अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर रचना कौशल ने यूनिवर्सिटी में उनके साथ हो रहे मानसिक शोषण को लेकर आवाज़ उठाई है. लगभग तीन दशकों से यूनिवर्सिटी में पढ़ा रही रचना कौशल ने यूनिवर्सिटी के चांसलर पर भेदभाव के गंभीर आरोप लगाते हुए भारत की एक बड़ी यूनिवर्सिटी मानी जाने वाली एएमयू की अंदरूनी सच्चाई को सबके सामने लाकर रख दिया है. उन्होंने चेयरमैन नफीस अंसारी द्वारा किए भेदभाव और मानसिक शोषण के साथ-साथ एएमयू में पढ़ने और फिर पढ़ाने के अपने सफ़र और अनुभवों को लेकर दि डोज़ियर के साथ विस्तार से बात की.
दि डोज़ियर – आपने स्कूल और कॉलेज की पढ़ाई कहां से पूरी की? अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में आप कब से पढ़ा रही हैं?
रचना कौशल – मैं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ पॉलिटिकल साइंस में 1998 से पढ़ा रही हूं. मैं मास्टर्स नेट में फर्स्ट डिविज़नल गोल्ड मेडिलिस्ट रही हूं. जब मेरी नियुक्ति हुई थी उस समय मैंने एम फिल पूरी कर ली थी. यह बात बताना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि मेरे चेयरमैन नफीस अंसारी साहब जो काफी लंबे समय से मेरा मेंटल हरैसमेंट कर रहे हैं. उन्होंने एक ओडियो में कहा कि मेरी नियुक्ति गैर-कानूनी है, जो पूरी तरह से गलत है.
मैं, 1998 में पूरे इंडिया से जो छह लेक्चरर्स अपॉइंट करे गए थे, उनमें से एक हूं. मेरी स्कूलिंग बिट्स पिलानी से हुई थी. उसके बाद मैंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से आगे की पढ़ाई की. मैं यहां की स्टूडेंट भी रही हूं. पिछले 27 साल से मैं यहां पढ़ा रही हूं. मैं यूपी में एनसीसी की बेस्ट लेडी कैडेट थी. मुझे वर्ल्ड फेमस प्रेस्टीजियस फेलोशिप्स मिली है. यूएस स्टेट डिपार्टमेंट फेलोशिप मिली है. साल्सबर्ग सेमिनार फेलोशिप और फोर्ड फाउंडेशन फेलोशिप्स भी मिली है.
दि डोज़ियर – आप कहां से हैं और वर्तमान में आपके परिवार में कौन-कौन है?
रचना कौशल – मेरे पिता इंडियन फॉरेस्ट सर्विसेज में थे. उस वक्त वह पब्लिक फॉरेस्ट सर्विस कमीशन कहलाई जाती थी. मेरे माता-पिता मेरी शिक्षा को लेकर बहुत ध्यान देते थे. मेरा जन्म मध्य प्रदेश के छतरपुर में हुआ था. मेरा परिवार अलीगढ़ से ताल्लुक रखता है. मेरे पति डॉ. डीके पांडे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के ही जेएन मेडिकल कॉलेज में टीबी एंड चेस्ट में एसोसिएट प्रोफेसर थे. साल 2012 में उनका देहांत हो गया. मैं एक सिंगल मदर हूं, अपनी एकलौती बेटी के साथ अलीगढ़ में रहती हूं. यही मेरा छोटा सा परिवार है.
दि डोज़ियर – यूनिवर्सिटी में किस तरह आपके साथ भेदभाव किया जा रहा है और ऐसा कब से हो रहा है?
रचना कौशल – इतने सालों में जब-जब भी मेरे प्रमोशन की बारी आती थी, मुझे परेशान किया जाता था. मुझे ह्यूमिलिएट किया जाता था. पूरा डिपार्टमेंट प्रमोट किया जाता था मुझे छोड़कर और जब भी मेरे प्रमोशन की बात उठती थी तो स्टूडेंट्स से मेरे ख़िलाफ़ लेटर लिखवाया जाता था.
2004 में मेरी ट्विंस प्रेगनेंसी अबॉर्ट हुई थी. और उस वक्त मेरे डीन और चेयरपर्सन प्रोफेसर मुर्तजा खान जो कि मेरे मौजूदा चेयरपर्सन के सुपरवाइजर थे. उनका मेरे चेयरमैन को बहुत सपोर्ट था. इसी दम पर नफीस अंसारी साहब ने मुझे अबॉर्शन लीव तक में बुला के काम करवाया.
और उसके फौरन बाद जब सिलेक्शन कमेटी की बैठक हुई तो मेरे लिए रिकमेंडेशन होने के बाद भी यह कह दिया गया कि मैं एलिजिबल नहीं हूं. और एक टेंपररी लेक्चरर प्रोफेसर इफ्तखार साहब को लीडर बनाया गया. उसके बाद समय-समय पर मेरे खिलाफ मुझे डीमोरलाइज करने के लिए स्टूडेंट्स से लेटर लिखवाए जाते रहे हैं जिसको यह कभी साबित नहीं कर पाए.
मेरा जो प्रमोशन 2007 में हो जाना चाहिए था, वह 2015 में किया गया. और उस वक्त भी रुकिया तबस्सुम नाम की एक मेरी रिसर्च स्कॉलर से मेरे ख़िलाफ़ लेटर लिखवाया गया. रुकिया तबस्सुम अपने होने वाले पति को एक प्रोजेक्ट से बाहर निकाल देने से मुझ से नाराज़ चल रही थी. हालांकि वह मेरे ख़िलाफ़ कुछ भी साबित नहीं कर पाई. जब 2017 में फिर से प्रमोशन की बारी आई जो मुझे 2013 में मिल जाना चाहिए था. हमारे यहां एपीआई कैलकुलेट होता है जिसके आधार पर इंटरव्यू लेटर दिया जाता है. पहले मेरा एपीआई गलत दिखाया गया. और मेरी जगह डॉक्टर फराना को प्रमोट किया गया. उनका एपीआई बढ़ा-चढ़ा के दिखाया गया और मेरा एपीआई घटा के दिखाया गया. और मुझे प्रमोट नहीं होने दिया गया.
जब मैंने आरटीआई फाइल की तो पता चला कि डॉक्टर फराना तो एलिजिबल ही नहीं है. उनके 120 एपीआई नहीं है. मैंने बार-बार यूनिवर्सिटी को लिखा, मिनिस्ट्री को लिखा, जगह-जगह रिप्रेजेंटेशन भेजे. लेकिन उसका कोई नतीजा नहीं हुआ और फाइनली जब मैंने एक और आरटीआई करी तो मुझे पता चला ना सिर्फ डॉक्टर फराना बल्कि डॉक्टर नफीस अंसारी, जो इस वक्त चेयरपर्सन है, वह भी एलिजिबल नहीं है.
उनका 120 एपीआई नहीं है. और मेरा एपीआई जो कम कैलकुलेट किया गया था वह अब बढ़ाकर 147 किया गया. लेकिन फिर भी मुझे न्याय नहीं मिला. मैं हाईकोर्ट गई जहां मुझे डेढ़ महीने में न्याय मिला.
यूनिवर्सिटी में आपका एक वेटेज मार्क्स चार्ट बनता है. उस वेटेज मार्क्स चार्ट के आधार पर यह तय होता है कि जिसके मार्क्स 100 में से 50 से ऊपर होंगे वह प्रमोट होगा. अगर किसी भी मार्कशीट पर कोई कटिंग्स होती तो क्या वह मार्कशीट एक्सेप्टेबल होती है? इसे टेंपरिंग ऑफ मार्क्स कहते हैं. यह सारे डॉक्यूमेंट्स लेकर मैं हाईकोर्ट गई जहां जज ने यूनिवर्सिटी से पूछा कि वाइस चांसलर को मार्क्स रिड्यूस करने के अधिकार है लेकिन 65 से 49 मार्क्स करने को कोई कारण तो बताना होगा. आखिर आप 65 से किसी को काट-काट कर 49 पर लाए यानी एक नंबर से उसको डिस्क्वालीफाई करने के लेवल पर लाए. तब तक मेरे मार्क्स रिड्यूस किए गए जब तक कि मैं 49 पर नहीं आ गई.
इस दौरान यूनिवर्सिटी ने डॉ. फराना कौसर के फॉर्म की स्क्रूटनी करने वाली टीम से बार-बार कहा कि आप फिर से स्क्रूटनी करिए कि क्या इनके एपीआई 120 नहीं है. तब भी टीम अपनी बात पर अड़ी रही. और उनको डिफेंड करती रही. फाइनली मैं हाई कोर्ट गई. डॉक्टर फराना के लिए यूनिवर्सिटी खड़ी थी, यूनिवर्सिटी का वकील खड़ा था. मैंने प्रोफेसरशिप के लिए 2017 से लेकर 2019 तक लड़ाई लड़ी.
डि डोज़ियर – वर्तमान समय में किस तरह परेशान किया जा रहा है?
रचना कौशल – मौजूदा चेयरपर्सन प्रोफेसर नफीस अंसारी लगातार मेरे ख़िलाफ़ प्रोपगेंडा चला रहे हैं. मुझे हर जगह बदनाम करने की साजिशे कर रहे हैं. मुझे कहा गया कि मैं डिजर्व नहीं करती इसलिए मेरा प्रमोशन नहीं हुआ. मुझ पर इल्ज़ाम लगाया गया कि मैं सभी को कह रही हूं कि मैं हिंदू हूं इसलिए मेरे साथ भेदभाव किया गया.
जबकि उनकी एक ऑडियो मेरे पास है जिसमें वे मुझे डिफेम कर रहे हैं. और सभी हिंदू टीचर्स के लिए बहुत कम्युनल रिमार्क्स दे रहे हैं. वह कह रहे हैं कि ‘यह हर जगह कहती घूम रही है कि मैं हिंदू हूं इसलिए मेरा प्रमोशन नहीं हुआ.’ जबकि आप मेरी सारी रिप्रेजेंटेशन उठाकर देख लीजिए मेरी किसी भी पिटीशन में कहीं भी रिलीजन का जिक्र नहीं है.
इस यूनिवर्सिटी ने मुझे नौकरी दी है. इस यूनिवर्सिटी ने मुझे डिग्रियां दी है. मैं तब भी हिंदू थी. मैं यह कैसे कह दूं कि यूनिवर्सिटी सांप्रदायिक है. मेरी यूनिवर्सिटी सांप्रदायिक नहीं है. नफीस अंसारी साहब जैसे लोग सांप्रदायिक हैं. अब एडमिनिस्ट्रेशन उनको सपोर्ट कर रहा है तो उस पर मैं क्या कुछ कहूं. उस ऑडियो में वे खुद खुल के कह रहे हैं मैं पॉलिटिक्स करता हूं.
लेकिन मैंने 20 पीएचडी कराई है. मैं पॉलिटिक्स नहीं करती. मैं सिर्फ पढ़ाती हूं. और जान बूझकर उस वक्त के वाइस चांसलर जमीरुद्दीन शाह ने एक इलीगल कंडीशन बनाई कि जिसने तीन पीएचडी सुपरवाइज कराई होंगी वही प्रमोट होगा जबकि यूजीसी की ऐसी कोई रिक्वायरमेंट नहीं थी.
जमीरुद्दीन शाह साहब ने तीन पीएचडी के टूल को उन टीचर्स के खिलाफ यूज किया जो पढ़ाई-लिखाई कर रहे हैं. जो किसी नेता के पिछलगू नहीं है, किसी नेतागिरी में नहीं है, किसी लॉबी का हिस्सा नहीं हैं. वहां पर बहुत सारे ऐसे लोग भी थे जिनके पास कोई पीएचडी नहीं थी, उनको प्रमोट कर दिया. उस ऑडियो में नफीस अंसारी साहब यह कह रहे हैं कि ‘हिंदू टीचर्स जान बूझकर मुसलमान बच्चों को नहीं पढ़ाते. हम अच्छे हिंदू टीचर्स अपॉइंट करते हैं. लेकिन यह जान बूझकर मुसलमान बच्चों को नहीं पढ़ाते.’
वाइस चांसलर से सबूत मांगने के लिए कहा लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया. ऑडियो में नफीस अंसारी को कहते सुना जा सकता है, ‘बीएचयू चले जाओ. बीएचयू में मुसलमानों का अपॉइंटमेंट तो दूर की बात फॉर्म उठा के फेंक दिया जाता है.’ नफीस अंसारी पिछले कुछ सालों से बहुत परेशान कर रहे है, खासतौर पर डेढ़ साल से. जिसकी शिकायत मैंने वाइस चांसलर को मेल पर भेजी है. कुछ समय पहले मैं 20 दिन के लिए अमेरिका गई थी. मैंने वहां से इनसे बोर्ड ऑफ स्टडीज़ की मीटिंग का लिंक मांगा कि मुझे बीओएस अटेंड करनी है जिसके लिए मैं एलिजिबल थी. इन्होंने मुझे लिंक नहीं दिया. पहले प्रोफेसर विजयपुर इस प्रोग्राम को अनवरत करते रहे, जिसपर किसी ने अपत्ति नहीं जताई. हम सभी उनका बहुत सम्मान करते हैं. वे अब रिटायर हो चुके हैं. उनके बाद सबसे सीनियर होने के नाते यह मेरा हक़ बनता है.
साथ ही 2024 में ट्रेनिंग वर्कशॉप मुझे ना देकर एक असिस्टेंट प्रोफेसर को दे दी गई. मैंने जब उस पर विरोध जताया और जिसके बाद वह मुझे दी गई. अगले साल वह चुपचाप मुझसे काफी जूनियर एक एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नगमा फारूकी को दे दी गई.
मेरी एक मुस्लिम स्टूडेंट राहत जमानी की पीएचडी थीसिस मेरी टेबल से गायब करवा दी गई थी. जिसकी मैंने वाइस चांसलर को कंप्लेंट की थी. उसकी पीएचडी थीसिस मेरी टेबल पर इवैल्यूएशन के लिए आई थी जो कभी मुझ तक नहीं पहुंची.
दि डोज़ियर – बच्चों से किस तरह लेटर लिखवाकर आपको परेशान किया जाता था?
रचना कौशल – सितंबर 2025 की शुरुआत में मेरे पास डीन इकराम हुसैन से एक लेटर आया. जिसमें एमए की किसी स्टूडेंट की शिकायत के आधार पर मुझ से सफाई मांगी गई थी. जिस शिकायत में लिखा था कि मैं क्लास में गलत भाषा का प्रयोग करती हूं, क्लास में दहशत का माहौल बनाती हूं और निजी कमेंट पास करती हूं.
इकराम हुसैन एक दूसरे डिपार्टमेंट के डीन हैं. उन्होंने मेरे ख़िलाफ़ ऐसा लेटर क्यों लिखा. मैंने उनसे पूछे कि किस नियम के तहत दूसरे डिपार्टमेंट का डीन एक प्रोफेसर से सफाई मांग सकता है. उन्होंने फिर मुझे एक और लेटर लिखा कि हायर अथॉरिटीज़ ने उनसे ऐसा करने के लिए कहा है. यहां सोचने वाली बात यह है कि 27 सालों में मैंने कभी क्लास में दहशत का माहौल नहीं बनाया अब उन्हें मेरे बारे में यह सब करने के लिए कौन कह रहा हैं. वास्तव में मेरे ख़िलाफ़ कोई कंप्लेंट नहीं आई थी यह सच्चाई उन्हें भी पता है. पांच महीने हो गए हैं. मेरे कई बार मांगने पर भी कॉन्फिडेंशियल होने की बात कहकर आज तक मुझे उस कंप्लेंट की कॉपी नहीं दी गई है.
मैंने 22 सितंबर को वाइस चांसलर को एक लेटर लिखकर मेरे साथ हो रही यह सारी बातें उन्हें बताईं. लेकिन कोई कदम नहीं उठाया गया.




दी डोज़ियर – आपने बताया कि कई बार मांगने पर भी आपको कंप्लेंट की कॉपी नहीं दी गई. क्या आपको लगता है कि यह कोई एक व्यक्ति अकेले नहीं कर सकता और चींजे छिपाने में कोई और भी इसमें शामिल हो सकता है.
रचना कोशल – ऊपर से नीचे तक पूरी चैन ही बनी हुई है. आप कॉन्ट्रडिक्शन देखिए, एक तरफ सो कॉल्ड शिकायत स्टूडेंट्स की जिसका आज तक मुझे लेटर नहीं दिया गया है. यानी कोई शिकायत है ही नहीं. इतना तय है कि यहां सभी लोग कुछ छुपाना चाह रहे हैं. वरना आप बताइए लेटर कॉन्फिडेंशियल कैसे हो गया. लेटर अथॉरिटीज के पास गया, अथॉरिटीज से डीन के पास आया. डीन मुझे लिख रहे हैं तो क्या वह कॉन्फिडेंशियल रह गया.
दी डोज़ियर – क्या अभी भी आप यूनिवर्सिटी में पढ़ा रहीं हैं, अभी क्या माहौल है वहां?
रचना कौशल – हां, मैं अपनी रेगुलर क्लास लेती हूं. मैं सारा काम कर रही हूं. मैं एग्जाम की कॉपियां चेक कर रही हूं. मैं अपना रूटीन वर्क कर रही हूं. लेकिन आप समझिए कि किसी इंसान की मेंटल स्टेट कैसी होगी इस माहौल में. अब मैं इतनी मजबूर हो गई हूं कि मुझे मीडिया के सामने आना पड़ा.
दी डोज़ियर – क्या किसी व्यक्ति, संगठन या एनजीओ ने आपसे मदद के लिए संपर्क किया?
रचना कौशल – कोई भी मेरी मदद के लिए आगे नहीं आया. मेरे कुछ कलीग्स, यूनिवर्सिटी में दोस्त और कुछ स्टूडेंट्स ने मुझे मैसेज भेजा है कि वे मेरे साथ हैं.
यहां तक की अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी टीचर्स एसोसिएशन (अमूटा) ने मेरे मामले पर कोई संज्ञान नहीं लिया. मैं खुद अमूटा की सदस्य हूं. मैं अमूटा की फीस देती हूं. अमूटा की तरफ से कोई फ़ोन, कोई लेटर नहीं आया. हमारे चुने हुए नुमाइंदे वहां पर हैं, जब इलेक्शन होता है तब वे मेरे पास आते हैं लेकिन अब वे मेरी आवाज नहीं सुन रहे हैं. क्या उनको मीडिया पर कुछ सुनाई नहीं दे रहा, क्या दिखाई नहीं दे रहा. कुछ टीचर्स ने मुझको फ़ोन किया, मुझसे मामले पर बातचीत की. लेकिन मेरे खुद के डिपार्टमेंट ने कोई सपोर्ट नहीं किया.
दी डोज़ियर – क्या आपने एएमयू को छोड़कर कहीं और जाने का नहीं सोचा?
रचना कौशल – नहीं, मैंने कभी यहां से जाने के बारे में नहीं सोचा. क्योंकि मेरे पति भी यहीं पढ़ाते थे. अगर मैं कहीं और चली जाती तो हमें अलग-अलग रहना पड़ता. परिवार डिस्टर्ब हो जाता. दूसरा, मेरी अपनी पैरेंटल फैमिली यहां पर है. मेरी बच्ची छोटी है, जब तक मेरे पति थे तो शायद हम दोनों ही यहां से जाते लेकिन अब मुझे मेरी बेटी को संभालने के लिए अपने परिवार की ज़रूरत है. अब मैं किसी नई जगह पर कैसे जाऊं? मैं एक विडो हूं, सिंगल मदर हूं एक बेटी को लेकर कहां-कहां जाऊं.
दी डोज़ियर – क्या दिल्ली यूनिवर्सिटी, जेएनयू या देश की किसी और यूनिवर्सिटी से कोई आपकी मदद के लिए आगे आया?
रचना कौशल – मुझे दिल्ली यूनिवर्सिटी या जेएनयू कहीं से कोई मदद करने नहीं आया. किसी ने संपर्क नहीं किया. जेएनयू में लोग फेमिनिज्म का झंडा लेकर हमेशा खड़े रहते हैं. फिलिस्तीन में कुछ होता है तो उधम मच जाता है. कुछ ही दूरी पर एएमयू की प्रोफेसर के साथ जो हो रहा है वह किसी को दिखाई नहीं देता.
दि डोज़ियर – आपके और एसएपी के बीच किस मसले पर विवाद हुआ था?
रचना कौशल – मैं कुछ महीने पहले एएमयू कोर्ट पर लॉन टेनिस खेल रही थी. एएमयू की स्पोर्ट्स फैसिलिटीज़ पहले एएमयू की फैकल्टी और यहां के स्टूडेंट्स के लिए है. वहां पर एसएसपी साहब के लिए स्लॉट बुक कर दिया जाता है. पूरा लॉन टेनिस उनके हवाले कर दिया जाता था. वह एक घंटे, दो घंटे, तीन घंटे कितना भी खेले उन्हें खेलने दिया जाता था. बाकी एएमयू फैकल्टी और बच्चे लाइन लगाकर बैठे रहते थे. एसएसपी ने मेरे साथ बहुत बदतमीजी करते हुए मुझसे ग्राउंड छोड़ने के लिए कहा. एसएसपी मेरा मोबाइल छीनने पर आ गया था.
मैंने कोर्ट छोड़ दिया लेकिन मैंने इसकी शिकायत प्रॉक्टर और अमूटा से की. अमूठा इस मामले में भी बस हाथ पैर हिलाकर चुप हो गया. मैंने वीसी को लेटर लिखा लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई. मैंने डीजी को मेल किया, मुझे प्रॉक्टर साहब ने यह रिक्वेस्ट भेजी कि मैडम आप लेटर विड्रॉ कर लीजिए जो एसएसपी के ख़िलाफ़ लिखा है. लेकिन एसएसपी ने कोई अपॉलीजी नहीं दी. यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन उनके साथ खड़ा रहा. यूनिवर्सिटी एडमिनिस्ट्रेशन हर उस आदमी के साथ खड़ा है जो मेरे साथ बदसलूकी करेगा.
दी डोज़ियर – जैसे उन्होंने ऑडियो में बोला कि आप बीएचयू में जाकर देखो वहां पर मुस्लिम को एंट्री नहीं मिलती है, आपको क्या लगता है उनका कहा सच है या गलत?
रचना कौशल – उन्होंने ओडियों में कहा कि अगर किसी को लगे कि हिंदू टीचर्स के साथ भेदभाव हुआ है तो बीएचयू जाओ बीएचयू जाकर देखो बीएचयू में मुसलमानों का अपॉइंटमेंट तो दूर की बात उनकी एप्लीकेशन उठा के फेंक दी जाती है.
देखिए, मैंने कोई सर्वे नहीं किया लेकिन मुझे नहीं लगता ऐसी कोई बात पूरे भारतवर्ष में कहीं होगी. मुझे नहीं लगता इस तरह की शिकायत किसी को करनी चाहिए कि आपका फॉर्म बस इसलिए फेंक दिया जाता है कि आप मुसलमान हैं. एएमयू में भी ऐसा नहीं होता कि हिंदू टीचर के फॉर्म उठा के फेंक दिए जाते हैं कि वह हिंदू है. बहुत सारे हिंदू टीचर्स यहां काम कर रहे हैं.
बीएचयू का तो मुझे याद है कि बीच में एक बार कंट्रोवर्सी हुई थी कि धर्मशास्त्र विभाग में थियोलॉजी में मुसलमान टीचर का अपॉइंटमेंट हुआ था और शायद अभी तक है. सोचिए एक मुसलमान सनातन धर्म को पढ़ाएगा. आप अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में शिया थियोलॉजी में सुन्नी को अपॉइंट करके देखिए, सुन्नी थियोलॉजी में शिया को अपॉइंट करके देखिए, हिंदू तो बहुत दूर की बात है. इस्लाम भी किसी अन्य से नहीं पढ़ाया जाता. और जहां तक मेरी जानकारी है बीएचयू में बहुत से मुस्लिम टीचर्स हैं.
दी डोज़ियर – आगे इस लड़ाई को आप किस तरह से लेकर जाएंगी?
रचना कौशल – मैं अपनी लड़ाई लड़ रही हूं. लड़ती आई हूं. सब लड़ाई जीती हूं. ईश्वर ने चाहा तो यह लड़ाई भी जीतूंगी. यूनिवर्सिटी से न्याय नहीं मिलेगा. हो सकता है मुझे सीएम पोर्टल, पीएम पोर्टल से मिल जाए. हो सकता है एनएचआरसी से न्याय मिल जाए. हो सकता है एनसीडब्ल्यू कुछ करें. लेकिन मैंने उम्मीद नहीं छोड़ी है.

