विश्व में सभी देशों का आधार उनका इतिहास, सभ्यता, संस्कृति और धर्म रहा है. जितना कोई देश अपनी जड़ों से गहराई से जुड़ा होता है उतनी ही उंचाई तक वह तरक्की करता है. भारत विश्व के प्राचीनतम देशों में से एक है जिसने पूरी दुनिया को धर्म और आध्यात्म का मार्ग दिखाया. भारत ने सनातन को जन्म दिया है या सनातन ने भारत की पवित्र भूमि को स्वंय चुना है यह कहना मुश्किल है. लेकिन धर्म भारत की आत्मा है और आत्मा ही होती है जो व्यक्ति के गुणों और चरित्र को गढ़ती है. भारत का चरित्र यहां के संस्कार, गौरवशाली इतिहास, देवी-देवताओं के आदर्शों, महान ऋशियों, संतो की वाणी और सनातन के गुणों की परछाई है. यह इस महान देश का दुर्भाग्य है कि बीते कुछ दशकों में भारत में भारत के ही लोग देश की जड़ो को काटने का प्रयास कर रहे हैं. माना जाता है कि यदि किसी देश को खोखला करना हो, वहां की जनता को बर्बाद करना हो तो सबसे पहले वहां के लोगों के आदर्शों के आधार यानि, वहां के मूल धर्म को तबाह कर दो. नैतिकता और मौलिक्ता का स्तर गिरा दो. अपने ही धर्म, सभ्यता, इतिहास के विरूद्ध लोगों को भड़का दो, देश अपने आप ही घुटने टेक देगा. भारत में ऐसा करना बेहद मुश्किल है लेकिन देश के भीतर कुछ घटिया मानसिकता के लोग भारत को बर्बाद करने में बिलकुल हार नहीं मान रहे हैं. उल्टा झूठ का सहारा लेकर वे अपने एजेंडे में काफी हद तक सफल भी हो रहे हैं.
सोशल मीडिया, टीवी डिबेट, सभाओं में भारत की धार्मिक पहचान को दबाने के लिए सेक्यूलेरिज़्म का सहारा लिया जा रहा है जबकि लोग यह नहीं जानते कि सेक्यूलेरिज़्म वास्तव में हिंदू धर्म का ही तत्व है. धर्म नहीं तो सेक्यूलेरिज़्म भी नहीं. भारत का शासन, प्रशासन सभी को भारत की धार्मिक तासीर के अनुरूप ही काम काम करना होता है. भारत की सेना भी भारत के मूल को अपने ज़हन में बैठाकर देश की सेवा और रक्षा करती है. लेकिन भारत में बौद्धिक आतंकवाद फैलाने वाले कुछ वामपंथी तत्व अपनी धटिया सोच को अन्य लोगों पर थोपने और हिंसा फैलाने से रुक नहीं रहे. सबसे ताज़ा उदाहरण भारत की सेना को हिंदू धार्मिक गुरूओं और देश की संस्कृति से जुड़ने वाले कार्य करने पर बौद्धिक आतंकवादियों के निशाने पर लिया जाना है.
गणतंत्र दिवस से एक दिन पहले 25 जनवरी, 2026 को कथावाचक और धर्मगुरू धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की राजस्थान के कोटा में हुई कथा में शामिल हुए सेना के कुछ जवानों की देश भक्ती को लेकर वामपंथियों और मुसलमानों ने सोशल मीडिया पर जमकर हंगामा मचाया. धीरेंद्र शास्त्री के साथ वीडियों में सेना के जवान देशभक्ति वाले गीत गाते देखे जा सकते हैं. जिसे लेकर द वायर की इस्लाम परस्त पत्रकार अरफा खानम शेरवानी ने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा, “गणतंत्र दिवास की इव पर देश, गणतंत्र को मरते हुए लाइव देख रहा है.” देश को टुकड़ों में बांटने वाली मानसिकता रखने वाली अरफा खानम भारत और भारत के मूल धर्म के ख़िलाफ़ किस कदर ज़हर उगल सकती हैं इसका अंदाज़ा शायद आप और हम लगा ही नहीं पाएंगी.
सेना को धर्म से अलग रहने की दुहाई देते हुए खानम की ही विचारधारा के लोगों ने भारत में समाप्त होते सेक्यूलेरिज़्म पर जमकर झूठ फैलाया. लेकिन भारत के वामपंथी और मुस्लिम एक अलग दुनिया में जीने वाले लोग हैं जो भारत के गुण, आत्मा को आज तक समझ ही नहीं पाए या शायद समझने के बावजूद देश के लोगों में अपने झूठ को फैलाने की ज़िद में लगे हुए हैं. भारत लाखों साल पुरानी पवित्र भूमि है. यहां की सेनाएं आज से नहीं सदियों से इसकी रक्षा करती आईं हैं और पाकिस्तान, चीन से लड़ने से पहले मिडिल ईस्ट से आने वाले मुस्लिम आक्रांताओं से देश और धर्म की भी रक्षा करती रही हैं. यही भारत की सेना का असली गुण हैं. भारतीय सेना से धर्म की रक्षा का भाव खत्म कर देने का मतलब है सेना से देश की रक्षा का भाव समाप्त कर देना.
सेना की हर रेजिमेंट अपने साथ हिंदू धर्म से जुड़ी अपनी ताक़त साथ रखती है. जो उन्हें युद्ध के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेणा देती है. यह ताक़त अपने मज़बूत और गौरवशाली इतिहास के साथ उनके नारों में भी साथ रहती है.
भारतीय सेना (सामान्य): “भारत माता की जय”, “जय हिंद”, “वंदे मातरम.”
सिख रेजिमेंट: “बोले सो निहाल, सत श्री अकाल”
जाट रेजिमेंट: “जाट बलवान, जय भगवान”
राजपुताना राइफल्स: “राजा रामचंद्र की जय”
गोरखा रेजिमेंट: “जय महाकाली, आयो गोर्खाली”
मद्रास रेजिमेंट: “वीर मद्रासी, आदि कोल्लू, आदि कोल्लू” (बहादुर मद्रासी, हड़ताल करो और मार डालो)
कुमाऊं रेजिमेंट: “कालका माता की जय”, “बजरंग बली की जय”
डोगरा रेजिमेंट: “ज्वाला माता की जय”
जम्मू एंड कश्मीर राइफल्स: “दुर्गा माता की जय”
बिहार रेजिमेंट: “जय बजरंग बली”, “बिरसा मुंडा की जय”
असम रेजिमेंट: “असम विक्रम”
भारतीय सेना: “स्वयं से पहले सेवा”
भारतीय वायु सेना: “नभः स्पृशं दीप्तम्”
भारतीय नौसेना: “शं नो वरुणः”
ये युद्धघोष युद्ध या ऑपरेशन के दौरान सैनिकों का मनोबल बढ़ाने और उनमें एकता की भावना जागृत करने के लिए चिल्लाए जाते हैं. यह एक संक्षिप्त और प्रभावशाली नारा होता है जिसे सैनिक युद्ध में उतरने से पहले या परेड के दौरान लगाते हैं. इतिहास, संस्कृति और क्षेत्रीय गौरव से प्रेरित ये नारे कई उद्देश्यों को पूरा करते हैं: मनोबल बढ़ाना, भाईचारा मजबूत करना और शत्रुओं में भय उत्पन्न करना. भारतीय सेना का युद्धघोष मात्र शब्द नहीं है, यह एक मनोवैज्ञानिक हथियार है जो साधारण पुरुषों को निडर योद्धाओं में बदल देता है. ऐतिहासिक रूप से, युद्धघोषों का इतिहास प्राचीन युद्धकला से जुड़ा है. भारतीय सेना के कई रेजिमेंटों का युद्धघोष सीधे हिंदू धर्म, देवी-देवताओं और प्राचीन संस्कृति से प्रेरित है. ये उद्घोष सैनिकों में अदम्य साहस, जोश और भाईचारे का संचार करते हैं. युद्धघोष हिंदू पौराणिक कथाओं से प्रेरित है, जो हनुमान जी, दुर्गा, राम की शक्ति और भक्ति का आह्वान करता है. हमारी प्रत्येक रेजिमेंट अपना एक अनूठा घोष अपनाती है, जो उसकी विरासत को दर्शाता है और अक्सर संस्कृत, क्षेत्रीय देवता, भाषाओं या ऐतिहासिक युद्धों से प्रेरित होता है.
भारतीय सेना का युद्धघोष वैदिक काल से चला आ रहा है, जिसमें महाभारत के समान मंत्र शामिल हैं. ब्रिटिश शासन के दौरान, मद्रास रेजिमेंट जैसी टुकड़ियों ने “वीर मद्रासी, आदि कोल्लू” (वीर मद्रासी, प्रहार करो और मार डालो) को अपनाया. स्वतंत्रता के बाद, भारतीय सेना ने इन्हें स्वदेशी रूप दिया, जिससे परंपरा और आधुनिकता का मिश्रण हुआ.
यद्यपि भारतीय सेना एक धर्मनिरपेक्ष संस्था है, लेकिन उसके रेजिमेंटों के युद्धघोष उनके गौरवशाली इतिहास, वीरता की परंपरा और सांस्कृतिक जड़ों से गहराई से जुड़े हैं, जो उन्हें “सर्वधर्म समभाव” की भावना के साथ प्रेरित करते हैं. वर्तमान में सेना में धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा देने के लिए वर्दी में धार्मिक प्रतीकों के प्रदर्शन को सीमित करने के नियम भी हैं. लेकिन भारत की सेना का धार्मिक जुड़ाव नियमों से कहीं अधिक मज़बूत रहा है. ब्रिटिश शासन के समय के यह नियम भारत के मूल विचार के अनुरूप नहीं है. लेकिन भारतीय सेना ने इन्हीं नियमों में रहकर बेहद बारीकी से धर्म और सद्भाव के विचार को बढ़ाया है.
स्वामी विवेकानंद धर्म को राष्ट्रीय चेतना, भारतीय राष्ट्र की आत्मा मानते थे. उनके अनुसार, राष्ट्रीय जीवन धर्म के प्रवाह से चलता है और यदि धर्म को छोड़ दिया जाए, तो राष्ट्र अपनी पहचान खो देगा. बारत और भारत की सेना पर एक ही नियम लागू होता है. भारत के वामपंथी और तथाकथित लिबरल धर्म शब्द को त्याज्य मानकर हिंदू अस्मिता पर लगातार गहरे आघात करते रहते हैं. इसके पीछे स्पष्ट रूप से भारत की संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने के कुत्सित लक्ष्य ही रहते हैं. किन्तु ऐसा करने वाले यह भूल जाते हैं कि असंख्य ऋषियों और देवभूमि- भारत की संस्कृति को वे कभी भी समाप्त नहीं कर सकते हैं.
भारत युगों-युगों से धर्म की सत्ता से ही सञ्चालित होता आया है. इश्वांकु से लेकर राम तक और लव, कुश के बाद हज़ारों सालों तक राज करते आए राजाओं ने अपने शासन को सनातन के नियमों और आदर्शों के अनुरूप ही चलाया है. ऐसे में देश के लिए सेवा देने वाले हर व्यक्ति चाहे वह सेना में हो या किसी अन्य काम में, वह भारतीय मूल्यों पर ही देश की सेवा करता है.
अकादमिक जगत ने भारतीय संस्कृति यानि हिंदू संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट करने के अनेकानेक प्रकार के काम किए. निरन्तर देवी-देवताओं आदि के साथ हिंदू अस्मिता पर प्रहार किए जाते रहे आए. बौध्दिक कम्युनिस्ट आतंकियों ने हमारे इतिहासबोध के साथ–साथ हर उस पहचान को विकृत किया, मनमानी व्याख्याओं से लांछित किया; जो भारत की मूल सनातनी पहचान रही है. पाश्चात्य अवधारणा से प्रेरित-पालित और पोषित विचारधारा ने भारत के सन्दर्भ में ‘धर्म’ शब्द की गलत व्याख्या की. तत्पश्चात उसे हिंदू धर्म के सन्दर्भ में तो और भी अधिक घ्रणा एवं वितृष्णा के साथ प्रस्तुत किया.
भारतविरोधियों ने ‘सेक्युलरिज्म’ को ‘धर्मनिरपेक्ष’ के रूप में प्रस्तुत किया. इतना ही नहीं फिर इस सेक्युलरिज्म का अर्थ ही ‘हिंदू निरपेक्ष‘ हो गया. इसके परिणामस्वरूप अकादमिक पाठ्यक्रमों से लेकर विमर्शों एवं संस्थागत ढांचों में हिंदू द्रोह मानक बन गया. यानि भारत में भारतीय संस्कृति – हिंदू संस्कृति के विरुद्ध विषवमन करना श्रेष्ठता का परिचायक बनता चला गया. इस हिंदू द्रोही प्रवृत्ति की झलक समय- समय पर वामपंथियों के विचारों में दिखती रहती है. हमारे देश की अनेकों संस्थाओं में अभी भी बौध्दिक कम्युनिस्टों का आतंक किसी न किसी रूप में व्याप्त ही है.
मई महीने में ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत के थल सेना के प्रमुख सीडीएस उपेंद्र द्विवेदी चित्रकूट में जगद्गुरु रामभद्राचार्य का आशीर्वाद लेने पहुंचे. इस दौरान उन्होंने आध्यात्मिक चर्चा की. इसके बाद रामभद्राचार्य ने कहा कि उन्होंने आर्मी सेना के चीफ उपेंद्र द्विवेदी को राम मंत्र की दीक्षा दी है और दक्षिणा में पीओके की मांग की है. जगतगुरु से मिलते समय की कुछ तस्वीरों में द्विवेदी ने हाथ में गदा पकड़ी हुई थी. इस एक तस्वीर ने पूरे लेफ्ट जगत में हाहाकार मचाकर रख दिया. ऐसा लग रहा था मानों भारत के मुसलमान अपना सामान बांध ही ले और मिडिल इस्ट के लिए निकलने की तैयारी कर लें. ऐसा पागलपन भारत के लेफ्ट में ही देखने को मिल सकता है. जो विश्व के हर देश में वहां के मूल धर्म के लिए खड़ा हो सकता है लेकिन भारत के लिए कभी नहीं. भारत का सेना प्रमुख अगर हिंदू धर्म गुरु से नहीं मिलेगा तो आखिर किससे मिलेगा. धर्म भारत में जन्मजात कर्त्तव्यबोध के साथ सर्वोच्च आदर्शों के रूप में जीवनशैली में ढला हुआ है. सेना में भी यही आदर्श पाए जाते हैं. यह आदर्श ही तो है जो भारत की सेना को विश्व के अन्य देशों की सेना से अलग करते हैं.
आपको याद होगा पैरिस में आलंपिक खेलों की ओपनिंग सेरेमनी में की गई एक परफोर्मेंस को लेकर विश्व भर में आलोचना की गई थी. वह एक नाटक और डांस की मिश्रण था जिसमें जिज़स को केंद्र में रखा गया था. पैरिस में ईसाई धर्म का प्रभाव अधिक है, वहां की संस्कृति, समाज सभी इसी धर्म से जुड़ा है इसलिए अपने इश्वर के ज़रिए उन्होंने अपनी संस्कृति को ज़ाहिर करने की कोशिश की. आप कल्पना कीजिए भारत में एस तरह के आयोजनों में यदि राम या कृष्ण पर कोई प्रस्तुति की जाए तो लेफ्ट और लिबरल किस कदर पागल हो जाएगा. सनातन के प्रति भारत में पनपने वाली यह नफ़रत भारत को हर कदम पर भारी पड़ने लगी है. हर आयोजन, हर योजना, हर कार्यक्रम में लोगों के मन में अपने देश के आधार के प्रति ज़हर घोला जा रहा है.
धर्म, देश और सरकार के आपस का संबंध हमने कुछ ही दिनों पहले अमरिका में देखा. जब ईरान, इज़राइल और अमरिका के बीच तनाव की स्थिति में अमरिका के राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने देश के कुछ ईसाई पादरियों को अपने दफ्तर में बुलाया. ट्रंप ने कहा, “अमरिका को इस चुनौति भरे समय में फिर से ईश्वर की ओर लौटना होगा.” पादरियों ने ट्रंप के दफ्तर में अमरिका और राष्ट्रपति ट्रंप के लिए प्रार्थना की. एक पादरी ने कहा, “हे प्रभु, हम जिस मुश्किल समय का सामना कर रहें हैं, आप उसमें मार्गदर्शक करें.” विश्व में सबसे पहले संविधान बनाने वाले देश अमरिका ने भी अपने मूल को नहीं छोड़ा. और हमारे देश में अपने ही देश के मूल धर्म की छवि को खराब करने के लिए संविधान को हथियार की तरह रोज़ इस्तेमाल किया जाता है.
मोदी सरकार के आने के बाद वामपंथियों ने सनातन और भारतीय संस्कृति को एक ख़तरे के रूप में देखा है. लेकिन वे भूल गए कि भारत की आज़ादी का समय भी हिंदू रिवाज़ के हिसाब से मुहूर्त चुन कर तय किया गया था. पंडित हरदेव शर्मा त्रिवेदी औप पंडित सूर्यनारायण व्यास ने 15 अगस्त को बारत की आज़ादी के लिए ठीक मध्यरात्रि 12 बजे अभिजीत मुहूर्त चुना. ज्योतिष के अनुसार यह अत्यंत शुभ था. जिससे की कुंडली मज़बूत बनी. डॉ. राजेंद्र प्रसाद को ऐसा करने की सलाह दी गई जिसे उन्होंने स्वीकार किया. जिस देश की आज़ादी भी हिंदू मुहूर्त का हिसाब से तय हुई उसी देश को धर्मनिरपेक्षता की आड़ में देश के ही लोग किस कदर बदनाम कर रहें हैं.
हमें विचार करना होगा कि आखिर भारत की सेना जिस देश की सेवा कर रही रही है. वह देश क्या और कैसा है. उसका आधार क्या है. इंडिया का संस्कृत शब्द भारत है. संविधान के अनुच्छेद 1 के अनुसार, भारत ही इस देश का आधिकारिक नाम है. जिसका अर्थ है ‘भाया रतां इति भारतम्’ जहां भ मतलब है रोशनी, जो रोशनी लाए, उसे आगे बढ़ाए वह भारतीय है, रोशनी से मतलब है ज्ञान और बुद्धि. जो समाज ज्ञान, प्रकाश पर आधारित हो वहीं एक सम्पन्न समाज होता है. और भारत सदियों से सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से एक सम्पन्न समाज रहा है. भारत की सेना का भारतीय मूल्यों पर चलना कुछ देश विरोधी लोगों के लिए इतना कष्टकारी हो सकता है कि वे देश को लेकर गलत से गलत बयान देने में बिलकुल पीछे नहीं हटते. धर्म को लेकर उनकी दुष्मनी सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं रही वह अब सेना, सरकार और देश के लोगों तक भी पहुंच चुकी है.
सेना ने देश और धर्म की रक्षा समय-समय पर है तो वहीं धर्म ने भी सेना को हर कदम और मुश्किल समय में अकेला नहीं छोड़ा. हमें नहीं भूलना चाहिए जब 1962 में चीन के साथ युद्ध के समय तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के कहने पर मध्य प्रदेश के दतिया में स्थित पीतांबरा पीठ में माता बगलामुखी का 11 दिवसीय विशेष 51 कुंडीय महायज्ञ (ब्रह्मास्त्र यज्ञ) कराया था. नेहरू की विशेष गुज़ारिश पर यह यज्ञ शत्रु को शांत करने और देश की रक्षा के लिए संपन्न किया गया था, यज्ञ खत्म होने के तुरंत बाद चीन ने सेना वापस बुला ली थी. पौराणिक मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध से पूर्व पांडवों ने भी बगलामुखी साधना की थी.
शत्रु नाशक के रूप में प्रसिद्ध पीतांबरा पीठ में 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान भी शत्रुओं पर विजय के लिए यह गोपनीय अनुष्ठान किए गए थे. 1971 के भारत-पाक युद्ध में इंदिरा गांधी ने यहां हवन कराया था. 1999 में कारगिल युद्ध के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने भी विशेष पूजा की थी. ऐसा माना जाता है कि इन पूजाओं से भारत को युद्ध में मदद मिली थी. 16 दिसंबर, 1971 को जब हवन पूरा हुआ, उसी दिन पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण किया और युद्ध विराम की घोषणा हुई.
भारत में युद्ध जैसी मुश्किल स्थिति में भगवान की पूजा का महत्व रहा है. आज भी धर्म और आस्था का ऐसा मेल देखने को मिलता है. पीतांबरा पीठ इसका एक बड़ा उदाहरण है. यहां युद्ध के समय किए गए धार्मिक कामों की कई मान्यताएं हैं. लेकिन देश का वामपंथी वर्ग इसी आस्था को देश में सद्भाव की समाप्ती के रूप में देखता है. बौद्धिक आतंकवाद फैलाने वाले वामपंथियों के लिए दुख की बात यह है कि उनके झूठ फैलाने और लोगों को भड़काने की हज़ारों कोशिशों के बाद भारतीय सेना आज भी “राजा रामचंद्र की जय”, “बजरंग बली की जय” बोलकर दुश्मनों पर धावा बोल देती है. और आतंकवादी वर्ग अपने एक्स हैंडल पर सेक्यूलेरिज़्म खत्म होने की बात कहकर विलाप करता रहता है.
