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मुस्लिम भीड़ द्वारा मारे गए हिंदुओं पर इकोसिस्टम का मौन

अलोक तिवारी, दीपक कुमार, दिनेश कुमार, रतन लाल, नरेश कुमार सैनी, विनोद कुमार, अंकित शर्मा, संजीत ठाकुर, राहुल सोलंकी, राहुल ठाकुर, प्रेम सिंह, वीर भान, नितिन कुमार, सोनू, दलबीर सिंह नेगी. इन नामों पर थोड़ा ध्यान दीजिए, सिर्फ 15 नाम हैं ये, सोचिए कि ये नाम आपने आख़िरी बार कब पढ़े थे, किस प्रकरण में इनका नाम आया था, चाहे तो गूगल कर लीजिए. अच्छा जाने दीजिए, आप गूगल करने की मेहनत नहीं करेंगे और सच तो ये है कि इससे आपको कुछ हासिल भी नहीं होगा, अब ये 6 ये नाम देखें, उमाकांत मकवाना, जैसेल कुमार सोनी, सतीश व्यास, नरेंद्र पटेल, शैलेश पांचाल, ललिता बेन पटेल. इन 6 नामों में तो मैंने हिंट भी छोड़ा है, उम्मीद है कि आप वहां ज़रूर पहुंच गए होंगे जहां मैं आपको ले जाना चाहता हूं.

अगर नहीं पहुंचे हैं तो ये आख़िरी 3 नाम देखिए, रवि कुमार खन्ना, डीबी सिंह, उदय शंकर. एक चौथा नाम है. ये सैकड़ों वर्षों में अकाल मृत्यु प्राप्त करने वाले लाखों-करोड़ों हिंदुओं में से बस कुछ नाम हैं.

अब बताइए कि आपने उमर खालिद, शरजील इमाम का नाम सुना है, ज़रूर सुना होगा. इनकी हाल में ही एक बार फिर बेल रिजेक्ट हुई है और इस वजह से देश की न्यायपालिका संदेह के घेरों में खड़ी कर दी गई है. संविधान रक्षक अजित अंजुम, रविश कुमार, महुआ मोइत्रा, आरफ़ा खानम और अन्य कह रहे हैं कि उमर-शरजील के मामले में न्यायपालिका संघी हो चुकी है, माने निष्पक्ष नहीं है. बेल इज़ द रूल, जेल इज़ द एक्सेप्शन का खुद का बनाया नियम न्यायपालिका तोड़ रही है.

मैंने शुरुआत में जो 15 नाम लिए थे, जो हममें से किसी को याद नहीं हैं, हमने सुने नहीं, लिस्ट ना हो तो मैं भी ये नाम भूल जाऊंगा. इनकी मृत्यु जिस दिल्ली दंगे में हो गई, उसका मास्टरमाइंड उमर और शरजील हैं, ऐसा मैं नहीं, दिल्ली पुलिस की चार्जशीट कहती है, जिसके आधार पर माननीय कोर्ट इनकी ज़मानत याचिका लगातार रद्द कर रहा है.

पिछले 5 वर्षों में हर मौके पर उमर और शरजील के लिए आंसू बहाने वाले इन कथित पत्रकारों और मानवता प्रेमी नेताओं ने जितनी पोस्ट इनके लिए लिखी है, उसका 5 फ़ीसदी भी अगर इन 15 लोगों के लिए लिखी होगी तो मैं आपसे माफ़ी मांग लूंगा, ये मेरी सीधी चुनौती है.

अगले 6 नाम जो मैंने शुरुआत में लिए थे, वो उन 59 लोगों में से सिर्फ़ 6 थे, जिनको बेरहमी से ट्रेन में जला कर 2002 में मार दिया गया, इसे हम गोधरा के नाम से जानते हैं. इन पर भी कोई वीडियो या पोस्ट आपको इन कथित पत्रकारों या मानव प्रेमी नेताओं की नहीं मिलेगी.

अगले 3 नाम वो हैं जिनका सम्बन्ध भारतीय वायु सेना से रहा है, जिनकी हत्या उसी यासीन मलिक ने की है, जिनके ये पक्षधर भी हैं, साथ में बैठे भी हुए हैं, कईयों ने इंटरव्यू भी किए हैं. लेकिन इन मानव प्रेमी नेताओं और लोकतंत्र रक्षक देशभक्त पत्रकारों ने कभी इन 3 नामों का ज़िक्र नहीं किया. इन्होंने उस चौथे व्यक्ति का भी नाम नहीं लिया जिससे इनका एजेंडा पूरा होता है, भारतीय राज्य के लिए काम करने वाले भारतीय वायु सेना के एयरमैन आज़ाद अहमद, जो कोलैटरल डैमेज हैं यासीन मलिक के लिए. बिलकिस बानो के लिए आवाज़ उठाने वाले धुरंधरों, ये भी तो मुसलमान है. हमने ये चौथा नाम लिया क्योंकि हममें आप में ये फ़र्क़ है.

उमर और शरजील के लिए रोने वाले, उस संजय के लिए आवाज़ नहीं उठाते जो इसी दिल्ली दंगे में आरोपी बनाया गया, 5 साल जेल के भीतर रहा, जबकि उसके क़रीबियों का भी ये मानना है कि वो बेगुनाह है. उमर को अपनी बहन की शादी के लिए अंतरिम ज़मानत मिली थी पर संजय को तो मां की मृत्यु के बाद भी अंतरिम ज़मानत नहीं मिली. आपने कहीं सुना कि इसके विरोध में किसी भी मीडिया संस्थान ने कोर्ट की निष्पक्षता पर सवाल उठाया हो.

आईबी में काम करने वाले अंकित शर्मा दंगा कंट्रोल करने गए थे, ताहिर हुसैन और मुस्लिमों की भीड़ ने बेरहमी से उसका क़त्ल कर दिया. बेटे के लिए मां ने चाय बनाई, वो बनी की बनी रह गई. किसी ने इनके लिए कभी आवाज़ उठाई. आवाज़ उठाना तो छोड़िए, द लल्लनटॉप की डॉक्यूमेंट्री देहली दिल्ली में ऐश्वर्या पालिवाल कह गई कि जब तक ये पता नहीं चला कि अंकित शर्मा आईबी से हैं तब तक उनको दंगा करने वाला समझा गया. वो आईबी के अंकित शर्मा जो दंगा रोक रहे थे, अपने एक पड़ोसी को बचाने के लिए मां के हाथ की बनी चाय छोड़ कर गए, जिन्हें उन्हीं की गली से ताहिर हुसैन के दंगाइयों ने उठाया, मारा और फिर नाले में फेंक दिया. कभी सोचा है आपने कि जब वो चाय पीती होगी तो उसके दिल पर क्या बीतती होगी. उमर की प्रेमिका मुलाक़ात पर उससे मिल सकती है, पर अंकित की मां नहीं. किसी वामपंथी पत्रकार ने आज तक अंकित को न्याय दिलाने के लिए आवाज़ क्यों नहीं उठाई.

15 वर्ष का बच्चा नितिन पासवान जो नौवीं क्लास में प्रमोट होने वाला था, हाफ़ पैंट से फुल पैंट पहन पहली बार स्कूल जाने वाला था. वो घर से सिर्फ़ मैगी लेने निकला था, उसको सिर पर गोली मारी गई और कड़ी मेहनत से पाला-पोसा गया नितिन अपने मां-बाप को मृत हालत में अस्पताल में मिला. वो नई स्कूल की फुल पैंट उसकी मां का कलेजा चीर देती होगी, छोटा भाई या बहन मैगी लाने जाते होंगे तो परिवार सिहर जाता होगा. उसका दर्द महसूस किया है कभी किसी लिबरल ने.

उस विनोद कुमार को क्या कहेंगे जिसे उसके बेटे मोनू के सामने पत्थर मार-मार कर मार दिया गया, जिसकी मदद के लिए एक जन भी सामने नहीं आया. उमर ने तो पैरोल पर अपनी बहन की शादी अटेंड कर ली, पर विनोद कुमार की बिटिया की शादी बिना उनके ही होगी.

26 साल का जवान लड़का राहुल सोलंकी मुस्लिम भीड़ द्वारा सिर पर गोली मारकर अकाल मृत्यु को प्राप्त हुआ. पिता ने बचाने की बहुत कोशिश की, पास के नर्सिंग होम ले गए, फिर जीटीबी अस्पताल ले जाने की कोशिश की पर इन दंगाइयों ने रास्ते बंद कर रखे थे. जब तक लोनी पहुंचे, बेटे ने बाप के हाथों में ही दम तोड़ दिया था. उमर को आज़ाद देखने के लिए पूरा ज़ोर लगाने वाले, इनके वालिद की उम्मीदें तो ज़िंदा हैं, उनका बेटा ज़िंदा है. लेकिन राहुल सोलंकी तो ज़िंदा ही नहीं है.

अपने घर में अकेले कमाने वाले हेड कांस्टेबल रतन लाल, जो बुखार से पीड़ित थे, जिनकी पत्नी पेट से थी, जिनकी बहन 2 महीने में विदा होने वाली थी. जिनके पास छुट्टी लेने का विकल्प था पर वो हिंसा पर उतारू मुस्लिम भीड़ को रोकने निकले और फिर कभी ना लौटे. उस वक़्त तक 3 और अब 4 बच्चों का पिता, बहन को घर से ख़ुशी-ख़ुशी विदा करने का ख़्वाब देखने वाला भाई, खुद दुनिया से विदा हो गया. वहीं उमर अपनी बहन की शादी में अंतरिम ज़मानत लेकर शरीक हुआ. रतन लाल की बहन शादी का जोड़ा पहन पाई भी या नहीं, पता नहीं. उस नवजात बच्चे ने अपने पिता के बारे में जब मां से पहली बार सवाल किया होगा तो क्या जवाब उस मां ने दिया होगा, पता नहीं. हां, शरजील और उमर 5 साल से जेल में बंद हैं, ये सबको पता है.

जिस वीर भान सिंह को उनकी 14 वर्षीय बेटी और बीमार पत्नी के सामने हिंसक भीड़ ने सिर पर गोली मारी, वो किस हाल में है पता नहीं. वो बच्ची कैसे बड़ी हुई, उसकी शिक्षा का क्या हुआ, वो बीमार पत्नी इस दुनिया में है या चल बसी, कोई नहीं जानता.

इन सभी हत्याओं का ज़िम्मेदार है शरजील और उमर, हज़ारों परिवारों का गुनहगार है शरजील और उमर. शरजील-उमर की बात करने वालों ने कभी इनका घर क्यों नहीं दिखाया, इनका परिवार क्यों नहीं दिखाया. जितनी डॉक्यूमेंट्री बनी, इनमें या तो ये लोग नहीं हैं या फिर इन्हें बस इतना रखा गया कि खानापूर्ति हो जाए. पुलिस एक्शन पर सवाल उठाने वाली डॉक्यूमेंट्री हिंदुओं की हत्या पर मौन रह गई है. कारण हम सब जानते हैं.

उमर का केस लड़ने के लिए कपिल सिब्बल जैसा बड़ा वकील मौजूद है, शरजील का केस सिद्दार्थ दवे लड़ रहे है, यकीन मानिए की एक आदमी तो बहुत छोटी बात हो गई, 2-3 लाख रूपए महीना कमाने वाला व्यक्ति भी शायद ही इनको अफ़्फोर्ड कर पाए. पर उमर और इमाम को इस देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और इकोसिस्टम के कारण इतने बढ़िया वकील मिले हुए है, कौन फीस दे रहा नहीं दे रहा जाने दीजिए. लेकिन अंकित, रतन लाल, नितिन पासवान के परिवारों को न्याय के लिए बस राज्य का सहारा है. अगर स्टेट ये केस हार जाए तो इनकी इतनी हैसियत भी नहीं की वो अपील कर पाए. हर 3 महीने में उमर और शरजील को 2 बार वॉयरल और विमर्श का केंद्र बनने वाले या समाज पिछले 5 वर्षों में एक बार भी इन 15 लोगों की बात करता हुआ नज़र नहीं आया. 

गोधरा में हिंदुओं को जलाने वाली कौम को उसी तरह निर्दोष साबित कर दिया गया जैसे आज इनको किया जा रहा है, अपराध बोध सिर्फ हिंदुओं की भीतर रहे इसके लिए आज महुआ कविता लिख रही कल राहत इन्दोरी ने लिखी थी याद है ना, 

जिनका मसलक है रौशनी का सफर

वो चिरागों को क्यों बुझाएंगें

अपने मुर्दे भी जो जलाते नहीं

जिंदा लोगों को क्या जलाएँगे

पर ना महुआ ने ना राहत ने इन 15 उन 59 या हज़ारों वर्षो की सभ्यतागत लड़ाई में अकाल मृत्यु को प्राप्त करोड़ों हिन्दुओं के एक कविता भी नहीं लिखी. उमर-शरजील पर वीडियो बनाने से व्यूज़ आते हैं, डॉलर बनते हैं, इकोसिस्टम सपोर्ट करता है. जिनके घर जाकर उनकी स्थिति दिखाना लोगों के एजेंडा को सूट नहीं करता, जहां से व्यूज़ नहीं आते, जहां कोई इकोसिस्टम मौजूद नहीं है कि बात को बड़ा बना सके, ट्विटर ट्रेंड करवा सके, मैं वहां ज़रूर जाऊंगा, इन लोगों का दर्द आपको बताऊंगा.

प्रभात रंजन मिश्रा
प्रभात रंजन मिश्रा
प्रभात रंजन मिश्रा दि पैम्फलेट के रिपोर्टर हैं.