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आधुनिक गुलामी

भारतीय संस्कृति को दिलानी होगी पश्चिमी विचारों के दबाव से स्वतंत्रता

भारत में यह चलन नया नहीं है, स्वतंत्रता के बाद से ऐसा ही हो रहा है कि भारत के अपने मूल्यों, इतिहास, सभ्यता और परंपराओं पर संदेह और सवाल उठाए जाते हैं. हमारे भीतर अपनी पहचान को लेकर एक बड़ा प्रश्न खड़ा करने की कोशिश की गई है. वर्तमान समय में हम अपने आदर्श, नियम, विचार, व्यवहार, संस्कार को आसानी से कटघरें में खड़ा कर देते है. हमें भारतीय परंपराएं ढकोसला लगने लगी हैं लेकिन वहीं जब बाहरी संस्कृति की खोखली चमक-धमक देखते हैं तो हम उसे अपनाने में बिलकुल देरी नहीं करते. यह सिर्फ़ एक आदत नहीं है बल्कि यह एक मानसिकता है जो धीरे-धीरे हमारे अंदर बैठ चुकी है और यहां बात केवल पसंद या नापसंद की नहीं है बल्कि यह एक गहरे मनोवैज्ञानिक ढांचे का परिणाम है, जिसमें हम अपनी संस्कृति, परंपराओं और जीवनशैली को अपनी दृष्टि से नहीं बल्कि एक उधार की दृष्टि से देखते हैं, एक ऐसी दृष्टि जो हमें यह सिखाती है कि पश्चिम आधुनिक, तार्किक और श्रेष्ठ है जबकि भारतीय परंपराएं पुरानी, अवैज्ञानिक और पिछड़ी हैं.

परिणामस्वरूप हम अपनी ही जड़ों से कटते चले जा रहें हैं और यह कटाव हमें महसूस भी नहीं होता क्योंकि इसे “प्रगति” और “मॉडर्निटी” का नाम दे दिया गया है. किसी ने यह जानने की कोशिश ही नहीं की कि इन परंपराओं के पीछे की सोच क्या थी, उनका उद्देश्य क्या था, बस एक लेबल लगा दिया गया “आउटडेटेड” और यही कारण है कि अब हमें अपनी जड़ों से कटना भी महसूस नहीं होता.  

यह प्रवृत्ति हमारी रोज़मर्रा की जिंदगी में साफ़ दिखाई देती है, जैसे एक युवा सूर्य नमस्कार को “पुरानी सोच” कहकर नकार देता है लेकिन वही व्यक्ति “माइंडफुल मॉर्निंग योगा” के नाम पर पैसे देकर क्लासेस अटेंड करता है, यहां फर्क केवल प्रस्तुति और स्रोत का है न कि सिद्धांत का. यही स्थिति हमारे त्योहारों के साथ भी है, दिवाली को प्रदूषण तक सीमित कर दिया जाता है, पर वही लोग न्यू ईयर की पार्टी पर कुछ नहीं कहते, होली को पानी की बर्बादी और गंदगी का प्रतीक बताया जाता है लेकिन उन्हीं रंगों के कॉन्सेप्ट को म्यूज़िक फेस्टिवल्स में “कलर ब्लास्ट” के नाम पर सराहा जाता है, करवा चौथ को पितृसत्तात्मक कह कर ख़ारिज कर दिया जाता है लेकिन वही लोग वैलेंटाइन डे को समर्पण और प्रेम की तरह देखते हैं और हैलोवीन को “कूल” और “क्रिएटिव” कहते हैं. यह विरोधाभास स्पष्ट करता है कि समस्या परंपराओं में नहीं बल्कि हमारी दृष्टि में है, हम अपने त्योहारों को कमतर समझते हैं और वहीं पश्चिम से आई अवधारणओं आधुनिकता का प्रतीक बना देते हैं.  

विवाह और पहनावे में भी यही दोहरापन दिखाई देता है, हिंदू विवाह में कुछ क्षण घूंघट लेने को दबाव और पिछड़ेपन का प्रतीक बताया जाता है लेकिन क्रिश्चियन शादी में वेल को “क्लासी” और “ट्रेडिशनल” कहा जाता है. यहां फर्क सिर्फ इतना है कि एक हमारी परंपरा है और दूसरी विदेशी है. ऐसा नहीं है कि हर महिला को हर वक़्त घूंघट में रहना चाहिए और प्रत्येक व्यक्ति की कपड़े पहनने की अपनी स्वतंत्रता है कि वह क्या पहनना चाहता है. लेकिन अगर एक लड़की अपनी इच्छा से अपनी परंपरा निभाती है तो उसे निचली नज़रों से देखना और उसी चीज़ की दूसरे रूप में सराहना करना लिबरल और मॉडर्न कहलाने का नया तरीका बन गया है.

यही स्थिति पहनावे में भी है, साड़ी को असुविधाजनक और पुराना मान लिया जाता है लेकिन वहीं ड्रेपिंग स्टाइल जब अंतरराष्ट्रीय फैशन शो में दिखता है तो उसे सराहा जाता है, बिंदी को रोज़मर्रा में पिछड़ा कहा जाता है लेकिन वही बिंदी म्यूज़िक फेस्टिवल्स में फैशन स्टेटमेंट बन जाती है, मेहंदी को साधारण समझा जाता है लेकिन “टेम्पररी टैटू” के नाम पर वही ट्रेंड बन जाती है. यह स्पष्ट करता है कि समस्या परंपराओं में नहीं है बल्कि हमारी मानसिकता में है. हमें अपनी चीज़ों से नहीं बल्कि उनके “भारतीय” होने से समस्या है. 

इस मानसिकता की जड़ें इतिहास में गहराई तक फैली हुई हैं. 19वीं सदी में ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने केवल भारत के संसाधनों का ही दोहन नहीं किया बल्कि भारतीय समाज के मानसिक ढांचे को भी बदलने का सुनियोजित प्रयास किया. 1835 में थॉमस बैबिंगटन मैकॉले ने अपनी प्रसिद्ध शिक्षा नीति में भारतीय ज्ञान परंपरा को नकारते हुए एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की वकालत की, जिसका उद्देश्य ऐसे लोगों का एक वर्ग तैयार करना था जो “रक्त और रंग से भारतीय हों लेकिन विचार, स्वाद और बुद्धि से अंग्रेज़ हों.” इस शिक्षा प्रणाली ने भारतीयों के भीतर अपनी ही सभ्यता के प्रति संदेह और हीन भावना पैदा की. भारतीय ग्रंथों, आयुर्वेद, गणित और दर्शन को अप्रासंगिक बताया गया जबकि पश्चिमी ज्ञान को श्रेष्ठ और वैज्ञानिक घोषित किया गया. 

यह कोशिश केवल शिक्षा तक सीमित नहीं रही, औपनिवेशिक सत्ता ने एक ऐसी “मानसिक पदानुक्रम” स्थापित की जिसमें पश्चिम को तर्क, प्रगति और परिपक्वता का प्रतीक बनाया गया और भारत को अंधविश्वास, भावुकता और बचकानेपन से जोड़ा गया. इस मानसिक ढांचे को भारतीय समाज ने धीरे-धीरे आत्मसात कर लिया और यही कारण है कि आज भी हम अपनी संस्कृति को उसी नज़र से देखते हैं, जो हमें अंग्रेजी शासन ने दी थी. 

स्वतंत्रता के बाद भी यह मानसिकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई. राजनीतिक स्वतंत्रता मिलने के बावजूद शिक्षा प्रणाली, प्रशासनिक ढांचा और सांस्कृतिक अभिजात वर्ग पश्चिमी प्रभाव में ही बना रहा. अंग्रेज़ी भाषा सत्ता, प्रतिष्ठा और अवसर का माध्यम बनी रही और भारतीय भाषाओं को धीरे-धीरे हाशिये पर डाल दिया गया. 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद यह प्रवृत्ति और तेज़ हो गई, जब पश्चिमी ब्रांड्स, मीडिया, हॉलीवुड और बाद में सोशल मीडिया ने यह धारणा और मज़बूत कर दी कि पश्चिमी जीवनशैली ही आधुनिकता और सफलता का मानक है. इस पूरी प्रक्रिया ने एक ऐसे समाज को जन्म दिया जो अपनी पहचान को लेकर पूरी तरह असहज है, जो अपनी भाषा बोलने में झिझकता है, अपने त्योहारों को मनाने में सफाई देता है और अपनी परंपराओं को अपनाने से पहले बाहरी स्वीकृति का इंतजार करता है.

यही कारण है कि आज हम अपने वास्तविक इतिहास से नहीं बल्कि उसकी एक विकृत छवि से जूझ रहे हैं, एक ऐसी छवि जो हमारी सभ्यता को केवल अंधविश्वास और पिछड़ेपन के रूप में प्रस्तुत करती है जबकि सच्चाई यह है कि इसी सभ्यता ने गणित, चिकित्सा, योग, दर्शन और सामाजिक संतुलन के ऐसे सिद्धांत दिए जिन्हें आज पूरी दुनिया अपना रही है. यह मानसिकता केवल सांस्कृतिक व्यवहार तक सीमित नहीं है बल्कि हमारे सामाजिक और बौद्धिक विमर्श को भी प्रभावित करती है. हम अपने ही ज्ञान को तब तक गंभीरता से नहीं लेते जब तक कि उसे पश्चिमी संस्थानों या वैज्ञानिकों द्वारा प्रमाणित न कर दिया जाए. योग, आयुर्वेद, ध्यान , इन सबको वैश्विक मान्यता तब मिली जब पश्चिमी दुनिया ने उन्हें स्वीकार किया जबकि ये सब सदियों से भारतीय परंपरा का हिस्सा रहे हैं.

सबसे बड़ा विरोधाभास तब सामने आता है जब हम दूसरों पर आरोप लगाते हैं कि वे हमारी संस्कृति को कॉपी कर रहे हैं. जब कोई अन्य देश हमारे पहनावे, खानपान या परंपराओं को अपनाता है तब हमें गर्व भी होता है और कभी-कभी आक्रोश भी, लेकिन उसी समय हम खुद अपनी ही संस्कृति को नज़रअंदाज कर रहे होते हैं. अगर हम खुद अपनी चीज़ों की कद्र नहीं करेंगे तो दूसरों के अपनाने पर शिकायत करना केवल एक विरोधाभास ही होगा. 

इस समस्या का समाधान अंधानुकरण में नहीं है, न तो पश्चिम का अंधानुकरण और न ही अपनी परंपराओं का अंधसमर्थन. समाधान है जागरूकता, समझ और संतुलन में. हमें अपनी परंपराओं को उनके मूल संदर्भ में समझना होगा, उनके पीछे के दर्शन, सामाजिक संरचना और उद्देश्य को जानना होगा. जो प्रासंगिक है उसे अपनाना होगा जो सुधार योग्य है उसे सुधारना होगा लेकिन यह निर्णय हमारी अपनी समझ से होना चाहिए न कि किसी बाहरी मानक से. 

यह संघर्ष केवल सांस्कृतिक नहीं बल्कि मानसिक स्वतंत्रता का भी संघर्ष है. राजनीतिक स्वतंत्रता हमें 1947 में मिल गई थी लेकिन मानसिक स्वतंत्रता अभी अधूरी है. 

आकांक्षा सिंह रघुवंशी
आकांक्षा सिंह रघुवंशी
आकांक्षा सिंह रघुवंशी इतिहास, संस्कृति और राजनीति पर लिखती हैं, जिसमें उनका स्पष्ट ध्यान प्रामाणिक कथाओं के संरक्षण और विकृतियों को चुनौती देने पर केंद्रित है.