विश्वविद्यालय किसी राष्ट्र के भविष्य की आत्मा होती है. यही वो स्थान होता है जहां से लोग निकलकर अलग-अलग क्षेत्रों में जाकर अपना कार्य करते हैं. भारत की आजादी के बाद से ही वामपंथ ने देश के प्रमुख विश्वविद्यालयों को अपने प्रभाव में रखा जिसकी परिणति यह हुई कि देश का प्रबुद्ध वर्ग बस बाहरी रूप से भारतीय था. उसके विचार, सोचने का ढंग सभी कुछ गैर भारतीय था और कई बार तो भारत विरोधी भी. दशकों तक हर चीज की प्रेरणा दूसरे देशों से ली जाती रही. शिक्षा प्रणाली से लेकर आर्थिक समाजवाद तक, हर चीज की परिकल्पना इस तरह की गई जो न तो भारत के लिए प्रासंगिक था और न ही यहां के समाज का उनसे भला होना था.
अक्सर इन संस्थानों के रूप में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय इत्यादि का नाम लिया जाता है पर हैदराबाद का राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान अकादमी (नालसा) भी जेएनयू का ही एक दूसरा रूप है. वर्षों तक यहां की प्रवृत्तियों ने भारत को प्रभावित किया है. यह कहना गलत नहीं होगा कि ऐसे संस्थानों की वजह से ही भारत में इतने वर्षों बाद भी मैकाले जिंदा रहा. राष्ट्रीय विधि अध्ययन एवं अनुसंधान अकादमी ने इस बार भी कुछ ऐसा किया है जिसे देखकर ये विचार करना आवश्यक हो जाता है कि इन संस्थानों पर इस देश के करदाताओं का लगने वाला पैसा आखिर किस दिशा में लग रहा है? कहीं ये पैसा इस देश को तोड़ने की इच्छा रखने वाले लोगों को महिमा मंडित करने में तो नहीं लग रहा.
इस बार इस संस्थान ने दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद पर बनी डॉक्यूमेंट्री की स्क्रीनिंग का आयोजन किया. इस आयोजन के बाद विचाराधीन कैदियों की हालत के नाम पर हुई चर्चा में ये दिखाने का प्रयास किया गया कि सरकार एक बेचारे अल्पसंख्यक बच्चे को बेतुके ढंग से जेल में रखे हुए है और इस देश की न्यायपालिका भी उसका साथ नहीं दे रही है. इस चर्चा पर सब कुछ हुआ पर किसी ने भी उमर खालिद के अपराध पर चर्चा नहीं की. किसी ने भी ये नहीं बताया कि वह किसी छोटे अपराधों का आरोपी नहीं है बल्कि उसपर दंगे भड़काने का आरोप है. उसके बयान पर किसी ने चर्चा नहीं की जिसमें उसने कहा था कि ‘‘“हम वादा करते हैं कि जब अमरीकी सदर डोनाल्ड ट्रंप 24 तारीख को हिंदुस्तान आएंगे, तो हम यह बताएंगे कि हिंदुस्तान की सरकार हिंदुस्तान को बांटने की कोशिश कर रही है… हम तमाम लोग सड़कों पर निकलकर आएंगे और चक्का जाम करेंगे….अगर आप आगे नहीं आएंगे तो हुकूमत हमारी बात नहीं सुनेगी… हमें सड़कों पर उतरना होगा.” यह बयान दो तरह से समस्या पैदा करने वाला था. पहला तो भारत को एक अतिवादी देश के रूप में अमेरिकी राष्ट्रपति के सामने दिखाना. यह दिखाता है कि पूंजीवाद को दिन रात गाली देने वाले कैसे उस देश के राष्ट्रपति को अपना माइ-बाप मानते है और उससे स्वीकृति पाने को लालायित रहते है? दूसरा यह कि ये आरोप किसी धार्मिक अतिवादी पर नहीं था बल्कि ऐसे व्यक्ति पर था जो सम्मानित माने जाने वालों संस्थानों से पढ़ा है. जहां तक बात उसकी ज़मानत की है तो उमर खालिद अब राजनीति का विषय बन चुका है जिसे जेल में रखकर ये संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है कि इस देश में मुसलमान ख़तरे में है. यही वजह है कि ज़मानत में होने वाली देरी का कारण खुद उमर खालिद की कानूनी टीम है जैसा कि पूर्व मुख्य न्यायधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ ने अपने एक साक्षात्कार में बताया कि कैसे इनकी टीम किसी जज विशेष के सामने ही सुनवाई की मांग करती है.
उन्होंने कहा यदि यह पावर हम किसी एक वकील या किसी पॉलिटिकल एस्टैब्लिशमेंट को दे दें कि हम केस इनके सामने आर्ग्यू करेंगे, इनके सामने नहीं करेंगे… तो यह आज हमारे सिस्टम के लिए सबसे बड़ा डेंजर है. उन्होंने स्पष्ट किया कि केस का आवंटन किसी व्यक्तिगत पसंद से नहीं, बल्कि तय नियमों और परंपराओं से होता है. जब बेंच का कोई सीनियर जज रिटायर होता है, तो केस उसी बेंच में बने रहने वाले दूसरे जज से टैग होकर नई बेंच में ट्रांसफर हो जाता है. पूर्व मुख्य न्यायधीश के अनुसार, किसी जज को रैंडम तरीके से चुनना संभव नहीं है और जजों की पसंद-नापसंद के आधार पर सुनवाई की मांग पूरी प्रणाली को नुकसान पहुँचा सकती है.
ये कोई पहला उदाहरण नहीं है जहां ये संस्थान नाहक विरोध का अड्डा बना है. इस संस्थान में पहले भी कई ऐसे काम हुए है जिसने इसको चर्चा का केंद्र बनाया है. इसमे से एक है यहां के प्रशासन द्वारा आधुनिकता की नजीर पेश करते हुए हॉस्टल नीति बनाई जिसमें जेंडर-न्यूट्रल वाशरूम स्थापित किए गए और हॉस्टल ब्लॉक के ग्राउंड फ्लोर को जेंडर-न्यूट्रल कमरों के रूप में आवंटित किया गया. छात्रों को अपनी पहचान के अनुसार सर्वनाम चुनने और हॉस्टल विकल्प चुनने की स्वतंत्रता दी गई. इसके पीछे सर्व समावेशिता लाने और सभी को आज़ादी देने का तर्क दिया गया. कोई भी इसे सुनकर समझेगा कि ये संस्थान ही तो है जो आधुनिक भारत के समाज को तैयार करेंगे. हालांकि एक तथ्य यह भी है कि इस तरह के निर्णय न तो भारत के समाज के अनुसार प्रासंगिक है और न ही भारत के संदर्भ में लिए जाते है. इन्हें लेने के पीछे केवल एक ही कारण ये होता है कि कोई पश्चिम देश या वहां का संस्थान ऐसा कर रहा है तो हम क्यों नहीं? पश्चिम सा दिखने की व्याकुलता जैसी इनमें है वैसी कहां ही होगी? परंतु इनकी कलई तब खुल गई जब इनके शिक्षकों पर ही उत्पीड़न के आरोप लगे. सबसे चर्चित मामला 2011-12 के दौरान सामने आया था, जब तत्कालीन कुलपति और कुछ वरिष्ठ संकाय सदस्यों पर अधिकारों के दुरुपयोग, वित्तीय अनियमितताओं के साथ-साथ यौन उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगे थे. यह विवाद इतना बढ़ गया था कि आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवारत और पूर्व न्यायाधीशों की एक समिति को इसकी जांच सौंपनी पड़ी थी. इसके बाद भी, 2018-2020 के दौरान जब देश भर में #MeToo आंदोलन की लहर चली, तब भी कई छात्रों और पूर्व छात्रों ने सोशल मीडिया तथा आंतरिक मंचों पर अपनी आपबीती साझा की.
छात्रों के मुख्य आरोपों में यह बात भी प्रमुखता से शामिल थी कि यूनिवर्सिटी की आंतरिक शिकायत समिति पीड़ित छात्रों की शिकायतों पर निष्पक्ष और त्वरित कार्रवाई करने में विफल रही. आरोप लगाए गए कि प्रशासनिक प्रभाव और संकाय सदस्यों के आपसी संबंधों के कारण शिकायतों को दबाने या मामले को ठंडा करने का प्रयास किया जाता था. भारी विरोध के बाद ही जाकर कहीं इस्तीफे हुए. यह दिखाता है कि इन बड़े संस्थानों में एक प्रकार का वैचारिक ब्रदरहुड चलता है जो घृणित से घृणित काम में भी साथ देता है बस आपमें वहीं वैचारिक पागलपन होना चाहिए जो अन्य में है.
अल्पसंख्यकों के काल्पनिक दुखों में दिन रात आंसू बहाने वाले ये सभी अल्पसंख्यक अधिकारों के स्वघोषित सम्राट वंचित वर्गों के साथ भी भेद भाव के आरोपों से घिरे है. इनपर हॉस्टल आवंटन द्वारा परिसर में सामाजिक विभाजन बनाने का भी आरोप भी है. इसी के साथ इनपर भाषाई और वैचारिक बौद्धिकतावाद बढ़ाने का भी आरोप है. अकादमिक क्षेत्र में सबसे बड़ी चुनौती अंग्रेजी भाषा का प्रभुत्व और कॉरपोरेट-केंद्रित अध्ययन का माहौल रहा है. जो छात्र क्षेत्रीय भाषाओं या छोटे शहरों के सरकारी स्कूलों से पढ़कर आते हैं, उन्हें कक्षाओं में बोलने, बहस करने और असाइनमेंट लिखने में हिचकिचाहट का सामना करना पड़ता है. शोध के भीतर अभिजात वर्ग की संस्कृति का दबदबा देखा गया है. बड़े शहरों, महंगे प्राइवेट स्कूलों या कानूनी घरानों से आने वाले छात्रों का एक अलग सामाजिक दायरा बन जाता है. वंचित, ग्रामीण या आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमियों के छात्र खुद को इस माहौल में अलग-थलग महसूस करते हैं.
उपरोक्त विवरण बताता है कि समानता, बंधुत्व जैसी बड़ी-बड़ी बातें करने वाले स्वयं में दोमुंहे रवैये अपनाते है. इन्हें अपनी बातों और विचारों में तो गांव, गरीब और मजदूर चाहिए पर अपने इर्द-गिर्द अंग्रेजी बोलने वाले, पश्चिमी अंधानुकरण में रमे हुए लोग चाहिए. कमजोरों की बात करना तो इनके लिए महज अपने अंदर के वामपंथी को पुष्ट करने का उपकरण है.
लोकतंत्र भी इनके लिए केवल अवसर के अनुसार अपनी महत्ता बदलने वाला मूल्य है. यहां के प्रशासन पर छात्र संघ चुनाव पर हस्तक्षेप के आरोप है. छात्रों का मुख्य आरोप रहा है कि प्रशासन छात्र राजनीति की स्वतंत्रता को सीमित करने की कोशिश करता है. चुनावों के दौरान प्रत्याशी चयन, प्रचार के नियमों और मतदान प्रक्रिया में प्रशासन द्वारा नए दिशा-निर्देश थोपने के आरोप लगते रहे हैं. कई मौकों पर प्रशासन ने सुरक्षा या अनुशासनात्मक आधार पर छात्र प्रतिनिधियों की गतिविधियों पर पाबंदी लगाने का प्रयास किया, जिसे छात्रों ने अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन माना. इन विवादों के कारण परिसर में कई बार शांतिपूर्ण प्रदर्शन, धरने और कक्षाओं का बहिष्कार देखने को मिला है. यह दिखाता है कि सदैव ही लोकतंत्र खतरे में है, का राग अलापने वाले खुद कैसे लोकतंत्र विरोधी है और अपनी आलोचना से भागने वाले है.
गरीबी की बातों के आत्मसुख के अतिरिक्त इनका एक और स्थायी भाव है सरकार की आलोचना करना. संस्थानों के रवीश कुमार ये ही प्रतीत होते है. इसकी एक बानगी देखने को मिली जब इन्होंने तिलचट्टों के समर्थन में देश के मुख्य न्यायाधीश का विरोध किया. यूनिवर्सिटी प्रशासन द्वारा मुख्य न्यायाधीश को मुख्य अतिथि बनाए जाने के फैसले के बाद, यहां के लगभग 450 से अधिक छात्रों ने एक सामूहिक ज्ञापन सौंपकर अपना विरोध दर्ज कराया. छात्रों ने इसका कारण न्यायपालिका के कुछ हालिया फैसलों, संस्थागत रुख और परिसर के भीतर वैचारिक स्वतंत्रता से जुड़ी चिंताओं को बताया. ये कदम एक बहुत गंभीर प्रवृत्ति की ओर इशारा करता है.
दरअसल पिछले कई दशकों में यह धारणा बना दी गई है कि असल देशभक्ति वही है जहां सरकार का विरोध किया जाए. अगर ये विरोध एक बढ़िया तरीके से अव्यवस्थित किए गए कुर्ते को कोई झोला लटकाए अधपके बालों के साथ व्यक्ति करें तो निश्चय ही इस विरोध की सार्थकता बढ़ेगी भले ही मुद्दा कितना भी अतार्किक क्यों न हो? सत्य बोलने पर पढ़ कर आओ, तर्क करने पर सरकारी सोच हावी है तुम पर, भारतीयता की बात करने पर मनुवादी हो तुम जैसे घिसे पिटे संवाद इनकी पहचान होती है. पर असल सच क्या है? वह यह है कि यह सब केवल अवसर पर निर्भर है. इनकी क्रांति सुविधाओं की मोहताज है. तमाम महान मूल्य इनके लिए केवल विचार के विषय है, आचरण तो अवसर, सुविधाओं पर निर्भर है.
अंत में, अक्सर हम ये सुनते है कि ये सदी भारत की है. क्या कोई समय काल अपने मूल्य और अपनी प्रकृति से दूर जाकर अपना बनाया जा सकता है. अगर नहीं, तो जिन्होंने ये कार्य किया और आज भी कर रहे है, वे कौन है? उनकी मंशा क्या है? इसपर विचार आवश्यक है. नीति कहती है कि सुधार का प्रथम चरण समस्या को पहचानने से शुरू होता है. अतः जरूरी है कि भारतीय संस्थान भारतीयता से चले. उनका सोचने का ढंग भारतीय हो. उनके काम भारतीय समाज के संदर्भ में हो. वह नैतिक हो पर वह नैतिकता ग्लानि या सीखी सिखाई न हो परंतु स्वयं से अर्जित हो तभी हम तक्षशिला और नालंदा के गौरव को पा सकेंगे.
