पिछले हफ्ते राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत अपने तीन देशों के दौरे पर थे. इस दौरान न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन में उनका एक कार्यक्रम रखा गया. इस दौरे से ठीक पहले जब न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी से इस कार्यक्रम को लेकर सवाल पूछा गया, तो उन्होंने अपने वही विचार सामने रख दिए जिनकी वजह से उनकी आलोचना करने से कोई भी भारतीय खुद को नहीं रोक पाता.
ममदानी ने कहा कि मोहन भागवत का मैडिसन स्क्वायर गार्डन का कार्यक्रम एक निजी कार्यक्रम है और उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि वह इस कार्यक्रम को रोकने की हैसियत रखते हैं या नहीं. ममदानी का यह बयान अधिकार क्षेत्र को लेकर था, लेकिन इसके बाद उन्होंने जो कुछ कहा, उसने उनके राजनीतिक रुख को लेकर बहस छेड़ दी.
उन्होंने अपने बयान में खुद को भारतीय मूल से जोड़ते हुए कहा, “मैं खुद भारतीय मूल से आने वाला मेयर हूं और मेरी मां का परिवार अभी भी भारत में है. भारत अभी भी एक बहुलवादी और धर्मनिरपेक्ष गणतंत्र है.”
भारत की सतही तारीफ और अपनी झूठी निष्पक्षता का दावा करने के तुरंत बाद ममदानी ने अपना ध्यान ‘हिंदुत्व’ की ओर मोड़ा. उन्होंने कहा, “किसी भी देश के बारे में बहिष्कारवादी दृष्टिकोण पर आधारित आंदोलन को बढ़ते देखना बेहद चिंताजनक है. इसलिए, यह एक ऐसा आंदोलन है जिसका मैं घोर विरोध करता हूं.”
उन्होंने आगे कहा कि, “न केवल एक भारतीय मूल के अमेरिकी के रूप में, बल्कि एक ऐसे शहर के मेयर के रूप में भी जो हर व्यक्ति के अपनेपन में गहराई से विश्वास करता है, चाहे उनका रंग, पंथ, धर्म, आस्था कुछ भी हो, वे कहीं से भी आए हों, मैं इस रैली का समर्थन नहीं करता, लेकिन मुझे नहीं पता कि किसी निजी कार्यक्रम को रद्द करने का अधिकार शहर के पास है भी या नहीं.”
ममदानी के इस दोहरे बयान के बाद सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हो गया. एक तरफ उनके वामपंथी, लिबरल समर्थकों ने इसे धर्मनिरपेक्षता के पक्ष में बताया, तो दूसरी तरफ हिंदू समुदाय से जुड़े लोगों ने इसे हिंदू-विरोधी रुख करार दिया.
इसी बीच फेल्ड कॉमेडियन और अक्सर हिंदू-विरोधी टिप्पणियों के लिए चर्चा में रहने वाले कुणाल कामरा ने ममदानी के बयान पर ट्वीट किया. कामरा ने लिखा कि न्यूयॉर्क के मेयर कह रहे हैं कि उनके पास मैडिसन स्क्वायर गार्डन में होने वाले एक निजी आरएसएस कार्यक्रम को रद्द करने का अधिकार नहीं है, जहां आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत को भाषण देना है.
कामरा ने इसकी तुलना भारत की “वाइब्रेंट डेमोक्रेसी” से की. उन्होंने कहा कि भारत में तो थाने का एक एसआई ही आसानी से ऐसा कार्यक्रम रुकवा सकता है. इसके लिए उन्होंने एक पूरा प्लेबुक भी बताया.
कामरा द्वारा बताए गए स्टेप्स के अनुसार, पहला स्टेप यह है कि भागवत को बताओ कि उन्हें पुलिस सुरक्षा की जरूरत है क्योंकि एक छोटे समूह का कहना है कि उनका भाषण उनकी धार्मिक भावनाओं को आहत करता है और वे विरोध की धमकी दे रहे हैं. दूसरा स्टेप, उनसे लिखित में लो कि उनके भाषण में कोई भी सांस्कृतिक, धार्मिक, राजनीतिक, भाषाई या ऐतिहासिक सामग्री नहीं होगी जो किसी भी जीवित, मृत या अजन्मे व्यक्ति को ठेस पहुंचा सके. तीसरा, घोषणा पत्र लेने के बाद पुलिस संसाधनों की कमी का हवाला देकर सुरक्षा देने से मना कर दो. चौथा, भागवत को खुद ही दर्शकों की सुरक्षा का हवाला देकर कार्यक्रम स्थगित करने पर मजबूर करो. पांचवां, अगले 5 साल तक हर संभावित तारीख पर ‘संसाधन नहीं हैं’ का वही बहाना दोहराते रहो.
खैर ध्यान रखने योग्य बात यह है कि, एक्स पर ये सब ज्ञान देने वाले कामरा वही व्यक्ति है जो मां सीता को राम की पत्नी कहकर संबोधित करता है और जिसे रामायण और महाभारत जैसे हिंदुओं के धर्मग्रंथ माइथोलॉजी लगते हैं.
ममदानी का विवाद सिर्फ इस एक बयान तक सीमित नहीं है. ममदानी हिंदुओं और भारत के ख़िलाफ़ अपने लगातार भड़काऊ बयानों के लिए जाने जाते रहे हैं.
इससे पहले ममदानी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तुलना इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से भी की और उन्हें “वार क्रिमिनल” करार दिया है. न्यूयॉर्क का यह मेयर अक्सर नफ़रत भड़काने और लोगों के बीच वैचारिक खाई बनाने का कोई मौका नहीं छोड़ता.
ममदानी भारत के सुप्रीम कोर्ट द्वारा गुजरात दंगों में क्लीन चिट दिए जाने के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी पर लगातार हमला करते रहता है. उन्होंने एक रैली में तो यहां तक दावा कर दिया कि गुजरात में शायद ही कोई मुसलमान बचा है.
ममदानी ने देश के एक बड़े राजनीतिक दल से जुड़े हिंदुओं को ‘फासीवादी’ तक करार दिया और साथी न्यूयॉर्क के राजनेताओं जेनिफर राजकुमार और केविन थॉमस को प्रधानमंत्री मोदी की निंदा न करने के लिए फटकार लगाई, ममदानी के सारे ज़हरीले तेवर सिर्फ हिंदू धर्म से जुड़े और धर्म के लिए काम करने वाले नेताओं पर ही होते हैं जिससे साफ पता चसता है कि उन्हें दिक्कत सिर्फ हिंदू धर्म से ही है. राम मंदिर निर्माण का विरोध करके वह इसे साबित भी कर चुके हैं.
ममदानी के राजनीतिक रुझान को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं. वह दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपियों में से एक और हिंदू विरोधी दंगों में संलिप्त रहने वाले उमर खालिद के समर्थक हैं और खालिद का समर्थन अपने भाषणों में करते रहते हैं. ममदानी ने उनकी रिहाई की वकालत करते हुए एक पत्र भी लिखा है.
इसके अलावा, ममदानी का यहूदी-विरोध और इस्लामवादियों से संबंधों किसी से छिपे नहीं हैं. मामदानी पहले ही नरसंहार को सही बताने वाले नारे “ग्लोबलाइज द इंटिफादा” की निंदा करने से इनकार कर चुके हैं. उन्होंने यहूदी समुदायों को इस नारे से पैदा होने वाले डर से बचाने के लिए बनाए गए हर संस्थागत सुरक्षा उपाय को भी नष्ट कर दिया है.
इसी साल रमज़ान के ममदानी ने इज़रायल विरोधी कट्टरपंथी महमूद खलील को मेयर के आधिकारिक आवास ग्रेसी मेंशन में इफ्तार डिनर के लिए आमंत्रित किया था. खलील, उनकी पत्नी नूर और उनके बच्चे, ममदानी और उनकी पत्नी रामा दुवाजी ने साथ में रोजा तोड़ा. सवाल यही कि अगर ममदानी खुद को सेक्यूलर बताते हुए हिंदुत्व का विरोध करते हैं, तो वे इस्लामिक कट्टरपंथियों के साथ क्यों देखे जाते हैं.
ममदानी का हिंदू विरोधी रवैया परिवार से ही उन्हें मिला है. उनके पिता, महमूद ममदानी, भारतीय मूल के युगांडा के लेखक और राजनीतिक सिद्धांतकार हैं, जिन्होंने भारत के हिंदुओं की तुलना रवांडा के हुतू लोगों से की, मुहम्मद अली जिन्ना की प्रशंसा की और आत्मघाती हमलावरों को “सैनिक” बताते हुए आतंकवाद का बचाव किया है.
अमेरिका में मोहन भागवत के विरोध को लेकर कुछ संगठनों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं. ये संगठन खुद को मानवाधिकारवादी बताते हैं, लेकिन भारत सरकार के अनुसार इनकी गतिविधियां अक्सर भारत-विरोधी एजेंडे को बढ़ावा देती हैं.
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर छवि खराब करने के लिए इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) और हिंदूज़ फॉर ह्यूमन राइट्स (HFHR) जैसे संगठन अमेरिकी सरकार और (USCIRF) पर लगातार दबाव बनाते हैं कि भारत को “विशेष चिंता का देश” घोषित किया जाए. वे भारतीय अधिकारियों पर आर्थिक और अन्य प्रतिबंध लगाने की वकालत करते हैं, जो भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुंचाता है.
इन संगठनों पर प्रवासी भारतीयों को निशाना बनाने का भी आरोप है. ये संगठन अमेरिकी राजनेताओं पर हिंदू-अमेरिकी समूहों से चंदा न लेने का दबाव बनाते हैं. प्रवासी भारतीय संगठनों को “कट्टरपंथी” के रूप में लिस्ट करके, ये विदेशों में भारतीय समुदाय को विभाजित करते हैं और उनकी राजनीतिक ताक़त को कमज़ोर करते हैं.
अमेरिका में हिंदू धर्म के लिए काम करने वाले संगठनों को हमेशा निशाने पर रखने वाले हिंदू विरोधी समूह भू-राजनीतिक हितों को नुकसान पहुंचाने का काम भी करते हैं. ये समूह अक्सर ऐसे विदेशी मंचों और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर काम करते हैं, जो भारत की रणनीतिक स्वायत्तता, क्षेत्रीय अखंडता और आर्थिक प्रगति के ख़िलाफ़ एजेंडा चलाते हैं. ये चुनिंदा और एकतरफा नैरेटिव चलाते हैं. पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों पर होने वाले अत्याचारों या पश्चिमी देशों में हिंदू मंदिरों पर हमलों पर पूरी तरह चुप रहते हैं और उनका पूरा ध्यान केवल वैश्विक मीडिया में भारत को एक ‘असहिष्णु राष्ट्र’ के रूप में पेश करने पर होता है.
सेलेक्टिव चुप्पी का सबसे बड़ा उदाहरण तब सामने आया जब बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा के विरोध में ममदानी ने कुछ बोला और न ही अन्य किसी संगठन ने.
लेकिन ये लोग यहीं नहीं रुकते, हिंदू धर्म के अलावा उन्हें पूरे भारत से ही समस्या है. न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन के बाहर आरएसएस सरसंघचालक मोहन भागवत के कार्यक्रम के दौरान हुए विरोध प्रदर्शनों में भारतीय राष्ट्रध्वज का इस्तेमाल विरोध जताने के एक विवादित माध्यम के रूप में किया गया. प्रदर्शनकारियों ने भारतीय तिरंगे का अपमान किया. सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो के अनुसार, इन भारत विरोधी लोगों ने भारतीय तिरंगे को जमीन पर बिछाकर उसके ऊपर पैर रखा और उसे कुचला. एक प्रदर्शनकारी ने भारत के राष्ट्रीय ध्वज को अपने पैर पर बांध रखा था, जिसे खुलेआम प्रदर्शित किया गया.
यह पूरा प्रदर्शन IAMC, HFHR और अन्य संगठनों के द्वारा आयोजित किया गया था, लेकिन तिरंगे के अपमान की इस विशिष्ट घटना के पीछे सिख फॉर जस्टिस (SFJ) और अन्य खालिस्तानी समर्थक तत्व भी शामिल थे, जो इस भीड़ का हिस्सा बनकर वहां पहुंचे थे.
इसके पीछे का मकसद भारत की संप्रभुता को चुनौती देना और उकसाने की नीति बताया जा रहा है. सिर्फ आरएसएस का विरोध करने के बजाय सीधे भारतीय ध्वज को निशाना बनाना यह दर्शाता है कि इन तत्वों का मकसद केवल एक संगठन का विरोध करना नहीं, बल्कि भारतीय राष्ट्र का अपमान करना था. आरएसएस को एक राष्ट्रवादी संगठन माना जाता है, इसलिए उसके समर्थकों को उकसाने के लिए जानबूझकर तिरंगे को निशाना बनाया गया.
भारत सरकार और प्रवासियों की प्रतिक्रिया भी इस पर सामने आई. केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने इस घटना का वीडियो साझा करते हुए कड़ी निंदा की. उन्होंने कहा कि आपको भाजपा, आरएसएस या सरकार की आलोचना करने की आजादी है, लेकिन हमारे देश या हमारे राष्ट्रीय ध्वज का अपमान न करें. अमेरिका में रह रहे आम भारतीय प्रवासियों ने भी इस कृत्य का कड़ा विरोध किया.
इसी मुद्दे पर अमेरिका में रह रहे भारतीय समुदाय की तरफ से एक तीखा सवाल भी उठाया गया. यूएस इंडिया कम्यूनिटी फाउंडेसन के चेयरमैन डॉ. भरत बाराई ने डेमोक्रेट और बाइडेन के पूर्व सलाहकार ट्रॉय ब्लैकवेल से सवाल पूछते हुए कहा, “बांग्लादेश में हाल ही में इतने सारे हिंदू मारे गए; 300 से अधिक मंदिरों में तोड़फोड़ की गई. उन हिंदुओं की रक्षा के लिए मानवाधिकार वाले लोग कहां थे?”
उत्तरी अमेरिका से संचालित होने वाला खालिस्तानी चरमपंथ, वर्तमान में भारत के ख़िलाफ़ वैश्विक प्रचार का केंद्र बन चुका है. कनाडा लंबे समय से SFJ द्वारा चलाई जा रही भारत-विरोधी गतिविधियों का मुख्य गढ़ बना हुआ है. SFJ ने कनाडा की राजधानी ओटावा में एक अनौपचारिक “खालिस्तान जनमत संग्रह” आयोजित किया, जहां “किल इंडिया” जैसे नारे लगाए गए. हाल ही में कनाडाई खुफिया एजेंसी CSIS ने अपनी रिपोर्ट में खालिस्तानी चरमपंथियों को कनाडा के लिए “राष्ट्रीय सुरक्षा खतरा” घोषित किया है.
अमेरिका में भी SFJ के संचालक गुरपतवंत सिंह पन्नून लगातार वीडियो जारी कर भारत के विमानों और राजदूतों को धमकियां दे रहे हैं. भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने वाशिंगटन के सामने यह मुद्दा उठाया है. एफबीआई और कनाडा की आरसीएमपी ने ‘ड्यूटी टू वॉर्न’ प्रोटोकॉल के तहत सुरक्षा अलर्ट भी जारी किया है.
इस पूरे घटनाक्रम पर एक बड़ी प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर देखने को मिली. ओवरटीन इंस्टीट्यूट के को-फाउंडर जॉय मन्नारेनक ने अपने एक्स अकाउंट पर लिखा, “ज़ोहरान ममदानी ने अब कल एनवाईसी में होने वाले एक हिंदू कार्यक्रम को ब्लॉक कर दिया है. यह आदमी जल्द ही ईरान में आयतुल्ला को भी पीछे छोड़ देगा, जिस तरह से वह खुलेआम हर उस व्यक्ति से नफ़रत करता है जो मुस्लिम नहीं है. मुझे उम्मीद है कि हर कोई यह समझेगा कि मुस्लिम ब्रदरहुड के लोगों को सत्ता में बिठाना इस धरती के हर देश में एक बुरा विचार है.”
भारत में भी इस पर राजनीतिक प्रतिक्रिया आई है. हैदराबाद, तेलंगाना में न्यूयॉर्क सिटी के मेयर ज़ोहरान ममदानी के मोहन भागवत के कार्यक्रम के विरोध पर शिवसेना सांसद मिलिंद देवरा ने कहा कि, अगर मैं किसी का विरोध करना चाहता हूं, तो मुझे ऐसा करने का पूरा अधिकार है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मैं उनकी आवाज़ को दबा दूंगा. अगर आप किसी को नापसंद करते हैं, तो आपको ऐसा करने का पूरा अधिकार है; यह आपको ऐसा करने का लोकतांत्रिक अधिकार देता है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपको किसी को आने से रोकना चाहिए. यदि आप ऐसा कर रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आप पूरी तरह से एक असहिष्णु व्यक्ति हैं. और इसका मतलब है कि आप डेमोक्रेट नहीं हैं; आप एक सत्तावादी व्यक्ति हैं.”
मोहन भागवत के दौरे के आसपास बने सोशल और पॉलिटिकल माहौल ने ममदानी के कथित सेक्युलरिज्म की पोल खोल दी है. मामदानी जो खुदको वैश्विक नागरिक के रूप में दिखाता है, लेकिन अंदर से वो भी एक कट्टरपंथी और एंटी हिंदू/एंटी इंडिया नेता है. सबसे बड़ा सवाल यह है जो मामदानी फ्रीडम ऑफ स्पीच की बात करता है वो भारत के एक राष्ट्रवादी संगठन के एक निजी कार्यक्रम से इतना क्यों डर गया? ममदानी की हिंदुओं से खुन्नस रक्षाबंधन के दिन भी सामने आई, जब उन्होंने राखी को साउथ एशिया का त्यौहार बता दिया. शायद मामदानी को अपने आकाओं से डर लगता है इसीलिए वो एक हिंदू त्योहार को हिंदू त्योहार तक नहीं लिखा पा रहा.
