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ऑपरेशन आज़ादी

भारत हुआ नक्सलवाद जैसी ख़तरनाक विचारधारा से आज़ाद

ऑपरेशन आज़ादी

भारत हुआ नक्सलवाद जैसी ख़तरनाक विचारधारा से आज़ाद

“कितने हिडमा मारोगे? हर घर से हिड़मा निकलेंगे” जैसे नारे लगाने वालों को जब तक देश की मुख्य विपक्षी और वामपंथी पार्टियों से समर्थन मिलता रहेगा तब तक देश को वैचारिक आधार पर नक्सलवाद से मुक्ति मिलना अवसाद जैसा लगता है, हालांकि कल संसद में गृहमंत्री ने इस बात की पुष्टि की है कि देश अब नक्सलियों और नक्सल आतंकवाद से मुक्त हो चुका है. देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता को खंडित कर देश के टुकड़े-टुकड़े करने वाली अलगाववाद और नक्सली विचारधारा ने देश की आंतरिक एकता और बाहरी छवि को जितना नुकसान पहुंचाया है उतना शायद पराधीन भारत को अंग्रेजों ने भी नहीं पहुंचाया हो. 

भारत में नक्सलवाद की जड़े कांग्रेस और वामपंथी विचारधारा के आस-पास घूमती हैं या ये कहें की कांग्रेस और नक्सलवाद एक दूसरे से जुड़े हुए हैं. भारत में नक्सलवाद के पनपने की शुरुआत नक्सलबाड़ी आंदोलन से होती है, जहां भूमि और अधिकारों के सवाल ने एक उग्र आंदोलन का रूप लिया. शुरुआती वर्षों में यह संघर्ष सीमित भौगोलिक दायरे में था, लेकिन 1970 के दशक तक आते-आते इसकी वैचारिक पकड़ गहरी होती गई. उस दौर में इंदिरा गांधी की राजनीति अपने चरम पर थी. राजनीतिक विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि उस समय के सत्ता समीकरणों ने उग्र वामपंथी विचारों को पूरी तरह हाशिये पर नहीं धकेला, बल्कि कुछ हद तक राजनीतिक स्पेस दिया.

1980 और 1990 के दशक नक्सलवाद के संगठित विस्तार के दशक रहे. 1980 के दशक में पीपुल्स वॉर ग्रुप जैसी संगठित ताक़तें उभरीं. इन संगठनों के माध्यम से यह आंदोलन कई राज्यों में फैला और अंततः 2004 में सीपीआई (माओवादी) के गठन के साथ एक केंद्रीकृत ढांचे में बदल गया. इसी दौर में तथाकथित “रेड कॉरिडोर” का विस्तार हुआ, जो 12 राज्यों में फैला एक ऐसा क्षेत्र था जहां सरकार और प्रशासन की उपस्थिति कमज़ोर और उग्रवादियों का प्रभाव मज़बूत होता गया.

दिलचस्प बात यह है कि 2000 के दशक में मनमोहन सिंह ने स्वयं नक्सलवाद को देश की सबसे बड़ी आंतरिक सुरक्षा चुनौती बताया. यह स्वीकारोक्ति महत्वपूर्ण थी, लेकिन इसके साथ ही यह सवाल भी उठा कि क्या सरकार की नीतियां इस चुनौती के अनुरूप थीं. 2005 में शुरू हुआ सलवा जुडूम इसी दुविधा का उदाहरण बना, एक ओर इसे जन-आंदोलन के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो दूसरी ओर 2011 में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने इसे असंवैधानिक ठहरा दिया. सुरक्षा और अधिकारों के बीच संतुलन का यह प्रश्न आज भी जस का तस है.

इसी कालखंड में पी. चिदंबरम के कुछ बयानों और नीतिगत रुख़ को लेकर भी बहस हुई. आलोचकों ने इसे नरम दृष्टिकोण बताया, जबकि समर्थकों ने इसे यथार्थवादी राजनीति का हिस्सा माना.

राजनीतिक विमर्श का एक और आयाम राहुल गांधी के कुछ सामाजिक और वैचारिक समूहों से संपर्क को लेकर सामने आता है, जिनमें गद्दार जैसे नाम शामिल हैं. यहां भी वही द्वंद्व दिखता है: क्या यह लोकतांत्रिक संवाद है या वैचारिक सहानुभूति? इसका उत्तर राजनीतिक दृष्टिकोण के अनुसार बदल जाता है.

नक्सलवाद ने पश्चिम बंगाल को अपनी चपेट में लेने से नहीं छोड़ा. बंगाल मे नक्सलवाद की शुरुआत 1967 में गांव में भूमि अधिकार को लेकर शुरू हुई. धीरे-धीरे नक्सलवाद की समस्या ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया. शुरू में यह केवल किसानों का संघर्ष लगता था, लेकिन जल्द ही यह एक ख़तरनाक विचारधारा में बदल गया. वामपंथी उग्रवादियों ने भोले-भाले आदिवासियों के सामने एक आकर्षक कहानी रखी: हम तुम्हारे अधिकारों और न्याय के लिए लड़ रहे हैं. लेकिन सच्चाई कुछ और थी. इंदिरा गांधी के शासनकाल में यह आंदोलन तेज़ी से फैला. 1971 में अकेले बंगाल में 3,620 हिंसक घटनाएं दर्ज हुईं. नक्सलवादी बंदूक उठाकर राज्य की व्यवस्था को चुनौती देने लगे. 1990 के दशक तक यह आंदोलन महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, ओडिशा, बिहार और आंध्र प्रदेश तक फैल चुका था.

‘रेड कॉरिडोर’ वाले राज्यों में आज़ादी के बाद के 75 सालों में से करीब 60 साल मुख्य विपक्षी पार्टियों की सरकार रही. फिर भी नक्सलवाद न केवल जीवित रहा, बल्कि और मज़बूत होता गया. 12 करोड़ से ज्यादा लोग इस जाल में फंसकर विकास से कोसों दूर रह गए. 20,000 से अधिक युवा मारे गए. स्कूल नहीं बने, सड़कें नहीं बनीं, अस्पताल नहीं बना.

भारत में अर्बन नक्सली और कुछ बुद्धिजीवी खुलकर या परोक्ष रूप से इस विचारधारा को समर्थन देते रहे. लेकिन 2014 के बाद रणनीति बदल गई. सरकार ने साफ कहा कि लाल आतंक विकास की कमी का नतीजा नहीं है, बल्कि लाल आतंक के कारण ही विकास नहीं हो पाया. अब दो मोर्चों पर एक साथ काम शुरू हुआ: एक तरफ सुरक्षा बलों को आधुनिक हथियार, खुफिया जानकारी और पूर्ण स्वतंत्रता दी गई; दूसरी तरफ विकास की बाढ़ लाई गई. सड़कें बननी शुरू हुईं. 17,589 किलोमीटर सड़कों की मंजूरी दी गई, जिनमें 12,000 किमी बन चुकी हैं. 5,000 मोबाइल टावर लगे, 8,000 और 4G टावर अभी लगने बाकी हैं. बैंकों की शाखाएं, एटीएम, डाकघर, एकलव्य विद्यालय, आईटीआई और स्किल सेंटर खुलने लगे. बस्तर में घर-घर बिजली, पानी और राशन पहुंचने लगा. सुरक्षा बलों, सीआरपीएफ, कोबरा, डीआरजी और राज्य पुलिस, ने अभूतपूर्व साहस दिखाया. बूढ़ा पहाड़, ऑपरेशन डबल बुल, थंडरस्टॉर्म और ब्लैक फॉरेस्ट जैसे अभियानों में जवानों ने 45 डिग्री की गर्मी, पहाड़ों और घने जंगलों में दिन-रात नक्सलियों के स्थायी कैंपों को तोड़ा. 21 दिन तक चले एक ऑपरेशन में नक्सलियों का पूरा 5 साल का हथियार, अनाज, सोलर सिस्टम का स्टॉक जब्त कर लिया गया. जिसका नतीजा धीरे-धीरे दिखने लगा. 2024 से 2026 तक के तीन सालों में 706 नक्सली मुठभेड़ में मारे गए, 2,218 गिरफ्तार हुए और 4,839 ने आत्मसमर्पण किया. सेंट्रल कमिटी और पोलित ब्यूरो के सभी 21 सदस्य या तो मारे गए, पकड़े गए या सरेंडर कर चुके हैं.

हिडमा, बसव राजू, गजुरल्ला रवि जैसे बड़े नाम समाप्त हो गए. दंडकारण्य, बस्तर और अन्य क्षेत्रों की कमेटियां टूट गईं. 31 मार्च, 2026 को आखिरकार वह दिन आ गया जिसका इंतजार देश को दशकों से था. संसद में ज़ोरदार आवाज़ में बताया गया कि “देश अब नक्सलवाद से आज़ाद हो चुका है.” लाल आतंक की परछाई हट चुकी है. बस्तर अब विकास की नई सुबह देख रहा है. जो हथियार डालेंगे, उन्हें पुनर्वास, नौकरी, शिक्षा और घर मिलेगा. लेकिन जो गोली चलाएंगे, उन्हें गोली से ही जवाब मिलेगा. यह कहानी सिर्फ बंदूकों और ऑपरेशनों की नहीं है. यह उस विचारधारा की हार की कहानी है जिसने 101 साल (1925 से 2026) तक देश के अंदर विदेशी प्रेरणा से पनपकर लोकतंत्र को चुनौती दी. यह उस दोहरे चरित्र की भी कहानी है जिसने मारे गए जवानों और आदिवासियों के लिए आंसू नहीं बहाए, लेकिन नक्सलियों के लिए ‘मानवाधिकार’ की दुहाई दी. आज जब बस्तर के गांवों में स्कूल की घंटियां बज रही हैं, सड़कें बन रही हैं और बच्चे खेल रहे हैं, तो एक सवाल सबके सामने है — अगर विकास ही मुद्दा था, तो 1970 से 2014 तक क्यों नहीं हुआ? और अगर विचारधारा ही असली दुश्मन थी, तो उसे इतने सालों तक किसने पनाह दी? नक्सलवाद की इस लंबी, खूनी यात्रा का अंत हो चुका है. अब भारत की एकता और विकास की नई कहानी लिखी जा रही है.

दुष्यंत शुक्ला
दुष्यंत शुक्ला
दुष्यंत शुक्ला दिल्ली स्थित एक राजनीतिक विश्लेषक और स्वतंत्र पत्रकार हैं.