जिस देश को वहां के नागरिक नारी के रूप में, आदि शक्ति की भांति पूजते हैं, उस देश को विभाजनकारी मानसिकता के लोग अपनी राजनीति और वोट की आस में पुरुष प्रधान, पितृसत्ता से प्रभावित बताते हैं, जिसे वो समाप्त करने की बात भी करते हैं. जिस देश में आप रहते हैं यदि उसके कल्याण और यशोगान में भारत माता की जय के नारे लगते हैं, तो उस देश की भौगोलिक सीमाओं से लेकर, राजनीतिक-प्रशासनिक तंत्र, समाज की व्यवस्थाओं में महिलाओं की सबसे पहले भागीदारी से आगे बढ़कर उनके कंधों पर देश की जिम्मेदारी, सृष्टि के संचालन से लेकर उनसे बढ़कर समाज में कुछ नहीं है की ध्वनि सुनाई देती है.
प्राचीन काल से लेकर मध्य और आधुनिक युग तक नेतृत्व करने से लेकर, राष्ट्र की रक्षा, मार्गदर्शन, समाज को दिशा देने, देश की नीतियां निर्धारित करने से लेकर देश के संचालन में भारत की नारीशक्ति ने सदैव ही पुरुषों से कहीं आगे जाकर अपने सामर्थ्य, क्षमता, शक्ति, दृढ़ निश्चय से भारत का उद्धार किया है. गार्गी, मैत्रेयी से लेकर रानी दुर्गावती, अहिल्याबाई होल्कर, रानी लक्ष्मी बाई, रानी चेन्नम्मा तक ऐसी असंख्य महिलाएं भारतीय सभ्यता, दर्शन, चिंतन, जीवनशैली, इतिहास में आपको मिल जाएंगी.
22 अगस्त के दिन पुणे में देश के नेता प्रतिपक्ष ने स्मैश दा पैट्रीआर्की का नारा देकर महिलाओं को वोट के लिए लुभाने का प्रयास किया. कांग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के परिवार से उनके परदादा, पिता और दादी देश के प्रधानमंत्री रहे हैं, लेकिन उनके शासनकाल में जब देश को महिलाओं को समान अधिकार, समान भागीदारी देने का समय था तो महिलाओं का नेतृत्व न के बराबर रहा. देश में पहला आम चुनाव होने के बाद देश के पहले मंत्रिमंडल में पूर्व पीएम पंडित नेहरू के समय राजकुमारी अमृत कौर एकमात्र महिला पूर्णतः कैबिनेट मंत्री थीं. द्वितीय और तृतीय मंत्रिमंडल (1962–1964) में डॉ. सुशीला नायर एकमात्र महिला कैबिनेट मंत्री थीं. वहीं इंदिरा गांधी ने अपने प्रधानमंत्री कार्यकाल (1966–1977 तथा 1980–1984) के दौरान किसी भी महिला को पूर्ण कैबिनेट-रैंक मंत्री के रूप में नियुक्त नहीं किया. वर्तमान में कांग्रेस शासित राज्यों, कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में, एक भी महिला मंत्री नहीं है. हिमाचल में तो महिला कल्याण मंत्रालय एक पुरुष मंत्री के पास है, और वहीं कर्नाटक में महिला मंत्रालय के लिए अभी तक कोई मंत्री नियुक्त नहीं किया गया है.
अपनी बहन प्रियंका गांधी से 1 साल 7 महीने बड़े राहुल गांधी खुद लोकसभा सांसद साल 2004 में बन गए, लेकिन उनकी बहन उनसे 20 साल बाद 2024 में पहली बार सांसद बनीं. वो भी तब जब राहुल गांधी ने दो लोकसभा सीटों से जीतने के बाद केरल की वायनाड सीट खाली की. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष भी वो खुद हैं, पार्टी के सभी वरिष्ठ पदाधिकारियों के साथ बैठक करते भी वही नजर आते हैं. हाल ही में कर्नाटक में सत्ता परिवर्तन से लेकर हिमाचल प्रदेश सहित देश भर में कहीं भी कोई आयोजन हो, राहुल गांधी ही मंच संभाले दिखते हैं. तमिलनाडु में विजय के साथ गठबंधन में कांग्रेस के विधायक ने ये तक कह डाला कि यदि टीवीके राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित नहीं करती है, तो कांग्रेस उनसे अपना गठबंधन खत्म कर देगी. लेकिन राहुल गांधी तो पितृसत्ता को नष्ट करने की बात करते हैं और उनकी ही पार्टी के विधायक, सांसद, मुख्यमंत्री से लेकर सब एक पुरुष को देश का प्रधानमंत्री बनाने की तैयारी में जुटे हैं.
कांग्रेस पार्टी के सभी सेलों, मोर्चों जैसे मीडिया, सोशल मीडिया, युवा, लीगल सेल समेत 27 सेलों के हेड में से मात्र 3 ही महिलाएं हैं, बाकी बचे 24 पुरुष हैं. कम्युनिकेशन, विदेश विभाग, रिसर्च, टेक्नोलॉजी, ओबीसी मोर्चा जैसे अहम विभाग राहुल गांधी ने पुरुषों को दे रखे हैं, जिनकी निगरानी के लिए एक पुरुष राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को नियुक्त कर रखा है. छात्रों की गूंज कार्यक्रम देहरादून, कोटा, पुणे में मंच से लेकर कांग्रेस की नीति-निर्धारण, आगामी कार्यक्रमों, पार्टी की बैठकों, धरना-प्रदर्शन में जब एक पुरुष ही बागडोर संभाले हुए हैं, तो कांग्रेस में महिलाओं को नेतृत्व करने की कार्यशैली, क्षमता ही नहीं है. महात्मा गांधी जी ने कहा था, “हम जो परिवर्तन देश और समाज के अंदर देखना चाहते हैं, पहले वो हमें अपने अंदर लाना पड़ता है, तब समाज उसको अपनाता है.”
