बिहार का बांग्लादेशीकरण

तेजस्वी का समाज को बांटने वाला ख़तरनाक मॉडल

प्राकृतिक सौंदर्य, संसाधन और संस्कृति का गढ़, बिहार सालों से राजनीतिक उठा पटक झेल रहा है. यहां भारत के इतिहास की सबसे शालीन महिला संयम, त्याग, शांति, संघर्श और शक्ति का प्रतीक माता सीता की जन्म भूमि की पवित्रता और राज्य के विकास की दूर-दूर तक कोई सुध लेने वाला नहीं है. बिहार भारत का वह अभागा प्रदेश बनकर रह गया है जो अपने ही नेताओं के हाथों रात-दिन अंधकार की गर्त में गिरता जा रहा है. बिहार नाम का प्रादुर्भाव बौद्ध सन्यासियों के ठहरने के स्थान विहार शब्द से हुआ. ‘बिहार’, ‘विहार’ का अपभ्रंश है. विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, वाणिज्य, धर्म और भारतीय दर्शन में स्वर्णिम युग से गुज़र चुका बिहार वर्तमान समय में अपनी गुंडों, माफिया और हिंसक छवि से उभरने की कोशिश कर रहा है. वर्तमान समय में सभ्यता और आध्यात्म की भूमि चंद नेताओं के हाथ का खिलौना बनकर रह गई है.

बीते तीन दशकों में बिहार की राजनीति में इतनी बार उठा पटक हुआ कि बिहार राजनीतिक रूप से संवेदनशील राज्यों में गिना जाने लगा है. जिसका कारण सत्ता को एक परिवार द्वारा अपनी जागीर समझ लेना है. लंबे समय तक बिहार पर राज करने वाले लालू प्रसाद यादव ने एक समृद्ध राज्य को गुंडई, जातिगत और धार्मिक भेदभाव की तरफ धकेल कर अपने परिवार के आर्थिक और राजनीतिक विकास की राह को आसान किया.       

लालू प्रसाद यादव की राजनीति देश और राज्य में पिछड़ो, गरीबों और मुसलमानों की पैरवी पर आधारित रही है. लेकिन सवाल यह है कि क्या वाकई लालू और उनका परिवार वैचारिक रूप से इस तरह की पैरवी के लिए मानसिक रूप से विकसित है या यह चंद लोगों के वोट पाकर अपनी सत्ता को चलाए रखने का मात्र एक तरीका है, जिसे अब तेजस्वी यादव आगे बढ़ा रहे हैं. और इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय संस्कृति का खज़ाना, देवी-देवताओं का पुण्य भूमि और भगवान बुद्ध से जुडे मठों की धरती मानसिक रूप से असंवेदनशील और असभ्य नेता को अपनाना चाहेगी.

अनेक सवालों के बीच एक कठोर सच्चाई भी है जिसे हम बीते लंबे समय से देखते आएं हैं. बिहार की राजनीतिक और प्रशासनिक खस्ता हालात और लालू परिवार का हिंसा और मुस्लिम तुष्टिकरण कर बिहार के धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व को बदलने की कोशिश करते रहना. लालू यादव के परिवार के पांच सदस्य राजनीति में कदम रख चुके हैं. लालू परिवार में कुल 20 लोग हैं. इनमें से 8 लोग राजनीति में हैं. लालू दो बार तो राबड़ी तीन बार सीएम रह चुकी हैं. तेजस्वी यादव दो बार डिप्टी सीएम रह चुके हैं. तेज प्रताप दो बार मंत्री रह चुके हैं. बेटी मीसा पहले राज्यसभा सांसद और अब लोकसभा सांसद हैं. करीब 30 साल से आरजेडी का मुखिया लालू कुनबे से ही रहा है.

लालू खुद आरजेडी के अध्यक्ष और पूर्व सीएम, पत्नी आरजेडी की उपाध्यक्ष और पूर्व सीएम, बेटी मीसा भारती लोकसभा सांसद, रोहिणी आचार्य राष्ट्रीय कार्यकारीणी की सदस्य, दामाद चिरंजीव राव विधायक हैं. बड़े बेटे तेज प्रताप पूर्व स्वास्थ्य मंत्री हैं. छोटे बेटे नेता प्रतिपक्ष हैं. दामाद तेज प्रताप यादव यूपी में विधायक हैं. लालू ने सत्ता और वंशवाद के बीच के फर्क को कम कर दिया है. एक इंटरव्यू में लालू ने कहा था “मैं राजनीति में सिर्फ शक्ति अर्जित करने के लिए आया हूं और मैं उसे सिर्फ इसलिए नहीं त्याग दूंगा कि क्योंकि किसी ने मेरे ऊपर आरोप लगाए हैं. अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाकर मैंने क्या गलती कर दी. क्या मैं अपनी सत्ता अपने राजनीतिक विरोधियों के हाथों में सौंप देता.” चौथी पास राबड़ी 1997 से 2005 तक तीन बार सीएम बनीं. 2014 में मीसा भारती ने पाटलीपुत्र सीट से चुनाव लड़ा लेकिन हार गईं. 2015 में दोनों बेटों को मैदान में उतारा गया. 12वीं पास तेज प्रताप वैशाली की मगुआ सीट से और तेजस्वी मां राबड़ी देवी की सीट राघोपुर से चुनाव जीते. नीतीश सीएम बने और महज़ 26 साल की उम्र में तेजस्वी डिप्टी सीएम बने. 2017 में तेजस्वी का नाम लैंड फ़ॉर जॉब घोटाले में भी उछला लेकिन उसी साल वह नेता प्रतिपक्ष बने. वहीं से साफ हो गया था कि लालू की विरासत तेजस्वी के हाथ में रहने वाली है. राबड़ी देवी वर्तमान समय में बिहार विधान परिषद की सदस्य और विपक्ष की नेता हैं. जो कि निर्विरोध चुनी गईं थीं. लालू 1980 ले 1989 तक दो बार विधानसभा के सदस्य रहे और विपक्ष के नेता भी रहे.  

1997 में जब राबड़ी देवी मुख्यमंत्री बनीं उन्हें कुछ मालूम नहीं था. लालू यादव जेल में थे. कोर्ट में सीवीक मामलों को लेकर पीआईएल डाली गई. सभी मुख्य सचिवों को कोर्ट ने समन किया और पूछा कि बिहार में कोई जंगल राज है क्या. इसी टिप्पणी के बाद से राजद की सरकार के समय को जंगल राज से जाना जाता है.  

सौजन्य: द टेलीग्राफ ऑनलाइन

आरजेडी आज भी बिहार में जाति आधारित राजनीति के बल पर अपना अस्तित्व बचाने की कोशिशों में लगी है. आज भी भूमिहार और सवर्णों को गाली देकर और आंबेडकर को हर वाद-विवाद में खींचकर अपनी पुरानी पहचान बरक़रार रखे हुए है. हिंदुओं को जातियों में बांटकर मुस्लिमों को इकहट्ठा करके देश पर वही पुराना घाव देने में आज भी आरजेडी बेशर्म बनी हुई है.

राजद और लालू प्रसाद के बिहार में जाति आधारित राजनीति करने को लेकर झारखंड में भाजपा के चुनाव प्रबंधन प्रमुख और बेस्टसेलर किताब ‘ब्रोकन प्रोमिसेज़’ के लेखक मृत्यूंजय शर्मा ने मुझसे बात की. उन्होंने बताया, “सीएम ऐसा पद होता है जो अपने राज्य का आधार होता है. सभी को साथ लेकर चलता है, लेकिन लालू ने ऐसा नहीं किया. और तेजस्वी की नज़रों में भी बिहार का हज़ारों साल पुराना सांस्कृतिक इतिहास कुछ मायने नहीं रखता. अर्थव्यवस्था, सामाजिक विकास तो दूर की बात है. भारत में जितने भी तथाकथित समाजवादी पार्टियां हैं उनकी पूरी राजनीति जातियों पर आधारित होती है. उनकी पूरी विचारधारा, वोट बैंक जाति से जुड़ा होता है”

उन्होंने आगे कहा, वे एक जाति के लोगों को दूसरी जाति के विरुद्ध भड़काते हैं. जब तक वे एक दूसरे के दुश्मन नहीं दिखेंगे, तब तक पिछड़े हिंदू और मुसलमान एक नहीं होगें. और इसीलिए उनकी पूरी राजनीति अगड़ा बनाम पिछड़ा की राजनीति है. वे जातियों में बांटकर हिंदुत्व वाली पहचान की जगह जाति को महत्व देने पर ज़ोर देते हैं. ताकि लोग हिंदुत्व की पहचान तले एक होकर वोट नहीं दे पाएं. राजद लोगों को जातियों में तब तक तोड़ेगी जब तक व्यक्ति खुद को यादव पहले और हिंदू बाद में नहीं मानेंगे. औऱ जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक लोग मुस्लिम के साथ मिलकर वोट नहीं देंगे. 90 के दशक में लालू प्रसाद ने भी यही किया था. आज के दिन में तेजस्वी भी यही कह रहे हैं.”

तेजस्वी समेत सभी विपक्षी दल के नेता अच्छे से जानते हैं कि मुस्लिम सेकुलरिज्म के नाम उनके साथ आ गया तो उनका वोट शेयर 19% से शुरू होता है. हिंदू को जातीयों में बांट दिया जाए तो आधी लड़ाई वे पहले ही जीत जाएंगे.

लालू यादव के परिवारवाद के बिहार की राजनीति पर असर और जाति आधारित राजनीति को लेकर बिहार से ताल्लुक रखने वाले जम्मू स्थित आईआईएमसी के प्रोफेसर अनिल सौमित्र ने मुझसे कहा, “जाति बिहार की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा है. और लालू परिवार की खासकर तेजस्वी की यादव समाज को बदनाम करने में बड़ी भूमिका रही है. अब तो यह यादव समाज को भी लगने लगा है कि उनकी बदनामी हो रही है. बिहार में हिंदुओं को जाति में बांटने और मुस्लिमों को एक करने की राजनीति लंबे समय से चली आ रही है. लेकिन फिर भी लालू और तेजस्वी के काम करने में बड़ा अंतर है. लालू यादव की राजनीति की शुरुआती जेपी आंदोलन से जुड़े समाजवादियों के साथ हुई है. जिसमें आरएसएस से लेकर जनता पार्टी तक, कईं धड़े के लोग जुड़े थे. लालू यादव ने छात्र राजनीति की है इसलिए उनके जीवन पर समाजवादियों का बहुत प्रभाव है.”

उन्होंने आगे कहा, “90 के दशक में युवा केंद्र में वीपी सिंह और राज्य में लालू यादव के साथ हो गए. बिहार के युवाओं को लगा कि वे परिवर्तन ला रहे हैं, एक क्रांति कर रहे हैं, लेकिन जैसे ही सत्ता मिली तो लालू के सभी समाजवादी विचार गायब हो गए. जैसे-जैसे समय निकलता रहा लालू यादव और उनकी पार्टी सिर्फ परिवार तक सिमटते चले गए. और परिवार भी ऐसा परिवार जिसमें साधु यादव जैसे बड़े अपराधी हों. आज की तारीख़ में परिवार और राजद की पूरी सत्ता सिर्फ तेजस्वी के हाथों में है. लालू को बिगड़ते-बिगड़ते थोड़ा टाइम लगा क्योंकि उनके ऊपर संघ, जनसंघ और समाजवादियों का प्रभाव था. तेजस्वी पर किसी का प्रभाव नहीं है. तेजस्वी अगर  जाति की राजनीति भी ठीक से कर पाते तो कम से कम अपनी जाति की अवमानना नहीं होने देते. इस तरह काम करते कि अनकी जाति बदनाम न होती. लेकिन वह इतना भी नहीं कर रहे हैं.”

इन विधानसभा चुनावों में भी बिहार ने हमेशा की तरह दोहरी मार झेली है, पहली परिवारवाद-वंशवाद की और दूसरी जाति आधारित तुष्टीकरण की. इसमें तीसरा दुख भी जुड जाता है मुस्लिमों को खुश करने की चाह में अपने ही धर्म और समाज को बेइज्जत करने का.    

वास्तव में जेपी आंदोलन से निकले नेता घोर जातिवादी और घोर सांप्रदायिक रहे हैं. इन्होंने बड़े हिस्से को हिंदू धर्म से तोड़कर, मुसलमानों का तुष्टीकरण करके लंबे समय तक सत्ता में बने रहने वाले फॉर्मूला पर ही काम किया है. इन चुनावों में तेजस्वी ने पिता लालू यादव की तरह समाज को बांटने के फॉर्मूले पर ही अमल किया है. क्रिकेट में रुची रखने वाले तेजस्वी ने राजनीति में आकर पिता लालू की राज्य पर पारिवार की पकड़ को मज़बूत रखने की इच्छा को पूरा किया है. लालू प्रसाद यादव जब चारा घोटाले में जेल गए तब उन्होंने पार्टी में किसी और पर विश्वास नहीं किया और राबड़ी देवी को बिहार का नेतृत्व दे दिया. उनका खुद राजद पार्टी के अंदर किसी दूसरे पर विश्वास नहीं बन पाया है. इसी अविश्वास का नतीजा तेजस्वी यादव का परिवार की ओर से राजनीति में आना है.

इन चुनावों में राजद के सबसे बड़े चेहरे तेजस्वी यादव अपने भाषण में अच्छी सरकार चलाने की बात करते हैं. लेकिन उन्होंने अशोक महतो नाम के एक दुर्दांत अपराधी को टिकट दिया है जिसके ऊपर नैटफ्लिक्स पर एक वेब सीरीज़ भी बन चुकी है. उस अपराधी ने हाल ही में द एक्टिविस्ट नाम के यूट्यूब चैनल को दिए अपने इंटरव्यू में कहा है कि चुनाव जीतते ही सबसे पहले वह भूरा बाल, ‘भू’ (भूमिहार), ‘रा’ (राजपूत), ‘बा’ (ब्राह्मण) और ‘ला’ (लाला/कायस्थ), साफ करेंगे. ऐसे लोगों को टिकट देना राजद की विचारधारा को साफ दर्शाता है. तेजस्वी अगर चुनाव जीतते हैं तो वह भूरा बाल साफ करने पर काम करेंगे. उनकी सोच समाज में एकता बनाने की नहीं दिखाई पड़ती.

राजद की आईटी सेल जिस प्रकार से जाति आधारित राजनीति को खुलकर बढ़ावा देती है. वह बेहद ख़तरनाक है. आरजेडी आईटी सेल से जुड़े हैंडल जैसे, ‘अनारकली ऑफ आरा’ और पथिक पटेल, जिस प्रकार से सवर्णों के प्रति घृणा का भाव दिखते है वह समाज और देश को तोड़ने वाला है. राजनीति के मूल आदशों को भुलाकर खुलेआम घृणा का भाव प्रदर्शित करने वाली नीति बेहद निंदनीय है. राजद के लोग घृणा फैलाने में एक बार भी नहीं सोचते हैं. हर बात, हर मुद्दे को जाति की कसौटी पर ले ही आते हैं.

तेजस्वी यादव ने अपनी तुष्टीकरण की राजनीति के चलते हाल ही में कहा है कि वे अगर सत्ता में आए तो वक्फ़ कानून को समाप्त करने के लिए कदम उठाएंगे. तेजस्वी की इस टिप्पणी पर बिहार के स्वतंत्र पत्रकार अभिषेक तिवारी ने कहा, “फतूहा गांव के अंदर वक्फ़ बोर्ड ने 200 साल पुरानी ज़मीन पर क्लेम कर दिया. 200 साल पुरानी प्रॉपर्टी के उनके पास डॉक्यूमेंट्स नहीं है. जबकि मालिक के पास ज़मीन के डॉक्यूमेंट्स है. ऐसे में वे संदेह के घेरे में आ जाते हैं. लेकिन तेजस्वी यादव कहते हैं कि हम सरकार बनाते ही इसे फाड़कर फेंक देंगे.”

तेजस्वी की सत्ता को लेकर लालची सोच का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि वह अपने ही बड़े भाई तेज प्रताप यादव की राजनीतिक हत्या करने के लिए महुआ में उनके खिलाफ़ चुनाव प्रचार करने चले गए थे. राजद के कार्यकर्ता भी आए दिन तेज प्रताप के साथ-साथ महिलाओं और उच्च जातीयों को लेकर जिस प्रकार की अभद्र टिप्पणी करते हैं वह बेहद शर्मसार करने वाली बात है. रोकने की बजाए पार्टी में इस तरह के लोगों को और बढ़ावा दिया जाता है. कुछ ही दिनों पहले एक वीडियो वायरल हुई थी जिसमें राजद के एक लड़के को कहते हुए देखा जा सकता है कि हम लोग सरकार आने पर गोली चलाएंगे. राजद चुनावी मौसम में राज्य में डर का माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है. लेकिन यह कोशिश सफल नहीं हो पा रही.

तिवारी ने मुझसे कहा कि “पिछले तीन-चार सालों से यादव जिस तरह की हरकतें कर रहें हैं, जिस तरह के बयान दे रहें हैं, उसे देखते हुए जाति, धर्म, समाज, राजनीति चारों के हिसाब से तेजस्वी यादव राज्य चलाने के लिए सही आदमी नहीं है. जिस प्रकार से तमिलनाडु के अंदर बिहारियों को अपमानित किया गया और तमिलनाडु में जिस प्रकार से हिंदी के प्रति द्वेष दिखाया गया, ऐसे में स्टालिन को वोट चोरी के नाम पर यात्रा में बुलाया गया जिसका बेटा खुलकर कहता है कि वह सनातन को मिटाएगा. तेजस्वी यह सब देखते रहे और एक शब्द नहीं बोले. स्टालिन बिहार में इंग्लिश में भाषण दे रहें हैं लेकिन वह चाहते हैं कि तमिलनाडु में सभी तमिल बोलें. वह सिर्फ तमिल का सम्मान चाहते हैं, लेकिन यहां की मैथिली, भोजपुरी से उन्हें कोई मतलब नहीं है.”

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन, 27 अगस्त 2025 को बिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान. सौजन्य: एम. के. स्टालिन/ एक्स

तेजस्वी की राजनीति की शुरुआत तब हुई जब नीतीश कुमार के साथ 2015 में गठबंधन बना और लालू प्रसाद यादव तब चुनाव लड़ नहीं सकते थे लेकिन उन्हें अपना राजनीतिक रूप से कद बढ़ाना था. यहां भी लालू प्रसाद यादव ने अपनी बेटी मिसा भारती पर विश्वास नहीं जताया. बिहार में जब एसआईआर प्रोसेस चल रहा था तब तेजस्वी के दो एपिक नंबर, वोटर आईडी कार्ड निकले थे. क्योंकि तेजस्वी को बिहार की राजनीति के लिए आनन-फानन में तैयार किया गया था.

अनिल सैमित्रा ने मुझे बताया कि, “लालू यादव के कार्यकाल से पहले और लालू यादव के कार्यकाल के बाद कोई नहीं कहता कि बिहार में जंगल राज था. लालू यादव के राज को ही जंगल राज कहा जाता है. लालू यादव का नाम चारा घोटाले से लेकर रेल मंत्री रहते हुए कई घोटालों में आया अगर उनकी सही जांच हो जाए तो सच सामने आ जाएगा.”

सौमित्र ने आगे बताया, “मैंने अपनी आंखो से जंगल राज देखा है. मैं बिहार मुज़फ़्फ़रपुर का रहने वाला हूं और मेरी ग्रेजुएशन तक की पढ़ाई वहीं हुई है. 1995 में वहां क्राइम की स्थिति बहुत भयानक थी. बड़े-बड़े इंडस्ट्रियलिस्ट और व्यापारी सभी पलायन कर गए थे. ऐसे में लालू ने  आर्थिक रूप से बिहार को खत्म ही कर दिया था. उनके पास बिहार के विकास की दृष्टि तो बिलकुल नहीं है. उनके पास अगर कुछ है तो जाति आधारित राजनीति. उनके लिए सत्ता प्राप्त करने के लिए जाति एक सबसे बड़ा साधन है.”

राजद और लालू परिवार में जैसे-जैसे तेजस्वी का उभार हो रहा है वैसे-वैसे अन्य पक्ष गायब हो गए हैं. तेजस्वी के मामा पक्ष और बड़े भाई तेज प्रताप यादव को संगठन और परिवार दोनों से दूर कर दिया गया है. तेजस्वी की राजनीति को राह पर लाने के लिए पिता लालू को कईं लोगों को किनारे लगाना पड़ा है.

अभिषेक तिवारी ने मुझे बताया कि, “वह कभी भी शानदार क्रिकेटर नहीं रहें हैं. अगर लालू प्रसाद बीसीए के मेंबर नहीं होते तो उन्हें मौका तक नहीं मिलता. यहां भी परिवारवाद के कारण ही उनको एंट्री मिली है. बिहार में क्रिकेट को पूरी तरह से बर्बाद करने का कारण पूरी तरह से लालू यादव ही हैं. भारतीय टीम में कोई रांची से खेला, तो कोई बंगाल से खेला लेकिन बिहार से नहीं. जब से क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से इनका प्रभाव समाप्त हुआ है तब से बिहार से अच्छे क्रिकेटर निकल रहे हैं जो इंटरनेशनल लेवल पर अच्छा परफॉर्म कर रहे हैं. तेजस्वी यादव खुद दिल्ली डेयरडेविल्स की तरफ से खेल रहा था. यहां तक की लालू यादव ने बयान भी दिया था कि ‘आईपीएल बंद कर देना चाहिए, मेरा बेटा चार साल से सिर्फ पानी ही ढो रहा है.’”

उन्होंने आगे कहा, “अगर तेजस्वी की पढ़ाई में रूचि होती तो वह ज़रूर पढ़ते. यह बहाना नहीं दिया जा सकता कि वह एक अच्छे खिलाड़ी थे इसलिए पढ़ नहीं पाए. सहवाग, धोनी, कुंबले, हरभजन सिंह सभी अच्छे क्रिकेटर रहे हैं और काफी पढ़े लिखे भी हैं. उनके मन में एक ही बात थी कि मैं तो लालू यादव का बेटा हूं. मेरे माता-पिता सीएम रहे हैं, रेल मंत्री है. मैं नहीं भी पढूंगा तो मेरा राजनीतिक करियर तो सेट ही है. तेजस्वी और तेज प्रताप ने 2008 में दिल्ली के कनॉट प्लेस और गुड़गांव में लड़की से छेड़छाड़ की थी जिसके बाद उनकी पिटाई की खबर भी सामने आई थी. कुल मिलाकर दोनों ही भाई एक बड़े परिवार के बिगड़ैल लड़कों की तरह जीवन जीने के आदी हैं.”

तिवारी ने मुझसे कहा, “राजनीतिक आदर्श जैसी चीज़ लालू परिवार के भीतर कभी नहीं थी. तेजस्वी ने लैंड फॉर जॉब्स स्कैम में जिन लोगों की जमीनें ली, वह सभी यादव समाज के ही थे. इन्होंने अपने ही समाज के लोगों के साथ भी न्याय नहीं किया. यह लोग जिस जाति की राजनीति कर रहे हैं उसे तीन दशकों में जिस प्रकार से मिसयूज़ करके उस समाज की इमेज़ खराब की है वह अब एक बहुत बड़ी समस्या बनकर उभर रहा है. और उन्हें यह लगता है कि वह मसीहा है. आने वाले 10-15 वर्षों में भी यह चीजें नहीं बदलेगी. वास्तव में सत्ता नहीं मिलने पर आप इस तरह की राजनीति के और बुरे स्वरूप को देखेंगे.”

संगठन का समाजवादी विचार होने के बावजूद राजद के नेता कभी जयप्रकाश नारायण, लोहिया औऱ कर्पूरी ठाकुर का नाम नहीं लेते जबकि लालू की राजनीति का आधार इन्हीं लोगों की विचारधारा रही है. तेजस्वी यादव ने पिता के राजनीतिक आधार से ऊपर बांटने की नीति को रखा है.

सौमित्र ने लालू परिवार पर टिप्पणी करते हुए कहा, “यह 12 लोगों की एक फैमिली है जिसका विकास सीधे-सीधे बिहार से जुड़ा हुआ है. जैसे-जैसे लालू परिवार की वृद्धि हुई. उसी तरह बिहार में पिछड़ापन बढ़ता रहा.”

वर्ष 2015 में नीतीश कुमार के कारण सत्ता मिलने के बाद तेजस्वी के उप मुख्यमंत्री बनने पर मीडिया ने भी उन्हें मोस्ट एलिजिबल बैचलर, मोस्ट हैंडसम मैन बोलकर उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा को भी बढ़ा दिया था. यही काम अब उनके सलाहकार संजय यादव भी कर रहे हैं. अभिषेक तिवारी के अनुसार संजय यादव लालू प्रसाद यादव की राजनीति नहीं समझ पाए. संजय ने बिहार को एक अलग दृष्टि से देखा और तेजस्वी यादव को भी देखना सिखाया. जिसने तेजस्वी यादव का डाउनफॉल कराया. यही कारण है कि तेजस्वी यादव बिहार और बिहारियों को बिल्कुल नहीं समझ पाए.

राजद की प्रवक्ता जिस तरह से बेहद घटिया और गंदे तरह से पक्ष रखती है. इसका कारण भी तेजस्वी के करीबी संजय यादव ही हैं. हर मुद्दे को जाति से जोड़ना, आपस में लोगों को भड़काना उन्हीं के दिमाग की उपज है. अगर लालू प्रसाद यादव के आसपास के प्रभुत्वशाली लोगों को देखें, जिसमें रघुवंश बाबू राजपूत समाज, जगतानंद सिंह राजपूत समाज, शिवानंद तिवारी ब्राह्मण समाज से थे, उन्होंने सवर्णों को भी अपने साथ बनाकर रखा था. लेकिन अब राजद में उल्टी गंगा बह रही है. हालांकि समाजवाद के उभार के समय खुद शिवानंद तिवारी ने बक्सर में अपना जनेऊ तोड़ दिया था. इससे उनका धर्म, जाति को लेकर विचार साफ पता चल जाता है.

तिवारी ने लालू प्रसाद यादव के परिवार को बिहार का एक बोझ बताते हुए कहा, “उन्होंने अपनी महत्वकांक्षाओं के कारण बिहार का विभाजन कराया और विभाजन के समय सभी बड़ी फैक्ट्रियां झारखंड में चली गई. यह लालू की बड़ी नाकामयाबी थी. लेकिन वह चाहते थे कि बिहार से बुद्धिजीवी लोग पलायन कर जाएं और उनके ही विचार के लोग बिहार में रह जाए ताकि वे बिना किसी रोक-टोक के राजनीति कर पाएं. उन्होंने आपस में जाति के नाम पर एक दूसरे के प्रति इतना घृणा भाव फैला दिया कि हिंदू आपस में लड़ कटकर मरने लगे. यह सब 20 साल और चला होता तो सबसे पहले बिहार का ही गजवा-ए-बिहार हो जाता. राजद बिहार की बदलती डेमोग्राफी पर बिलकुल चिंता नहीं करती. और इस मुद्दे को नकार देती है. तुष्टीकरण की इस राजनीति का अंतिम लक्ष्य बिहार के बांग्लादेशीकरण पर जाकर ही रूकेगा.”  

बिहार में तेज़ी से बदलती डेमोग्राफी इन विधानसभा चुनावों में एक बड़ा मुद्दा रही है. बांग्लादेश और रोहिंग्या मुसलमानों की बढ़ती जनसंख्या पर तिवारी ने मुझे बताया कि बांग्लादेश के मुसलमानों में, बिहार के मुसलमानों में और बंगाल के मुसलमानों में कोई अंतर नहीं है. जो नुआखली का मुसलमान किशनगंज के मुसलमान से बिल्कुल अलग नहीं है और कभी भी अलग नहीं था. 1905 तक यह सब कुछ बंगाल प्रेसिडेंसी के अंदर ही आता था. यहां के मुसलमान देश के अन्य हिस्सों में रहने वाले मुसलमान के मुक़ाबले अधिक हिंसक होते हैं.

तेज प्रताप यादव को घर और पार्टी से निकालने के कारण को समझाते हुए तिवारी ने बताया, “ तेजस्वी की पत्नी रेचल की परिवार में एंट्री वैसी ही थी जैसी सोनिया गांधी की गांधी परिवार में थी. सोनिया गांधी ने भी मेनका गांधी को उनके बच्चे सहित घर से निकलवा दिया था. रेचल ईसाई है और तेज प्रताप कृष्णवंशी है, भगवान श्री कृष्ण को मानता है तो उनको आज नहीं तो कल निकलना ही था. यह घर में सीधे-सीधे धार्मिक प्रभुत्व की लड़ाई थी. तेज प्रताप के रहते वह घर का वातावरण ईसाई धर्म के अनुसार नहीं बदल सकती थी. तेज प्रताप काफी धार्मिक तरीके से घर में रहते थे जो रेचल को पसंद नहीं था.”

बड़े बेटे तेज प्रताप की जगह छोटे बेटे को कमान सौंपने के सवाल पर मृत्यूंजय ने मुझसे कहा, “दोनों बेटों में बड़ा अंतर है. तेज प्रताप में पहले के मुकाबले काफी बदलाव आया है. राजनीति में अपने शुरुआत के दिनों में वह ठीक से बोल भी नहीं पाते थे. उनकी इमेज हंसी की पात्र बन गई थी. यह बात लालू को दिख गई और उन्होंने पार्टी की कमान तेजस्वी को सौंप दी.”

अकले पार्टी संभालने वाले तेजस्वी ने सभी को साथ लेकर चलने की कोशिश की लेकिन उसके चक्कर में उनका पहले से चला आ रहा वोट बैंक गड़बड़ा गया. ज़मीनी सच्चाई नहीं होने का कारण वह जो भी बोलते हैं लोगों को रीझाने के लिए बोलते हैं. जैसे हर घर सरकारी नौकरी और हर महीने महिलाओं को ₹2,000-₹2,500 देने जैसे वादे को पूरा करना वास्तव में संभव नहीं है. इन्हीं नीतियों की वजह से इस चुनाव में कोई नया उनसे जुड़ नहीं पा रहा है.

1997 में जनता दल से आरजेडी के टूटने बाद से ही पार्टी लालू यादव की पारिवारिक पार्टी बन के रह गई है. बिहार में जितने भी निगम बोर्ड थे सभी में परिवार और इनकी जाति के लोगों को ही नियुक्त किया गया है. 90 के दशक में भारत में उदारीकरण की शुरुआत के बाद से पूरा भारत तेज़ी से गति कर रहा था. बैंगलोर, गुड़गांव जैसे हब विकसित हो रहे थे, कईं राज्य तेज़ से आगे बढ़ रहे थे. इसी समय पर बिहार में लालू प्रसाद का शासन था. उनके कार्यकाल में बिहार का जीडीपी ग्रोथ रेट 1% से भी कम रहा. जबकि भारत का औसत ग्रोथ रेट कम से कम 5-6% था. बिहार के साथी राज्य जैसे आंध्र प्रदेश, झारखंड तेज़ी से विकास कर रहे थे. और वे बिहार से कहीं आगे निकल गए. और बिहार की अर्थव्यवस्था वहीं रह गई. कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं आए और इंडस्ट्रीज भी छोड़ कर चली गईं. कानून व्यवस्था की बुरी हालत थी. प्रोफेशनल्स, डॉक्टर्स, इंजीनियर राज्य छोड़कर भाग गए थे.

मृत्यूंजय ने बताया, “बिहार के पिछड़ेपन और पतन का सबसे बड़ा कारण लालू सरकार को ही माना जाता है. उनकी सरकार के समय बिहार में लगभग 60 जातिगत हिंसा हुईं. जिसमें पूरे के पूरे गांव पर अटैक किया जाता था. मगध क्षेत्र ने खासकर बुरा दौर देखा था. लगभग 32,000 किडनैपिंग के मामले सामने आए थे. हालांकि वास्तव में यह आंकड़ा सरकारी आंकड़े से 10 गुना अधिक था. बच्चों ने स्कूलों में जाना बंद कर दिया था. माता-पिता अपने बच्चों को राज्य से बाहर पढ़ने के लिए भेजने को मजबूर होने लगे. स्कूलों में 122 बच्चों पर सिर्फ एक शिक्षक हुआ करता था. सालों तक राज्य में एक भी डॉक्टर की नियुक्ति नहीं हुई थी. लालू की बेटी की शादी में पूरे राज्य को जबरदस्त तरीके से लूटा गया. राजद के लोगों द्वारा पूरी की पूरी दुकाने लूट ली जाती थी. चुनावी हिंसा अपने चरम पर थी. कोई इलैक्शन ऐसा नहीं होता था जिसमें हज़ारों लोग मारे न जाते हो.”

जंगल राज का ऐसा आलम शायद ही देश के किसी हिस्से ने देखा होगा. जिसका सबसे बड़ा उदाहरण सीवान जिले के चंदा बाबू की रोंगटे खड़े कर देने वाली भयावह सच्चाई है. उन्होंने पुलिस को दिए बयान में कहा था, “मैंने लालू प्रसाद यादव को फ़ोन किया और बोला कि हमारे बच्चों को जिंदा तेज़ाब से नहला दिया गया है. मालिक एक बच्चा बचा हुआ है. उसको किसी तरह बचा लीजिए. हमको न्याय दीजिए” तब लालू प्रसाद यादव ने खुद कहा कि मामला सिवान का है और इसमें वह कुछ नहीं कर सकते. सोचने वाली बात है कि चंदा बाबू सवर्ण समाज से नहीं थे.

चंदा बाबू और उनकी पत्नी कलावती देवी अपने मृत बेटों की तस्वीरें दिखाते हुए, जिन्हें जंगल राज में तेज़ाब से जला दिया गया था. सौजन्य: रंजीत कुमार/ द हिंदू

लालू परिवार का जंगल राज इस बदलते भारत में किसी भी तरह टिक पाने में अब सक्षम नहीं है. लोगों ने जातिगत हिंसा और मुस्लिम तुष्टिकरण को करारा जबाव देने और वापस डर के साय में नहीं जाने का मन बना लिया है. इस विधानसभा चुनाव के परिणाम चाहे जो भी हो लेकिन जीत अब बिहार की ही होगी.


ईशा दिल्ली स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.