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रेज़ बेट से बीमार पड़ता सोशल मीडिया

मैं सोशल माडिया प्लैटफॉर्म एक्स पर चलने वाली गतिविधियों पर नियमित रूप से नज़र रखती हूं. 7 फ़रवरी को जब मैंने अपना एक्स अकाउंट खोला, तो मैंने ‘Faarees’ नाम के एक अकाउंट से किया गया एक पोस्ट देखा. अपने ट्वीट में Faarees ने लिखा था: “सिर्फ़ मूर्ख और बेवकूफ़ लोग ही अब भी मानते हैं कि 9/11 मुसलमानों ने किया था.” Faarees ने यह ट्वीट उस व्यक्ति के पोस्ट के जवाब में लिखा था, जिसमें ‘anti-infidels’ 9/11 हमले की एक तस्वीर थी और कैप्शन में लिखा था—‘Look to Islam.’

9/11 हमले के बारे में जानकारी होने के कारण, यह देखकर मैं आहत हुई. क्योंकि हम सभी को पता है कि इस हमले के पीछे अल-क़ायदा था और उस संगठन का नेता ओसामा बिन लादेन था, जो एक मुस्लिम था. फिर मैंने सोचा, इस व्यक्ति ने ऐसा क्यों लिखा होगा? यहीं से मेरी यह खोज शुरू हुई कि सारी जानकारी बोने के बाद भी मैं इस पोस्ट से आहत क्यों हुई. और आखिरकार इसका जवाब मिला. वह शब्द था— रेज़ बेट.

दरअसल, दिसंबर 2025 में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी ने रेज़ बेट को ‘वर्ड ऑफ द इयर’ घोषित किया था. ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी के अनुसार, रेज़ बेट का मतलब है, “ऐसा ऑनलाइन कंटेंट जो जानबूझकर गुस्सा या आक्रोश पैदा करने के लिए बनाया जाता है. जो निराशाजनक, उकसाने वाला या आपत्तिजनक हो. ताकि सोशल मीडिया पर ट्रैफ़िक या एंगेजमेंट बढ़ाया जा सके.”

अचानक मुझे ऐसे कई और उदाहरण याद आने लगे, जहां मैंने पहले भी ऐसा कंटेंट देखा था. कहीं पूरी तरह झूठे दावे थे, कहीं एडिट या चुनिंदा तरीके से काटे गए वीडियो क्लिप्स, कहीं मॉर्फ की गई तस्वीरें, जिनसे असली मुद्दा और जानबूझकर की गई हेराफेरी के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है. दुख की बात यह है कि इनमें मीडिया संगठन भी शामिल थे.

2025 में भारत में 49.1 करोड़ से ज़्यादा इंटरनेट यूज़र्स हैं, ऐसे में यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिससे हम अनजान रह सकते हैं. सबसे पहले, जो चीज़ रेज़ बेट को आगे बढ़ाती है, वह है फ़ेक न्यूज़. दिलचस्प बात यह है कि भारत में अभी तक इसकी कोई कानूनी परिभाषा नहीं है. हालांकि, ऑस्ट्रेलिया के ई-सेफ्टी कमीश्नर के अनुसार, फ़ेक न्यूज़ वह काल्पनिक ख़बर है जो किसी विशेष एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए बनाई जाती है.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार, ‘फ़ेक न्यूज़’ के मामले 2019 में 486 से बढ़कर 2020 में 1,527 हो गए. जैसे-जैसे प्लेटफ़ॉर्म और फ़ॉर्मैट बढ़े हैं, यह प्रवृत्ति और तेज़ हुई है. पिछले महीने न्यूज़ 24 ने अपने एक्स हैंडल पर बागेश्वर धाम सरकार श्री धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री और एक बुज़ुर्ग महिला के बीच हुई बातचीत का एक एडिट किया हुआ वीडियो क्लिप शेयर किया. क्लिप पर लिखा था: “नहीं बुलाऊंगा स्टेज पर,” धीरेंद्र शास्त्री को महिला ने दी गाली. द डोज़ियर ने पूरी बातचीत का वीडियो देखा और पाया कि न्यूज़ 24 का दावा पूरी सच्च नहीं था. असल में यह एक मज़ेदार बातचीत थी. महिला श्री शास्त्री की अनुयायी थी और अंत में उसने उन्हें आशीर्वाद भी दिया. हां, शास्त्री ने “गाली क्यों दे रही माता?” कहा था, लेकिन हमेशा की तरह मज़ाकिया अंदाज़ में, किसी और भाव में नहीं.

लेकिन कंटेंट शेयर कर दिया गया, संदर्भ हटा दिया गया, एडिट किया गया और एक निर्दोष व्यक्ति को कटघरे में खड़ा कर दिया गया. नतीजा यह हुआ कि लोग श्री शास्त्री को गालियां देने लगे, उन्हें ढोंगी से लेकर पागल तक कहा गया. जो खुद को पत्रकार कहते हैं, वे भी इसमें कम दोषी नहीं थे. मुझे याद है, वामपंथी पत्रकार अभिसार शर्मा ने न्यूज़ 24 की उसी पोस्ट को कोट करते हुए लिखा: “कितना घटिया आदमी है ये और अहंकार देखो! एक बुज़ुर्ग महिला को कैसे चिढ़ा रहा है. ये क्या बदतमीज़ी है? देखो कितना फ्रस्ट्रेट हो जाता है कि गाली देनी पड़ती है. अगर दी है, तो शर्मनाक.” शर्मा ने बिना पूरी क्लिप देखे श्री शास्त्री को ‘घटिया’, ‘अहंकारी’ और न जाने क्या-क्या कहा. वह लंबे समय से मीडिया में काम कर रहे हैं, फिर भी वह पत्रकारिता के आदशों के कितने दूर हैं. पिछले साल श्री प्रेमानंद जी महाराज के साथ भी यही हुआ. उन्हें भी रेज़ बेट कंटेंट के ज़रिये निशाना बनाया गया, जबकि हक़ीक़त कुछ और ही थी.

एक और उदाहरण में, जनवरी 2026 में, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव के एक पैरोडी अकाउंट, जो खुद को पार्टी का ‘छोटा सिपाही’ बताता है, ने एक पोस्ट किया. उसमें लोकप्रिय कवि कुमार विश्वास की एक तस्वीर थी, जिसमें वे हवाई जहाज़ में बैठकर खाना खा रहे थे. कैप्शन था: “अभागा सूअरर्ण” सिर्फ़ इसलिए कि वे ‘ऊंची जाति’ से आते हैं, उनकी तुलना सूअर से कर दी गई.

इसी तरह, मुझे इंस्टाग्राम पर एक रील मिली, जिसमें सवाल पूछा गया था: “सती प्रथा, स्तन टैक्स, देवदासी, शुद्धीकरण, बाल विवाह, छुआछूत—किस महान धर्म की खोज थी?” लोगों ने तुरंत जवाब दिया—हिंदू धर्म. एक यूज़र चंदा मिश्रा ने लिखा: “ये सब मुग़लों की देन है, वरना हमारे यहां तो स्वयंवर होता था.”

इस पर एक मुस्लिम यूज़र, मो. खान ने जवाब दिया: “व्हाट्सअप यूनिवर्सिटी टॉपर स्पॉटिड.”

और ये तब है जब उसका धर्म काफिरों को मारना, महिलाओं के साथ बलात्कार करना आदि की अनुमति देता है.

इंडियन स्कूल ऑफ़ बिज़नेस और साइबर पीस के अध्ययनों के अनुसार, ऑनलाइन फैलने वाली लगभग आधी फ़ेक न्यूज़ और राजनीतिक होती है. एक दिन पहले पोस्ट की गई एक रील ने मेरा द्यान खींचा. यह रील भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की थी. 1.23 लाख से ज़्यादा लाइक्स, 1,445 कमेंट्स और 25.9 हज़ार शेयर के साथ, इसने जमकर ग़लत जानकारी फैलाई. रील में प्रधानमंत्री मोदी को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से यह कहते दिखाया गया कि संसद में कहा जाए:

“कांग्रेस की महिला सांसद मुझे मारना चाहती हैं.” जबकि ऐसा कुछ भी कभी नहीं हुआ.

असल में, 4 फ़रवरी को राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव के बाद, महिला कांग्रेस सांसदों ने प्रधानमंत्री मोदी की सीट घेर ली थी, जब वे जवाब देने वाले थे. यह सब इसलिए हुआ क्योंकि राहुल गांधी को लोकसभा के एक नियम के कारण द कारवां के एक निबंध से उद्धरण देने की अनुमति नहीं दी गई थी, जो पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे की एक अप्रकाशित किताब पर आधारित था.

आप सभी ऑपरेशन सिंदूर के दौरान फैलाए गए रेज़ बेट कंटेंट से तो वाक़िफ़ होंगे ही. कभी एटीएम बंद होने की अफ़वाह, कभी एयरपोर्ट बंद होने की और न जाने क्या-क्या—वह भी राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील समय में. सबसे विडंबनापूर्ण उदाहरण ‘मुस्लिम आईटी सेल’ नाम के एक अकाउंट के दो ट्वीट थे. एक में लिखा था: “ईरान विल स्टे इस्लामिक रिपब्लिक फॉरएवर” और साथ में ईरान के साहसी विरोध प्रदर्शनों की तस्वीरें थीं. दूसरे में, कुछ भारतीय सेना के अधिकारी श्री शास्त्री से मिलने गए थे और बस उन्हें आध्यात्म में लीन दिखने की वजह से लिखा गया:

“इंडिया वाज़ फाउंड एज़ ए सेक्यूलर रिपब्लिक. सेक्यूलेरिज़म हैज़ नॉट इवॉल्वड इट हैज़ बीन सिस्टमैटिकली इरैज़्ड. #IndianArmy”

इन सभी उदाहरणों से हम यह समझ सकते हैं कि रेज़ बेट किन तत्वों से बनता है. अगर हम इन्हें पहचान लें, तो इसे शुरुआती स्तर पर ही रोका जा सकता है. ये तत्व हैं—

भावनात्मक या राजनीतिक विषय, किसी वीडियो या संदेश का चयनात्मक एडिट, बिना सत्यापित स्रोत के जल्दबाज़ी में निष्कर्ष निकालना और उस कंटेंट का बड़े पैमाने पर शेयर होना. यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि डीपफ़ेक जैसे पूरी तरह गढ़े गए कंटेंट की तरह ही, रेज़ बेट में भी असली बातों को तोड़-मरोड़ कर या संदर्भ से बाहर दिखाया जाता है. फिर दर्शक अपने डर या पूर्वाग्रह के आधार, बिना किसी सत्यापित स्रोत के, निष्कर्श पर पहुंच जाते हैं. और नतीजा होता है तथ्यात्मक रूप से ग़लत जानकारी. सोशल मीडिया पर हर वायरल स्टोरी अपने पाठकों को दो विकल्प देती है. आप और मैं, या तो तुरंत प्रतिक्रिया दें, शेयर करें, ग़ुस्सा हों, या रुकें, जांचें और सोचें. हमारे पास ख़बरों के स्रोत सीमित रखें. ऐसा कोई माध्यम चुनें जो आपको सबसे विश्वसनीय लगे और उसी पर टिके रहें. रेज़ बेट अज्ञानता, जल्दबाज़ी और भावनाओं पर पनपता है. एक जागरूक पाठक बिना स्रोत जांचे ख़बर को न शेयर करता, न फ़ॉरवर्ड करता है.

इन भ्रामक सूचनाओं से भरे सोशल मीडिया के जाल में फंसे रहने से बेहतर है कि हम रूककर थोड़ा सोचें. “जब सोचना रुकता है, तब रेज़ बेट फैलता है; और जब पाठक रुककर सोचते हैं, तभी सच ज़िंदा रहता है.”

नैन्सी महावीर शर्मा
नैन्सी महावीर शर्मा
नैन्सी महावीर शर्मा एलएलएम स्नातक हैं और कानून, नीति तथा न्यायिक विकास पर लिखती हैं.