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मानसिक स्वास्थ्य भी मर्दानगी है

पुरुषों में बढ़ रहे डिप्रेशन के मामलों को गंभीरता से लेने की ज़रूरत

आज बात उस विषय की होगी जिस पर शायद ही कभी बात होती है. यह विषय है, पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य का. सच कहें तो, एक स्वस्थ मन ही स्वस्थ शरीर की नींव स्थापित करता है, और यह बात पुरुषों पर उतनी ही लागू होती है जितनी किसी और पर. भारतीय समाज में आज भी मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य जितनी गंभीरता नहीं मिलती और पुरुषों के मामले में तो यह अनदेखी और भी ज्यादा है, जबकि दोनों बराबर महत्व की मांग करते हैं.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मानसिक स्वास्थ्य वह अवस्था है जिसमें कोई व्यक्ति अपनी विशिष्ट क्षमताओं को पहचान पाता है, जीवन के उतार-चढ़ावों से निपट पाता है और समाज में सार्थक योगदान दे सकता है. यानी यह सिर्फ एक बीमारी न होने की स्थिति नहीं, बल्कि किसी इंसान की पूरी जिंदगी की गुणवत्ता का पैमाना है.

अब दिक्कत यह है कि भारत में इस विषय पर जागरूकता आज भी बेहद कम है और पुरुषों के लिए तो बात करना और भी मुश्किल माना जाता है. मामूली से बुखार-सिरदर्द पर हम फौरन डॉक्टर साहब के पास पहुंच जाते हैं, पर जब किसी पुरुष का मन बेचैन हो, चिंता घेरे रहे, तनाव बढ़ता जाए, तो उसे हल्के में लेकर टाल देते हैं, या इग्नोर कर देते हैं, या फिर कह दिया जाता है कि “मर्द होकर इतना परेशान क्यों है.”, क्योंकि वह तो एक मज़बूत मर्द है. यही अनदेखी छोटी परेशानी को बड़ी बीमारी बना देती है, जिसे शुरू में ही रोका जा सकता था.

यह भी समझना ज़रूरी है कि पुरुषों का मानसिक स्वास्थ्य किसी एक उम्र या किसी एक तबके की परेशानी नहीं है. यह एक छात्र से लेकर नौकरीपेशा और बुजुर्ग तक, हर पड़ाव पर अलग-अलग रूप में सामने आता है, इसलिए इसे निजी कमजोरी मानने की बजाय पूरे समाज की जिम्मेदारी मानना चाहिए. बात इतनी सी है कि यह मुद्दा किसी और का नहीं, बल्कि हम सबका है.

मौजूदा आंकड़े इस समस्या की गंभीरता खुद बयान करते हैं. विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया में हर आठवां व्यक्ति किसी न किसी मानसिक विकार से जूझ रहा है. ये आंकड़े यहां पढ़ने में जितने सरल लग रहे हैं, वास्तव में ये उतने ही गंभीर हैं. वहीं, बंगलुरु के राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य संस्थान के राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार भारत में करोड़ों लोगों को सक्रिय इलाज या परामर्श की सख्त ज़रूरत है, लेकिन दुर्भाग्य से इनमें से बहुत ही कम लोग तक मदद ही पहुंच पाती है, जिसपर अविलम्ब ध्यान देने की जरूरत है. बात करें राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की, भारत में कुल आत्महत्याओं में पुरुषों की हिस्सेदारी लगभग 72-73 प्रतिशत है, जो बेहद चौंकाने वाला है. वर्ष 2023-24 के आंकड़ों में पुरुषों द्वारा आत्महत्या के मामले बहुत अधिक रहे, जिनके प्रमुख कारण परिवार की समस्याएं, आर्थिक तनाव, बीमारी और शादी संबंधी मुद्दे हैं.

कानूनी और मानवीय नज़रिए से, मानसिक स्वास्थ्य का सीधा संबंध भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गारंटीकृत जीवन, सम्मान और भलाई के अधिकार से है. मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 मानसिक स्वास्थ्य देखभाल को मानवीय गरिमा और सुरक्षा का एक अहम पहलू मानता है. हालांकि, सिर्फ़ कानूनी मान्यता ही काफी नहीं है, पुरुषों के भावनात्मक स्वास्थ्य के प्रति सामाजिक सोच में भी बदलाव आना ज़रूरी है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के एक डेटा के अनुसार 2015 तक भारत में 5,66,75,969 लोग डिप्रेशन से पीड़ित थे. यह भारत की आबादी का 4.5% है. एसोचैम के मुताबिक भारत में कॉर्पोरेट कर्मचारियों में से 42.5% लोग डिप्रेशन से पीड़ित हैं. सरकार का अनुमान है कि देश में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक या मनोरोग संबंधी काउंसलिंग की ज़रूरत है. शहरी इलाकों में हर 100 में से तीन लोगों के डिप्रेशन से पीड़ित होने का अनुमान है. 2008 और 2015 के बीच कॉर्पोरेट कर्मचारियों में एंग्जायटी और डिप्रेशन की दर 45-50% तक बढ़ गई है. 36% भारतीयों को अपने जीवन में कभी न कभी गंभीर डिप्रेशन का सामना करना पड़ सकता है. लगभग 38.5% कॉर्पोरेट कर्मचारी दिन में छह घंटे से कम सोते हैं, जिससे डिप्रेशन, हाइपरटेंशन, शुगर जैसी बीमारियां हो सकती हैं. गंभीर मानसिक बीमारी वाले लगभग आधे लोगों का इलाज नहीं हो पाता है.

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के अनुसार साल 2012 में भारत में कुल 1,35,445 लोगों ने आत्महत्या की. यानी हर दिन औसतन 371 आत्महत्याएं हुईं. भारत में ज़्यादातर आत्महत्याएं 44 साल से कम उम्र के लोग करते हैं. 2015-16 के नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे (NMHS) के अनुसार, भारत में हर छठे व्यक्ति को किसी न किसी तरह की मानसिक स्वास्थ्य मदद की ज़रूरत है. 2014 के आंकड़ों के अनुसार, आबादी के मुकाबले मानसिक स्वास्थ्य कर्मियों का अनुपात प्रति 1,00,000 लोगों पर सिर्फ़ एक है. कुल मिलाकर, भारत में लगभग 9,000 मनोरोग विशेषज्ञ (साइकियाट्रिस्ट) और 2,000 से भी कम क्लिनिकल मनोवैज्ञानिक हैं.

हमारे समाज की सच्चाई यह है कि रिश्तों की टूट-फूट का तनाव, शादीशुदा पुरुषों में घर-परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ और बुजुर्ग पुरुषों में अकेलापन व नजरअंदाज किए जाने का दर्द सबसे ज्यादा देखने को मिलता है. सोचने वाली बात यह है कि ये सिर्फ आंकड़े नहीं, हर घर में चुपचाप घुट रहे किसी न किसी मर्द के मौन दर्द की कहानी है.

वहीं पुरुषों में मानसिक तनाव के लक्षणों की बात करें तो अवसाद में व्यक्ति लगातार उदास रहता है, किसी भी काम में मन नहीं लगता, नींद और खान-पान बिगड़ जाता है. ज्यादा चिंता होने पर घबराहट, बेचैनी और दिल की तेज धड़कन जैसे लक्षण दिखने लगते हैं. इसके अलावा, तनाव अक्सर चिड़चिड़ेपन या नशे की लत के रूप में भी सामने आता है, जिस वजह से इसे पहचानना और मुश्किल हो जाता है.

कुछ लोगों में कभी बहुत ज्यादा उत्साह तो कभी गहरा अवसाद हावी रहता है, जबकि कुछ गंभीर मामलों में भ्रम और मतिभ्रम की स्थिति बन जाती है, जहां व्यक्ति को ऐसी चीजें दिखने-सुनने लगती हैं जो असल में होती ही नहीं. सोचिए ये कितनी गंभीर स्थिति है. इनके पीछे खानदानी वजहें, दिमाग के रसायनों का गड़बड़ाना, बचपन का कोई सदमा, हीनभावना, बेरोजगारी, पढ़ाई-काम का दबाव, घर की कलह और मारपीट जैसे कारण शामिल होते हैं.

आज के मोबाइल-इंटरनेट के दौर ने इसमें एक नई परत जोड़ दी है. दूसरों की कामयाबी देखकर खुद को असफल समझना, कमाई और स्टेटस को लेकर लगातार तुलना, कुछ छूट जाने का डर और ऑनलाइन तंग करना पुरुषों में तनाव को और बढ़ा रहे हैं. मोबाइल या फिर कंप्यूटर आदि की स्क्रीन के सामने बिताने वाला बढ़ता समय नींद और ध्यान लगाने की क्षमता को भी बिगाड़ रहा है. इतना ही नहीं, कई पुरुष तनाव से बचने के लिए शराब या अन्य नशों का सहारा लेते हैं, जो समस्या को कम करने के बजाय और बढ़ा देता है.

पुरुषों में मानसिक अस्थिरता का एक पहलू यह भी है कि ऐसे लोग अपनी तकलीफ बताने से बचते हैं, नतीजतन उनमें थकावट और गंभीर अवसाद गहराई से पनप जाता है, क्योंकि “मर्द को दर्द नहीं होता” जैसी सोच की जड़ें बहुत गहरी हैं और रोने या टूट जाने को एक कमजोरी सरीखे माना जाता है.

इसका बहुचर्चित वाक्या बंगलुरु से देखने को मिला था. बात दिसंबर 2024 की है जब 34 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर अतुल सुभाष ने आत्महत्या से पहले करीब डेढ़ घंटे का वीडियो और 24 पन्नों का लंबा नोट छोड़ा, जिसमें उन्होंने अपनी पत्नी और ससुराल पक्ष पर मानसिक-आर्थिक उत्पीड़न के आरोप लगाए गए थे.

परिवार के मुताबिक शुरुआत में बच्चे के खर्च के लिए चालीस हजार रुपये महीना की मांग की गई थी, जो बाद में एक लाख रुपए तक पहुंच गया और तलाक के लिए तीन करोड़ रुपए तक की मांग रख दी गई. सुसाइड नोट में यह भी लिखा था कि पत्नी ने उन पर हत्या की कोशिश, यौन शोषण, घरेलू हिंसा और यहां तक कि दहेज जैसे नौ अलग-अलग मुकदमे दर्ज कराए थे और तो और अदालत की कार्यवाही में भी उन्हें बार-बार अपमानित होना पड़ा.

प्रतिक्रिया के तौर पर, इस घटना के बाद पूरे देश में पुरुषों के अधिकारों, कानूनों के गलत इस्तेमाल और न्याय व्यवस्था पर जोरदार बहस छिड़ गई, कई शहरों में विरोध-प्रदर्शन भी हुए, जहां से एक बदलाव की पहल की शुरुआत हुई. इसी दौरान सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग मामले की सुनवाई करते हुए गुजारा-भत्ता तय करने के लिए कुछ स्पष्ट मानक सुझाए, ताकि यह प्रक्रिया दोनों पक्षों के लिए निष्पक्ष रह सके.

हालांकि, यह मामला अभी अदालत में चल ही रहा है, इसलिए इसमें लगे आरोप अभी साबित नहीं हुए हैं, पर इस घटना ने दिखा दिया कि पारिवारिक झगड़े, कानूनी दांव-पेंच और आर्थिक बोझ किसी पुरुष को मानसिक रूप से किस हद तक तोड़ सकते हैं और अक्सर उसकी तकलीफ पर तब तक किसी का ध्यान ही नहीं जाता जब तक बहुत देर न हो जाए. दफ्तरों में भी लगातार बढ़ता काम का बोझ, आपसी होड़ और नौकरी जाने का डर पुरुषों में थकावट और तनाव को बढ़ा रहा है.

अब इस नितांत गंभीर मुद्दे के निदान की बात करें तो, देश में पुरुष-केंद्रित काउंसलिंग सेवा लगभग न के बराबर है. खासकर गांवों में परामर्शदाताओं और मनोचिकित्सकों की भारी भरकम कमी है, जिससे इलाज के लिए शहर आना मजबूरी बन जाता है और जागरूकता की कमी की वजह से लोग शुरुआती लक्षणों को पहचान भी नहीं पाते.

एक और जरूरी बात यह है कि आम पुरुषों में इलाज के तरीकों को लेकर भी बहुत गलतफहमियां हैं. बहुत से लोग समझते हैं कि डॉक्टर के पास जाना या काउंसलर से बात करना “पागलपन” की निशानी है, जबकि सच यह है कि बात करने वाली थेरेपी यानी काउंसलिंग बेहद असरदार होती है, और कई बार दवाई के साथ मिलाकर ही सबसे अच्छा नतीजा मिलता है. इसमें हर स्तर पर जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है.

परिवार का साथ भी इलाज में बहुत अहम भूमिका निभाता है. अगर घर के लोग मरीज की बात सुनें, उसे कमजोर कहने की बजाय उसका साथ दें और डॉक्टर के पास जाने में मदद करें, तो ठीक होने की रफ्तार काफी तेज हो जाती है. इसके उलट, अगर परिवार ही ताना मारे या मर्द होकर रो रहा है, जैसी बातें कहे, तो हालत और बिगड़ जाती है.

समाधान की दिशा में अब ठोस कदम उठाने होंगे. स्कूल-कॉलेजों में लड़कों को बचपन से ही यह सिखाया जाना चाहिए कि भावनाएं जताना कमजोरी नहीं, बल्कि सामान्य इंसान की बात है. मीडिया को संवेदनशील भाषा अपनानी चाहिए, ‘पागल’ जैसे शब्दों की जगह इज्जत भरे शब्दों का इस्तेमाल हो.

दफ्तरों में पुरुष कर्मचारियों की मदद के लिए भी खास कार्यक्रम शुरू किए जाएं और मानसिक तकलीफ में छुट्टी का भी प्रावधान बने, ताकि कर्मचारी बिना डर के अपनी बात रख सकें. गांवों में आशा वर्कर्स और नर्सों को मानसिक स्वास्थ्य की बुनियादी जानकारी देना, पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य में सुधार में एक मील का पत्थर साबित हो सकता है.

पुरुषों के लिए भी खास तौर पर ऐसी सुलभ चौबीस घंटे सहायता सेवाएं और ज्यादा से ज्यादा हेल्पलाइन बनें, जहां वे बिना शर्म के खुलकर बात कर सकें. हालांकि, सरकार द्वारा ऐसी व्यवस्था की गई है. सरकार ने इस दिशा में टेली-मानस जैसी चौबीस घंटे काउंसलिंग सेवा शुरू की है. साथ ही राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम योजना 2022 के तहत जिला स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिनका उद्देश्य 2030 तक आत्महत्या की दर 10 प्रतिशत कम करना है. यह एक सराहनीय कदम है.

बात खत्म करने से पहले इतना जरूर कहूंगा- जब तक परिवार, ऑफिस, मीडिया, अदालत और सरकार एक साथ आगे नहीं बढ़ेंगे, तब तक कई पुरुष चुपचाप दर्द सहते रहेंगे. पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य को उतनी ही गंभीरता से लेना ही एक संवेदनशील और आगे बढ़े हुए समाज की असली पहचान है. यह बदलाव रातों-रात नहीं आएगा, लेकिन आएगा जरूर.