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GC Warriors के लिए कुछ कृषि-संबंधी सुझाव

एक आदमी ने घर बनाना शुरू किया। पहले जमीन खरीदी, फिर नक्शा बनवाया, नींव खोदी, ईंटें खरीदीं, मजदूर लगाए और छत डाली। बीस साल बाद उसके बेटे ने उसमें दो मंजिल और बनवाईं। पोते ने बगल की जमीन खरीद ली। डेढ़ सौ साल बीतते-बीतते वहाँ पूरा मोहल्ला खड़ा हो गया। फिर एक दिन दूसरा आदमी आया। उसने चार tweet किए, दो Twitter Space किए और घोषणा कर दी कि अगले महीने वह इस पूरे मोहल्ले को गिरा देगा। घोषणा इतनी आत्मविश्वासपूर्ण थी कि कुछ देर के लिए मोहल्ले को भी अपने खड़े होने पर संदेह हो गया।

मेरी समस्या यह नहीं है कि वह मोहल्ला गिराना क्यों चाहता है। उसकी कई शिकायतें न्यायसंगत हैं। मेरी समस्या इतनी है कि उसे निर्माण और विध्वंस—दोनों की बुनियादी engineering नहीं मालूम। वह हथौड़ा लेकर आया अवश्य है, पर उसे यह जानकारी नहीं कि दीवार कहाँ है। फिलहाल वह दरवाजे की घंटी बजाकर मकान को चेतावनी दे रहा है कि उसके दिन पूरे हो गए। 

लगभग यही स्थिति आज सोशल मीडिया पर स्वयं को General Category का योद्धा घोषित कर चुके बहुत से लोगों की है। योद्धा वाला पद उन्होंने स्वयं ग्रहण किया है, इसलिए नियुक्ति-पत्र, प्रशिक्षण और युद्ध का नक्शा जैसी छोटी-मोटी औपचारिकताएँ आवश्यक नहीं समझी गईं। Reservation के ढाँचे पर सवाल हैं, SC/ST Act के कुछ प्रावधानों और उनके अमल पर सवाल हैं, विश्वविद्यालयों और दूसरी संस्थाओं में जाति-आधारित नीतियों को लेकर सवाल हैं, प्रतिनिधित्व और सरकारी नीति को लेकर वास्तविक शिकायतें हैं। इन सवालों को केवल यह कहकर खारिज नहीं किया जा सकता कि पूछने वाला General Category से आता है, इसलिए उसका सवाल अपने आप अनुचित हो गया। कई जगह गंभीर सुधार की आवश्यकता पर ईमानदार चर्चा होनी चाहिए।

लेकिन उससे पहले एक बुनियादी सवाल पूछना जरूरी है—आप जिस राजनीतिक और सामाजिक तंत्र को चुनौती देने निकले हैं, क्या आपको पता भी है कि वह बना कैसे है? क्योंकि सामने वाला चार tweet, दो Space और एक hashtag से यहाँ नहीं पहुँचा है। उसने Twitter Blue लेने से पहले भी राजनीति की थी। बल्कि उस समय की थी जब blue tick केवल आसमान में दिखाई देता था।

जिसे आज हम अलग-अलग रूपों में non-Brahmin, Dalit, backward, OBC या Bahujan राजनीति कहते हैं, उसके पीछे लगभग डेढ़ सौ साल का वैचारिक, संगठनात्मक, कानूनी और राजनीतिक निवेश है। आज आपको उसकी फसल दिखाई दे रही है, लेकिन बीज उन्नीसवीं सदी में बोया गया था। महाराष्ट्र से शुरू कीजिए। ज्योतिराव फुले ने 1873 में सत्यशोधक समाज बनाया, लेकिन सत्यशोधक समाज किसी रविवार की दोपहर बनाया गया WhatsApp group नहीं था, जिसमें पहले दिन 412 सदस्य जोड़े गए हों और तीसरे दिन admin के व्यवहार से नाराज होकर 287 लोगों ने नया group बना लिया हो।

उससे पहले विचार तैयार हुआ, इतिहास को पढ़ने का एक alternative ढाँचा तैयार हुआ, शूद्र-अतिशूद्र जैसी राजनीतिक शब्दावली विकसित हुई, किताबें लिखी गईं, pamphlets निकले और जाति तथा सामाजिक authority को देखने का एक नया ढाँचा बनाया गया। पहले लोगों से यह नहीं कहा गया कि कल वोट डालकर सरकार बदल दो। पहले उन्हें यह बताया गया कि तुम कौन हो, तुम्हारा इतिहास क्या है, तुम्हारे हित क्या हैं और मौजूदा सामाजिक order को किस नजर से देखना है। आजकल इस लंबे काम को thread लिखकर पूरा मान लिया जाता है। thread के अंत में यदि ‘यह बात आपको कोई नहीं बताएगा’ जोड़ दिया जाए तो इतिहास भी विनम्रतापूर्वक रास्ते से हट जाता है।

यह सब vacuum में नहीं हो रहा था। उन्नीसवीं सदी का औपनिवेशिक India missionary polemics, Orientalist classifications, Western शिक्षा, print networks और indigenous सामाजिक conflicts—इन सबका churn था। Phule ने इनमें से सब कुछ mechanically adopt नहीं किया, लेकिन उनका वैचारिक world इन influences से पूरी तरह बाहर भी नहीं था। यही किसी गंभीर आंदोलन का पहला चरण होता है। वह सबसे पहले एक explanatory universe बनाता है। लोग अपनी स्थिति को किस language में समझेंगे, किस historical story के भीतर रखेंगे और किस सामूहिक पहचान के रूप में स्वयं को देखेंगे—यह बाद की राजनीति से पहले तय होता है। आंदोलन पहले दिमाग में नक्शा बनाता है, उसके बाद सड़क पर जुलूस निकालता है। हमारे नए योद्धाओं ने सुविधा के लिए जुलूस पहले निकाल दिया है; नक्शा रास्ते में किसी से माँग लेंगे।

इसके बाद संगठन आया और फिर patronage आया। Kolhapur के Shahu Maharaj इस कहानी में इसलिए महत्वपूर्ण हो जाते हैं क्योंकि उन्होंने non-Brahmin शिक्षा, प्रतिनिधित्व और government employment के सवाल को राज्य patronage दिया। यहाँ एक connection है जिस पर कम-से-कम curiosity तो होनी चाहिए। Shahu Maharaj की administrative training से जुड़ा British officer था Sir Stuart Mitford Fraser। बाद में यही Fraser 1896 से 1902 तक Mysore के young Maharaja Nalwadi Krishnaraja Wadiyar IV का tutor और guardian बना। UK National Archives की catalogue entry Fraser को पहले Kolhapur के Maharaja का tutor और बाद में Mysore Maharaja का tutor and guardian explicitly बताती है।

आगे चलकर Kolhapur और Mysore दोनों non-Brahmin प्रतिनिधित्व के महत्वपूर्ण centres बने। Colonial establishment इस story में केवल बाहर खड़ा spectator नहीं था, जो interval में मूँगफली खाकर लौट आया हो। British officers princes की administrative शिक्षा में थे, औपनिवेशिक bureaucracy communities को classify कर रही थी, census लोगों को categories में गिन रहा था, government service measurable प्रतिनिधित्व का question बन रही थी और राज्य increasingly यह तय कर रहा था कि society को किन boxes में देखा जाए। सरकार ने मनुष्य को पहले प्रजा माना, फिर संख्या माना और अंततः column में फिट कर दिया। जो फिट नहीं हुआ, उसके लिए नया column बना दिया गया; आखिर साम्राज्य था, stationery की कमी नहीं थी।

Mysore में Nalwadi Krishnaraja Wadiyar IV के शासन के दौरान यह प्रक्रिया संस्थागत form लेता दिखाई देता है। Non-Brahmin groups ने public services में प्रतिनिधित्व का सवाल उठाया और 1918 में Maharaja ने Sir Leslie Miller की chairmanship में committee नियुक्त की। Government of India की backward-classes इतिहास के अनुसार committee का उद्देश्य non-Brahmin communities के adequate प्रतिनिधित्व के उपाय सुझाना था, और official historical account यह भी दर्ज करता है कि Mysore court का एक हिस्सा non-Brahmin grievances के प्रति sympathetic था।

यहीं औपनिवेशिक policies का deeper effect आता है। British rule ने India की diversity पैदा नहीं की थी। जातियाँ, भाषाएँ, sects, local hierarchies और regional identities पहले से मौजूद थीं। अंग्रेजों के आने से पहले भारत में सब लोग एक-दूसरे को गले लगाकर नहीं घूमते थे; यह सुविधा हमने बाद की कल्पनाओं के लिए सुरक्षित रखी है। लेकिन औपनिवेशिक राज्य ने इन भेदों को systematically count, classify, rank और compare करना शुरू किया। Census पूछता था कि आप कौन हैं और कितने हैं। Bureaucracy पूछती थी कि किस community की government jobs में कितनी प्रतिनिधित्व है। Representative institutions यह सवाल खड़ा करते थे कि किस group की कितनी राजनीतिक हिस्सेदारी होनी चाहिए। जिस पहचान की पहले मुख्यतः local सामाजिक relevance थी, वही अब jobs, शिक्षा, प्रतिनिधित्व और राज्य resources से जुड़ सकती थी।

Christophe Jaffrelot इसी तरह की प्रक्रिया को जाति की “ethnicisation” के रूप में analyse करते हैं। उनका point यह नहीं है कि कोई जाति literally ethnicity बन गई। उनका point यह है कि जाति identities modern राजनीति में larger, more bounded और politically self-conscious collectivities के रूप में shape होने लगीं। वे लिखते हैं कि lower-जाति identities की ethnicisation autochthony की ideologies, चुनावी राजनीति और positive भेदभाव जैसी public policies से प्रभावित हुई।

यहीं affirmative action और ethnicisation एक-दूसरे से जुड़ते हैं। मान लीजिए दस अलग-अलग जातियाँ हैं जिनकी local histories, rivalries और status claims अलग हैं। जब तक राज्य उन्हें अलग-अलग deal करता है, उनके लिए एक common umbrella पहचान बनाने का फायदा सीमित है। लेकिन जिस दिन राज्य कहता है कि किसी larger recognised श्रेणी को jobs, शिक्षा या प्रतिनिधित्व में tangible benefit मिलेगा, arithmetic बदल जाती है। पुरानी दुश्मनियाँ समाप्त नहीं होतीं; वे फिलहाल बैठक के बाहर चप्पलों के साथ उतार दी जाती हैं। अब श्रेणी केवल पहचान नहीं रहती, resource-bearing पहचान बन जाती है। संख्या राजनीतिक capital बनती है और श्रेणी में शामिल होने का incentive बढ़ता है।

यानी राज्य केवल पहचान को recognise नहीं करता; कई परिस्थितियों में उसकी policies पहचान को consolidate करने का incentive भी पैदा कर सकती हैं। फिर consolidated group association बनाता है, memorandum देता है, commission के सामने प्रतिनिधित्व माँगता है, अपनी इतिहास लिखता है, अपना साहित्य बनाता है और अपनी संख्या को राजनीतिक तर्क में बदलता है। State concession पहचान को मजबूत करता है, मजबूत पहचान आगे और concession माँगती है और अगला concession श्रेणी को और durable बनाता है। यह feedback loop है—सरकारी भाषा में ‘सामाजिक न्याय की निरंतर प्रक्रिया’ और चुनावी भाषा में ‘हिसाब अभी बाकी है।’

यहीं आंदोलन की शब्दावली भी evolve हुई। “Non-Brahmin” आखिर अपने आप में कैसी पहचान है? आप स्वयं को इस आधार पर define कर रहे हैं कि आप कोई दूसरा नहीं हैं। अलग-अलग जातियों, occupations, regions और सामाजिक status वाले लोगों को एक residual श्रेणी में डाल दिया गया। Gail Omvedt की Cultural Revolt in a Colonial Society की शुरुआत ही “Non-Brahman” और “Bahujan Samaj” की interpretations से होती है।

इसी debate में Tilak का polemical criticism महत्वपूर्ण है। Omvedt जिस conceptual problem की तरफ ध्यान दिलाती हैं, उसका सार यही था कि “non-Brahmin” इतनी negative और residual श्रेणी है कि Brahmin को हटाने के बाद बाकी हर तरह के लोग उसमें आ जाते हैं। Kesari वाले जिस प्रसंग का उल्लेख किया जाता है, उसमें Tilak ने इसी absurdity को मजाक में इतना आगे बढ़ाया कि non-Brahmin तो पेड़-पौधे और पशु-पक्षी भी हैं। Original Kesari issue मेरे सामने अभी नहीं है, इसलिए इसे exact archival quotation की तरह नहीं लिखा जाना चाहिए। लेकिन इसके तुरंत आसपास “Bahujan Samaj” जैसी ज्यादा affirmative शब्दावली का उभरना conceptually महत्वपूर्ण है। “Non-Brahmin” बताता है कि आप क्या नहीं हैं; “Bahujan” बताता है कि आप क्या होने का दावा कर रहे हैं—बहुसंख्यक। राजनीति में सर्वनाम बदलते-बदलते सरकार बदल सकती है।

यह केवल शब्द बदलना नहीं है। राजनीति में शब्दावली लोगों को संगठित करने का साधन होती है। सफल आंदोलन पहले यह तय करता है कि शिकायत का नाम क्या होगा, सामूहिक पहचान क्या होगी, विरोधी को किस भाषा में परिभाषित किया जाएगा और समाधान किस शब्दावली में माँगा जाएगा। जिस दिन आपकी भाषा लोगों की अपने बारे में समझ का हिस्सा बन जाती है, उसी दिन संगठन का आधा काम आसान हो चुका होता है। बाकी आधे के लिए कार्यकर्ता चाहिए; आजकल उनकी जगह followers की संख्या रख दी जाती है, क्योंकि दोनों को गिनना संभव है और फर्क समझना कठिन।

यही वह बात है जिसे हमारे वीर योद्धाओं को सबसे पहले समझने की आवश्यकता है—आधुनिक राष्ट्र-राज्य भावनाओं से नहीं, औपचारिकताओं से चलता है। संविधान, कानून, अधिसूचना, नियमावली, आयोग, श्रेणी, आँकड़ा, याचिका और लिखित परिभाषा—ये सजावटी चीजें नहीं हैं। राज्य उसी समस्या को देख पाता है जिसका कोई औपचारिक नाम हो; उसी समूह से बात करता है जिसकी कोई मान्य श्रेणी हो; और उसी माँग पर विचार करता है जो नारे से निकलकर प्रस्ताव, आँकड़े और कानूनी भाषा में उसके सामने पहुँचे। आधुनिक शासन में जिस शिकायत का कोई दस्तावेज नहीं, वह प्रायः शिकायत कम और वातावरण में उपस्थित कंपन अधिक मानी जाती है। सरकारें कंपन नापने के लिए भूकम्प विभाग रखती हैं, Twitter Space विभाग नहीं।

इसीलिए औपचारिकता को कायरता, समझौता या बाबूगिरी समझना भारी भूल है। कोई भी ढाँचा खड़ा हुआ है तो इसलिए कि किसी ने विचार को शब्द दिया, शब्द को परिभाषा दी, परिभाषा को श्रेणी बनाया, श्रेणी को संगठन दिया और संगठन को कानून या संस्था में बदलने का धैर्य रखा। संविधान को एक क्षण के लिए छोड़ भी दीजिए। स्वयं को हिंदुत्व, भारतीयता और राष्ट्रवाद का रक्षक मानने वाले लोग अपने शास्त्रों को ही देख लें। सूत्र क्यों रचे गए? भाष्य क्यों लिखे गए? परम्पराएँ क्यों व्यवस्थित की गईं? सिद्धान्तों के पूर्वपक्ष और उत्तरपक्ष क्यों बनाए गए? इसलिए कि केवल अनुभूति से परम्परा नहीं चलती; उसे शब्द, क्रम, व्याख्या और मान्य पद्धति चाहिए। ऋषियों ने भी यह मानकर काम नहीं चलाया कि सत्य मेरे हृदय में है, बाकी लोग मेरी timeline देख लें।

और यदि संविधान तथा आधुनिक राज्य की औपचारिकताएँ फिर भी अत्यधिक पश्चिमी और नीरस लगें तो हमारे योद्धा भर्तृहरि को पढ़ सकते हैं। उनके भाषा-दर्शन और स्फोट के सिद्धान्त का सरलीकृत संकेत यह है कि अर्थ केवल अलग-अलग अक्षरों की खड़खड़ाहट से पैदा नहीं होता; पूरा शब्द या वाक्य चेतना में अर्थ को प्रकट करता है। इसे यह कहकर अतिशयोक्तिपूर्ण ढंग से नहीं लिखना चाहिए कि शब्द के बिना भौतिक वस्तु का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है। अधिक सटीक बात यह है कि मनुष्य की समझ और सामाजिक व्यवहार में किसी वस्तु, विचार या श्रेणी की अर्थपूर्ण उपस्थिति भाषा के बिना सम्भव नहीं होती। जिसका नाम नहीं, उसकी पहचान कठिन; जिसकी परिभाषा नहीं, उसकी सीमा अस्पष्ट; और जिसकी वैधानिक भाषा नहीं, आधुनिक राज्य के सामने उसका दावा लगभग अदृश्य।

यहाँ व्यंग्य यह है कि जो लोग स्वयं को भारतीय बौद्धिक परम्परा का स्वाभाविक उत्तराधिकारी मानते हैं, उनमें से कुछ शब्द, परिभाषा, तर्क-पद्धति और औपचारिक संरचना को ही बेकार समझते हैं। उन्हें लगता है कि भावना जितनी प्रबल होगी, संस्था उतनी जल्दी खड़ी हो जाएगी। जबकि हमारे शास्त्रों की परम्परा ठीक उलटा पाठ पढ़ाती है—विचार को टिकाऊ बनाना है तो उसे सूत्रबद्ध कीजिए, परिभाषित कीजिए, उस पर भाष्य लिखिए, आपत्तियों का उत्तर दीजिए और अगली पीढ़ी के लिए व्यवस्थित रूप में छोड़िए। केवल क्रोध उत्तराधिकार में नहीं दिया जा सकता; अधिक-से-अधिक उसकी recording भेजी जा सकती है।

इसलिए लगभग दो सदियों में खड़े हुए इस ढाँचे को tweet और hashtag से धक्का देकर गिराने की कल्पना वैसी ही है जैसे कोई व्यक्ति नगर निगम के नक्शे को देखकर बुलडोजर की आवाज निकालने लगे और माने कि अतिक्रमण हट गया। सामने वाले ने अपनी भाषा बनाई, अपना इतिहास लिखा, श्रेणियाँ बनवाईं, आँकड़े जुटाए, आयोगों के सामने ज्ञापन दिए, कानूनों में जगह बनाई, विश्वविद्यालयों में विभाग और chairs खड़े किए तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं तक अपनी शब्दावली पहुँचा दी। आप उसके निष्कर्षों से असहमत हो सकते हैं, लेकिन उसकी औपचारिक मेहनत को अनदेखा करके उसे हरा नहीं सकते।

और इस लड़ाई की एक सामाजिक विडम्बना भी है। जिस समाज ने शिक्षा को मुख्यतः engineering और medical की दो टिकट-खिड़कियों में बाँध रखा हो, उसे अचानक पता चल रहा है कि इतिहास, समाजशास्त्र, कानून, राजनीति-विज्ञान, दर्शन, भाषा-विज्ञान, अभिलेखागार और जननीति भी सत्ता बनाते हैं। दशकों तक बच्चों से कहा गया कि इतिहास पढ़कर क्या करोगे, वकील बनकर मुकदमे लड़ोगे क्या, और humanities तो वे लेते हैं जिनसे science नहीं होती। अब वही समाज पूछ रहा है कि universities, courts, commissions, publishing houses और अंतरराष्ट्रीय forums में हमारी बात कौन रखेगा। भाई, जिन्हें वहाँ भेजना था, उन्हें तो आपने coaching में बैठाकर JEE का तीसरा attempt दिलवा दिया।

इसलिए GC Warriors को केवल कुछ बातें सीखनी नहीं, बहुत कुछ unlearn भी करना पड़ेगा। यह भ्रम छोड़ना पड़ेगा कि आर्थिक सफलता अपने आप वैचारिक क्षमता पैदा करती है; कि सोशल मीडिया पर लोकप्रियता संगठन का प्रमाण है; कि कानून को पढ़े बिना उस पर क्रोध करना कानूनी रणनीति है; और कि humanities पर हँसने वाला समाज इतिहास की व्याख्या पर अपना अधिकार बचाए रख सकता है। आधुनिक भारतीय राज्य कैसे काम करता है, इसकी बुनियादी समझ के बिना उसके किसी हिस्से को बदलने निकला योद्धा वैसा ही है जैसे कोई आदमी operation theatre में तलवार लेकर घुस जाए और surgeon से कहे—आप हटिए, काटना मुझे भी आता है।

फिर Madras Presidency देखिए। यहाँ सवाल और व्यावहारिक हो गया। Government services में कौन है, शिक्षा में कौन है, bureaucracy में प्रतिनिधित्व किसकी है और नए representative institutions में किसकी कितनी हिस्सेदारी होनी चाहिए—ये केंद्रीय राजनीतिक questions बन गए। Justice Party इसी environment से निकली। फिर Self-Respect Movement आया, Periyar आए, Dravidian पहचान ने नई ideological और cultural shape ली, Justice Party Dravidar Kazhagam में बदली और आगे DMK जैसी चुनावी formations निकलीं। 1916 के organised non-Brahmin राजनीति से 1967 की DMK government तक लगभग आधी सदी लगी। कोई सुबह उठा, दस tweet किए और शाम तक Madras की सत्ता नहीं ले आया था। Newspapers चले, associations बने, cadre खड़ा हुआ, elections लड़े गए, defeats आईं, alliances बने और संगठन फिर भी चलता रहा। उस समय हार के बाद लोग ‘यह देश रहने लायक नहीं रहा’ लिखकर अगले trending विषय पर नहीं चले जाते थे।

उत्तर भारत की trajectory अलग रही। यहाँ “Non-Brahmin” South और Maharashtra जैसा durable umbrella नहीं बना। पहले जाति associations, फिर backward-class organisations, Scheduled Castes और Scheduled Tribes जैसी संवैधानिक categories और बाद में OBC राजनीति ज्यादा consequential हुई। फिर socialist राजनीति ने इसे नई ideological और संगठनात्मक energy दी। Ram Manohar Lohia और उनके बाद के socialist currents ने “forward” और “backward” की language को mass राजनीति में महत्वपूर्ण जगह दी। Karpoori Thakur जैसे leaders ने quota और प्रतिनिधित्व को governance के स्तर पर translate किया। आगे Mandal ने उस प्रक्रिया को national राजनीतिक explosion में बदल दिया। हमें explosion 1990 में दिखाई देता है, लेकिन बारूद, बत्ती और गोदाम उससे बहुत पहले तैयार हो चुके थे। इतिहास की यही खराब आदत है—वह breaking news से पहले काम शुरू कर देता है।

और अगर आज के किसी self-declared GC warrior को आंदोलन खड़ा करने की प्रक्रिया सीखनी हो तो irony यह है कि उसे Kanshi Ram को ध्यान से पढ़ना चाहिए। उनकी विचारधारा मानने के लिए नहीं, उनकी कार्यपद्धति समझने के लिए। Kanshi Ram ने BSP से शुरुआत नहीं की। पहले educated employees का network बनाया, BAMCEF खड़ा किया, ऐसे लोगों को जोड़ा जिनके पास शिक्षा, regular income, bureaucracy की understanding और संगठनात्मक capacity थी। इसके बाद DS4 के जरिए mass mobilisation हुई और फिर BSP बनी। यानी चुनावी vehicle से पहले human infrastructure बना। हमारे यहाँ वाहन पहले खरीद लिया जाता है, driver बाद में खोजा जाता है और petrol के विषय में सरकार को tag कर दिया जाता है।

Kanshi Ram की कहानी में एक दूसरी चीज भी है जिसे विचारधारा से अलग करके समझना चाहिए—समर्पण। कांशीराम को व्यक्तिगत रूप से जानने वाले एक व्यक्ति ने मुझे कभी बताया था कि कांशीराम ने जीवन भर प्याज-रोटी ही खाई। इस anecdote को independently verified biographical fact की तरह नहीं, उनके जीवन की broader तस्वीर के संदर्भ में ही रखना चाहिए—सादा जीवन, marriage और family life से दूरी और अपने राजनीतिक mission को decades देना। मैं यहाँ यह फैसला नहीं कर रहा कि उनका राजनीतिक project सही था या गलत। सवाल केवल इतना है कि अपने cause के लिए उस स्तर का समर्पण आज के कितने rage-baiters में दिखाई देता है? प्याज-रोटी तो दूर, कुछ लोगों का आंदोलन उस दिन स्थगित हो जाता है जिस दिन studio की cab समय पर न पहुँचे।

कौन अपनी comfortable life छोड़कर अगले बीस साल archive बनाएगा? कौन दस साल judgments compile करेगा? कौन ऐसे researchers को fund करेगा जिनका नाम public शायद कभी न जाने? कौन institution बनाएगा जिसका असली फायदा उसे नहीं बल्कि अगली generation को मिले? यही जगह है जहाँ पुराने आंदोलन खड़ा करने की प्रक्रिया और आज के सामाजिक-media सक्रियता का difference सबसे साफ दिखाई देता है। पुराने लोग आंदोलन के लिए अपनी जिंदगी लगा देते थे। नए लोग पहले bio में ‘activist’ लगाते हैं और फिर देखते हैं कि आंदोलन कौन-सा सुविधाजनक रहेगा।

लेकिन कहानी यहाँ भी खत्म नहीं होती। जिस तंत्र को आज challenge करने की बात की जा रही है, उसने domestic राजनीति से आगे अंतरराष्ट्रीय institutions और academia में भी जगह बनाई है। क्या आज के self-declared GC warriors को सच में अंदाजा है कि जाति, Ambedkar, Dalit studies, भेदभाव और सामाजिक justice पर कितनी संस्थागत machinery खड़ी हो चुकी है? केवल भारत सरकार के Dr. Ambedkar Foundation को देखिए। उसकी मौजूदा list में 25 universities और institutions में मौजूदा Chairs के साथ 2025 में तीन और institutions के साथ MoU दर्ज हैं—यानी कम-से-कम 28 institutions का औपचारिक chair network दिखाई देता है।

इन Chairs का मतलब केवल Ambedkar Jayanti पर एक lecture कर देना नहीं है। Foundation scheme शोध outputs, अकादमिक activities और संस्थागत work को explicitly support करती है। और यह India तक सीमित भी नहीं है। Columbia Law School में Government of India ने Dr. B.R. Ambedkar Chair in Indian Constitutional Law स्थापित की। Columbia आज उसी chair से आगे B.R. Ambedkar Program in Global Constitutionalism चला रहा है, Ambedkar Law Lectures कराता है और full-time faculty position भी मौजूद है। इधर हमारे योद्धा की अकादमिक infrastructure पर पहली बैठक Space में हुई है; दूसरी बैठक इसलिए टल गई क्योंकि co-host का account suspend हो गया।

अब इसे उस चीज से जोड़िए जिसे polemical language में लोग “atrocity साहित्य” कहते हैं। Academia में उसे उस नाम से नहीं लिखा जाता। वहाँ headings होती हैं—जाति भेदभाव, untouchability, जाति violence, सामाजिक exclusion, structural inequality, work-and-descent भेदभाव, human rights, affirmative action, marginalisation। और यहाँ distinction समझना जरूरी है। इस साहित्य में दर्ज भेदभाव और violence पर वास्तविक तथ्याधारित शोध-साहित्य भी है; इसलिए केवल “atrocity साहित्य” बोलकर पूरे corpus को fabricated मान लेना उतना ही intellectually lazy होगा जितना हर activist claim को बिना scrutiny सच मान लेना। हर किताब को conspiracy कह देने से bibliography छोटी नहीं होती; केवल आपकी reading list छोटी हो जाती है।

लेकिन आंदोलन खड़ा करने की प्रक्रिया के दृष्टि से तरीका समझिए। जिस claim को सामाजिक media पर सौ बार लिखने से भी स्थायित्व नहीं मिलता, उसे जब PhD thesis, peer-reviewed paper, शोध grant, university centre, named chair, conference, syllabus और citation chain मिल जाती है, तो वह durable वैचारिक infrastructure बन जाता है। अगली generation को तर्क zero से नहीं बनाना पड़ता। उसे bibliography तैयार मिलती है। उसी bibliography से journalism निकलता है, NGOs reports बनाते हैं, lawyers submissions तैयार करते हैं और policymakers frameworks borrow करते हैं। विचार जब संस्था बन जाता है तो उसे रोज सुबह motivation की आवश्यकता नहीं रहती। वह payroll पर चलने लगता है।

क्या इसे challenge करने वालों ने इसका पैमाना समझा है? सामने केवल कोई angry Twitter account नहीं है। सामने journals हैं, departments हैं, named chairs हैं, doctoral researchers हैं, lawyers हैं, NGOs हैं, अंतरराष्ट्रीय conferences हैं और decades की accumulated bibliography है। अगर आपको इस शोध-साहित्य के किसी हिस्से से disagreement है तो “propaganda” लिखकर reply कर देने से bibliography disappear नहीं होती। आपको better archive, better data, better historiography, better कानूनी शोध-साहित्य और better तथ्याधारित work देना पड़ेगा। ‘Expose soon’ शोध कार्यपद्धति की मान्य श्रेणी नहीं है।

और फिर internationalisation देखिए। 2001 का Durban World Conference Dalit advocacy के लिए इतना महत्वपूर्ण था कि NCDHR की अपनी documentation उसे “watershed event” कहती है। उसके बाद जाति भेदभाव को “भेदभाव based on work and descent” जैसे अंतरराष्ट्रीय human-rights frameworks में ज्यादा systematically place किया गया। NCDHR के later annual reports अंतरराष्ट्रीय advocacy को openly describe करते हैं, जिसमें Asia Dalit Rights Forum, International Dalit Solidarity Network और multi-country parliamentarian networks के जरिए New York और दूसरे वैश्विक forums में work-and-descent भेदभाव को उठाना शामिल है।

International Dalit Solidarity Network की latest annual reporting में UN Human Rights Council events, UN Forum on Minority Issues, OECD engagement, European Union advocacy, business-and-human-rights frameworks और वैश्विक supply chains तक जाति question ले जाने का काम दर्ज है। 2024 की report में UN submissions, EU officials के साथ engagement और EU corporate sustainability ढाँचा में जाति-related language पर advocacy दर्ज है। 2025–26 में Dalit activists की Brussels advocacy missions, UN CEDAW engagement और EU रणनीति on जाति जैसी proposals तक reporting पहुँचती है।

इसका मतलब यह नहीं कि दुनिया भर के सारे academics, NGOs, churches, universities और UN officials एक centrally controlled conspiracy में काम कर रहे हैं। ऐसा claim evidence से बड़ा होगा। conspiracy की खूबी यही है कि उससे शोध का खर्च बच जाता है—जो तथ्य मिले वह प्रमाण, जो न मिले वह secrecy। लेकिन संगठनात्मक achievement को deny करना भी उतना ही absurd होगा। एक domestic जाति आंदोलन के कई strands ने समय के साथ अंतरराष्ट्रीय शब्दावली, professional advocacy, UN access, EU engagement, अकादमिक शोध, solidarity networks और नीति expertise acquire की है।

यानी आंदोलन की यात्रा कुछ ऐसी रही है—पहले इतिहास की interpretation, फिर शब्दावली, फिर संगठन, फिर patronage, फिर राज्य प्रतिनिधित्व, फिर quotas और कानूनी architecture, फिर राजनीतिक parties, फिर academia और NGOs, और उसके बाद अंतरराष्ट्रीय human-rights institutions तक संस्थागत presence। यही कारण है कि कोई आंदोलन किसी एक leader या election पर depend नहीं रहता। वह multiple institutions में reproduce होने लगता है। नेता retire हो सकता है, grant cycle नहीं; पार्टी हार सकती है, syllabus अगले semester फिर पढ़ाया जाएगा।

अब दूसरी तरफ आज के rage-bait सक्रियता को रखिए। यहाँ कई जगह cause से relevance पैदा होने के बजाय relevance के लिए cause इस्तेमाल होने लगता है। जिस व्यक्ति को पहले बहुत कम लोग जानते थे, सक्रियता शुरू हुआ और अब उसे mainstream television debates में बुलाया जाने लगा, बड़े politicians के साथ photographs मिलने लगीं, party functionaries से परिचय बढ़ा, followers बढ़े और धीरे-धीरे visibility स्वयं में achievement लगने लगी। हर activist fame के लिए काम कर रहा है, ऐसा कहना गलत होगा। लेकिन incentive structure को ignore करना भी भोला होगा। देश में त्याग की कमी नहीं है; लोग cause के लिए सब कुछ त्याग सकते हैं, बशर्ते camera ठीक कोण पर लगा हो।

अगर sober, carefully researched तर्क पर सात सौ likes आते हैं और rage-filled post पर सत्तर हजार, तो algorithm धीरे-धीरे बता देता है कि market क्या खरीद रहा है। वह गुरु की तरह समझाता नहीं, दुकानदार की तरह हिसाब दिखाता है। फिर सक्रियता और personal brand के बीच की boundary धुंधली होने लगती है। किसी बड़े नेता के साथ photograph हो गई, television debate में chair मिल गई या किसी party president ने दो मिनट बात कर ली तो व्यक्ति को लगता है आंदोलन आगे बढ़ गया। जबकि photograph संगठन नहीं होती, television appearance cadre नहीं होता और followers institution नहीं होते। photograph से अधिक-से-अधिक यह सिद्ध होता है कि दो मनुष्य किसी क्षण एक ही कमरे में थे।

असली आंदोलन वहाँ बनता है जहाँ कोई anonymous researcher पाँच साल data collect कर रहा है, कोई lawyer सौ judgments annotate कर रहा है, कोई donor quietly scholarships चला रहा है और कोई editor ऐसी किताब publish कर रहा है जिसे दस साल बाद लोग reference text की तरह इस्तेमाल करेंगे। ये सभी लोग दुर्भाग्य से prime-time debate के लिए अनुपयुक्त होते हैं, क्योंकि वे सवाल सुनने के बाद उत्तर देने से पहले सोचते हैं।

यहीं सबसे बड़ा नुकसान होता है और नुकसान केवल image का नहीं होता। नुकसान न्याय का होता है, सही तर्क का होता है और वास्तविक शिकायत का होता है। मान लीजिए किसी law में सचमुच गंभीर flaw है। आपके पास संवैधानिक तर्क है, तथ्याधारित data है और workable सुधार proposal भी है। लेकिन public face उस rage account को बना दिया गया जो हर तीसरे tweet में किसी community को गाली देता है और हर दूसरे दिन apocalypse announce करता है। अब neutral observer आपका अस्सी page का paper नहीं पढ़ेगा। वह आपके दस सबसे खराब screenshots देखेगा। आपके opponent को substantive तर्क का जवाब देने की भी जरूरत नहीं पड़ेगी। वह screenshots दिखाकर कह देगा—ये है इनका आंदोलन। आपने शोध की होगी; publicity department ने उसका अंतिम संस्कार कर दिया।

यही rage bait की सबसे बड़ी कीमत है। वह विरोधी से ज्यादा अपने ही वास्तविक issue की credibility खाता है। एक न्यायसंगत शिकायत जो sober तर्क, data और कानूनी work के जरिए धीरे-धीरे mainstream legitimacy बना सकती थी, सामाजिक-media circus में caricature बन जाती है। फिर शिकायत होती है कि हमें गंभीर क्यों नहीं लिया जा रहा। इसका उत्तर भी प्रायः उसी live stream में दिया जाता है जिसमें पीछे भड़कती हुई आग का graphic लगा होता है। Serious issue को गंभीर तरीके से प्रस्तुत करना भी आपकी जिम्मेदारी है।

Social media ने आंदोलन खड़ा करने की प्रक्रिया की psychology उलट दी है। असली आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण काम boring होता है। तीन सौ pages की report पढ़नी पड़ती है, Supreme Court और High Courts के सैकड़ों judgments निकालने पड़ते हैं, district-wise data collect करना पड़ता है, reservation benefits के distribution का longitudinal dataset बनाना पड़ता है और SC/ST Act पर केवल एक conviction-rate screenshot से conclusion नहीं निकाला जा सकता। Acquittal, pendency, investigation quality, hostile witnesses, procedural failures और alleged misuse—सबको अलग-अलग study करना पड़ेगा। किसी UGC regulation से objection है तो उसका पूरा text पढ़ना होगा, previous drafts compare करने होंगे, संवैधानिक position समझनी होगी और फिर alternative language draft करनी होगी। दुर्भाग्य से कानून में ‘बहुत हो गया’ नाम की कोई धारा नहीं होती।

Young lawyers तैयार करने होंगे, researchers fund करने होंगे, journals बनाने होंगे, archives खड़े करने होंगे, scholarships देनी होंगी और think tanks बनाने होंगे। यह सब boring काम है। Twitter Space में applause नहीं मिलेगा, mainstream channel का phone नहीं आएगा और किसी बड़े नेता के साथ photograph भी नहीं मिलेगी। लेकिन बीस साल बाद वही boring PDF किसी Supreme Court petition का annexure बन सकती है, वही dataset Parliamentary Committee में quote हो सकता है और वही student professor बनकर पूरा वैचारिक तंत्र तैयार कर सकता है। आंदोलन में PDF का वही स्थान है जो खेती में खाद का—गंध आकर्षक नहीं होती, पर फसल उसी से आती है।

और यहाँ पैमाना का difference समझिए। एक तरफ लोग Geneva में UN bodies के सामने submissions दे रहे हैं, Brussels में EU officials से मिल रहे हैं, Columbia में endowed chair चला रहे हैं, India की universities में Ambedkar Chairs चला रहे हैं, doctoral साहित्य बना रहे हैं और वैश्विक human-rights शब्दावली shape कर रहे हैं। दूसरी तरफ आप Twitter पर किसी minister को tag करके लिख रहे हैं कि इस बार सबक सिखाएँगे। Minister ने notification बंद कर रखा है। Competition बराबर कैसे होगा?

फिर एक और layer आती है—manipulation की। फिल्म दस में villain SIT chief को समझाता है कि तबला किसी देश में बजता है, harmonium किसी दूसरे देश में, बाँसुरी किसी तीसरे में और singer कहीं चौथे में होता है; तब जाकर bomb blast नाम का orchestra तैयार होता है। Social-media राजनीति में हर चीज उतनी cinematic या centrally coordinated नहीं होती, लेकिन analogy useful है। आपकी timeline पर दिखने वाला एक narrative अलग-अलग incentives से बन सकता है। कहीं वास्तविक आक्रोश है, कहीं ideological campaigning है, कहीं party राजनीति है, कहीं personal ambition, कहीं media amplification और कहीं algorithmic reward। अलग-अलग लोग अलग-अलग instrument बजा सकते हैं और अंत में आपके सामने एक ऐसी coherent धुन बन सकती है जिसे आप spontaneous public mood समझ लेते हैं। श्रोता को यह जानने की फुर्सत नहीं रहती कि orchestra किसने बुलाया; वह टिकट खरीद चुका होता है।

इसलिए सबसे पहले स्वयं को manipulate होने से बचाना जरूरी है। Manipulation का मतलब यह नहीं कि कोई secret room में बैठकर हर tweet लिख रहा है। कई बार manipulation decentralised होती है। एक rage account जानता है कि आक्रोश बिकता है, television जानता है कि conflict attention देता है, राजनीतिक तंत्र जानता है कि emotional voter नीति document से ज्यादा आसानी से mobilise होता है और algorithm जानता है कि outrage engagement पैदा करता है। किसी एक conductor की जरूरत नहीं होती। हर वादक अपनी धुन को मुख्य राग समझकर बजाता रहता है और orchestra अपने आप तैयार हो जाता है।

यहीं “सरकार को सबक सिखाओ” वाली राजनीति को बहुत सावधानी से देखना चाहिए। अगर किसी voter का मूल concern जाति-based नीति, reservation ढाँचा या SC/ST legislation है, तो केवल incumbent के खिलाफ आक्रोश पर्याप्त information नहीं है। Competing parties की actual नीति positions पढ़नी चाहिए। उदाहरण के लिए Congress के 2024 manifesto में nationwide socio-economic जाति census और SC-ST-OBC reservations की 50 per cent ceiling हटाने के लिए संवैधानिक amendment की commitment explicitly दर्ज थी।

इसलिए जो व्यक्ति affirmative-action architecture को सीमित या सुधार करना चाहता है, उसके लिए यह बुनियादी requirement है कि वह सभी parties के दर्ज नीति programmes compare करे। यह किसी को किसे vote देना चाहिए, इसका निर्देश नहीं है; राजनीतिक choice हर voter की अपनी है। लेकिन “फलाँ को सबक सिखाना है” और “मेरी preferred नीति किस programme से आगे या पीछे जाएगी”—ये दो अलग questions हैं। पहले का answer आक्रोश दे सकता है, दूसरे का answer manifesto, legislation और governance record पढ़कर मिलता है। Manifesto पढ़ने में कठिनाई यह है कि उसमें background music नहीं होता और हर तीसरे वाक्य के बाद ‘चौंकाने वाला खुलासा’ नहीं लिखा रहता।

यही manipulation का सबसे effective रूप हो सकता है। कोई आपके सामने आकर यह नहीं कहता कि मैं आपको manipulate कर रहा हूँ। आपको ऐसा feel कराया जाता है कि reaction अभी और इसी क्षण देना moral duty है। Policy comparison की जगह emotional urgency आ जाती है। आप समझते हैं कि आपने स्वतंत्र फैसला लिया है, जबकि हो सकता है आपकी attention पहले ही narrow हो चुकी हो। इसलिए चुनावी revenge को रणनीति समझने से पहले यह देखना जरूरी है कि जिस alternative को punishment समझा जा रहा है उसकी दर्ज नीति direction आपकी own नीति preference से मेल खाती है या नहीं। कहीं ऐसा न हो कि आप किसी को थप्पड़ मारने के उत्साह में अपना ही चश्मा तोड़ आएँ और लौटकर इसे ऐतिहासिक विजय घोषित कर दें।

फिर algorithm को आंदोलन समझने की mistake आती है। Algorithm रोज नया outrage चाहता है, आंदोलन दस साल एक ही issue पर काम माँगता है। Algorithm maximal language reward करता है, नीति work precision माँगता है। Algorithm चाहता है कि हर घटना existential crisis लगे, researcher पूछता है कि Section 18 में exact कौन से शब्द बदलने हैं। Algorithm कहता है सब खत्म हो गया, researcher कहता है evidence अभी incomplete है। पहला sentence लाखों impressions ला सकता है, दूसरा sentence law बदलने के ज्यादा काम आ सकता है। लेकिन दूसरे वाक्य में thumbnail की संभावनाएँ सीमित हैं।

इसीलिए जिस राजनीतिक tradition से आप पूरी तरह disagree करते हों, उससे भी आंदोलन खड़ा करने की प्रक्रिया सीखने में कोई नुकसान नहीं है। Phule से साहित्य का महत्व समझिए, Shahu और Mysore से संस्थागत patronage समझिए, औपनिवेशिक classification और Jaffrelot की ethnicisation thesis से श्रेणी-building के incentives समझिए, South Indian non-Brahmin राजनीति से संगठन और patience समझिए, North Indian socialist-backward राजनीति से decades-long networking समझिए, Kanshi Ram से cadre-building और personal समर्पण समझिए और अंतरराष्ट्रीय Dalit advocacy networks से यह समझिए कि mature आंदोलन अपनी लड़ाई को local शिकायत से वैश्विक संस्थागत language तक कैसे ले जाता है। इन सबकी विचारधारा आपको स्वीकार करनी जरूरी नहीं है। लेकिन यह deny करना कठिन है कि उन्होंने homework किया। परीक्षा में उनसे असहमति रखने वाला विद्यार्थी उत्तर-पुस्तिका खाली छोड़कर examiner की विचारधारा पर प्रश्न उठा रहा है।

हमारे यहाँ आंदोलन का construction plan कुछ वैसा हो गया है जिसमें पहले inauguration की तारीख तय कर दी जाती है, chief guest का poster छप जाता है, plaque पर संस्थापक का नाम खुद जाता है और उसके बाद पूछा जाता है कि plot कहाँ है। यदि कोई plot का प्रश्न उठा दे तो उसे निराशावादी घोषित कर दिया जाता है। क्रांति जैसे पवित्र काम में जमीन-जायदाद की बातें करना आखिर छोटी मानसिकता का लक्षण है।

आज के GC सक्रियता की सबसे बड़ी कमजोरी शायद यही है कि बहुत से लोग सीधे final चरण पर पहुँचना चाहते हैं। State हमें सुने, राजनीतिक parties हमसे डरें, law बदले और election में हमारी ताकत दिखाई दे—लेकिन उससे पहले शिकायत का definitive वैचारिक articulation कहाँ है? Serious books कहाँ हैं? Research centres कहाँ हैं? Law journals कहाँ हैं? Data archives कहाँ हैं? Legal defence networks कहाँ हैं? Scholarships और fellowships कहाँ हैं? Young academics और lawyers की pipeline कहाँ है? International-quality शोध network कहाँ है? Twenty-year रणनीति कहाँ है?

इन सवालों के उत्तर में प्रायः बताया जाता है कि ‘काम चल रहा है।’ हमारे सार्वजनिक जीवन में यह वाक्य पुल, नाली, पार्टी, आंदोलन और राष्ट्रीय पुनर्जागरण—सभी पर समान रूप से लागू होता है। काम कहाँ चल रहा है, कौन कर रहा है और कब पूरा होगा, यह पूछना काम में बाधा डालना माना जाता है।

हर आंदोलन को पहले famous face नहीं चाहिए होता। उसे हजार ऐसे लोग चाहिए होते हैं जिन्हें शायद public कभी न जाने—एक researcher, एक lawyer, एक statistician, एक editor, एक organiser, एक donor, एक professor और एक archivist। ऐसे लोग मिलकर वैचारिक और संस्थागत machinery बनाते हैं। उसके बाद राजनीतिक power आती है। अगर शुरुआती दस stages skip करके सीधे final चरण perform करेंगे तो शायद visibility मिल जाए, आंदोलन नहीं। बारात में घोड़ी, बैंड और drone camera आ जाएगा; केवल दूल्हा और विवाह का कारण बाद में तय होगा।

अगर शिकायत न्यायसंगत है तो उसे सबसे पहले rage merchants से बचाना चाहिए। Injustice के खिलाफ लड़ाई में सबसे बड़ी tragedy यह नहीं है कि आपका opponent आपकी बात नहीं मानता। उससे बड़ी tragedy यह है कि आपके पास सही तर्क हो और आपके self-appointed champions उसे इतनी खराब तरह से पेश करें कि सही बात भी गलत दिखाई देने लगे। Genuine issue को कई बार उसके opponents से ज्यादा उसके सबसे loud supporters चौपट कर देते हैं। वे cause की रक्षा उसी उत्साह से करते हैं जिससे गाँव का चौकीदार चोर पकड़ने के लिए पहले घरवालों को पीट दे।

और शायद पूरी बात यहीं आकर सरल हो जाती है। जिस पेड़ को आज आप सामने खड़ा देख रहे हैं, उसकी जड़ें डेढ़ सौ साल पुरानी हैं। उसमें साहित्य है, शब्दावली है, औपनिवेशिक classification है, affirmative-action incentives हैं, जाति associations हैं, princely patrons हैं, राजनीतिक parties हैं, socialists हैं, lawyers हैं, universities हैं, Ambedkar Chairs हैं, NGOs हैं, अंतरराष्ट्रीय advocacy networks हैं, UN submissions हैं, EU engagement है और generations का संगठनात्मक labour है। आप उसकी विचारधारा reject कर सकते हैं, उसकी इतिहास challenge कर सकते हैं, उसके नीति outcomes का critique कर सकते हैं और उसके शोध-साहित्य से disagree कर सकते हैं। लेकिन उसे challenge करने से पहले कम-से-कम यह समझना पड़ेगा कि उसकी जड़ें कितनी गहरी हैं। पेड़ को गाली देने से उसकी botanical structure पर कोई असर नहीं पड़ता।

सामने वाला डेढ़ सौ साल से जमीन जोत रहा है। उसने बीज चुना, खेत तैयार किया, पानी दिया, खाद डाली, अगली पीढ़ी को खेती सिखाई और धीरे-धीरे अपनी पूरी कृषि व्यवस्था बना ली। आपको आज उसकी फसल दिखाई दे रही है। आपने अभी खेत की मिट्टी हाथ में लेकर देखी भी नहीं है, लेकिन दराँती कंधे पर रखकर पूछ रहे हैं—कटाई किस तारीख को रखी जाए?

भाई, पहले बोना तो शुरू कीजिए। और यदि संभव हो तो बीज बोने से पहले यह भी देख लीजिए कि जिस जमीन पर खड़े हैं, वह खेत है या केवल आपकी timeline।

कौशलेश राय
कौशलेश राय
कौशलेश राय 'दि डोज़ियर' और 'द हिंदू कैफे' के संस्थापक हैं. वे एक साधारण हिंदू के रूप में लिखते हैं, जो उन रास्तों की तलाश में है जिनसे वह सभ्यता—जो सदियों के इस्लामिक और ईसाई आक्रमणों व विजय अभियानों को सहकर, चोटिल होने के बावजूद आज भी जीवित है—न केवल बनी रहे, बल्कि अपने खोए हुए आत्मविश्वास और प्राचीन वैभव को पुनः प्राप्त कर सके.