back to top

ब्रिक्स सम्मेलन पर पश्चिमी मीडिया का विलाप

मन्नू भण्डारी उपन्यास ‘महाभोज’ में लिखती है कि ‘’गुलामी आत्मा का क्षय तो करती है.’’ लेकिन जिसके दिमाग में गुलामी की मानसिकता घर बना ले उसकी आत्मा के साथ-साथ बुद्धि का भी क्षय होता है. सामान्य बुद्धि फिर सामान्य नहीं रह जाती. हर एक काम पर राय देना उनका खुद को खुद के द्वारा दिए गए अधिकार सा हो जाता है जिसका प्रयोग वह दूसरों की सफलता और उपलब्धियों को कमतर बताने और अपनी असहाय हालत को छिपाने के लिए करते है. कई बार ये मानसिकता किसी देश की राष्ट्रीय स्मृति और सोच का हिस्सा बन जाती है. इसके बाद वे सत्य से विमुख हो जाते है और अपनी आत्म मुग्धता को पुष्ट करने के लिए अतार्किक और कई बार मूर्खता के हद तक की बात कर जाते है. इस सम्पूर्ण तथ्य को पश्चिमी जगत के मन में बसें भारत विरोध या यूं कहे कि नफ़रत के हद तक विरोध के संदर्भ में देखा जा सकता है.  

पश्चिम का भारत विरोधी रुख सदियों पुराना है, सांप संपेरों के देश के रूप में भारत को समझने वाले पश्चिम जगत को तेज़ी से बदलते विश्व में भारत की बढ़ती भूमिका रास नहीं आ रही. इस बार इसकी बानगी देखने को मिली है पश्चिमी मीडिया संस्थानों द्वारा भारत में आयोजित ब्रिक्स के संबंध में की गई कवरेज में. ये कोई पहली दफा नहीं है जब उसका भारत विरोधी रुख प्रत्यक्ष रूप से दिखा है. इससे पहले चंद्रयान अभियान हो या मंगल मिशन, सभी की सफलता से आहत पश्चिमी जगत भारत पर टिप्पणी करने से बाज नहीं आता. उसने सदैव यह दिखाने का प्रयास किया है कि वह भारत से श्रेष्ठ है और भारत को प्रत्येक कार्य के लिए उससे मान्यता मिलनी चाहिए.

बीतें दिनों 11 सितंबर से 13 सितंबर के बीच भारत में तमाम वैश्विक नेताओं का जमावड़ा लगा. ब्रिक्स की वार्षिक बैठक भारत में होनी थी जो अभूतपूर्व सफलता के साथ सम्पन्न हुई. असफलता की कामना के साथ बैठे पश्चिम देशों के हाथ कुछ न लगा लेकिन उन देशों के मीडिया संस्थानों ने अपने विचार में बसें भारत विरोध को दिखाने का अवसर नहीं छोड़ा. उपनिवेशवाद और व्हाइट मैन सुप्रेमैसी का जितना झूठा दंभ वह भर सकते थे, उन्होंने भरा. सभी प्रमुख अखबारों में बड़े-बड़े लेख लिखे गए, विश्लेषण के नाम पर अपने अवश्यंभावी पतन से जितना मुंह चुराया जा सकता था और जितनी सुखद कल्पनाएं की जा सकती थी सब कर ली गई. सब की सब भारत के प्रति पश्चिमी समझ की कमी और पूर्वाग्रह से भरी हुई थी.

ब्लूमबर्ग, न्यूयॉर्क टाइम्स, रायटर्स, अल जजीरा, द गार्डीअन आदि अखबारों ने भारत की ब्रिक्स मेजबानी का विश्लेषण किया जिसमें उन्होंने निजी कुंठा को पत्रकारिता में लपेट कर पेश की. यह दो स्तर पर गलत और बेमानी थी. पहला तो इनमें प्रयुक्त फोटो के पूर्वाग्रह को लेकर है. लगभग सभी रिपोर्ट में प्रयोग की गई फोटो में एक समानता थी. वह यह कि सभी में पहले किसी सरकारी विज्ञापन की फोटो थी और उसको पृष्ठभूमि बनाकर किसी दीन हीन से दिखने आदमी की फोटो है जो या तो कोई रिक्शा चला रहा था या फिर कोई भोज उठा रहे थे. उन्हें न तो भारत मंडपम की वह भव्य इमारत दिखी और न ही दो दिन तक हुए बड़े-बड़े समारोह. दरअसल इस प्रवृत्ति के पीछे एक बड़ा गहरा कारण है. वर्षों तक पश्चिम ने भारत को एक ही नज़रिए से देखा है जिसमें भारत एक कमज़ोर और उनकी सहायता का पात्र था. भारत को कभी राष्ट्र के रूप में उन्होंने देखा ही नहीं, उनके लिए तो यह खंडित लोगों की सामूहिक धरती थी जो कभी उनके सम्मुख एक दास की भांति रहा है.

हालांकि इसका एक पक्ष यह भी रहा है कि भारत के प्रति इस धारणा को बनाने में कुछ भारतीयों का भी योगदान है जिन्होंने पश्चिम को सदैव प्रेरणा की तरह देखा और उनके सम्मुख भारत को एक कमतर सभ्यता के रूप में पेश किया है. उन्होंने भारत की सांस्कृतिक परंपरा की जगह सांप संपेरों को दुनिया में पेश किया और आजीवन पश्चिमी जगत से स्वीकृति पाने के लिए संघर्षरत रहें. दूसरा कारण है कि पश्चिम ने दशकों तक समृद्ध जीवन जिया है और उनके लिए गरीबी एक बहुत रोमांटिक अनुभव है जिसे पुष्ट करने के लिए उन्होंने भारत को देखा है. अब कि जब भारत उस दौर से बाहर आ चुका है, वह अभी भी उसी मानसिकता में जी रहे है. एक तरफ जहां भारत विपन्नता के दौर से बाहर आ रहा है और पश्चिम पुनः अपनी संपन्नता को खो रहा है, ऐसे में सच्चाई से दूर उनका ये रुख जितना हास्यास्पद है उतना ही त्रासदी पूर्ण भी. ब्रिटेन आज इस्लामिक अतिवाद से जूझ रहा है, अमेरिका हर दिन एक पायदान नीचे या रहा है, अरब धनपशु होने के बाद भी अपनी रक्षा करने में असमर्थ है लोकिन उन्हें सिर्फ भारत को कमतर पेश करना है क्योंकि उन्हें भी पता है कि भारतीय उत्थान अवश्यंभावी है.

इन फोटो के अतिरिक्त भी उन्होंने कई आलोचना योग्य विश्लेषण लिखे जिसमें इस सम्मेलन को लगभग असफल घोषित करने का प्रयास किया. अलग-अलग अखबारों ने अलग-अलग तर्क देकर एक समान निष्कर्ष निकाला. द न्यूयॉर्क टाइम्स ने इस सम्मेलन को भारत और चीन के मध्य कूटनीतिक होड़ के रूप में देखा. उसके अनुसार दोनों में ग्लोबल साउथ के नेता बनने की प्रतिस्पर्धा है. भारत ब्रिक्स को पश्चिमी दुनिया और चीन के बीच एक सेतु के तौर पर देखता है तो वहीं चीन इसे अमेरिका को संतुलन करने का एक उपक्रम मानता है.

रॉयटर्स जैसे कुछ मीडिया संस्थानों ने ब्रिक्स सम्मेलन को अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ से अधिक भारत चीन संबंध के चश्मे से देखा. उनके अनुसार डोकलाम विवाद के बिगड़े हुए संबंध को सुधारने के प्रयास में लगे हुए दोनों देश इस सम्मेलन को अपने द्विपक्षीय संबंधों को सुधारने और आर्थिक सहयोग बढ़ाने के लिए प्रयोग करना चाहते है.

ईरान अमेरिका युद्ध के बीच हो रहे इस सम्मेलन की एकता और व्यावहारिकता पर टिप्पणी करते हुए अल जजीरा ने प्रश्न किया कि ईरान, सऊदी, और यूएइ जैसे विपरीत हित वाले देश इस समूह को कितना एकजुट रहने देंगे? अरब क्षेत्र में इनके अलग-अलग हित और उसे लेकर इनके बीच टकराव का प्रभाव ब्रिक्स को केवल एक प्रतिस्पर्धा का उपक्रम बना देंगे.

इन सभी के बीच टाइम ने अमेरिका पर ब्रिक्स के असर और बहु ध्रुवीय दुनिया के उभार में इसकी भूमिका को बेअसर बताते हुए कहा कि ये समूह विपरीत ध्रुवों को एक साथ लाने का नाहक प्रयास है. उसने तर्क दिया है कि चीन और रूस के बीच भले ही कितनी एकजुटता दिखे लेकिन दोनों एक दूसरे को कभी उभरती हुई वैश्विक व्यवस्था का नेता नहीं मानेंगे.

इसी प्रकार अरब दुनिया से सऊदी, यूएइ और ईरान के होने के कारण ये मतैक्यता को नहीं पा सकेंगे क्योंकि इनके हित मूल रूप से बिल्कुल भिन्न है. साथ ही इसने भारत और चीन के संबंधों की जटिलता के संबंध में भी ब्रिक्स की सार्थकता पर प्रश्न खड़े किए. इसके अनुसार भारत सदैव ही अपने को पश्चिम और चीन के संतुलित करने का प्रयास करेगा तो वहीं चीन अमेरिका के हितों विपरीत कार्य करने के लिए इस समूह का प्रयोग करना चाहेगा और अंततः दोनों के बीच असहमति इस समूह के अमेरिका पर प्रभाव को बेअसर कर देगी.      

संभव है कि प्रथमदृश्यतया कोई इनसे सहमत हो लेकिन ये हवाई कल्पना के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है. अरब दुनिया अब अमरीकी प्रभाव से बाहर निकल रही है ऐसे में भारत के अतिरिक्त कोई दूसरा ऐसा देश नहीं है जो निरपेक्ष रूप से दोनों के मध्य बात कर सकें क्योंकि चीन जहां भी कुछ करेगा वह अमेरिका को संतुलित करने के लिए करेगा न कि उनके मध्य शांति के लिए. जहां बात भारत-चीन संबंधों की तो चीन मामलों के विशेषज्ञ कान्ति बाजपेई के अनुसार ‘‘भारत चीन अब उस स्थिति में है जहां से वह कुछ अर्जित नहीं कर सकते पर परंतु किसी भी तनातनी में दोनों को नुकसान जरूर होगा’’. साथ ही पिछले कुछ वर्षों में चीन भारतीय नीति से जान चुका है कि वह ताकत से कुछ भी हासिल नहीं कर सकता. इसके अतिरिक्त रूस का भविष्य पुतिन के बाद कैसा होगा? इस प्रश्न के उत्तर के बिना कोई भी अंदेशा गलत ही होगा. इस तरह हम ये देख सकते है कि ब्रिक्स के संबंध पश्चिमी अनुमान भ्रामक है. दरअसल पश्चिम चीन के उभार से असुरक्षित महसूस कर रहा है इसलिए ही वह ब्रिक्स के प्रति भी भयभीत है लेकिन भारतीय नज़रिए में ऐसा नहीं है. भारत के लिए ब्रिक्स एक संतुलनकारी उपक्रम है. भारत तेज़ी से ध्रुवीकृत हो रहे विश्व में संतुलित तरीके से अपनी भूमिका तय करना चाहता है. उसे न अमरीकी स्वामित्व कबूल है और न ही वह चीन के पक्ष में खड़ा होना चाहता है. चूंकि पश्चिम को ये आदत नहीं ही कि कोई उनके पिछलग्गू बनने की जगह सहयोगी की तरह बात करें, इसलिए ही वे गलत अनुमान करते है और अतार्किक विश्लेषण पेश करते है. उनके लिए ये भी एक अपाच्य तथ्य है कि जिस अरब दुनिया से उनका प्रभाव कम होता जा रहा है और अभी भी वह अपनी ईरान नीति के प्रति संशय में है, वहीं पर भारत सभी पक्षों की मेजबानी करके उन्हें एक मंच पर लाकर सहमत करके ‘‘दिल्ली घोषणा’’ को ब्रिक्स के मंच से जारी करने में सफल रहा.

इसके अतिरिक्त एक अन्य रोचक पक्ष भी है कि भारत लंबे समय तक भारत की आंतरिक राजनीति और नीतियों में पश्चिम को महत्व देता रहा है लेकिन के बाद सरकार ने उन्हें ये छूट देने से मन कर दिया है. बीते दिनों में सरकार ने कई ऐसे प्रयास किए है जिससे भारत में विदेशी पैसे की पहुंच को कठिन बना दिया गया है ताकि उसका गलत प्रयोग न किया जा सकें. यहीं वजह है कि तमाम पश्चिमी शक्तियां समय-समय पर विरोध करती है और कुछ नुकसान पहुंचाने का असफल प्रयास भी करती है. दरअसल इन शक्तियों ने लंबे समय तक भारत को इस देश के तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग की निगाह से देखा है जो इनकी लगभग पिछलग्गू थी. अब ऐसा नहीं है और इसीलिए इनकी व्याकुलता और बढ़ी है.

भारत के लोगों और सरकार को ध्यान रखने की आवश्यकता है कि वे एक महान राष्ट्र की महान संस्कृति का हिस्सा है अतः उन्हें इस तरह के दुष्प्रचार से प्रभावित नहीं होना है. ऐसे हर प्रयास का विरोध करना है. भारत को अपने आत्मविश्वास के साथ अपनी राष्ट्रीयता की धरोहर पर विश्वास बनाए रखना है.     

नित्य नगीना मिश्र
नित्य नगीना मिश्र
नित्य नगीना मिश्र भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली में पत्रकारिता के छात्र हैं.