संसद के मानसून सत्र को अनिश्चित काल तक के लिए स्थगित कर दिया गया है. लेकिन इस बार सत्र के आखिरी दिन कुछ ऐसा हुआ जिसका इंतज़ार हर भारतीय को लंबे समय तक करना पड़ा. भारत की संसद में आज़ादी के बाद पहली बार भारत का राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम’ पूरा गाया गया, पहली बार राष्ट्रगीत को राष्ट्रगान जैसा पूर्ण सम्मान दिया गया. कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते भारत की सांस्कृतिक, धार्मिक चेतना को व्यक्त करने वाले इस राष्ट्रगीत से वे सभी भाग हटवा दिए थे जो भारत के मूल ‘हिंदू’ धर्म के मूल्यों को देशभक्ति से जोड़ते थे, जिसमें भारत माता का गुणगान किया गया था. भारत के राष्ट्रगीत के साथ लंबे समय बाद न्याय किया गया और इसे फिर से भारत के लोगों के बीच देशभक्ति के भाव को बढ़ाने, भारत की मूल सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना को जगाने के लिए वह स्थान दिया गया जिसका यह हक़दार था.
हमें यह समझना होगा कि भारत का इतिहास केवल सीमाओं के विस्तार, राजवंशों के उत्थान-पतन या राजनीतिक सत्ताओं के परिवर्तन की गाथा नहीं है. भारत मूलतः एक ‘सांस्कृतिक जीवंत सत्ता है, जिसकी आत्मा उसकी शाश्वत चेतना, आध्यात्मिक दृष्टि और अपनी भूमि के प्रति अटूट भक्ति-भाव में बसती है. विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं ने जब अपनी पहचान केवल भौतिक विकास और भौगोलिक सीमाओं तक सीमित रखी, तब भारतवर्ष ने अपनी भूमि को केवल मिट्टी का पिंड न मानकर उसे ‘माता’ के रूप में पूजा. इसी सनातन चेतना, मातृ-भक्ति और सांस्कृतिक स्वाभिमान का 19वीं सदी का सर्वाधिक प्रखर, तेजस्वी और क्रांतिकारी प्रकटन था—‘वंदे मातरम्’
19वीं सदी का उत्तरार्द्ध भारतीय इतिहास का एक अत्यंत अंधकारमय और त्रासद कालखंड था. 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा बर्बरतापूर्वक कुचल दिए जाने के बाद, भारत पर क्राउन (ब्रिटिश राज) का सीधा शासन स्थापित हो चुका था. लॉर्ड मैकाले द्वारा 1835 में लागू की गई शिक्षा नीति का मूल उद्देश्य एक ऐसा वर्ग तैयार करना था जो “रक्त और वर्ण से भारतीय हो, लेकिन रुचियों, विचारों, नैतिकताओं और बुद्धि में अंग्रेज हो. इस औपनिवेशिक हीनभावना के कारण शिक्षित भारतीय वर्ग अपनी ही सांस्कृतिक जड़ों से कट रहा था. ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती देने के लिए केवल राजनीतिक संघर्ष पर्याप्त नहीं था, आवश्यकता थी एक ऐसी सांस्कृतिक चिंगारी की, जो भारतीयों को उनके वास्तविक स्वरूप और गौरव की याद दिला सके. इसी विषम और निराशाजनक वातावरण में, बंगाल के 24 परगना जिले के कांतालपाड़ा गांव में 7 नवंबर, 1875 को बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय के अंतस में ‘वंदे मातरम्’ का अवतरण हुआ. उस समय बंकिमचंद्र ब्रिटिश सरकार में डिप्टी मजिस्ट्रेट के पद पर कार्यरत थे. वे रोजाना सरकारी कार्यालयों में अंग्रेजों के राष्ट्रीय गान ‘गॉड सेव द क्वीन’ का महिमामंडन देखते थे. स्वाभिमानी बंकिमचंद्र के हृदय को यह बात कचोटती थी कि जिस देश की अपनी हज़ारों वर्षों पुरानी ज्ञान और संस्कृति की परंपरा है, उसका अपना कोई राष्ट्रगीत क्यों न हो?
और तब 1882 में बंकिमचंद्र ने अपने प्रसिद्ध ऐतिहासिक-राजनीतिक उपन्यास ‘आनंदमठ’ में ‘वंदे मातरम्’ को मुख्य प्रेरणा-स्रोत के रूप में पिरोया. ‘आनंदमठ’ 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में बंगाल में हुए प्रसिद्ध ‘संन्यासी विद्रोह’ की पृष्ठभूमि पर लिखा गया था. किसी रचना का साहित्यिक महत्व और किसी गीत का राष्ट्रीय आंदोलन का प्रतीक बन जाना दो अलग बातें हैं. ‘वंदे मातरम्’ ने दोनों यात्राएं पूरी कीं.
1896 में कलकत्ता में हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में रवींद्रनाथ ठाकुर ने वंदे मातरम्’ का गायन किया. इसके बाद यह गीत राष्ट्रीय राजनीतिक मंच पर अधिक व्यापक रूप से पहचान बनाने लगा. 20वीं सदी के प्रारंभ के साथ ही ‘वंदे मातरम्’ केवल साहित्य का हिस्सा न रहकर भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्य जीवन-धारा बन गया. इसने जाति, पंथ, भाषा और क्षेत्र की दीवारों को तोड़कर पूरे देश को एक सूत्र में पिरो दिया.
वंदे मातरम ने एक गीत से लेकर एक आंदोलन का रूप तब ले लिया जब 1905 में लॉर्ड कर्जन ने बंगाल को विभाजित करने का निर्णय लिया, तो इसके विरोध में स्वदेशी आंदोलन की ज्वाला भड़क उठी. 16 अक्टूबर, 1905 को, विभाजन के दिन, पूरे बंगाल में लोगों ने उपवास रखा, एक-दूसरे की कलाई पर रक्षा-सूत्र बांधा और नंगे पैर सड़कों पर जुलूस निकालते हुए ‘वंदे मातरम्’ का गान किया. अंग्रेजों ने ‘वंदे मातरम्’ को ‘राजद्रोह का शब्द’ घोषित कर दिया. स्कूलों और कॉलेजों में इसे गाने पर छात्रों को निष्कासित कर दिया जाता था, लेकिन प्रतिबंधों ने इसे और अधिक लोकप्रिय बना दिया. समय के साथ वंदे मातरम गीत से बढ़कर भारतीयता का अगला रूप बन गया, 20वीं सदी में भारतीय राष्ट्रवाद को प्रकट करने का सबसे बड़ा माध्यम वंदे मातरम बन गया था. अरविंद घोष ने अंग्रेजी में ‘Bande Mataram’ नाम से ही एक समाचार पत्र शुरू किया. उन्होंने लिखा वंदे मातरम् केवल एक शब्द नहीं है, यह एक प्रत्यक्ष मंत्र है जो एकाएक ईश्वर की ओर से आया है. इसने एक झटके में एक पूरे राष्ट्र को पुनर्जीवित कर दिया है.
बंकिमचंद्र ने भारत माता को केवल एक भौगोलिक नाम नहीं, बल्कि एक साक्षात देवी के रूप में देखा और दिखाया. इसी तरह कई उदाहारण हैं जहां वंदे मातरम् संघर्ष का प्रतीक बना, जैसे लंदन में ‘इंडिया हाउस’ के माध्यम से भारतीय युवाओं को संगठित करने वाले वीर सावरकर ने ‘वंदे मातरम्’ को क्रांतिकारियों का सर्वमान्य उद्घोष बनाया. जब 1909 में मदनलाल ढींगरा ने कर्जन वायली का वध किया और फांसी के तख्ते पर चढ़े, तो उनके अंतिम शब्द थे, ’वंदे मातरम्! मेरा देश अमर रहे!’ वहीं नेताजी ने अपनी ‘आजाद हिंद सरकार’ के रेडियो प्रसारणों का आरंभ और समापन ‘वंदे मातरम्’ से किया. आजाद हिंद फौज के सैनिकों के लिए यह गीत देशभक्ति का सर्वोच्च प्रतीक था. रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खां, काकोरी कांड के नायकों ने जात-पात से ऊपर उठकर मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए ‘वंदे मातरम्’ गाते हुए अपना बलिदान दिया.
लेकिन वंदे मातरम की राह जितनी आसान दिख रही है उतनी थी नहीं, स्वतंत्रता संग्राम की जिस पावन ऊर्जा ने पूरे देश को एकजुट किया था, दुर्भाग्यवश 1930 के दशक में संकीर्ण राजनीतिक स्वार्थों और तुष्टिकरण की नीति के कारण उसी ‘वंदे मातरम्’ को विवादों में घसीटने का प्रयास शुरू हुआ. 1937 में मोहम्मद अली जिन्ना और ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने ‘वंदे मातरम्’ का सांप्रदायिक आधार पर विरोध करना शुरू किया. और सच्चाई यह थी कि बंकिमचंद्र का विरोध किसी धर्म विशेष से नहीं, बल्कि अत्याचारी और विदेशी आक्रांताओं के विरुद्ध था, लेकिन जिन्ना की द्वि-राष्ट्र सिद्धांत की राजनीति को चमकाने के लिए ‘वंदे मातरम्’ को एक शिकार बनाया गया. अक्टूबर 1937 में कांग्रेस कार्यसमिति ने इस विषय पर विचार किया और पहले दो पदों को सार्वजनिक अवसरों पर गाए जाने के लिए उपयुक्त माना. वंदे मातरम्’ की मूल शक्ति केवल उसके दो शुरुआती शब्दों में नहीं थी. उसकी पूरी रचना भारत को मातृभूमि और शक्ति के रूप में देखने वाली उस भारतीय सभ्यतागत दृष्टि से निकलती थी, जिसने स्वतंत्रता आंदोलन के असंख्य सेनानियों में आत्मबल पैदा किया. बाद के पदों को अलग कर देने से उसके सार्वजनिक प्रयोग का दायरा तो व्यापक हुआ, लेकिन उसके मूल सांस्कृतिक संदर्भ पर एक ऐतिहासिक बहस भी स्थायी रूप से छोड़ दी गई.
वर्तमान समय में कई मुस्लिम नेताओं और वामपंथियों ने वंदे मातरम का विरोध किया है. वे इसका सालों से विरोध करते आए हैं. मुस्लिम नेता और वामपंथी भारत को माता के रूप में व्यक्त किए जाने के सख्त ख़िलाफ़ रहे हैं. लेकिन हमें यह समझना होगा कि भारत अपने मूल से एक हिंदू देश रहा है. भारत की हर पहचान हिंदू सभ्यता और संस्कृति से जुड़ी है. ऐसे में देश की पहचान व्यक्त करने वाले राष्ट्रगीत से किसी विचारधारा के लोगों को दिक्कत होने का मतलब है कि वे भारत के मूल को आज़ादी से आठ दशक बाद तक भी स्वीकार नहीं कर पाए हैं.
स्वतंत्रता के बाद प्रश्न उठा कि नवगठित गणराज्य के राष्ट्रीय प्रतीकों में ‘वंदे मातरम्’ का स्थान क्या होगा, 24 जनवरी, 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया कि ‘जन गण मन’ राष्ट्रीय गान होगा, पर साथ में ‘वंदे मातरम्’ को स्वतंत्रता संग्राम में उसकी ऐतिहासिक भूमिका के कारण समान सम्मान दिया जाएगा. ‘वंदे मातरम्’ को राष्ट्रीय गान का दर्जा न मिलने के बावजूद उसका राष्ट्रीय गीत के रूप में सम्मानित स्थान कायम रहा. यह इस बात का प्रमाण है कि भारत के राष्ट्रनिर्माण में आधुनिक संवैधानिक व्यवस्था और उसकी प्राचीन सांस्कृतिक चेतना—दोनों की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका है. 150 वर्षों के लंबे सफर के बाद, जब भारत आज ‘अमृत काल’ से गुजर रहा है, तो मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि 21वीं सदी के आधुनिक भारत में इस मंत्र की क्या प्रासंगिकता है और आज इसकी इतनी व्यापक चर्चा क्यों हो रही है? इसका उत्तर केवल इतिहास में नहीं, बल्कि वर्तमान भारत की चुनौतियों और संभावनाओं में भी छिपा है.
आज का भारत विज्ञान, तकनीक, अंतरिक्ष, डिजिटल क्रांति, स्टार्टअप, शिक्षा और आर्थिक विकास के क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ रहा है. ऐसे समय में ‘वंदे मातरम्’ हमें अपनी जड़ों, अपनी सांस्कृतिक पहचान और उन अनगिनत बलिदानों से जोड़ता है, जिनके कारण हमें स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ने का अवसर मिला. यह मंत्र हमें याद दिलाता है कि आधुनिकता का अर्थ अपनी परंपराओं, मूल धर्म और राष्ट्रीय स्मृतियों से विमुख होना नहीं, बल्कि उन्हें नए युग की आवश्यकताओं के अनुरूप रचनात्मक रूप देना है. आज का भारत जब आर्थिक, तकनीकी, सामरिक और वैज्ञानिक रूप से वैश्विक मंच पर नेतृत्व कर रहा है, तो ‘वंदे मातरम्’ आत्मनिर्भरता की उस भावना को बल देता है. स्वदेशी रक्षा प्रणालियों, अंतरिक्ष मिशनों और इंफ्रास्ट्रक्चर की प्रगति में यही राष्ट्र-प्रथम का भाव समाहित है. 150 वर्ष पूरे होने का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न शायद यही है कि इस विरासत को अगली पीढ़ी तक कैसे पहुंचाया जाए. तो यह तभी संभव है जब आज का युवा वंदे मातरम को सिर्फ गाए नहीं बल्कि उसके भाव को भी अपने जीवन में रूपान्तरित करे.
यदि आज का युवा ‘वंदे मातरम्’ कहता है लेकिन सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाता है, भ्रष्टाचार को सामान्य मानता है, जाति या धर्म के आधार पर घृणा फैलाता है, पर्यावरण की चिंता नहीं करता और अपने कर्तव्यों से भागता है, तो राष्ट्रवाद केवल शब्द बनकर रह जाएगा. लेकिन यदि वही युवा उत्कृष्ट शिक्षा प्राप्त करता है, समाज में नेतृत्व करता है, लोकतांत्रिक बहस में तथ्य के साथ भाग लेता है, भारतीय संस्कृति पर गर्व करता है और वैश्विक मंच पर भारत की क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है, तब ‘वंदे मातरम्’ जीवंत राष्ट्रभाव बन जाता है.
