भारत एक लोकतांत्रिक देश है, जहां प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने और अपने विचार रखने का अधिकार है. हर व्यक्ति और हर राजनीतिक दल अपने वैचारिक नेताओं का मूल्यांकन करने के लिए स्वतंत्र है. लेकिन इस स्वतंत्रता का इस्तेमाल इतिहास और उसके परिणामों को भूल कर नहीं किया जाना चाहिए.
जब भारत में कोई राजनीतिक संगठन ऐसे विदेशी नेता का सम्मान करता दिखाई देता है, जिसका शासनकाल भारत के लिए युद्ध, तनाव और गंभीर सामरिक चुनौतियों से जुड़ा रहा हो, तो स्वाभाविक रूप से एक प्रश्न उठता है — क्या विचारधारा राष्ट्र से ऊपर हो सकती है? क्योंकि किसी भी लोकतंत्र में राजनीतिक विचारों की स्वतंत्रता के साथ-साथ देश की संप्रभुता, सुरक्षा और राष्ट्रीय हित के प्रति जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है. विचारधारा चाहे कोई भी हो, प्रश्न यह होना चाहिए कि पहले भारत या विचारधारा?
9 सितंबर, 2026 को माओ की 50वीं पुण्यतिथि पर सीपीआई(एम) ने उन्हें “महान क्रांतिकारी” तथा “चीनी क्रांति के मुख्य नेता और रणनीतिकार” के रूप में श्रद्धांजलि दी. यह श्रद्धांजलि स्वाभाविक रूप से एक महत्वपूर्ण प्रश्न खड़ा करती है— क्या किसी विदेशी क्रांतिकारी नेता का सम्मान करते समय उसके पूरे ऐतिहासिक और राजनीतिक विरासत को भी ध्यान में नहीं रखा जाना चाहिए?
माओ के नेतृत्व में भारत-चीन के लगभग दो हजार वर्षों पुरानी मैत्री को दरकिनार कर दिया गया. फिर ऐसी नीतियां अपनाईं, जिनके गंभीर राजनीतिक परिणाम हुए, फलतः भारत-चीन संबंध 1962 के युद्ध तक पहुंच गया. इसलिए प्रश्न माओवाद पढ़ने या इतिहास में उनके स्थान को स्वीकार करने का नहीं, बल्कि उन्हें किस दृष्टि से याद किया जा रहा है और क्या उस स्मरण में भारत के राष्ट्रीय हित तथा 1962 का इतिहास पर्याप्त रूप से उपस्थित है.
आज भारत और चीन के बीच व्यापारिक और कूटनीतिक संबंध हैं. कई बहुपक्षीय मंचों पर दोनों देश सहयोग करते हैं. सीमा और अन्य महत्वपूर्ण मुद्दों पर बातचीत भी जारी रहती है. पर इन दोनों देशों के संबंध थोड़े जटिल है. तिब्बत, सीमा-विवाद, हिंद महासागर, दक्षिण एशिया में चीन की भूमिका और पड़ोसी देशों में उसका बढ़ता प्रभाव, ये सभी भारत की सुरक्षा और सामरिक चिंताओं से जुड़े विषय हैं.
अपने एक्स हैंडल पर माओ का गुनगान करने वाले वामपंथियों से स्वाभाविक रूप से पूछा जा सकता है— आप माओवाद को किस रूप में याद करते हैं?, चीनी क्रांति की विचारधारा के रूप में?, मार्क्सवादी विचारधारा के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में?, गुरिल्ला रणनीति और क्रांतिकारी राजनीति के मॉडल के रूप में?, ऐसे राजनीतिक प्रयोग के रूप में, जिसकी नीतियों और परिणामों को आज भी स्वयं चीनी कम्युनिस्टों ने गंभीर भूल और देश तथा जनता के लिए भारी क्षति का कारण माना है, या हजारों साल पुराने भारत-चाइना दोस्ताना संबंधों के बीच 1962 युद्ध से दरार डालनेवाले अध्याय के रूप में?
यदि किसी विदेशी क्रांतिकारी मॉडल को भारत की राजनीतिक वास्तविकताओं के लिए आदर्श मानने की बात आती है, तो स्वाभाविक रूप से गंभीर प्रश्न उठेंगे. हिंसक क्रांति का समर्थन, भारत की संप्रभुता के विरुद्ध गतिविधि या किसी विदेशी राज्य के हितों को भारत के हितों से ऊपर रखना गंभीर विषय है. इन आरोपों का मूल्यांकन भावनाओं या नारों से नहीं, बल्कि प्रमाणों और तथ्यों के आधार पर होना चाहिए.
एक और महत्वपूर्ण सवाल है— भारत में ऐसे कितने भारतीय नेता, स्वतंत्रता सेनानी, सामाजिक सुधारक और विचारक हैं, जिनके जीवन और विचारों पर गंभीर चर्चा की जा सकती है? फिर उस विदेशी क्रांतिकारी विचारधारा को क्यों चुना जाए, जिसके नेतृत्व वाले चीन के साथ भारत का युद्ध हुआ? क्या यह केवल अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट परंपरा के प्रति वैचारिक सम्मान है?, क्या यह माओवादी इतिहास के प्रति आकर्षण है?, क्या यह चीनी क्रांति को आदर्श मानने की पुरानी मानसिकता है?, या फिर यह केवल राजनीतिक औपचारिकता है?
इन सवालों का उत्तर सीपीआई(एम) ही बेहतर दे सकती है. क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना जनता का अधिकार है. भारत का लोकतंत्र किसी एक विचारधारा का नहीं है. यह गांधी, आंबेडकर, नेहरू, भगत सिंह, सुभाषचंद्र बोस, विनोबा भावे, श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सावरकर, राजेन्द्र प्रसाद और अनेक विचारधाराओं के लोगों की बहसों, संघर्षों और योगदान से विकसित हुआ लोकतंत्र है.
मार्क्सवाद को भी भारत में अपनी जगह मिली है. लेकिन भारतीय वामपंथ से यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह भारतीय वास्तविकताओं के आधार पर अपनी राजनीति को परिभाषित करे. भारत के किसान, मजदूर, महिलाएं, आदिवासी, युवा, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता—ये उसके अपने मुद्दे हैं. इन मुद्दों पर राजनीति करने के लिए माओवाद को आदर्श मानना आवश्यक नहीं है. भारत की गरीबी और असमानता को समझने के लिए किसी विदेशी क्रांतिकारी मॉडल को अपनाना आवश्यक नहीं है. यानी भारत के राष्ट्रीय हित की रक्षा करने के लिए किसी विदेशी विचारधारा के प्रति निष्ठा की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए.
माओवाद की 50वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि और उसके राजनीतिक-सैद्धांतिक संदर्भों ने एक बात स्पष्ट की — माओवाद भारतीय वामपंथ के लिए अभी पूरी तरह इतिहास नहीं बना है. लेकिन क्या माओवादी विरासत को उसी तरह स्वीकार किया जा सकता है जैसे किसी महान साहित्यकार, वैज्ञानिक या दार्शनिक को उसकी रचनाओं और विचारों के कारण याद किया जाता है? नहीं, क्योंकि माओवाद केवल एक विचारधारा नहीं था; वह सत्ता, क्रांति और राज्य-व्यवस्था से जुड़ा एक व्यापक राजनीतिक प्रयोग भी था. उसके नेतृत्व में चीन ने ऐसी नीतियां अपनाईं, जिनसे करोड़ों लोगों का जीवन नकारात्मक तरीक़े से प्रभावित हुआ. इसी दौर में चीन का भारत के साथ युद्ध भी हुआ.
इसलिए माओवाद को पढ़ना, समझना, रणनीति और राजनीतिक विचारों का अध्ययन, उसके ऐतिहासिक प्रभावों पर बहस कीजिए. लेकिन इतिहास की कीमत पर उसका महिमामंडन ठीक नहीं है. स्पष्ट है कि विचारधारा रखिए, असहमति रखिए, लेकिन भारत की संप्रभुता पर समझौता मत कीजिए. विदेशी क्रांतियों का अध्ययन कीजिए, लेकिन भारत की जमीन और भारत के सैनिकों के कीमत पर नहीं. 1962 का युद्ध हमें यही याद दिलाता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी मित्रता से अधिक महत्वपूर्ण होता है—राष्ट्रीय हित.
आज भारत और चीन के संबंध बदल चुके हैं. चीन माओवादी दौर का चीन नहीं है. भारत भी 1962 वाला भारत नहीं है. लेकिन एक बात नहीं बदली — भारत की संप्रभुता भारत की है. किसी भी विचारधारा, किसी राजनीतिक आकर्षण से ऊपर, यही सत्य होना चाहिए. 9 सितंबर, 2026 को चीन के कम्युनिस्ट नेता माओ ज़ेदोंग की 50वीं पुण्यतिथि थी. माओ चीन के इतिहास के सबसे प्रभावशाली और विवादास्पद नेताओं में से एक रहे. वे चीन की कम्युनिस्ट क्रांति के प्रमुख नेता और 1949 में स्थापित जनवादी गणराज्य चीन के सर्वोच्च नेतृत्व के केंद्र में रहे. उनके शासनकाल में चीन ने बड़े राजनीतिक और सामाजिक परिवर्तन देखे, लेकिन उनकी कई नीतियों ने भारी मानवीय और राजनीतिक संकट भी पैदा किए.
विशेष रूप से ग्रेट लीप फॉरवर्ड और सांस्कृतिक क्रांति माओ विचार की विरासत के सबसे विवादास्पद अध्यायों में गिने जाते हैं. स्वयं चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की आधिकारिक ऐतिहासिक समीक्षा ने सांस्कृतिक क्रांति को गंभीर भूल और देश तथा जनता के लिए भारी क्षति का कारण माना है. माओ की ‘ग्रेट लीप फॉरवर्ड’ (1958-1962) नीतियों और गलत कृषि निर्णयों के कारण चीन में भयंकर अकाल पड़ा. इससे लगभग 3 करोड़ से 4.5 करोड़ लोगों की भूख और अत्यधिक श्रम से मौत हो गई. राजनीतिक विरोधियों, भूस्वामियों और ‘सांस्कृतिक क्रांति’ (1966–1976) के दौरान श्रम शिविरों, जेलों और हिंसक झड़पों में लाखों लोग मारे गए या प्रताड़ित किए गए. माओ की नीतियों ने लोगों को भूखा मारा, आपस में हिंसा भड़का कर मारा और जेलों से लेकर सड़को तक माओ ने लोगों पर क्रूरता से शासन किया, लेकिन भारत की लेफ्ट पार्टियों को देश की लोकतांत्रिक सरकार तानाशाह लगती हैं, अजीब पागलपन है.
“पाम एंड फाइव फिंगर्स अवधारणा”: इतिहास और सावधानी
माओवाद और भारत-चीन संबंधों की चर्चा में एक अवधारणा अक्सर सामने आती है — “पाम एंड फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत”. इस रूपक में तिब्बत को चीन की हथेली और लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और तत्कालीन नेफा—आज का अरुणाचल प्रदेश—को उसकी पांच उंगलियां बताया जाता है. भारत में इस अवधारणा का इस्तेमाल चीन की हिमालयी रणनीति और उसके कथित विस्तारवादी दृष्टिकोण को समझने के लिए लंबे समय से होता रहा है.
लेकिन 2024 में प्रकाशित एक शोध-अध्ययन में मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेन्स स्टडीज़ एंड एनालिसिस के शोधकर्ता प्रशांत कुमार सिंह ने “फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत” की ऐतिहासिक प्रमाणिकता की समीक्षा की. उनका निष्कर्ष है कि इस बात के पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं कि माओवाद ने इसे किसी औपचारिक चीनी रणनीति के रूप में प्रतिपादित किया था. लेकिन यह भी सच है कि चीन की तिब्बत नीति, हिमालयी क्षेत्र और भारत के साथ सीमा विवाद उसकी सामरिक सोच के महत्वपूर्ण हिस्से हैं. इसलिए “पाम एंड फाइव फिंगर्स” एक चर्चित रणनीतिक रूपक जरूर है.
यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है. चीन आज भी राजनीतिक रूप से चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में है. चीन के संविधान में चीन को समाजवादी राज्य बताया गया है और उसमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व “चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद” की निर्णायक विशेषता है.
चीन ने बाद के दशकों में आर्थिक सुधार, बाजार-आधारित व्यवस्थाओं, निजी उद्यम, विदेशी निवेश, वैश्विक व्यापार और तकनीकी विकास को व्यापक स्थान दिया. लेकिन राजनीतिक सत्ता की केंद्रीय संरचना में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व अब भी कायम है. यह कहना भी उचित नहीं होगा कि चीन की सामरिक सोच पूरी तरह बदल गई और भारत-चीन की प्रतिस्पर्धा समाप्त हो गई.
आज चीन एक अत्यंत शक्तिशाली आर्थिक, तकनीकी सैन्य शक्ति है. भारत और चीन के संबंधों में व्यापार भी है, कूटनीति भी है और प्रतिस्पर्धा भी. सीमा विवाद भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है. यही कारण है कि भारत को चीन को न तो केवल एक पुराने वैचारिक प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखना चाहिए और न ही केवल एक व्यापारिक साझेदार के रूप में. चीन आज एक शक्तिशाली पड़ोसी, आर्थिक साझेदार, सामरिक प्रतिस्पर्धी और सीमा-विवाद से जुड़ा देश — इन सभी भूमिकाओं में एक साथ मौजूद है.
प्राचीन सांस्कृतिक मैत्री से आधुनिक सामरिक प्रतिस्पर्धा तक
भारत और चीन का संबंध लगभग दो हजार वर्षों से था. प्राचीन काल से दोनों सभ्यताओं के बीच ज्ञान, बौद्ध धर्म, दर्शन और व्यापारिक संबंध थे. फाह्यान, ह्वेनसांग और इत्सिंग जैसे चीनी यात्री भारत आए, नालंदा जैसे विश्वविद्यालयों में अध्ययन किया और भारतीय ज्ञान-परंपरा को चीन तक पहुंचाया. ह्वेनसांग के समय सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल में भारत-चीन सांस्कृतिक संबंध विशेष रूप से मजबूत था.
प्राचीन चीनी यात्रियों के वृत्तांतों में भारत एक समृद्ध और वैभवशाली भूमि के रूप में उभरता है—जहां विकसित नगर, संपन्न व्यापार, भव्य धार्मिक संस्थान और ज्ञान की समृद्ध परंपरा दिखाई देती है. भारत की आर्थिक-सांस्कृतिक सम्पन्नता और उसके विद्वानों तथा शिक्षा-केंद्रों की प्रतिष्ठा ने इन यात्रियों को गहराई से प्रभावित किया था. जिस चीन से प्राचीन काल में ज्ञान की खोज में यात्री भारत आते थे, उसी चीन के साथ आधुनिक भारत का संबंध 1950 के दशक में सीमा और सामरिक विवादों के कारण बदल गया और 1962 का युद्ध दोनों देशों के इतिहास में एक गहरी दरार बन गया. अंग्रेज़ों से मिली आज़ादी के बाद भारत अपने पैरों पर खड़ा होने और एक नए राष्ट्र के निर्माण में जुटा था. ऐसे नाजुक समय में चीन ने युद्ध छेड़ दिया. 1962 का भारत-चीन युद्ध अचानक नहीं हुआ था. यह उस लंबे समय से बढ़ रहे तनाव का परिणाम था, जिसकी पृष्ठभूमि 1950 के दशक में तैयार हो चुकी थी. दूसरी ओर 1949 में चीन में कम्युनिस्ट सत्ता स्थापित हो चुकी थी और 1950 के बाद तिब्बत पर चीन का नियंत्रण स्थापित होने से भारत-चीन सीमा का प्रश्न और अधिक गंभीर हो गया.
भारत के विदेश मंत्रालय के ऐतिहासिक दस्तावेज बताते हैं कि 1956 में चीन ने शिनजियांग से तिब्बत तक सड़क निर्माण शुरू किया. अक्साई चिन से होकर बनी सड़क और चीनी मानचित्रों में अक्साई चिन तथा मैकमोहन रेखा के दक्षिण के कुछ क्षेत्रों को चीन का हिस्सा दिखाए जाने से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ता गया. इसके बाद सीमा पर चीनी घुसपैठ और भारतीय प्रतिक्रिया ने स्थिति को और जटिल बना दिया.
अक्टूबर 1962 में यह तनाव, युद्ध में बदल गया. यह कोई छोटी सीमा-झड़प नहीं थी. तिब्बत पर चीन का नियंत्रण, अक्साई चिन में चीनी गतिविधियां, सीमा विवाद और दोनों देशों की बढ़ती सुरक्षा चिंताएं धीरे-धीरे उस स्थिति तक पहुंचीं, जहां सैन्य टकराव हुआ. पश्चिम में लद्दाख और पूर्व में तत्कालीन नेफा, आज का अरुणाचल प्रदेश युद्ध के प्रमुख क्षेत्र बने.
जवाहरलाल नेहरू ने दिसंबर 1962 में चीन की कार्रवाई को भारत के विरुद्ध “aggression and invasion”, अर्थात “आक्रमण और हमला”, के रूप में वर्णित किया था. उनके लिए यह केवल सीमा का विवाद नहीं था; यह उस भारत के लिए गंभीर राष्ट्रीय संकट था, जो स्वतंत्रता के बाद अपनी सुरक्षा और संप्रभुता को मजबूत करने की कोशिश कर रहा था.
इसलिए 1962 युद्ध को इतिहास की एक पुरानी तारीख मानकर आगे बढ़ जाना उचित नहीं है. यह भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा की स्मृति का हिस्सा है.
भारतीय विद्वान मीरा सिन्हा भट्टाचार्जी ने अपने अध्ययन Mao Zedong’s Vision: China, the World and India में माओ की विदेश नीति और चीन की अंतरराष्ट्रीय भूमिका का विश्लेषण करते हुए भारत को माओ की रणनीतिक सोच में महत्वपूर्ण स्थान दिया है. उनके अध्ययन में 1962 के युद्ध को केवल क्षेत्रीय दावों के संदर्भ में नहीं, बल्कि माओ की व्यापक सामरिक और राजनीतिक गणनाओं के संदर्भ में देखा गया है.
अध्ययन के एक महत्वपूर्ण हिस्से का शीर्षक ही है — “Not Territorial Concerns but Strategic Considerations”. लेखिका का तर्क है कि 1962 में भारत के साथ युद्ध के पीछे व्यापक रणनीतिक और राजनीतिक उद्देश्य भी थे. उनके अनुसार, भारत उस समय अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा था और माओ की रणनीतिक गणनाओं में भारत का स्थान इसी कारण विशेष था. अर्थात् 1962 के युद्ध को केवल तत्कालीन सीमा-विवाद तक सीमित करके देखना पर्याप्त नहीं होगा. उस समय की वैश्विक राजनीति, चीन की सामरिक सोच और माओवाद की विश्व-दृष्टि को भी समझना आवश्यक है.
सीपीआईएम खुलेआम भारत के दुश्मन का जश्न मना रही है. हैरानी की बात यह है कि कोई भी इन लोगों से जवाब नहीं मांगता. ‘इंडी ब्लॉक’ की दूसरी पार्टियों से पूछा जाना चाहिए कि क्या वे भारत के दुश्मन का समर्थन करती हैं? भारत का लिबरल गुट विशेषाधिकारों की एक अलग ही दुनिया में रहता हैं. एक वामपंथी माओ का खूब प्रचार करेगा और सरकार पर फासीवादी, देशद्रोही और आतंकवादी होने का आरोप लगाएगा. और भारत के वामपंथी ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे इसमें कुछ भी अजीब न हो.
1962 में, भारतीय कम्युनिस्टों के कुछ गुटों ने – जिनमें सीपीआई के कुछ सदस्य भी शामिल थे – भारत के बजाय चीन का समर्थन किया और उसका बचाव किया. उन्होंने देश से ऊपर अपनी विचारधारा को रखा. 64 साल बाद, 2026 में, सीपीआईएम माओ ज़ेडोंग को एक महान क्रांतिकारी नेता के तौर पर सलाम करती है, जिनकी भारत के खिलाफ़ युद्ध की भूमि तैयार करने भी बड़ी भूमिका रहा. कम्युनिस्ट चाहे तब के हो या अब के, उनकी चीन के प्रति वफादारी वफ़ादारी कभी नहीं बदलीं.
जो लोग अतीत को याद नहीं रखते, वे उसे दोहराने के लिए अभिशप्त होते हैं.” – जॉर्ज सैंटायाना, The Life of Reason (1905)
माओवाद के समय की चीन की नीतियों और आज के चीन की नीतियों में अंतर है. लेकिन इतिहास का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है. 1962 के युद्ध ने भारत को अपनी सैन्य तैयारी, सीमा सुरक्षा और सामरिक दृष्टि की गंभीर कमजोरियों का अहसास कराया. आज भारत और चीन के संबंध भले ही अनेक स्तरों पर आगे बढ़े हों, लेकिन 1962 की स्मृति आज भी दर्द देती है.
माओवाद को पढ़ना चाहिए—लेकिन केवल एक “महान क्रांतिकारी” के रूप में नहीं. उन्हें एक ऐसे ऐतिहासिक नेता के रूप में पढ़ना चाहिए, जिसकी क्रांति ने चीन को बदल दिया, पर कुछ नीतियों की वजह से चीन ने भारी कीमत भी चुकाई. साथ हीं यह नहीं भूलना चाहिए हमारे हजारों साल पुराने सौहार्दपूर्ण भारत-चीन संबंधों पर गहरा नकारात्मक प्रभाव ड़ाला. भारत के लिए सबसे बड़ी सीख शायद यही है— राष्ट्रीय हित, राष्ट्रीय सुरक्षा और भारत की संप्रभुता सबसे ऊपर होनी चाहिए.
यहां एक महत्वपूर्ण फर्क समझना ज़रूरी है. चीन की आलोचना करना देशभक्ति का प्रमाण नहीं है. और चीन की किसी नीति की प्रशंसा देशद्रोह नहीं है. लोकतंत्र में असहमति की जगह है. किसी विचार से असहमति रखना और किसी राष्ट्र के प्रति शत्रुता रखना एक ही बात नहीं है. इसी तरह किसी विदेशी विचारधारा का अध्ययन करना और अपने राष्ट्रहित से समझौता करना भी एक ही बात नहीं है. इसलिए अंतिम कसौटी न तो अंध-विरोध होनी चाहिए, न अंध-समर्थन.
इस बिंदु पर पूरी बहस का उत्तर है – लोकतंत्र में राष्ट्र के देशभक्त नागरिकों के लिए— देशहित सर्वोपरि, भारत सबसे पहले है. यदि भारत-चीन के संबंधों में किसी विरासत की प्रशंसा करनी है, तो क्यों न उस प्राचीन ज्ञान, सांस्कृतिक संवाद और सौहार्द की विरासत को याद किया जाए, जिसने दोनों सभ्यताओं को सदियों तक जोड़े रखा? फिर उस विचारधारा और राजनीतिक विरासत को श्रेष्ठ क्यों माना जाए, जिसने आधुनिक दौर में इस ऐतिहासिक सौहार्द को गहरी दरार में बदल दिया?
