारों की बात करते थे. उनके एक प्रकाशित इंटरव्यू में उनसे पूछा गया था कि क्या वे बाबरी मस्जिद गिराए जाने के पक्ष में थे. उनका जवाब था:

“No, not at all.” (नहीं, बिल्कुल नहीं)

और जब उनसे पूछा गया कि क्या मस्जिद गिराए बिना मंदिर बनाया जा सकता था, तो उन्होंने कहा: “The mandir was already there.” (मंदिर पहले से वहीं है)

अर्थात उनका तर्क यह था कि रामलला का मंदिर/पूजा पहले से चल रही थी और मस्जिद गिराने की जरूरत नहीं थी. इसके अलावा वामपंथी विचारधारा से प्रेरित लेफ्ट विंग लेखकों का भारत के इतिहास व हिंदू धर्म की आलोचना को लेकर टीका टिप्पणी और माओवादी आंदोलन के समर्थन में बयान आते रहे हैं.

इसमें रोमिला थापर और इरफान हाबीब जैसे इतिहासकारों पर ऐसे कई आरोप हैं कि उन्होंने भारत के प्राचीन और गौरवशाली इतिहास और संस्कृतियों को बर्बर, रूढ़िवादी और शोषक के रूप में चित्रित किया. यहां तक कि इतिहास की पुस्तकों में यह तर्क दिया गया कि सोमनाथ मंदिर पर महमूद गजनवी का हमला मुख्य रूप से धार्मिक ना होकर केवल धन-दौलत के लिए किया गया था. 

वहीं अरुंधति रॉय ने माओवादियों की तुलना मोहनदास कर्मचंद गांधी से कर दी थी. दरअसल वामपंथी विचारधारा से प्रेरित दलों में नक्सलबाड़ी आंदोलन से लेकर आज तक देश विरोधी नारे लगते रहे हैं. वहीं बीते एक दशक में वामपंथी विचारधारा से प्रेरित राजनीतिक एवं छात्र दलों द्वारा कितने देश विरोधी नारे लगे हैं, उसकी गिनती नहीं है.

फरवरी 2016 में जेएनयू में संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी की बरसी पर आयोजित एक कार्यक्रम में, ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशाल्लाह इंशाल्लाह’, ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी, जंग रहेगी’, ‘अफजल हम शर्मिंदा हैं, तेरे कातिल जिंदा है’ और ‘कश्मीर की आजादी’ जैसे देशविरोधी नारे लगाने वाले कोई ओर नहीं, बल्कि इसमें थे कन्हैया कुमार, जो तत्कालीन एआईएसएफ (एआईएसएफ) संगठन से जुड़े थे, जो कि सीपीआई का छात्र संगठन है.

वहीं इसमें उमर खालिद और अनिबान भट्टाचार्य भी मौजूद थे, जो Democratic Student Union (डीएसयू) से जुड़े थे जो एक धूर वामपंथी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं और वैचारिक रूप से उसका सीपीआई (माओवादी) का समर्थन करते हैं.

वहीं उमर खालिद और शरजील इमाम पर 2020 दिल्ली दंगे और सीएए संबंधी अन्य मामलों पर भी कार्यवाही चल रही है. जहां इन पर दिल्ली दंगों की साजिश में भड़काऊ भाषणों और उकसावे के आरोप में यूएपीए के तहत मामले दर्ज किए गए थे. शरजील इमाम खुद आइसा जो सीपीआई (एमएल) लिबरेशन पार्टी का एक छात्र संगठन है, उस से जुड़े हुए थे. 

अब यदि वामपंथी विचारधारा के इतिहास पर नज़र डालें तो आजादी के बाद से ही यह साफ़ प्रतीत होने लगता है कि चीन के समर्थन में बयान देना, नक्सली घटनाओं को अंजाम देकर देश में लगभग 5 दशक से अधिक समय तक देश को हानि पहुंचाना, अपनी वामपंथी विचारधारा से देश विरोधी बातें करना, यह इन वामपंथी और नक्सलवादी विचारों वाले अर्बन नक्सलियों की हमेशा से सोच रही है.

वहीं अगर किसी को लगता है कि इन वामपंथियों ने, विशेषकर उन वामपंथियों ने (जिन्होंने हिंसक क्रांति को छोड़कर संसदीय प्रणाली को अपनाया), अच्छा काम किया, तो वह भी गलतफहमी है. पश्चिम बंगाल और केरल का आज क्या हाल है, उसका एक बड़ा कारण इन राज्यों में विशेषकर पश्चिम बंगाल में 34 साल तक राज करने वाला वामपंथी राजनीतिक दल ही है. 

1947 में भारत की आजादी के समय पश्चिम बंगाल देश के सबसे समृद्ध और औद्योगिकीकृत राज्यों में से एक था. कलकत्ता भारत का प्रमुख व्यापारिक और वित्तीय केंद्र था. हालांकि, वाममोर्चा के 34 वर्षों के शासनकाल के दौरान राज्य का आर्थिक ढांचा बुरी तरह प्रभावित हुआ. 

इसका सबसे बड़ा कारण था: उग्र मजदूर यूनियन, सीपीआईएम की ट्रेड यूनियन, सैंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन ने कारखानों में हड़ताल, तालाबंदी कर मालिकों को व्यापारियों को परेशान कर दिया था. लगातार हड़तालें, हिंसक विरोध के कारण बड़ी औद्योगिक कंपनियों ने अपने हेडक्वॉर्टर और मैन्युफैक्चरिंग प्लांट बंगाल से गुजरात और तमिलनाडु में स्थानांतरित कर दिए. इतना ही नहीं पार्टी के अंदर “कट कमीशन” और कैडर राज चलता था.

1980 से 90 के दशक में वामपंथी शासन के दौरान स्थानीय पार्टी समितियों का दबदबा बढ़ा. इसमें होता यह था कि कोई भी नया व्यवसाय शुरू करने, दुकान खोलने या निर्माण कार्य करने से पहले वहां के उस लोकल कैडर को या यूनियन के नेता को एक निश्चित हिस्सा (जिसे कट कमीशन कहते हैं), देना पड़ता था. इसके अलावा बिना पार्टी कैडर की मंजूरी के रोजगार, आवास या सरकारी योजनाओं का लाभ मिलना, वामदल के शासनकाल में असंभव सा हो गया था.

इस तरह से वामदल के 35 साल के शासनकाल में पश्चिम बंगाल पिछड़े से पिछड़ता चला गया, जिस कारण आज वहां न मैन्युफैक्चरिंग प्लांट है, रोजगार अपने चरम पर है, और आज पश्चिम बंगाल पर अपनी कुल राज्य अर्थव्यवस्था का लगभग 38% कर्ज़ है. पश्चिम बंगाल का कुल कर्ज़ दशक दर दशक बढ़ते हुए आज 8 लाख करोड़ रुपए को पार कर चुका है. जहाँ वह आज भी अपने बजट का 40% हिस्सा पुराने ब्याजों के भुगतान, पेंशन आदि पर खर्च कर रहा है. 

इसका अर्थ यह है कि इतिहास में वामदल और टीएमसी के शासन काल में लिए गए गलत निर्णयों के कारण आज पश्चिम बंगाल अपने साथी राज्यों गुजरात, तमिलनाडु समेत अन्य राज्यों से विकास की दौड़ में पिछड़ चुका है.

वहीं बात करें अगर केरल की तो सामाजिक संकेतकों में, जैसे मानव विकास, उच्च शिक्षा और स्वास्थ्य में केरल बेहतर है लेकिन आर्थिक विकास के मामले में यह भी पश्चिम बंगाल से पीछे नहीं है. केरल में भी उग्र मजदूर यूनियनों के सख्त नियमों के कारण विनिर्माण उद्योग कभी स्थापित ही नहीं हो पाया.

केरल की आर्थिक व्यवस्था काफी हद तक खाड़ी देशों में काम करने वाले एनआरआई के ज़रिए आने वाले धन पर ही टिकी रही. केरल में ट्रेड यूनियन द्वारा नौक्कू कूली (यानी कि केवल सामान लोड होते देखने का पैसा लेना) जैसी बेकार प्रथाओं ने व्यापार के माहौल को प्रभावित किया, साथ ही श्रम लागत अधिक होने और वामपंथी यूनियनों के प्रभाव के कारण भारी उद्योग और मैन्युफैक्चरिंग प्लांट केरल में कभी स्थापित ही नहीं हो सके. हालांकि 2018 में नौक्कू कूली प्रथा को बैन कर दिया गया. लेकिन इसमें बहुत देर हो चुकी थी.

अपनी इन्हीं गलत निर्णयों के कारण आज केरल पर अपने कुल राज्य अर्थव्यवस्था का लगभग 34% कर्ज़ है. दशक से केरल का राजस्व घाटा और दिन-ब-दिन बढ़ता ही गया, क्योंकि राज्य में कल्याणकारी योजनाओं, वेतन और पेंशन पर भारी खर्च किया गया था. जिस कारण केरल सरकार ने कभी उतना पूंजीगत व्यय ही नहीं किया, ताकि कंपनियों और व्यापारियों को व्यापार करने हेतु सुविधाजनक इंफ्रास्ट्रक्चर उपलब्ध हो सके. 

वामदल के शासनकाल में केरल में पेंशन इस हद तक दी जाती थी, कि मंत्रियों, मुख्य सचिव और विपक्ष के नेता के पर्सनल स्टॉफ तक में नियुक्त होने वाले कार्यकर्ताओं को मात्र 2 से 3 साल के कार्यकाल की सेवा के बाद जीवन भर तक पेंशन दी जाती है. 

दरअसल सीपीआई के शासनकाल में किस तरह से वह अपने कैडर को फायदा पहुंचाते थे. उसकी प्रकिया समझना बहुत ज़रूरी है. दरअसल प्रत्येक मंत्री के पास 20 से 25 पर्सनल स्टाफ सदस्य रखने की अनुमति होती है. सरकार में सत्तारूढ़ दल (वाममोर्चा / सीपीआईएम नेतृत्व वाली सरकार) अपने राजनीतिक कार्यकर्ताओं को पर्सनल स्टाफ में नियुक्त करती थी. 

अब 5 साल के कार्यकाल के बीच (लगभग 2 से 2.5 साल पूरे होने पर) इस पूरे स्टाफ को इस्तीफा दिलवाकर घर भेज दिया जाता है और उनकी जगह पार्टी के कार्यकर्ताओं के एक नए बैच को नियुक्त कर दिया जाता था. 

इस रोटेशन का नतीजा यह होता था कि मात्र 2 साल सेवा देने के बाद पहला बैच जीवनभर पेंशन पाने के लिए पात्र हो जाता है. इसके बाद आया दूसरा बैच भी 2.5 साल काम करके जीवनभर पेंशन पाने का हकदार बन जाता था.

तब उस समय यह मुद्दा इतनी चर्चा में रहा कि तत्कालीन केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने इसे सरकारी खजाने की लूट बताया. उन्होंने सवाल उठाया कि एक आम सरकारी कर्मचारी को पेंशन पाने के लिए कम से कम 10 वर्षों की सेवा देनी पड़ती है, जबकि पार्टी कैडर को लाभ पहुंचाने के लिए 2 साल में रोटेशन करके जीवनभर पेंशन का अधिकार दे दिया जाता है. उन्होंने यह बोला कि यह कदम राज्य के पैसों से सीधे राजनीतिक कार्यकर्ताओं (पार्टी कैडर) को फंड करने का एक ज़रिया बन गया है. सिर्फ़ राज्यपाल ही नहीं, बल्कि वामदल की इस सरकारी खजाने की लूट नीति ने सुप्रीम कोर्ट तक से भी फटकार खाई. मार्च 2022 में सुप्रीम कोर्ट (जस्टिस एस. अब्दुल नाज़ीर और जस्टिस कृष्ण मुरारी की पीठ) ने एक अन्य मामले की सुनवाई के दौरान केरल सरकार की इस नीति पर कड़ी टिप्पणी कर कहा था :

केरल एकमात्र ऐसा राज्य है जहां मंत्रियों द्वारा लोगों को केवल 2 साल के लिए नियुक्त किया जाता है और वे जीवनभर पेंशन पाते हैं. क्या राज्य इतना अमीर है कि वह 2 साल काम करने वालों को पूरी जिंदगी पेंशन दे सकता है?”

वामदल के इन्हीं सब निर्णयों का परिणाम है कि आज भी केरल अपने कुल बजट का लगभग 52% सिर्फ वेतन और पेंशन में खर्च करता है. जब एक राज्य का आधा बजट सिर्फ़ पेंशन और वेतन में जाएगा, तो राज्य में उद्योग, व्यापार स्थापित करने हेतु बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण हेतु, पूंजीगत खर्च कहां से करेगा, यह सबसे बड़ा सवाल है.

केरल सरकार में अपने लगभग 30 साल से अधिक के शासन काल में वामदल ने  सामाजिक संकेतकों में बेहतर कर लोगों को पढ़ा लिखाकर सिर्फ घर बैठाया है क्योंकि रोजगार तो वह विदेश जाकर ही ले रहे हैं, बाकि रोजगार सिर्फ अपने कैडरों को दिया है ताकि उनको पेंशन देकर, सरकारी खजाने में सेंध लगती रहे.

आखिरकार वामदल चाहे वह हिसंक माओवादी हो या संसदीय प्रणाली में विश्वास रखने वाले सीपीआईएम और अन्य दल, इनकी ट्रेड यूनियन, छात्र संघ ने दक्षिण पंथी दल और सत्ता दल से दुश्मनी के चलते और उनको अपना दुश्मन मानकर कई बार ऐसे बयान दिए हैं, जिन्होंने देश हित की भावना को ठेस पहुंचाये और देश विरोधी मुद्दों को बढ़ावा दिया है. 

उसी का परिणाम यह है कि 1970 के दशक में जिन वामपंथी दलों का वर्चस्व रहता था, जिन्होंने पश्चिम बंगाल और केरल में आजादी से लेकर वर्तमान तक लगभग 35 साल से अधिक शासन किया, आज वही भारत के किसी राज्य में सत्ता में नहीं है. 

जहां वर्तमान में सभी वाम दलों की कुल मिलाकर लोकसभा में 8 सीटें हैं, तो वहीं राज्य स्तर पर इनका सूपड़ा साफ है. जिससे यह साफ पता चलता है कि वर्तमान का जनादेश भी इस वामपंथी देश विरोधी विचारधारा को पूरी तरह से नकार चुका है. 

बलराम सिंह पाल
बलराम सिंह पाल
बलराम सिंह पाल एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.