एक व्यक्ति है, जिसकी चिंताएं प्रमुखतः उन कुप्रथाओं से संबंधित हैं, जो विशेष रूप से केवल हिंदू समाज में प्रचलित बताई जाती हैं और वह स्वयं को ‘निष्पक्ष’ कहता है — यह जानते हुए भी कि उसके शरीर का केवल ‘बायां’ भाग, अर्थात् उसका मस्तिष्क, सक्रिय है; आप समझ ही रहे हैं कि मेरा अभिप्राय क्या है. इस व्यक्ति के महाविद्यालयी प्रतियोगिताओं के बिंदु, मूट–कोर्ट वाद-विवाद के तर्क व यूपीएससी की उत्तर पुस्तिकाओं के दीर्घ उत्तर तथा उसका सामान्य–विशिष्ट दृष्टिकोण प्रायः महिलाओं के साथ हिंदू समाज में होने वाले कथित अत्याचारों के इर्द-गिर्द घूमते हैं और यह निष्पक्ष आदमी ‘उदारवाद’ के नाम पर उसी समाज की निंदा करता है. यदि आप अभी भी इस व्यक्ति को नहीं पहचान पाए हैं, तो वह और कोई नहीं, अपितु भारत का ‘दो शताब्दियों से ब्रेनवॉश’ किया गया युवा है. इस ‘ब्रेनवॉश’ युवावर्ग की इस ज्वाला को शांत करने, ठोस विश्लेषणात्मक तथ्यों के माध्यम से खोखली कथाओं का खंडन करने, तथा महिलाओं के प्रति ‘पीड़ित-केंद्रित’ दृष्टिकोण को परिवर्तित करने हेतु ए. एस. अल्टेकर ने अपनी एक अत्यंत उत्कृष्ट, निष्पक्ष एवं तथ्यपरक कृति ‘द पोज़िशन ऑफ वीमेन इन हिंदू सिविलाइज़ेशन : फ्रॉम प्रीहिस्टोरिक टाइम्स टू द प्रेज़ेंट डे’ की रचना की.
इस पुस्तक में कुल 12 अध्याय हैं और महिलाओं से संबंधित प्रत्येक विषय की लेखक ने विस्तारपूर्वक विवेचन किया है. यहां तक कि वे विषय भी सम्मिलित हैं, जिन पर वर्तमान काल के नारीवादी प्रायः मुखर होते हैं. विवाह की आयु, विवाह संबंधी नियम, वैवाहिक जीवन, पर्दा-प्रथा, दहेज, महिला-शिक्षा, तलाक, विधवा की सामाजिक स्थिति, सार्वजनिक जीवन एवं प्रशासन में महिलाओं की भूमिका, उनके व्यवसाय, संपत्ति-अधिकार तथा यहां तक कि उनके परिधान एवं आभूषण जैसे विषयों का अत्यंत विस्तार से वर्णन किया गया है और यह विवेचन प्राचीन काल से आधुनिक काल तक की यात्रा करता है.
इस पुस्तक की संदर्भ-सूची अपने आप में एक आजीवन अध्ययन-सूची के समान है. वैदिक एवं सहायक साहित्य से लेकर महाकाव्यों, पुराणों और तंत्रग्रंथों तक, अल्टेकर मुख्यतः मूल अथवा प्राथमिक स्रोतों पर आधारित रहते हैं. उनकी संदर्भ-सूची में सनातन धर्म की शाखाओं—बौद्ध एवं जैन—के ग्रंथ भी सम्मिलित हैं. इन ग्रंथों के संदर्भ देकर, प्राचीन काल की महिलाओं से संबंधित विषयों पर चर्चा करते समय, अल्टेकर अनायास ही दो महत्वपूर्ण कार्य करते हैं. पहला, वे उन वामपंथी प्रयासों का खण्डन करते हैं, जो हिंदू समाज को दमनकारी एवं रूढ़िवादी तथा बौद्ध धर्म को आधुनिक एवं प्रगतिशील सिद्ध करने का प्रयास करते हैं; और दूसरा, वे यह स्थापित करते हैं कि बौद्ध धर्म, सनातन परंपरा की ही एक शाखा है. प्रत्येक अध्याय का प्रत्येक विषय अपने इतिहास एवं विकास को आदिकाल से आधुनिक काल तक प्रस्तुत करता है.
लेखक ने धर्मशास्त्र साहित्य, धर्मसूत्रों, स्मृतियों एवं संस्कृत के शास्त्रीय साहित्य का भी संदर्भ लिया है हालांकि लेखक इन संदर्भों का अधिकांशतः समर्थन करते हैं, वहीं कुछ स्थानों पर उनकी आलोचना भी करते हैं. महिलाओं के आर्थिक एवं धार्मिक जीवन पर चर्चा करते हुए अल्टेकर अर्थशास्त्र एवं कामशास्त्र का भी उल्लेख करते हैं. वे निर्भीकतापूर्वक इस्लामी समाज और हिंदू समाज में महिलाओं के साथ होने वाले व्यवहार के स्पष्ट अंतर को मुस्लिम स्रोतों, विदेशी यात्रियों एवं मध्यकालीन विवरणों के आधार पर प्रस्तुत करते हैं. अपने विश्लेषण को सुदृढ़ करने के लिए वे ज़रथुष्ट्र धर्म (पारसी) के ग्रंथ ‘अवेस्ता’ का भी अनेक स्थानों पर उल्लेख करते हैं. इससे यह स्पष्ट होता है कि प्राचीन सभ्यताएं एकेश्वरवादी रिलीज़न की अपेक्षा में स्वभावतः उदार भाव की हुआ करतीं थीं.
अल्टेकर ने प्रत्येक विषय को दो व्यापक एवं स्पष्ट वर्गों, प्रारंभिक स्मृति-लेखक एवं उत्तरकालीन स्मृति-लेखक, में विभाजित कर उनकी विवेचना की है. जिससे यह स्पष्ट होता है कि किसी भी समाज का स्वरूप प्रारंभिक काल में लचीले एवं तर्कसंगत होता है व कालांतर में यह स्वरूप रूढ़ एवं कठोरता की ओर अग्रसर हो सकता है. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि वामपंथी प्रायः उत्तरकालीन स्मृतियों का संदर्भ लेकर हिंदू समाज को रूढ़ एवं दमनकारी सिद्ध करने का प्रयास करते हैं. जबकि सत्य यह है कि प्रत्येक समाज में कुछ दोष होते हैं; परंतु पश्चिमी समाज उन दोषों को अपनी संपूर्ण पहचान नहीं बनने देता, जबकि भारतीय समाज प्रायः इसके विपरीत करता है. यह पुस्तक भारतीय समाज के सद्गुणों तथा विशेषतः भारतीय महिलाओं के गौरवपूर्ण पक्ष को उजागर करती है.
लेखक ए. एस. अल्टेकर प्रारंभ में ही एक बौद्धिक कसौटी प्रस्तुत करते हैं, जिसके आधार पर किसी समाज में महिलाओं की स्थिति का आकलन महिला की पुरुष पर निर्भरता की सीमा एवं क्षेत्र, विवाह-संबंधी नियम एवं प्रथाएं, यौन नैतिकता के नियम, विवाह एवं गृह-प्रबंधन में महिला की सहभागिता, संपत्ति-अधिकारों की मान्यता, विधवाओं के प्रति समाज की सहानुभूति, शिक्षा की उपलब्धता, ललित कलाओं में प्रगति, वस्त्र एवं आभूषण, सार्वजनिक जीवन में सहभागिता की स्वतंत्रता, धर्म का न्याय एवं निष्पक्षता के प्रति दृष्टिकोण, धार्मिक अनुष्ठानों एवं दर्शन में महिला की स्थिति को देखकर किया जा सकता है.
इन बिंदुओं के माध्यम से पुस्तक की मूल धारा स्पष्ट होती है. अल्टेकर संदर्भों द्वारा पुत्र और पुत्री की इच्छा की तुलना करते हुए यह स्थापित करते हैं कि हिंदू समाज को केवल पितृसत्तात्मक कहना उचित नहीं है. वे स्पष्ट करते हैं कि “अथर्ववेद में पुत्री की अपेक्षा पुत्र के जन्म को सुनिश्चित करने के लिए मन्त्रों और धार्मिक अनुष्ठानों का उल्लेख मिलता है (III, 23; VI, 11). किंतु पुत्री का जन्म वैदिक और उपनिषद काल में परिवार के लिए किसी प्रकार की घबराहट या चिंता का कारण नहीं था. बल्कि, प्रारंभिक उपनिषदों में से एक — बृहदारण्यक उपनिषद — एक गृहस्थ को विदुषी पुत्री के जन्म की कामना हेतु एक विशेष अनुष्ठान करने की सलाह देता है (VI, 4, 27). यह स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि संस्कारित माता-पिता पुत्रों के समान ही पुत्रियों के लिए भी उतने ही उत्सुक रहते थे. कुछ विचारकों ने तो यहां तक कहा है कि एक प्रतिभाशाली और सुसंस्कृत पुत्री, पुत्र से भी बेहतर हो सकती है (संयुक्त निकाय, 111, 2). संस्कारित समाज में ऐसी पुत्री को परिवार का गौरव माना जाता था.”
आगे चलकर लेखक यह भी स्पष्ट करते हैं कि समय के साथ कालांतर में उपजे कुछ सामाजिक कारणों जैसे पितृ-श्राद्ध में पुत्र की अनिवार्यता, बाल-विवाह की प्रथा, विधवा-विवाह का निषेध, जातीय बंधनों की वृद्धि तथा सती-प्रथा, के कारण कन्या के जन्म को लेकर चिंता बढ़ी. परंतु यह चिंता उसके प्रति घृणा के कारण नहीं, बल्कि उसके भविष्य के प्रति अत्यधिक उत्तरदायित्व के कारण थी. अल्टेकर यह भी बताते हैं कि अनेक ग्रंथों में पुत्री को पुत्र से श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि वह अपने पिता के लिए पुण्य अर्जित करने का माध्यम बनती है.
वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि प्राचीन भारत में कन्या-भ्रूण हत्या या कन्या-हत्या का कोई व्यापक प्रमाण नहीं मिलता. यदि यह प्रथा व्यापक होती, तो स्मृतिकार उसका तीव्र विरोध अवश्य करते. इस संदर्भ में वे यह भी बताते हैं कि कुछ पाश्चात्य विद्वानों द्वारा ग्रंथों की गलत व्याख्या के कारण भ्रांत धारणाएं उत्पन्न हुईं. अन्ततः लेखक यह निष्कर्ष प्रस्तुत करते हैं कि कन्या के जन्म पर क्षणिक निराशा अवश्य हो सकती थी, परंतु यह भावना स्थायी नहीं थी और समाज में उसका सम्मान बना रहता था.
| वर्ष | 5 वर्ष से कम आयु के बालकों की संख्या | 5 वर्ष से कम आयु के बालिकाओं की संख्या |
| 1931 | 1458 | 1665 |
| 1921 | 1202 | 1306 |
| 1911 | 1327 | 1433 |
| 1901 | 1254 | 1339 |
| 1891 | 1409 | 1527 |
वेदों में विदुषी महिलाओं के योगदान का वर्णन करते हुए अल्टेकर तथ्य प्रस्तुत करते हैं कि प्रागैतिहासिक काल में स्वयं स्त्री कवयित्रियां ऋचाओं की रचना करती थीं, जिनमें से कुछ को वैदिक संहिताओं में भी स्थान प्राप्त हुआ. ऋग्वेद में अनेक सूक्त स्त्री विदुषियों के नाम से संबद्ध हैं. लोपामुद्रा को मंडल 1, सूक्त 179; विश्ववारा को मंडल 5, सूक्त 28; तथा सिकता निवावरी को मंडल 8, सूक्त 91 का श्रेय दिया जाता है. घोषा को मंडल 9, सूक्त 81 के मंत्र 11–20 की रचयिता माना जाता है. मंडल 10 के सूक्त 39 एवं 40 भी स्त्री ऋषियों से संबद्ध हैं, जबकि सूक्त 145 एवं 159 क्रमशः इंद्राणी एवं शची को समर्पित माने जाते हैं.
वे आगे लिखते हैं—
“ब्रह्मयज्ञ के समय जिन विद्वानों एवं आचार्यों की स्मृति में प्रतिदिन श्रद्धांजलि अर्पित करने का विधान है, उनमें कुछ स्त्रियों के नाम भी सम्मिलित हैं—जैसे सुलभा मैत्रेयी, वडवा प्रञ्चितेयी तथा गार्गी वाचक्नवी (आपस्तम्ब गृह्यसूत्र, III. 4. 4). इन विदुषियों ने निश्चय ही विद्या के क्षेत्र में वास्तविक योगदान दिया होगा, अन्यथा उनके नामों को भावी पीढ़ियों के लिए नित्य स्मरणीय बनाने की संस्तुति नहीं की जाती. यह अत्यंत खेद का विषय है कि हम इनके नामों के अतिरिक्त इनके विषय में कुछ भी नहीं जानते; इनके ग्रंथ संभवतः सदा के लिए लुप्त हो चुके हैं.”
अल्टेकर महिला विद्यार्थियों को दो वर्गों, ब्रह्मवादिनी एवं सद्योद्वाहा, में विभाजित करते हैं. ब्रह्मवादिनी वे थीं जो जीवनपर्यंत धर्म एवं दर्शन का अध्ययन करती थीं; जबकि सद्योद्वाहा विवाह तक ही अध्ययन करती थीं. ब्रह्मवादिनियां विद्या के क्षेत्र में उच्चतम उत्कृष्टता प्राप्त करने का लक्ष्य रखती थीं. इस अवधि में वे वैदिक स्तोत्रों का अध्ययन एवं कंठस्थ करती थीं, जिससे वे विवाहोपरांत धार्मिक अनुष्ठानों में सक्रिय भाग ले सकें. पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं कि पुरुषों के समान महिलाएं भी प्रातः एवं सायं वैदिक प्रार्थनाएं नियमित रूप से करती थीं. उदाहरणार्थ, रामायण में सीता का वर्णन नित्य वैदिक उपासना करती हुई प्राप्त होती हैं.
लेखक के अनुसार, वेदों के अतिरिक्त अनेक महिलएं पूर्वमीमांसा का भी अध्ययन करती थीं, जो यज्ञ-विधानों से संबंधित जटिल विषयों का विवेचन करती है. यह अत्यंत गूढ़ एवं कठिन शास्त्र है, फिर भी अनेक स्त्रियां इसमें गहरी रुचि रखती थीं. अल्टेकर ‘काशकृत्सन’ नामक आचार्य का उल्लेख करते हैं, जिन्होंने ‘काशकृत्सिनी’ नामक ग्रंथ की रचना की थी; इस शास्त्र में पारंगत महिलाओं को ‘काशकृत्स्ना’ कहा जाता था. यहां वे एक महत्वपूर्ण अवलोकन करते हैं, यदि इतनी जटिल शाखा में स्त्री विदुषियों की संख्या पर्याप्त थी कि उनके लिए विशेष शब्द गढ़ना पड़ा, तो यह मानना उचित होगा कि सामान्य शिक्षा प्राप्त करने वाली महिलाओं की संख्या भी पर्याप्त रही होगी.
वे आगे जोड़ते हैं—
“प्रत्येक ग्राम में एक ‘पुराणिक’ होता था, जिसके धर्म, दर्शन और संस्कृति पर आधारित प्रवचन ग्राम की स्त्रियां अत्यंत ध्यानपूर्वक सुनती थीं. यद्यपि वे औपचारिक रूप से शिक्षित नहीं थीं, तथापि वे परंपरा और संस्कृति की अधिक सच्ची संरक्षिका थीं.”
अल्टेकर कुछ प्रमुख विदुषी स्त्रियों का उल्लेख करते हैं—
गार्गी – मिथिला के राजा जनक के दरबार में आयोजित दार्शनिक वाद-विवाद में गार्गी ने अत्यंत सूक्ष्म प्रश्न प्रस्तुत किए और याज्ञवल्क्य जैसे विद्वान से निर्भीकता से संवाद किया.
मैत्रेयी – वे आभूषण एवं भौतिक वस्तुओं की अपेक्षा अमरत्व के ज्ञान में अधिक रुचि रखती थीं.
आत्रेयी – वे वेदांत की विद्यार्थिनी थीं और वाल्मीकि तथा अगस्त्य जैसे ऋषियों से अध्ययन कर रही थीं.
लेखक बताते हैं कि संस्कृत भाषा में शिक्षिका एवं आचार्य-पत्नी के लिए पृथक शब्द प्रचलित थे—‘उपाध्यायिनी’ आचार्य की पत्नी के लिए, जबकि स्वयं अध्यापन करने वाली विदुषी को ‘उपाध्यायी’ कहा जाता था. इनमें से कुछ विदुषियां आध्यात्मिक साधना हेतु आजीवन अविवाहित रहती थीं.
अल्टेकर बौद्ध एवं जैन परंपराओं में भी स्त्री शिक्षा के उदाहरण प्रस्तुत करते हैं. वे लिखते हैं कि ब्रह्मवादिनियों के समान ही बौद्ध परिवारों में भी अनेक स्त्रियां ब्रह्मचर्य का पालन कर धर्म-दर्शन का अध्ययन करती थीं. संघमित्रा जैसी विदुषी विदेशों में भी विख्यात हुईं. ‘थेरीगाथा’ की 32 अविवाहित एवं 10 विवाहित स्त्रियां मुक्ति प्राप्त करने वाली मानी जाती हैं. जैन परंपरा में भी जयंती जैसी विदुषी का उल्लेख मिलता है, जिन्होंने महावीर से दीक्षा ली.
अल्टेकर यह भी स्पष्ट करते हैं कि सनातन परंपरा मूलतः उदार थी. आत्रेयी का वाल्मीकि के आश्रम में लव-कुश के साथ अध्ययन करना सहशिक्षा का उदाहरण है. पुराणों में भी ऐसे उदाहरण मिलते हैं जो इस उदार दृष्टिकोण को पुष्ट करते हैं. वे यह भी उल्लेख करते हैं कि मुस्लिम शासनकाल में हिंदू महिलाओं की साक्षरता में तीव्र गिरावट आई, तथापि परंपरा के संरक्षण में उनका योगदान बना रहा.
अब आता है पिछले दो दशकों का सबसे अधिक ज्वलंतशील और विवादास्पद विषय अर्थात् विवाह. विवाह सदैव से ही भ्रमित युवाओं के लिए एक प्रश्नात्मक मुद्दा रहा है. इस विषय पर अल्टेकर ने अपनी पुस्तक में जो कहा है, वह विचारणीय है. वे इस तथ्य पर बल देते हैं कि 500 ईसा पूर्व तक (यद्यपि विवाह पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए वांछनीय माना जाता था) समाज इस बात पर ज़ोर नहीं देता था कि विवाह हर स्थिति में किया ही जाए. वैदिक साहित्य में अविवाहित स्त्रियों का उल्लेख मिलता है; “अमाजूह”, अर्थात् वह जो अपने माता-पिता के घर में वृद्ध हो जाए — यह शब्द एक अविवाहित वृद्धा के लिए प्रयुक्त होता था.
लेखक महिलाओं के विवाह को अनिवार्य बनाने के तर्क पर प्रकाश डालते हैं. वे बताते हैं कि उपनिषदों के काल में सैकड़ों युवक बिना विवाह की चिंता किए संन्यास लेने लगे थे और कुछ युवतियां, जैसे सुलभा, आध्यात्मिक मुक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य से उनका अनुकरण करने लगीं. थेरीगाथा (बौद्ध धर्म का एक प्राचीन और ऐतिहासिक ग्रंथ) की टीका से पता चलता है कि कुछ महिलाएं विवाह से पहले ही बौद्ध संघ में शामिल हो जाती थीं. परंतु लगभग 300 ईसा पूर्व तक, विवाह को कन्याओं के लिए अनिवार्य माना जाने लगा और इसके पीछे कई कारण थे. सबसे पहले, समाज में यह प्रतिक्रिया उत्पन्न हुई कि कुछ युवतियां बिना वास्तविक आध्यात्मिक प्रेरणा के या अपने बड़ों की स्वतंत्र और स्वाभाविक अनुमति के बिना बौद्ध और जैन संप्रदायों में प्रवेश कर रही थीं. उनमें से कुछ अपने उच्च आदर्शों पर खरी नहीं उतर सकीं और उनकी त्रुटियों की समाज में तीव्र आलोचना हुई. सामाजिक चिंतकों ने अनुभव किया कि ऐसे दुरुपयोगों को रोकने के लिए सभी कन्याओं के लिए विवाह को अनिवार्य बना देना ही बेहतर होगा.
अल्टेकर एक उदाहरण भी देते हैं कि सुभ्रू, ऋषि कुणि की पुत्री थी. उसके पिता उसका विवाह करना चाहते थे, परंतु उसने सहमति नहीं दी. वह जीवनभर अविवाहित रही और कठोर तपस्या करती रही. किंतु मृत्यु के समय उसे यह जानकर अत्यंत आश्चर्य हुआ कि वह स्वर्ग नहीं जा सकती क्योंकि उसका शरीर विवाह संस्कार से संस्कारित नहीं हुआ था. तब उसने बड़ी कठिनाई से ऋषि शृंगवत को उससे विवाह करने के लिए प्रेरित किया, एक रात्रि उनके साथ निवास किया और इसके बाद उसे स्वर्ग जाने की अनुमति मिल सकी. एक उत्तरकालीन सूत्र तो यहां तक कहता है कि किसी कन्या के शव का दाह संस्कार भी औपचारिक विवाह के बाद ही किया जा सकता है, भले ही वह मृत्यु के पश्चात् ही क्यों न हो. यह ध्यान देने योग्य है कि समकालीन फारस में भी कन्याओं के लिए विवाह अनिवार्य कर दिया गया था.
विवाह के प्रकारों पर चर्चा करते हुए अल्टेकर कहते हैं कि स्मृतियों द्वारा मान्य आठ प्रकार के विवाह प्रसिद्ध हैं. किंतु हिंदु समाज के कुछ वर्गों में प्रचलित अनेक अन्य प्रकार और रीति-रिवाज भी थे, जिन्हें धर्मशास्त्र साहित्य में मान्यता नहीं मिली. ब्रह्म, दैव, प्राजापत्य और आर्ष — ये चार स्वीकृत विवाह रूप हैं. केवल इन प्रकार के विवाहों में ही सप्तपदी संस्कार के अंत में वधू के गोत्र परिवर्तन के द्वारा धार्मिक दृष्टि से विवाह पूर्ण माना जाता है. शेष चार प्रकार के विवाहों को ऋषि मनु ने कुछ कारणों से अस्वीकार्य बताया है, जिनका विस्तार से वर्णन पुस्तक में किया गया है.
अंतरजातीय विवाह के विषय में लेखक यह बताते हैं कि जाति ने लंबे समय तक विवाह के मार्ग में कोई असाध्य बाधा उत्पन्न नहीं की. मनु के समय में भी यह व्यवस्था आज की तुलना में अधिक लचीली थी, चाहे वह अंतर्जातीय विवाह हो या सहभोजन… तथापि यह देखा जा सकता है कि अनुलोम विवाह, अर्थात् उच्च जाति के पुरुषों का निम्न जाति की स्त्रियों से विवाह, आठवीं शताब्दी ईस्वी तक समाज में सामान्य थे. यहां तक कि स्मृति और निबंधकारों ने भी उन्हें वैध माना. चौदहवीं शताब्दी ईस्वी तक धर्मशास्त्रकारों ने विभिन्न जातियों की पत्नियों से उत्पन्न पुत्रों के उत्तराधिकार के नियम भी निर्धारित किए.
शिलालेखीय और साहित्यिक प्रमाण भी यही दर्शाते हैं. शुंग वंश के ब्राह्मण राजा अग्निमित्र ने लगभग 150 ईसा पूर्व में मालविका नामक क्षत्रिय राजकुमारी से विवाह किया था. पांचवीं शताब्दी के एक अभिलेख में वर्णित है कि सोम नामक एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण ने एक क्षत्रिय स्त्री से ‘श्रुति और स्मृति के नियमों के अनुसार’, न कि किसी तुच्छ कारण से, विवाह किया; वाकाटक मंत्री हस्तिवर्मन उसी के वंशज थे. लगभग उसी समय ब्राह्मण जाति का कदंब शासक था, जिसने अपनी पुत्री का विवाह गुप्तों से किया जो कि वैश्य थे.
अल्टेकर ने पारंपरिक, धार्मिक एवं शैक्षणिक जीवन के संतुलन हेतु एक व्यावहारिक शिक्षा-व्यवस्था का सुझाव दिया कि प्राथमिक शिक्षा 10 वर्ष की आयु तक पूर्ण हो, माध्यमिक शिक्षा 17 वर्ष तक पूर्ण हो, जिसमें गृह-विज्ञान, संगीत आदि विषय शामिल हों, महाविद्यालयीन शिक्षा 20 वर्ष तक पूर्ण हो, व्यावसायिक एवं व्यावहारिक शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए, आवश्यकतानुसार उच्च शिक्षा के लिए अवसर उपलब्ध हों.
उनके अनुसार यह व्यवस्था महिलाओं के गृहस्थ जीवन, धार्मिकता (धार्मिक जीवन) और अकादमिक करियर के बीच संतुलन को स्पष्ट रूप से दर्शाती है. यद्यपि यह उनका उद्देश्य नहीं था, फिर भी अल्टेकर अपने गहन, सूक्ष्म, तथ्यपूर्ण और तार्किक लेखन के माध्यम से कई स्थापित संस्कृति विरोधी वामियों द्वारा पोषित विमर्शों का खंडन करते हैं.
इस पुस्तक में कई विषयों पर चर्चा की गई है, लेकिन चूंकि सभी मुद्दों को एक ही पुस्तक समीक्षा में समाहित नहीं किया जा सकता, इसलिए हम अन्य महत्वपूर्ण विषयों—जैसे विवाह योग्य आयु, तलाक, शिक्षा, विदुषी महिलाएं, प्रशासन और सैन्य क्षेत्र में महिलाएं, कला में महिलाओं की भूमिका, तथा महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता—पर अगले भाग में चर्चा करेंगे.
