बीते दिनों स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर की पुण्यतिथि पर पूरे देश में उनके यागदान को याद किया गया. लेकिन भारत का विपक्ष और लिबरल गुट इस दिन पूरी ताक़त के साथ अपना एजेंड़ा चलाने में व्यस्त था. लेकिन सत्य को संवाद से डर नहीं लगता. असत्य ही आंख मिलाने से डरता है. सत्य सामना करता है. असत्य छुपने का स्थान खोजता है. यह बात न केवल हमारे व्यवहारिक जीवन में लागू होती है बल्कि राजनीतिक-विमर्श में भी इसको बड़ी चतुराई से भुनाया गया. आज़ादी की लड़ाई का श्रेय किन विशिष्ट लोगों को मिले और उससे प्राप्त सत्ता-सुख कौन भोग सकें— इसकी व्यवस्था सत्य से संवाद करके नहीं बल्कि उससे भागकर की गई. जिन्होंने स्वाधीनता के लिए अपना जीवन होम दिया वो गुमनाम ही रहे और जिनकी ज़ेल भी किसी पॉंच सितारा होटल सरीखी थीं— वो ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ के प्रणेता बने.
इस ‘अस्पृश्यता’ और ‘गुमनामी’ के शिकार थे— वीर सावरकर. जितनी अमानवीय यातनाएं और क्रूरताएं वीर सावरकर ने भुगतीं वैसी निर्मम स्थिति की कल्पना करना ही दुष्कर है. किंतु सावरकर को बहुत सुनियोजित ढंग से सांप्रदायिक घोषित कर मुख्य परिदृश से ग़ायब कर दिया गया. उनको न पढ़ाया गया और न ही उनके बारे में कहीं बताया गया. हालांकि कुछ लोगों ने उनके धुसरित साहित्य और विस्मृत जीवन को स्वप्रेरणा से ही उजाले में लाने का प्रयास किया और उसके बाद राष्ट्र ने उनके कृतित्व को जाना.
“माफ़ीवीर” से लेकर गांधी-हत्या के षड्यंत्र में सम्मिलित होने तक के आक्षेप सावरकर पर लगे. उनके इतिहास के समूल नाश का विधिवत षड्यंत्र चला किंतु समय ने करवट ली और सावरकर फिर उठ खड़े हुए. सावरकर से बहस नहीं की गई. उनके विचारों का प्रतिकार कठिन था. उनको किसी खांचे तक सीमित कर उनके श्रेणीकरण का ही उद्यम हुआ. और यह न केवल सावरकर के साथ हुआ बल्कि उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों के साथ हुआ— जिन्होंने अपने प्राण देकर इस आज़ादी की कीमत चुकाई. लेकिन मुकुट सजा उनके सर जिनकी जैकेट पर सुनहरा गुलाब फबता था.
‘आइडिया ऑफ इंडिया’ की गूंज सावरकर के साहित्य में सुनाई पड़ती है. अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और विलक्षण मेधा के बल पर भारत-भूमि और उसके वैभव का विवेचन किया और इस राष्ट्र की पहचान को नए सिरे से सूत्रबद्ध किया. वही सांस्कृतिक महत्ता इस भारतदेश को जोड़ती है और उसके सातत्य को बनाए रखी है.
“मुट्ठी भर बालू को सब और फेंक दिया जाए, उसी तरह यदि हम सबको दस दिशाओं में बिखेर दिया जाए, तब भी, रामायण व महाभारत— ये दोनों ग्रंथ हमें एकत्रित करने की क्षमता रखते हैं.”
ऐसा सुदीर्घ लेखन और ऐसी सुघड़ दृष्टि सावरकर की ही हो सकती है.
एक बेचैन व्यक्तित्व, निर्भय बौद्धिक और महान स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के योगदान को वामपंथी तबके ने अपने अपनेकों झूठे आरोपों के तले दबा दिया. यह सत्य है कि जिस तरह की यातनाएं सावरकर को दी गई थी कांग्रेस के किसी नेता को नहीं दी गई. बल्कि उन्हें जेल में भी पूरे ऐशों आराम के साथ रखा गया. भारत के सच्चे सपूत पर जिस तरह का झूठ कांग्रेस और लेफ्ट के साथी फैला रहे हैं वह बेशर्मी की हद से परे है. अब समय आ गया है कि दशकों से सावरकर को देश विरोधी बताने वाले वर्ग को सच का आइना दिखाया जाए. और बताया जाए कि गांधी परिवार से परे भी भारत के कई सपूतों ने भारत के लिए सच्चा योगदान दिया था. उन्होंने जेल में हड्डियां तक चूर कर देने वाली यातनाएं सही थी न कि जेल की सुविधाओं में रहकर अपने घर की औरतों के लिए साड़ियां बुनी थी.
