मिशनरियों ने शुरू में यह कोशिश की कि भारतीयों के देवी देवताओं को अनार्य बताया जाए. शिव एक अनार्य देवता हो गए, इसलिए गुलामगिरी में विष्णु के अवतारों और ब्रह्मा पर जितनी बकवास की गई है, शिव पर नहीं बल्कि गुलामगिरी में शिव लगभग अनुल्लिखित हैं. किताब में एक जगह हर हर महावीर कहा गया है. वह हर हर महादेव का स्थानापन्न है. कुछ ऐसे कि जैसे शिव हिंदू देवलोक में शामिल ही नहीं हैं और यदि महादेव का नाम आया तो ‘हर हर महावीर’ हो जाता है. ध्यान यह भी दें कि ‘गुलामगिरी’ से गणेश भी सरासर गायब हैं. उनकी भी मिशनरी प्रचारतंत्र में हीन उत्पत्ति वाली अनार्य भूमिका ही है. मां काली को भी मिशनरी अनार्य बताते थे, वो भी गुलामगिरी में चर्चा नहीं पा सकीं. मिशनरी प्रचार में कृष्ण भी ग़ैर-आर्य देवता थे, इसलिए उन्हें भी बख्श दिया गया. इस प्रचार में हनुमान भी अनार्य थे, इसलिए वे भी ‘गुलामगिरी’ में जगह नहीं पाए और चूंकि वे रामभक्त हैं इसलिए रामावतार की चर्चा भी इस पुस्तक में नहीं की गई.
लेकिन इससे सनातन पर उतनी चोट नहीं लग पाती जितनी मिशनरी चाहते थे. इसलिए उन्होंने रणनीति बदली. अब असुरों को अछूतों और आदिवासियों से समीकृत किया जाने लगा. ‘गुलामगिरी’ इस बदली रणनीति की पुस्तक थी. अब भारतीय देवी, देवता अनार्य नहीं थे बल्कि वे हमलावर अत्याचारी विदेशी थे और शूद्र व आदिवासी भारत के ही रहने वाले थे.
महार अब गुलामगिरी के अनुसार महाअरि थे. हालांकि महाअरि नामक कोई असुर भारतीय पौराणिकी में नहीं मिलता. सिर्फ नाम साम्य के आधार पर कुलाबे भिड़ाने की पश्चिमी इंडोलजी आज भी फुले की इस प्रविधि को जारी रखे हुए है. ये बिहार के गुमला जिले के एक गांव की एक असुर जनजाति को महिषासुर का वंशज बताने लगी. उस जनजाति के बुजुर्ग इसकी पुष्टि नहीं करते पर नए-नए कन्वर्ट युवक युवती को मिशनरी द्वारा यह रटा दिया गया. इसकी भी नींव ‘गुलामगिरी’ में है. परिच्छेद 8 में जोतीराव परशुराम को एक नोटिस देते हुए लिखते हैं :
“तुम इस नोटिस की तारीख़ से छह माह के भीतर-भीतर यहां पर उपस्थित हो सके तब मैं ही नहीं, सारी दुनिया के लोग तुमको सचमें आदिनारायण का अवतार समझेंगे और लोग तुम्हारा सम्मान करेंगे. लेकिन यदि तुम ऐसा न कर सके तो यहां के महार मातंग हमारे म्हसोबा के पीछे छिपकर बैठे हैं.”
यह म्हसोबा महिषासुर ही है. बस फर्क यह है कि तब इसे महार-मातंग में खोजा जा रहा था, अब इसे बिहार के गुमला जिले के गांव की बस्ती में खोजा जा रहा है. पहले मिशनरी और उनके भारतीय एजेंट तय कर लें कि महिषासुर कहां हुआ. जब वे किसी एक निष्कर्ष पर पहुंचें तो मैं नाम-साम्य के और उदाहरण दे दूंगा.
क्या अजीब तर्क पद्धति है. ‘म’ से महाअरि. म से महिषासुर. म से महार. म से मातंग. लेकिन ये भारत के गांव खेड़ों और जातियों में असुरों को चिन्हित करने वाले लोग इन असुरों को यूरोप के नगर-गांवों में क्यों नहीं ढूंढते. क्या बेल्जियम के मोंस नगर में वे नहीं रहते थे? या फ्रांस के फेयेंस कैंटन के मोंस कम्यून में उन्हें नहीं खोजा गया. वैसे वहां कम से कम आठ कम्यून ‘मोंस’ नाम के हैं. जर्मनी के मोंश्चाऊ नगर में तो मोंस्टर की बस्ती तो नहीं थी? हो सकता है कि स्विट्ज़रलैंड के ग्रौबुंडेन के छोटे से मोंस गांव में हो? ये वैम्पायर क्या चेक रिपब्लिक के वामबर्क क़स्बे में रहते थे? या ग्रीस के वाम्वाकोफ्योटो में? इनका डेविल क्या इंग्लैंड के डेवोनपोर्ट में या डेविजेस में रहता था? या डच शहर डेवेंटर में? या ये जो लोग बील्जी सरनेम के होते हैं क्या ये बिब्लिकल बील्जीबब के वंश से हैं? यह शैतान का ही एक पर्याय नाम है. ये जो डैगोनिस सरनेम वाले हैं, क्या बाइबल के दैत्य डैगॉन को इनका पितृपुरुष कहा जा सकता है? ये जो मेफिस्टोन सरनेम वाले हैं, क्या मेफिस्टोफिलीज दैत्य की आनुवांशिकी में हैं?
आप कहेंगे क्या पागलपन है. लेकिन भारत के सिलसिले में वही एप्रोच वैकल्पिक पाठ, शोध, सब-आल्टर्न विमर्श और महात्मा-उवाच हो जाती है. शब्द-साम्य से सीधे इतिहास बनाने वाली यह प्रवृत्ति फुले में बीमारी की हद तक है. इनके लिए फ़ोनेटिक समानता काफी है.
सीमेंटिक समानता का क्या कोई अचार डालेंगे. फुले कहते हैं कि “इराण से आर्य लोगों का एक बड़ा कबीला बंदरगाह पर आ पहुंचा और वे कछुए की तरह धीरे-धीरे चल रहे थे. इसी की वजह से उस कबीले के मुखिया का उपनाम कच्छ हो गया.” या “जब क्षत्रियों को यह ध्यान आया कि नरसिंह ने अमानवीय कर्म किया है तब उन्होंने आर्य लोगों को द्विज कहना बिलकुल त्याग दिया और नरसिंह को विप्रिय कहने लगे. इसी विप्रिय शब्द से बाद में उसका नाम विप्र पड़ा होगा.” या इसी तरह से मल्हारी को ‘मल्लअरी’ कहना. मारतोंड से ‘मार्तंड’ शब्द बनना. माने भाषाविज्ञान का शीर्षासन ही हो गया हो.
ऐसे बहुत से उदाहरण हैं. फिर इनका ब्रह्मा वामन अवतार के बाद प्रकट होता है. अवतारित होने के बाद वह क्या करता है? इसपर फुले लिखते हैं :
“क्षत्रियों के अलावा जो लोग उसकी चंगुल में आ गए थे, उनका सब कुछ उसने छीन लिया. बाद में उसने सत्ता की गरमी में उस सब क्षुद्र लोगों (जिसका अपभ्रंश रूप \’शूद्र\’ है) को अपना गुलाम बनाया. उसने उनमें से कई लोगों को गुलामस्वरूप सेवा के लिए अपने लोगों के घर-घर बांट दिया. फिर उसने गां-गांव में एक एक ब्राह्मण-सेवक भेज कर उनके द्वारा भूक्षेत्र विभाजन करवाया और उन शेष सभी शूद्रों को कृषिकार्य करने के लिए मजबूर किया. उसने इन कृषक-शूद्रों को जिंदा रहने के लिए जमीन की उपज का कुछ हिस्सा स्वयं ले कर शेष भाग इन स्वामियों को दे देने का नियम बनाया. इसी की वजह से उन ग्राम सेवक ब्राह्मण कर्मचारियों का नाम कुले करणी (जिसका अपभ्रंश रूप है कुलकर्णी) हो गया और उसी प्रकार उन शूद्र कुलों का (किसान) नाम कुलवाड़ी (जिसका अपभ्रंश शब्द है कुलंबी, कुळंबी या कुनबी हो गया.”
मेरा मानना है कि यह भाषाविज्ञान का शीर्षासन भी है. कुलकर्णी कुलवाड़ी जैसे उदाहरणों से लगता है कि इनका ब्रह्मा भी मराठी है. शूद्र एक अपभ्रंश शब्द है, यह दिव्य दृष्टि भी इन्हीं से प्राप्त करें. अन्यथा ‘श’ एक साधारण तालव्य ध्वनि है, जबकि ‘क्ष’ एक जटिल संयुक्त ध्वनि है, जो ध्वन्यात्मक विकास में आसानी से एक-दूसरे में परिवर्तित नहीं होती.
स्वर शूद्र में दीर्घ ऊ और क्षुद्र में ह्रस्व उ है. स्वर की मात्रा में यह अंतर भी अपभ्रंश की संभावना को कमज़ोर करता है. दोनों में द्र समान है, जो संस्कृत में सामान्य प्रत्यय है. यों तो इंद्र भी या चंद्र भी ‘द्र’ जैसे प्रत्यय हैं लेकिन यह सामान्यता अपभ्रंश का प्रमाण नहीं है. ‘क्ष’ अपभ्रंश में ‘ख’ में बदलता है. क्षेत्र खेत हो जाता है पर ‘श’ में नहीं बदलता. मॉन्क्स और बर्गाइन जैसे भाषाविद (A Comparative Dictionary of Indo-Aryan Languages) शूद्र और क्षुद्र को अलग-अलग जड़ों से मानते हैं.
लेकिन फुले को ब्रह्मा और ब्राह्मण को अत्याचारी सिद्ध करना है. ये यीशु को ईश बताने वाला मिशनरी मानस है. जी. के. चेस्टरटन ने अपनी पुस्तक ‘ द एवरलास्टिंग मैन’ ( 1925) में उचित ही कहा था :
Theories are built on the top of theories, till the whole thing is a tower of Babel, with everybody talking nonsense in a different language.
फर्क इतना है कि जो म्होबा या महिषासुर फुले को अनुसूचित जाति लगे थे. हमारे जनेऊमार्काओं के यहां आकर वो अनुसूचित जनजाति हो गया. फुले उसे महारों-मातंगों में ढूंढ रहे थे, फुले उसे गुमला की असुर जनजाति में ढूंढ रहे हैं.
वैकल्पिक पाठ और प्रतिरोध की संस्कृति के ये आधुनिक दिखावे वस्तुतः धर्म-परिवर्तन की प्रस्तावनाएं हैं. 8 दिसंबर, 2016 को द इंडियन एक्सप्रेस की एक स्टोरी देखें : \’मीट द असुर्स-अ मार्जिनल ट्राइब दैट डिस्क्राइब्स दुर्गा एज़ अ गॉडेस हू एंटिस्ड महिषासुर.\’ वे झारखंड के गुमला जिले की गुरदारी बॉक्साइट खदान से 500 मीटर दूर के एक गांव साखूपानी में रहने वाले 70 वर्षीय चमरू असुर को ढूंढ निकालते हैं. वह कहता है, “मैंने सुना है कि हम महिषासुर के वंशज हैं. मुझे बस इतना ही मालूम है.” यानी उसने सुना है कि वे लोग महिषासुर के वंशज हैं. वह नहीं कहता कि हमने अपने पुरखा-पीढ़ियों से सुना है, न ही उसे पता है कि उसके पूर्वज यहां कैसे बसे. लेकिन यह बात वहीं की सुषमा असुर जानती है जो 12वीं तक पढ़ी है. इसी रिपोर्ट से पता चलता है कि वहां रह रहे 101 असुर परिवारों में से 90 ने ईसाइयत अपना ली है. क्या इन्हें ये ऐसे ही तोड़-मरोड़कर बताई गई हैं? मैंने काउंटरकरेंट्स में छपी एक कविता देखी जिसके संपादक बीनू मैथ्यू है. यह कविता किन्हीं कबीर देब जी की है जिसका शीर्षक है : WHEN THE EAST GETS MURDERED!
A sleek encounter between two idols
One gets killed, other stands tall above all
Some call it feminism when an Asura falls
Little do they know that Aryans just made a roll
Deep in that Eastern cloudy forest
Where nature used to nourish itself by a chain
Lived a community which bruised itself
With their race and food, everything as villain
White Aryans forming a dictator inside a nation
Resonating its power through the thriving illiteracy
Keeping the Black Asuras away from God’s devotion
Make upping humans in the name of killing and celibacy
Everyone preaches with unknown customs
One says to play with vermillion and smoky censer
Other says to be active in burning Asura with bombs
I fail to understand what’s so pious in fear
Some will say that the story depicts good versus evil
Popped out vein will react like a hypnotised being
Question lies, why did Aryans describe us as the devil?
Making Indians dance with their woven string!
Take an epic, take a story symbolised as pious
You will find the true Indians getting murdered
For the first time, you will be oblivious
As you will see the migrated one’s being treasured.
यह कविता माओवादी/धर्मांतरणकारी ज़हर की प्रतिनिधित्व करती है. यह बताता है कि जब औसत हिन्दुस्तानी नवदुर्गा दुर्गा पूजा पर व्रत रख रहा होता है, अपनी आंतरिक शद्धि के लिए देवी आराधना में तन्मय हुआ रहता है या नवदुर्गा प्रतिमा मंडपों में नाच रहा होता है, तब भारत के भीतरी हल्कों में कौन से ज़हर की आपूर्ति की जा रही होती है? जिन दुर्गा को रौलेट कमिटी ने अंग्रेजी शासन के प्रति मोहभंग फैलाने का माध्यम माना था, जैसे उन्हीं दुर्गा का एक विपरीत नैरेटिव तय कर भारत की स्वतंत्रता की क्षतिपूर्ति की जा रही है.
इससे स्पष्ट है कि भारत की माओ-बेल्ट ही मिशन-बेल्ट क्यों है? कैसे एक शान्तिपूर्ण सह-अस्तित्व भारत की जड़ों पर आघात कर रहा है? वे हर भारतीय महाकाव्य की हर पवित्र कथा का अर्थ यह बता रहे हैं कि कैसे उनमें \”सच्चे भारतीयों\” को मार डाला गया. क्या राम ने रामायण में \”सच्चे भारतीय\” को मारा था? क्या किष्किन्धा के वानर सच्चे भारतीय न थे और लंका का बलात्कारी और अत्याचारी हुक्मरान सच्चा भारतीय था? और अयोध्या का राजकुमार राम \’माइग्रेंट\’ हो गया. राम का पूरा वंशवृक्ष इसी भारत का है. इक्ष्वाकु क्या काकेशस से आए थे? वे अयोध्या के राजा थे. क्या हरिश्चन्द्र उत्तरी ध्रुव से आए थे? क्या भगीरथ राइन नदी को खींचकर लाए थे? क्या रघु का होमलैंड यूरोप था?
इस बिंदु पर आकर लगता है कि क्या हमारे शास्त्रों में वंशावलियों पर इतना स्थान खर्च किया गया? पहले मैं इन्हें व्यर्थ का श्रम मानता था लेकिन अब लगता है कि उन त्रिकालज्ञ काव्यकारों को मालूम था कि एक दिन इस देश में राम और कृष्ण को भी बाहरी बनाने की ज़हरीली फसल उगाई जाएगी और इसी देश के कुछ अकादमिक परिसर इस फसल को रासायनिक उर्वरकों की आपूर्ति कर रहे होंगे. सबसे बड़ी शैतानी महिषासुर को मात्र काले होने के आधार पर आदिवासी बताने की है. यदि ऐसा है तो काली क्यों स्थानीय समुदाय की नहीं हुई?
The Asur: A Study of Primitive Iron Smelters (1963, पृ. 37) नामक अपनी पुस्तक में नृतत्व-शास्त्री एवं इतिहासकार के.के. लेउवा बताते हैं कि असुर जनजाति के लोग चंडी की पूजा करते हैं ताकि उनके पास चमत्कारिक शक्तियां आ सके. यह पुस्तक 1963 में आई थी. अतः किसी तरह के रेशनलाइजिंग ऑफ्टर-थॉट की तरह नहीं देखा जा सकता. यह पुस्तक बताती है कि इस जनजाति की मान्यता है कि महादेव और पार्वती ने मानुषजात बनाई. गाय इनके यहां भी अवध्य है. हाल में ही इस कुप्रचार के उभरने से पहले तक सभी प्रकाशनों में असुर जन के बारे में ये महिषासुर-सन्दर्भ नहीं थे बल्कि वे भी वे ही सब त्यौहार मनाते बताए गए हैं जो अन्य हिंदू मनाते आए हैं. यह भी दिलचस्प है कि महिषासुर को ही लेकर उन्हें असुर जाति का आराध्य या पूर्वज बताने वाले अन्य असुरों को इस असुर जनजाति से नहीं जोड़ते. तब महिषासुर असुर जनजाति का माना जाता तो उसके पिता रम्भासुर और चाचा करंभासुर को भी कोई वाचिक स्मृति होनी चाहिए थी. न उसके दूतों/मंत्रियों/सेनापतियों का कोई उल्लेख तत्कथित मौखिक कथाओं में है. भारतीय पौराणिकी में असुरों की संख्या और नाम बहुत हैं लेकिन उन सबका इस असुर जाति कोई रिश्ता क्यों नहीं है? समय बदल रहा है. 1961 में 81% असुर जनजाति के लोगों ने अपने को हिंदू लिखाया था. अब उनकी संख्या लगातार कम हो रही है. हमने ऊपर देखा कि कैसे एक क्षेत्र के असुर परिवार धर्मांतरित हो गए.
दरअसल भारतीय समाज में फूट डालने का जो मिशन पहले अंग्रेजों ने शुरू किया था, अब वह कैम्पेन कुछ नए क्षितिज छू रहा है. इस नए प्रकल्प में दानव, दैत्य, राक्षस और असुर समकालीन दलित, वंचित और आदिवासियों से समीकृत किए जाएंगे और देवगण सवर्णों से. इस नए समीकरण के ज़रिए हमारे हर पर्व को जातीय संकीर्णताओं की बहसों में दूषित किया जायगा. इस आल्टरनेटिव रीडिंग का लक्ष्य हमारे समय और समाज को प्रगतिशील बनाना नहीं है बल्कि उनमें स्पष्ट दिखाई देने वाली समस्त प्रगतिशीलताओं को भेदभावों के धुएं में आवृत्त करना है. इसके ज़रिए पाठ का विकल्प नहीं ढूंढा जा रहा, एक विकल्प की तरह पुनर्जागृत होते हुए भारत का खंडन किया जा रहा है.
भारत आधुनिक है, क्योंकि ऐसा होना उसकी तबीयत में है. उसकी आधुनिकताओं को इन रूपकों में देखा जा सकता है, जो जाति या जनजाति से निरपेक्ष होकर सारे मानव समाज के लिए हैं. जब असुरों को दलित व आदिवासी बताने की तरकीबें की जाती हैं तो वे भारत के समकालीन को लक्ष्य कर की जाती हैं, उसकी पौराणिकताओं को ध्यान में रखकर नहीं. अब वे भारत के अनुसूचित जाति और जनजातीय समाजों का एलियनेशन ही नहीं करना चाहते, वे उनका एप्रोप्रिएशन भी करना चाहते हैं. और इसकी लिखित शुरुआत ‘गुलामगिरी’ से हुई थी.
