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समाजवाद सुनिश्चित करता है कि पेपर लीक कभी न रुकें

समाजवाद सुनिश्चित करता है कि पेपर लीक कभी न रुकें

मैंने 5-6 साल पहले एक किताब पढ़ी थी. उसमे ऑथर ने लिखा था कि आगे आने वाले वर्षों में भारत में कोई भी परीक्षा बिना पेपर लीक कराना लगभग असंभव हो जाएगा.

उसके पीछे उनका लॉजिक बड़ा सिंपल था. उनका कहना था कि नैतिकता कोई जेनेटिक नहीं है. माता-पिता, स्कूल, समाज बच्चे को नैतिक बनाते हैं. भारतीय समाज को समाजवाद ने पूरी तरह, बिल्कुल, भ्रष्ट कर दिया है. पिता को बच्चे नोटों की गड्डी के साथ घर आते देखते हैं.

सरकारी कॉलोनी में रह रहे सत्यनिष्ठ अधिकारी को उसका ही परिवार मूर्ख कहता है. उसकी बेटी देखती है कि पड़ोस के भ्रष्ट अधिकारी ने बेटी के लिए आईएएस दामाद ख़रीद लिया है, उसके स्वयं के विवाह के लाले पड़े है दहेज न होने के कारण. बच्चे स्कूल जाते हैं तो देखते हैं कि मास्टर जी कुछ पढ़ाते नहीं हैं, ट्यूशन पर आने को कहते हैं.

इंजीनियरिंग कॉलेज तक में तो अध्यापकों ने घर पर ट्यूशन पढ़ाना आरम्भ कर दिया है अपने छात्रों को. समाज में चारो ओर देखते है बच्चे कि बिना रिश्वत दिए ट्रैफिक सिग्नल पर खड़ा सिपाही नहीं मानता है. गैस सिलिंडर देने आया कर्मचारी “एक्स्ट्रा” कुछ माँगता है.

इस परिवेश में पला कोई बच्चा नैतिक होगा?

हम किसे … बना रहे है … ? किसे?

अमेरिका में आपने देखा होगा कि हर राष्ट्रपति के उम्मीदवार, सुप्रीम कोर्ट के जज के लिए चयनित व्यक्ति, के विरुद्ध उसकी कोई कॉलेज की सहपाठी ब्लात्कार का आरोप लेकर आ जाती है. मतलब साफ़ व्यक्ति मिलना असंभव हो चला है वहाँ. केवल भारत में ही नहीं, दुनिया भर में. पतन इतना शीघ्र होता है समाज का.

तो नीट या कोई भी परीक्षा कराने वाले कहाँ से लाए जाएँगे? इसी समाज से तो आयेंगे. मंगल ग्रह वालों से तो अभी संपर्क हुआ नहीं है.

साथ में फिर डिमांड सप्लाई का भी फैक्टर है. समाजवाद के कारण नौकरियां/करियर बहुत कम हैं. एक ही परीक्षा का परिणाम पूरे जीवन को बना/बिगाड़ सकता है. इसलिए पेपर की डिमांड बहुत अधिक है. लोग कुछ भी मूल्य देने को तैयार हैं.

इस परिवेश में लोग पूछते हैं कि पेपर लीक क्यों हो रहे हैं. एक व्यक्ति, केजरीवाल, आया था कि लोकपाल बना कर इस भ्रष्टाचार को समाप्त करेगा. किसी ने ये नहीं पूछा उससे कि आप लोकपाल को कौन से ग्रह से लाने वाले हैं. ये भी कह रहा था कि उसे मैग्सेसे अवार्ड मिला है, इसलिए उसके पास दिव्यदृष्टि है. सरकार बनी उसकी, एक मंत्री फर्जी डिग्री में पकड़ा गया, दूसरा राशन कार्ड के बदले महिलाओं का यौन शोषण करता पकड़ा गया. ये उसकी दिव्य दृष्टि थी.

इस भ्रष्टाचार, इस लीक हुए पेपर के लिए पागलपन भरी होड़ को समाप्त करने के एकमात्र उपाय — समाजवाद की समाप्ति — की बात करने का प्रयास करो, तो सत्ता में बैठे हर पक्ष के लोग ऐसे भड़कते हैं जैसे कोई घोर ईशनिंदा कर दी हो. मतलब समाजवाद को समाप्त करने पर तो बात ही नहीं हो सकती. वो तो स्थापित विज्ञान है.

तो सार यही है कि भारतीय समाज पिछहत्तर साल के समाजवाद के बाद पूरी तरह, बिल्कुल भ्रष्ट हो चुका है. इसी समाज से पेपर सेटर, पेपर ट्रांसपोर्टर, निरीक्षक आते है, उत्तर जाँच करने वाले आते है.

और इसी देश में ऐसे परीक्षाएँ है कि तुक्के से भी पास कर लो तो हजारों करोड़ रिश्वत में कमा सकते हो, नहीं तो सड़क पर घिसटने के लिए हवाई चप्पल तक खरीदने के लाले पड़े रहेंगे पूरा जीवन, क्यूंकि समाजवाद के कारण अन्य कोई आर्थिक गतिविधि संभव ही नहीं है. तो प्रलोभन भी है और कमजोर नैतिकता वाला पूरा अमला भी है.

पेपर लीक होते रहेंगे, लोगों के राजनीतिक करियर बनते रहेंगे, पेपर लीक रोकने के वादे करते रहेंगे.

लेकिन जब तक देश में समाजवाद है तब तक कुछ भी नहीं बदलेगा.

लीक लोकपाल बनाओगे तो वो भी रिश्वतखोरी की दुकान ही खोलेगा या, परीक्षा देने वाली लड़कियों का यौन शोषण करेगा.

ढोंग से मनुष्य मूर्ख बनते है, प्रकृति नहीं.

कौशलेश राय
कौशलेश राय
कौशलेश राय एक कल्चरल कमेंटेटर और द डोज़ियर के फाउंडर हैं.