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हम दो हमारे दो

भारत की बढ़ती जनसंख्या पर पश्चिम के लेखकों ने फैलाई भ्रांतियां

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भारत की बढ़ती जनसंख्या पर पश्चिम के लेखकों ने फैलाई भ्रांतियां

जिस समय देश और दुनिया में कोरोना महामारी चल रही थी उसी समय सोशल मीडिया पर इन्फ़र्नो मूवी की एक क्लिप वायरल हो रही थी जिसमें दिखाया गया था कि कैसे और कितनी तेज़ी से दुनिया की आबादी बढ़ती जा रही है और अगर इसे नहीं रोका गया तो बहुत सारी समस्याएं खड़ी हो जाएंगी. इसलिए इस बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए कुछ किया जाना चाहिए. इस फिल्म में ओवरपोप्यूलेशन का डर पैदा करने वाला बेरट्रैंड ज़ोबरिस्ट नाम का एक ट्रांसह्यूमनिस्ट इनफ़र्नो नामक एक वायरस बनाता है जिससे महामारी फैलेगी और काफ़ी बड़ी संख्या में लोग मर जाएंगे. और पॉपुलेशन कंट्रोल हो जाएगी.

यह फिल्म काफ़ी डरावनी और कन्विंसिंग थी. उसे देखकर एक बार को तो मुझे भी लगने लगा था कि इस बढ़ती जनसंख्या को रोकने के लिए कुछ तो किया जाना ही चाहिए. ओवरपोप्यूलेशन कहे या पॉपुलेशन एक्सप्लोजन, यह एक बहुत बड़ी समस्या है. अगर आप सड़क पर 100 लोगों से बढ़ती जनसंख्या के मुद्दे पर बात करेंगे तो सभी इसे एक समस्या की तरह ही देखते मिलेंगे. वास्तव में भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या ही बढ़ती हुई आबादी है ऐसा मानने वाले बहुत लोग होंगे. कई बड़े-बड़े बुद्धिजिवियों का मानना होगा कि भारत की बदहाली का सबसे बड़ा कारण समाजवाद ना होकर बेहताशा बढ़ती हुई जनसंख्या है.

भारत समेत दुनिया भर में सरकारें, एनजीओ, प्रशासन सभी पॉपुलेशन कंट्रोल करने के लिए कुछ ना कुछ योजनाएं बना रहे है, कार्यक्रम चला रहे है, रिसर्च पेपर लिखवा रहे है जिसमें पॉपुलेशन ग्रोथ को एक एक नेगेटिव चीज़ माना जाता है. बढ़ती हुई आबादी बेहतर भविष्य की राह में बाधा है. और इसे कैसे भी करके कंट्रोल किया जाना चाहिए.

लेकिन बढ़ती हुई जनसंख्या के बारे में इस तरह के विचार नेचुरल नहीं है. क्या आपने कभी सोचा है की ग्रोइंग पॉपुलेशन के लिए पॉपुलेशन एक्सप्लोजन जैसे नेगेटिव शब्दों का प्रयोग क्यों किया जाता है? वास्तव में इसके पीछे पिछले लगभग 100-200 साल का प्रोपेगंडा है जो 1960 के दशक तक आते-आते और मारक रूप ले चुका था. आज के इस डॉजियर में हम जानेंगे इसी पॉपुलेशन एक्सप्लोजन जैसी भ्रांति का सच. साथ ही बात करेंगे भारत में जनसंख्या नियंत्रण के इतिहास और इसी सबसे जुड़े एक अहम मुद्दे, डिलिमिटेशन की. जो 2026 में होना है जिसका अभी से विरोध भी शुरू हो गया है.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर पॉल एहरलिच ने 1968 में एक किताब लिखी जिसका नाम था ‘दि पोपुलेशन बॉम्ब’ जिसके कवरपेज पर लिखा हुआ था कि ‘जिस समय आप यह लाइनें पढ़ रहे होंगे तब तीन बच्चे भूख से मर रहे होंगे और 24 बच्चे पैदा हुए होंगे.’ यह किताब जब बाज़ार में आई तब चारों तरफ तहलका मचा गया. 1988 तक इसके 19 संस्करण छप चुके थे. और 20 लाख कॉपियां बिक चुकी थी. जो वर्तमान समय में भी बहुत कम किताबों की बिक पाती हैं.

इस किताब के लिखे जाने की भी कहानी बहुत दिलचस्प हैं. डॉ. पॉल अपने परिवार के साथ भारत आए हुए थे. शाम की सैर करने के बाद अपनी पत्नी और बेटी के साथ वापस अपने होटल जा रहे थे. रास्ते में इनकी टैक्सी जाम में फस गई. उस समय इन्होंने जाम में इतनी भीड़ देखी जितनी पहले कभी नहीं देखी थी. चारों तरफ इतनी भीड़ देखकर इनके पसीने छूटने लगे. इन्हें डर लगने लगा की ये जाम से निकल भी पाएंगे की नहीं. खैर जाम से निकलने के बाद वे सभी होटल पहुंचे. होटल पहुंचने के बाद भी इनके दिमाग से वह जाम और भीड़ निकल ही नहीं रहे थे. इन्हें लगा कि ये दिल्ली, कलकत्ता की भीड़ पूरी दुनिया के लिए ख़तरा हो सकती है और उन्होंने यह किताब लिख दी. अब आप अगर यह किताब पढ़ेंगे तो पॉल साहब की फियर मांगरिंग के दीवाने हो जाओगे. इन्फ़र्नो मूवी का पॉपुलेशन वाला सीन भी इसी से प्रेरित है. हालांकि, लेखक ने बढ़ती आबादी से होने वाली प्रलय को लेकर जितनी भी भविष्यवाणी की थी वे सभी ग़लत साबित हो चुकी हैं.

जैसे कि वे लिखते हैं कि 1 मिलियन साल पहले दुनिया की कुल आबादी 25 लाख के करीब थी. जो 8000 ईस्वी आते-आते 5 मिलियन हो गई. फिर इस पॉपुलेशन को 5 से 500 मिलियन पहुंचने में क़रीब 10 हज़ार साल लग गए. 1650एडी में दुनिया की आबादी 500 मिलियन हुई. यानी जनसंख्या डबल होने में लगभग 1000 साल लगे. और 1850 आते-आते यह आबादी 1 बिलियन के आस पास पहुंच गई. यानी मात्र 200 सालों में. और अगला डबल होने में इस जनसंख्या को मात्र 80 साल लगे और 1930 में यह आबादी 2 बिलियन हो चुकी थी. और जब यह किताब लिखी जा रही थी तब 4 बिलियन आबादी होने में थोड़े ही कम थे तो अनुमान लगाया की 2 बिलियन से 4 बिलियन होने में मात्र 35 साल लगे. यानी दुनिया की आबादी के डबल होने की स्पीड बढ़ती जा रही थी जैसे पहले दोगुना होने में 10 लाख साल लगे थे, फिर ये समय घट के 1000 साल हो गया, फिर और घटा और घट के 200 साल हो गया. फिर 80 साल में आबादी डबल हो गई और फिर दुनिया की कुल आबादी को दोगुना होने में मात्र 35 साल लगे.

इसी स्पीड और डेटा को आगे बढ़ाते हुए इन्होंने लिखा की अगर ऐसे ही आबादी बढ़ती रही तो 900 साल बाद दुनिया की आबादी 60 मिलियन बिलियन (60 लाख करोड़) होंगी. मैं जीवन में पहली बार इकाई दहाई सैकड़ा हज़ार दस हज़ार वाले मेथड से इतनी बड़ी गिनती कर रहा था. अच्छा यह इतनी बड़ी आबादी धरती पर कैसे रहेगी. यह बताते हुए उन्होंने आगे हाइपोथेटिकली बात लिखी कि पूरी धरती के साइज की एक 2000 फ्लोर की बिल्डिंग बनेगी उसी में इतनी बड़ी आबादी आ पाएगी. यानी इस धरती को 2000 से गुना कर दो तो इतनी जगह लगेगी. अब वो जगह कहां से लाओगे तो उसके लिए 2000 फ्लोर की ऊंची बिल्डिंग बनाओ. इससे ज़्यादा जनसंख्या नहीं बढ़ पाएगी क्योंकि इतने पर हीट लिमिट रीच कर जाएगी.

लेकिन डाक्टर पॉल इतने पर ही रुकने वाले नहीं थे. इन्होंने और ऊंची उड़ान भरी और लिखा की मानो साइंस ने तरक्की कर ली और चांद पर जीवन ढूंढ लिया और केवल पृथ्वी के ही चांद पर नहीं, मानो मरकरी, वीनस, मार्स, सैटर्न, जुपिटर के चांद पर भी रहोगे तो 50 साल में वहां भी जगह कम पड़ जाएगी, यह थ्योरी पॉल अहलरीच ने ब्रिटिश फिज़िसिस्ट जेएच फ्रेमलिन से उधार ली थी.

फ्रेमलिन का कहना था की अगर जनसंख्या को नहीं रोका गया तो केवल दूसरे प्लेनेट्स के चांद पर ही नहीं दूसरे प्लेनेट्स पर भी जगह कम पड़ जाएगी, करीबन ढाई सौ साल में हम सभी नौं ग्रहों और उनके चांद पर सोसाइटीज़ बना के जगह समाप्त कर चुके होंगे. यानी नौं स्पेस लेफ्ट वाली स्थिति हो जाएगी. इन्होंने यह सब अपनी किताब में लिखकर लोगों को डराने की कोशिश की. यही नहीं पॉल ने चार भविष्यवाणी भी की थीं. 

पहला थी, 1970 में मास स्टारवेशन होगा, करोड़ो लोग भुखमरी से मरने लगेंगे. जिसके कारण ग्लोबल डेथ रेट्स में उछाल देखने को मिलेगा. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ.

दूसरी, भारत की आबादी में 1980 तक 200 मिलियन लोग और बढ़ेंगे जिससे भुखमरी फैलेगी. लोगों को खाना नसीब नहीं होगा. लोग भूखे मरने लगेंगे जिसमें बच्चों की संख्या ज़्यादा होगी. जबकि हुआ क्या? भारत में जनसंख्या मुश्किल से तीन गुना बढ़ी और कुपोषण की दर तेज़ी से घटी.

तीसरी, भारत अनाज के मामले में बढ़ती हुई आबादी के कारण आत्म निर्भर नहीं हो पाएगा. जबकि भारत में लाखों टन अनाज तो सरकारी मंडियों में बारिश के कारण भीगकर सड़ जाता है. यानी भारत में इतना अनाज पैदा हो रहा है.

चौथा, 1985 आते-आते ग्लोबल ब्रेकडाउन होगा. इस फेक न्यूज़ को आज 55 साल साल बीत चुके है, लेकिन विश्व भर में भुखमरी की दर तेज़ी से घट रही है.

इसके अलावा भी उनकी जितनी भविष्यवाणी थीं सभी ग़लत साबित हो गई. लेकिन इस किताब को आधार बनाकर पॉपुलेशन ग्रोथ के विरोध में जो प्रोपेगंडा शुरू किया गया था वो दिन दुगुना रात चौगुना बढ़ता ही गया. मतलब अगर आज पॉपुलेशन ग्रोथ को नेगेटिव टर्म्स में देखा जाता है तो इसमें बहुत बड़ा हाथ डाक्टर पॉल अहलरीच का है.

लेकिन पॉपुलेशन एक्सप्लोजन पर भ्रम फैलाने वाला केवल अहलरीच ही अकेला नहीं था. थॉमस माल्थूस ने जनसंख्या के सिद्धांत पर 1798 में एक निबंध लिखा. जिसमें उन्हेंने लिखा, ‘भविष्य में बढ़ती जनसंख्या और अनाज के उत्पादन के बीच सर्वनाशकारी प्रतिस्पर्धा होगी.’ यानी खाने के लिए लोगों को संघर्ष करना होगा. खाने की कमी पड़ जाएगी. उनका मानना था कि जनसंख्या की ताक़त पृथ्वी की मानव के लिए जीविकी पैदा करने की ताक़त से कही ज्यादा अधिक है. यानी जिस रफ़्तार से जनसंख्या बढ़ रही है उस रफ़्तार से अनाज उत्पादन नहीं हो सकता. और इसके कारण अकाल पड़ेंगे, गरीबी बढ़ेगी और समाज में बिखराव होगा. माल्थूस का कहना था की पॉपुलेशन जियोमेट्रिकली बढ़ती है.

आपने एक और भ्रांति सुनी होगी कि अमीर और अमीर हो रहा है, ग़रीब और ग़रीब हो रहा है राहुल गांधी से लेकेर तमाम भारत के नेता और बुद्धि पिशाच यह नारा लगाते रहते हैं. अब यह ग़लत कैसे है? मानिए एक कमरे में 5 लोग हैं और सभी के पास 20-20 रुपए है यानी टोटल 100 रुपए है. कमरे में रुपए फिक्स्ड हैं कि 100 ही हो सकते है 101 भी नहीं.

ऐसे में अगर किसी के पास 50 हो जाते है तो इसका मतलब हुआ कि बाकी चार के हिस्से से कम हुए होंगे. अगर 100 रुपए फिक्स ना हो वो 100 रुपए वाली अपर लिमिट हट जाए कि बाहर से और रुपए आ सकते तब तो एक के पास 50 हुए तो ज़रूरी तो नहीं की चारों में से किसी के पास कम हुए? क्या पता जिसके पास 50 हुए है उसने कमरे के बाहर से कमाए हो. दूसरा, क्या दुनिया में जितना पैसा 1925 में था क्या उतना ही आज भी है? इतना पीछे मत जाइए, भारत में ही 35 साल पहले चलिए. क्या जितना पैसा इस देश में 1990 में था क्या उतना ही आज है? नहीं ना?

इसका मतलब दुनिया में संपत्ति स्थिर नहीं है और नई संपत्ति बनाई जा सकती है. जिसका मतलब है, ज़रूरी नहीं कि कोई अमीर हो रहा है तो दूसरा उसके कारण ग़रीब हो रहा हो. वेल्थ क्रिएशन से सभी का जीवन स्तर बढ़ता है. जैसे 20 साल पहले एसी अपर मिडल क्लास घरों में ही होता था अब एक रूम वाले रेंटेड फ्लैट में भी लोअर मिडल क्लास एसी लगा के सो रहा है. ऐसे ही आज से 12-14 साल पहले कैमरे वाले बड़ी स्क्रीन के फ़ोन महंगे लोगों के हाथो में ही दिखते थे. आज कबाड़ी वाले के हाथ में भी स्क्रीनटच वाला बड़ा फ़ोन नार्मल चीज़ हो गई है. ये समृद्धि फ्री मार्केट से आई है.

अब माल्थूस की बात करते हैं. जिन्होंने कहा था कि उत्पादन का स्तर जनसंख्या के स्तर तक नहीं पहुंच पाएगा. अभी 50 साल पहले तक इस देश में अकाल पड़ता था हमने सुना है. 100 साल पहले तो हर दूसरे तीसरे साल अकाल पड़ता था जिससे लाखों लोग भूख से मर जाते थे. तब भारत की आबादी 20-25 करोड़ ही थी. 100 साल पहले और 50 साल पहले 50 करोड़ रही होगी. और आज जब आबादी 140-45 करोड़ है तो अकाल नहीं पड़ रहा. क्या इतने सालों में आपने सुना है कि अनाज की कमी से लोग मर गए? नहीं सुना होगा.

हां, आपने यह ज़रूर सुना होगा कि वर्तमान समय में लोग खाने की कमीं के कारण नहीं बल्कि अधिक खाने के कारण ज़रूर मर सकते हैं. सर्वे कराया जाए तो आधा भारत मोटापे का शिकार होगा. व्रत वाले दिन भी व्रत स्पेशल छोले भटूरे खाए जाते हैं. यह सब कैसे संभव हुआ? मेरे गुरु कहते हैं कि दुनिया में स्वतंत्र मानव मस्तिष्क से ताक़तवर कुछ नहीं होता और इस मस्तिष्क की कोई लिमिट ही नहीं है. 

एक और उदाहरण से समझिए, आपने इज़राइल नाम सुना होगा. उस इज़राइल में पीने के साफ़ पानी के नेचुरल रिसोर्सेस नहीं है. मतलब ना के बराबर है. इज़राइल अपने पीने के पानी और खेती के लिए पानी के लिए समंदर के पानी पर निर्भर है. और समंदर का पानी खारा होता है. ऐसे में इन्होंने इनोवेशन टेक्नोलॉजी डेवलोप की और उससे समुंदर के पानी का डिसैलीनेशन करके प्रयोग कर रहे है और उन्हें पानी की कोई कमी नहीं है. हां अगर इनोवेशन नहीं किया होता तो आज जो उनकी आबादी है अगर आज उस से दस गुना कम भी होती तो भी प्यास से मर जाती. लेकिन अगर आज उनकी आबादी 10 गुना बढ़ भी जाए तो प्यास से नहीं मरेंगे. यह सब इनोवेशन के कारण ही संभव हो सका है.

आपके मन में सवाल आ रहा होगा की क्या बढ़ती हुई जनसंख्या समस्या नहीं है? क्या मैं इसे नकार रहा हूं? जी मैं नकार नहीं रहा हूं. मैं सिर्फ आप से एक सवाल पूछता हूं कि हम इस जनसंख्या को संसाधन के तौर पर प्रयोग कर सकते है.  

मानव सभ्यता के सामने यदि कोई ख़तरा है तो वह ओवरपोप्यूलेशन नहीं है बल्कि डिपोप्यूलेशन है. दुनिया भर में गिरते हुए फर्टिलिटी रेट्स चिंता का विषय है. दुनिया जनसंख्या बढ़ने से समाप्त नहीं होगी, बल्कि घटती जनसंख्या के कारण बेशक समाप्त हो जाए. 2050 तक दुनिया भर के दो तिहाई देशों की कुल प्रजनन दर एक निश्चित स्तर से नीचे यानी 2:1 बच्चे प्रति महिला से नीचे चला जाएगा. भारत में ही कुल प्रजनन दर बिल्कुल बिलो रिप्लेसमेंट रेट पर है. अगर यूपी, बिहार को हटा दे तो 1:9 हो जाएगा. और 2:1 कम होते ही सिविलाइजेशन की रिकवरी संभव होती नहीं है.

जैसे हम जापान को देख सकते हैं वहां कुल प्रजनन दर 0.78 है, वहीं साउथ कोरिया में 1:26, यूरोप में 1.4 है. इस हिसाब से 2100 सेंचुरी के आखिर तक जापान की आबादी अभी की आबादी के हिसाब से 37.4 परसेंट यानी 46 मिलियन के करीब, साउथ कोरिया की आबादी 57.7 परसेंट यानी 22 मिलियन लोगो के क़रीब और यूरोप की आबादी 20.8% यानी 153 मिलियन के क़रीब कम हो जाएगी.  

दुनिया को बढ़ती आबादी से नहीं बल्कि असली ख़तरा घटती आबादी से है. पॉपुलेशन बॉम, पॉपुलेशन एक्सप्लोजन का हिस्टीरिया फैलाने वाले शायद डेमोग्राफ़िक ट्रांजीशन के बारे में नहीं जानते. इसका मतलब होता है कि दुनिया भर की आबादी मोटा-माटी तीन स्तरें से गुज़रती है. वास्तव में, इतिहास में गुज़री है और वर्तमान में भी हम गुज़रते हुए देख रहे है. इन तीनो फेज़ को तीन तरह से नापा जाता है. जन्म दर, मृत्यू दर और प्रजनन दर, इन्हीं तीन वेरिएबल्स के हिसाब से दुनिया भर की डेमोग्राफी बदलती रहती है.

इस ट्रांजीशन के पहले फेज़ को प्री मॉडर्न फेज़ ऑफ़ ट्रांजीशन कहते हैं. दुनिया के लगभग सभी देशों में 17वीं सदी तक ये फेज़ चला, उच्च जन्म दर, उच्च मृत्यू दर के कारण बेहद धीमी गति से जनसंख्या बढ़ी. यानी बच्चे भी ज़्यादा पैदा होते थे और पैदा होने वाले बच्चे इन्फ़ेंसी में ही मर भी ज़्यादा जाते थे. इस कारण देशो की जनसंख्या में बहुत स्लो ग्रोथ हुई.

फिर आया डेमोग्राफिक ट्रांजीशन का सेकंड फेज़. ये 18वीं सेंचुरी में कुछ यूरोपियन देशों से शुरू हुआ यानी औद्योगिकरण के बाद. इसमें उच्च जन्म दर और निम्न मृत्यू दर रही यानी आबादी तेज़ी से बढ़ने लगी. धीरे-धीरे बाकी देशों में भी ये फेज़ पहुंचा. भारत में ये फेज़ अपने एंड की ओर चल रहा है.

फिर आता है थर्ड एंड फाइनल फेज़ ऑफ़ डेमोग्राफिक ट्रांजीशन अर्थात, निम्न जन्म दर निम्न मृत्यू दर यानी पैदा भी कम होंगे, डेथ्स भी कम होंगी. यहां फर्टिलिटी रेट भी गिरने लगता है जिस से आबादी स्थिर हो जाती है. जापान साउथ कोरिया यूरोप और अन्य कई देश इस फेज़ में हैं. भारत में थोड़े टाइम में आ जाएगा.

भारत में एक बहुत बड़ा वर्ग है रूलिंग एलीट, सरकारी बाबुओ और बड़े-बड़े विद्वानों का है जो अपनी कॉमन सेंस खो चुके हैं. पर मुझे उनसे कोई सहानुभूति नहीं है.

इसी माल्थूस के झूठ और पॉल अहलरी के पॉपुलेशन बॉम्ब आदि के झांसे में आकर भारत में शुरुआत हुई पॉपुलेशन कंट्रोल की जिस फ़ैमिली प्लानिंग कहा जाता है. मैं फ़ैमिली प्लानिंग को पॉपुलेशन कंट्रोल क्यों कह रहा हूं? क्योंकि फ़ैमिली प्लानिंग का मतलब है, ‘प्रजनन के अधिकार को बढ़ावा देना, जिसका मतलब जनसंख्या नियंत्रण से बिलकुल विपरीत है.’

पिछले 100 सालों में यदि ग्लोबल पॉपुलेशन कंट्रोल का कोई सबसे बड़ा उर्जावान कैंपेनर कोई था तो वो था अमेरिकन बर्थ कंट्रोल लीग का फाउंडर मार्ग्रेट सैंगर. सैंगर साहब मोहनदास गांधी को बर्थ कंट्रोल की वैल्यू समझने के लिए उनसे मिलने वर्धा आश्रम आए. लेकिन उल्टा गांधी ने उन्हें परहेज़ के बारे में पढ़ाने लगे और वहां सैंगर की दाल नहीं गली.

इधर पटना यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स के एक प्रोफेसर ज्ञान चंद ने 1939 में इंडियाज़ टीमिंग मिलियंस नाम से 400 पन्नों की किताब लिखी. 5 साल बाद पॉपुलेशन की समस्या नाम से एक और किताब लिखी.

लखनऊ यूनिवर्सिटी में इकोनॉमिक्स और सोशियोलॉजी के प्रोफ़ेसर राधाकमल मुखर्जी भी पॉपुलेशन कंट्रोल के डिस्कोर्स में बड़ा नाम हैं. इन्होंने 1936 में इंडियन पॉपुलेशन कांफ्रेंस की स्थापना की. और दो साल बाद यानी 1938 में फ़ूड प्लानिंग फॉर 400 मिलियंस नाम से किताब लिखी. जिसमें इन्होंने पॉपुलेशन कंट्रोल का आईडिया दिया. वे कांग्रेस पार्टी की नेशनल प्लानिंग कमेटी में सबकमिटी के हेड भी बने.

डेमोग्राफिक ट्रांजीशन कॉइन करने वाले फ्रैंक नोटेसटीन ने 1936 में प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में ऑफिस ऑफ़ पॉपुलेशन रिसर्च की स्थापना की. इसी ऑफिस ऑफ़ पॉपुलेशन रिसर्च ने 1951 में किंग्सले डेविस नाम के व्यक्ति को एक किताब लिखने के लिए फंडिंग दी. किताब का शीर्षक था ‘दि पॉपुलेसन ऑफ इंडिया एंड पाकिस्तान’. यह किताब प्रजनन पर नियंत्रण रखने को गरीबी कम करने का तरीका बताती है.

यूनाइटेड नेशंस ने 1946 में पॉपुलेशन डिवीज़न की स्थापना की थी उसमें एक बहुत बड़ा रोल इन्हीं का था. नोटेसटीन इसके पहले डायरेक्टर भी बने. यूएन की दूसरी संस्थाएं जैसे फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन और डब्ल्यूएचओ इसके पार्टनर्स बने.  

1952 में जॉन डी रॉकफेलर तृतीय ने पॉपुलेशन काउंसिल की स्थापना की. और यह काउंसिल इंटरनैशनल प्लांड पैरेंटहुड फाउंडेशन (आईपीपीएफ), दि फोर्ड फाउंडेशन, दि रॉकफेलर फाउंडेशन और फार्मास्यूटिकल कंपनियों को एक कॉमन प्लेटफार्म पर ले आई.

इन सभी पॉपुलेशन कंट्रोल वाले एक्टिविस्टों के लिए भारत उनका फेवरेट देश बना. और इन्हें सबसे बड़ा डोनेशन बना फोर्ड फाउंडेशन से. जिसके दिल्ली चीफ डगलस एन्समिंगर थे.  

जवाहरलाल नेहरू भी पॉपुलेशन कंट्रोल वाले प्रोपेगंडा के प्रभाव में थे. उनके बनाए प्लानिंग कमीशन में पॉपुलेशन कंट्रोल भी उसका पार्ट था. फोर्ड फाउंडेशन के इंडिया चीफ डगलस नेहरू को जनसंख्या को नियंत्रण करने पर काम करने के लिए मनाना गए. नेहरू ने उन्हें कहा की मैं तैयार हूं पर हेल्थ मिनिस्टर राज कुमारी अमृत कौर को ऑनबोर्ड किए बिना यह सब करना संभव नहीं है.

वैसे राजकुमारी अमृत कौर सिर्फ नाम से सरदार लगती थी. इस लेख को लिखते समय पता चला वह ईसाई धर्म में अधिक विश्वास रखती थीं. एन्समिंगर 1955 में अमृत कौर जी से मिला और कहा की अगर वह तैयार है तभी वो इस मुद्दे पर बात करेगा. कौर के राज़ी होने के बाद उसने पॉपुलेशन ग्रोथ और गरीबी के बीच संबंध समझाया. जबकि वास्तव में ऐसा कोई रिलेशन नहीं होता.  

राजकुमारी ने उसकी बातो में इंटरेस्ट दिखाया और कहा की वह इस मुद्दे को गहराई से जानना चाहती है. वह तुरंत तैयार हो गया. उसने पहले ही जॉन डी रॉकफेलर से वादा करा लिया था कि वह दो कंसल्टेंट्स की सैलरी अपनी जेब से देगा एनजीओ से नहीं.

ताकि उन दोनों कंसल्टेंट्स की न्यूट्रैलिटी का आवरण बना रहे. ऐसा ना लगे कि फोर्ड फाउंडेशन या रॉकफेलर फाउंडेशन से सैलरी ले रहे हैं. लोगों को में ये भ्रम बना रहे की ये बेचारे तो सिर्फ काम कर रहे हैं. और इस प्रकार राजकुमारी अमृत कौर को समझाने के लिए न्यू यॉर्क पब्लिक हैल्थ सर्विसिज़ की हैड लियोन और प्रिंसटन यूनिवर्सिटी से फ्रैंक नोटेसटीन दोनों दिल्ली आए और हेल्थ मिमिस्टर की फर्स्ट पालिसी स्टेटमेंट ऑन पॉपुलेशन कंट्रोल ड्राफ्ट करने में मदद की.

इन दोनों की सलाह पर भारत सरकार ने 1956 में स्वास्थ्य मंत्रालय अंतर्गत ही सेंट्रल फ़ैमिली प्लानिंग बोर्ड की स्थापना की. जिसके हेड आर्मी मेडिकल कॉर्प्स के हेड कोलोनल बीएन रैना बने. साथ ही अगली पंचवर्षीय योजना में पॉपुलेशन कंट्रोल को हाई प्रायोरिटी में रखा गया. 50 मिलियन का फंड अलॉट हुआ और राज्यों में भी पॉपुलेशन कंट्रोल एडवाइजरी बोर्ड्स बनाए गए.

तीसरी पंचवर्षीय योजना में फ़ैमिली प्लानिंग के लिए 270 मिलियन का बजट सैंक्शन किया गया. साथ ही फोर्ड फाउंडेशन ने 12 मिलियन डॉलर की एडिशनल मदद का वादा किया जिसमें से 5 मिलियन डॉलर्स दिए. 1960 के दशक तक फोर्ड फाउंडेशन भारत सरकार के फ़ैमिली प्लानिंग प्रोग्राम में इतना अंदर तक घुस चुका था कि पॉपुलेशन कौंसिल के स्टाफ मेंबर्स कहने लगे थे कि उन्हें कई इंडियंस मिले जिनका मानना था कि फ़ैमिली प्लानिंग के मामले में फोर्ड फाउंडेशन जो-जो कहता है भारत सरकार वो-वो करती है.

उस समय पर भारत में फोर्ड फाउंडेशन के 36 विशेषज्ञ, 177 टैक्निकल एंड एडमिनिस्ट्रेटिव स्टॉफ, 63 अन्य लोग और १६ फॉरेन इंडिविड्युअल्स अलग-अलग डिपार्टमेंट्स में काम  कर रहे थे जिनकी सैलरी फोर्ड फाउंडेशन दे रहा था.

भारत में फोर्ड फाउंडेशन की उपस्थिति दुनिया के किसी भी देश में किसी भी एनजीओ की उपस्थिति से कही अधिक थी. इसके कंसल्टेंट्स हेल्थ मिनिस्ट्री तक को चला रहे थे और फोर्ड वाले हेल्थ मिनिस्ट्री के सरकारी बाबुओ को एजुकेशनल टूर के नाम पर न्यू यॉर्क की ट्रिप करवाते थे. उधर बीएन रैना ने आदेश दिया की हर गांव और कस्बे में एक फ़ैमिली प्लानिंग कमेटी बनाई जाए और ग्रुप लीडर को फ़ैमिली प्लानिंग क्रियांन्वित करने के बदले हज़ार रुपए की सहयोग राशि सरकार द्वारा दी जाएगी.

महाराष्ट्र में नसबंदी वाली गाडियां दिखाई देने लगी. महिलाओं की तुलना में पुरुषों की नसबंदी पर ज़्यादा ज़ोर इसलिए भी था क्योंकि पुरुषों की नसबंदी महिलाओ की तुलना में आसान थी. लोकल एनेस्थीसिया की मदद से 15 मिनट में नसबंदी हो जाया करती थी. अकेले 1962 में 1,72,00 लोगों की नसबंदी हुई जिनमें 70 परसेंट पुरुष थे.

वर्ष 1965 तक बीएन रैना ने रॉकफेलर को शाबाशी और कुछ डॉलर चंदा लेने के लिए उत्साह से भरी कुछ रिपोर्ट भेजीं. जब रॉकफेलर को लेटर मिला तो वह चौंक गए. ना तो उसने ऐसी कोई रिपोर्ट मांगी थी ना ही उसे रैना के बारे में उन्हें कुछ पता था. लेकिन रैना अपने उद्देश्य को लेकर फिर भी उत्साह से भरा हुआ था.

कभी-कभी रूलिंग इलीट की इन हरकतों को देखकर लगता है कि चर्चिल ने बिल्कुल ठीक कहा था कि भारतीय रूलिंग इलीट एक कमज़ोर और कायर वर्ग है.

खैर भारत में पॉपुलेशन कंट्रोल के इन अमेरिकन प्रोपोनेंट्स को इंदिरा गांधी में उम्मीद की किरण दिखायी दी. बहुत कम लोग जानते है कि इंदिरा गांधी का प्रयागराज वाला घर जिसे आनंद भवन नाम से जाना जाता है, को फैमली प्लानिंग इंस्टीट्यूट के तौर पर भी प्रयोग किया गया था. जब इंदिरा गांधी शास्त्री की सरकार में इनफार्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग मिनिस्टर थी तभी से उन्होंने पॉपुलेशन कंट्रोल पर ज़ोर देना शुरू कर दिया था. उन्होंने ज़ोर देना शुरू किया की देश के दूर दराज़ के गांवो में भी ट्रांजिस्टर्स बांटे जाए ताकि फ़ैमिली प्लानिंग का संदेश कोने कोने तक ब्रॉडकास्ट हो सके. तत्कालीन हेल्थ मिनिस्टर सुशीला नैय्यर को इंदिरा गांधी ने आईयूडी को बढ़ावा देने के लिए वित्तिय मदद देने का भी सुझाव दिया.

फिर लाल बहादुर शास्त्री की मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री बन गई. प्रधानमंत्री बनते ही उन्होंने मिनसिट्री ऑफ़ हेल्थ का नाम बदल के मिनिस्ट्री ऑफ़ हेल्थ एंड फ़ैमिली प्लानिंग कर दिया. जिसमें अलग से डिपार्टमैंट, सचिव और मिनिस्टर ऑफ स्टेट था. उनकी सरकार में प्लानिंग मिनिस्टर रहे अशोक मेहता का कहना था कि जनसंख्या वृद्धि ‘द्वार पर खड़ा शत्रु’ है. यह एक ऐसा युद्ध है जिसे हमें लड़ना ही होगा और सभी युद्धों की तरह, हम पक्षपात नहीं कर सकते, कुछ लोग घायल होंगे, कुछ न कुछ गड़बड़ होगी. ज़रूरत है इस युद्ध को लड़ने की दृढ़ इच्छाशक्ति की ताकि इसे जीता जा सके.

कौशलेश राय
कौशलेश राय
कौशलेश राय एक कल्चरल कमेंटेटर और द डॉसियर के फाउंडर हैं.