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वामपंथियों के निशाने पर हमेशा शिक्षा मंत्रालय ही क्यों?

भारत की शिक्षा प्रणाली से औपनिवेशिक, इस्लामिक और वामंपथी इतिहास को हटाना पड़ रहा भारी

भारत में मौजूद हर राजनीतिक दल और हर विचारधारा के काम करने का एक विशेष तरीका रहा रहा है. सभी अपनी विचारधारा को लोगों तक पहुंचाने के लिए अलग-अलग तरह से काम करते हैं. भाजपा खुले तौर पर अपने मुद्दों को जनता के सामने रखती है और उसपर सीधी चर्चा करती है. कांग्रेस लोगों की भावनाओं को आधार बनाकर उसपर चालाकी तो करती है लेकिन विफल हो जाती है. समाजवादी पार्टी खुले तौर पर मुस्लिम तुष्टिकरण करके किसी भी तरह सरकार बनाने की जद्दोजहद में लगी रहती है. ऐसे ही हर राजनीतिक दल किसी न किसी तरह से खुद को प्रासंगिक बनाए रखने में लगा हुआ है. लेकिन क्या आपने कभी वामपंथी दलों, आईसा, एसएफआई, सीपीआई, सीपीआईएम को पूरी तरह खुल कर जनता के बीच अपने विचार रखते देखा है. मजदूर, गरीब, मुस्लिम और दलित के नाम पर वोट मांगने के अलावा देश, विकास और धर्म के मामले पर वामपंथी दल हमेशा गोलमोल रवैया अपनाते हैं.

आप ऐसा कतई नहीं समझिएगा कि वे नौसिखिए हैं, कुछ जानते ही नहीं. वास्तव में वामपंथियों ने अपने ख़तरनाक विचारों को कभी जनता के बीच खुलकर नहीं रखा. वे हमेशा किसी अन्य न्यूट्रल संगठन के ज़रिए वैचारिक ज़हर को जनता तक पहुंचाने का काम करते हैं. ताकि खुद की छवि साफ सुथरी दिखा कर चुपके से वैचारिक ज़हर फैलाने का काम जारी रखा जा सके. क्योंकि जिस दिन इस देश की जनता ने वामपंथ को अंदर से लेकर बाहर तक समझ लिया उसी दिन वामपंथ देश में अतीत बनकर रह जाएगा.

हमें आज यह समझना बेहद ज़रूरी है कि वामपंथ हमेशा किताबों, स्कूलों, कॉलेजों और वैचारिक गोष्ठियों में अपने असली रूप में आता है. यदि आज भारत में कांग्रेस की गठबंधन सरकार (इंडी एलायंस) आ जाए तो लेफ्ट पार्टियां किस मंत्रालय की मांग करेंगी. रक्षा मंत्रालय नहीं, गृह मंत्रालय नहीं बल्कि शिक्षा मंत्रालय की. लेकिन ऐसा क्यों? इसे ध्यान से समझिए, यदि यह देश एक पूरा शरीर है तो इसका दिमाग इसके सभी शिक्षा संस्थान हैं, पुस्तकालय, कॉलेज, यूनिवर्सिटी, शिक्षक, रिसर्च पेपर, पीएचडी करने वाले, नीतियां बनाने वाले, लेखक, पत्रकार. ये सभी वे जगह और लोग हैं जो देश के विचार को गढ़ने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं, यही इस शरीर का दिमाग है. पूरी शरीर दिमाग से ही कंट्रोल होता है. अगर किसी भाग का दिमाग से कनेक्शन टूट जाए तो वह काम करना बंद कर देता है. वामपंथ ने देश के दिमाग को ही कंट्रोल किया हुआ है. जो पूरे शरीर को अपने हिसाब से चला रहा है. शिक्षा मंत्रालय इसी दिमाग को कंट्रोल करने में बड़ी भूमिका निभाता है. इस पर से नियंत्रण गया तो दिमाग से नियंत्रण गया. इसलिए बीते 12 सालों से पूरे वामपंथी गुट ने शिक्षा मंत्री के हर फैसले का विरोध किया है.  

यदि नीतियां बनाने बाले ही वामपंथी होंगे तो साधारण सी बात है देश से वास्तविक धार्मिक, सांस्कृतिक इतिहास हटाकर मुगल, मुस्लिम और दलितों को भड़काने वाले कंटेंट ही किताबों में जोड़े जाएंगे. इस देश में बीते 70 सालों से यही हो रहा है. देश का शिक्षा विभाग, मंत्रालय, प्रोफेसर, पाठ्यक्रम की किताबें लिखने वाले लेखकों को वामपंथी अपने अनुसार चला रहे थे. एक वामपंथी किताब लिखता जिसमें देश के इतिहास में भारतीय राजाओं की वीर गाथाओं को कोई स्थान नहीं दिया जाता, केवल मुगलों के गुणगान गाए जाते, दूसरा वामपंथी किताब को पाठ्यक्रम में जोड़ देता, तीसरा वामपंथी उसे शिक्षक बनकर स्कूलों में पढ़ाता, चौथा उसी मुद्दे पर रिसर्च करता और रिसर्च के लिए वामपंथी की ही किताब को आधार बनाता, पांचवा वामपंथी एक एनजीओ बनाकर उसी रिसर्च पेपर को कोई अवार्ड दिलवा देता और उसी के आधार पर देश की नीतियां बनाने की वकालत करता. वामपंथियों को पूरा गिरोह इसी तरह काम करता है. यही कारण है देश के बच्चे से लेकर बड़ों तक भारत का वास्तविक इतिहास कभी पहुंच ही नहीं सका. देश के लोगों के दिमाग को अपने नियंत्रण में रखना ही वामपंथियों के काम करने का तरीका है.           

बीते 12 सालों में जब से देश में सरकार बदली है तभी से वामपंथियों के इस गिरोह को सीधे चुनौती मिल रही है. सरकार में बनने वाले हर शित्रा मंत्री ने स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों से मुगलों की झूठी शान में पढ़ाए जाने वाले कंटेंट को हटाकर भारतीय योद्धाओं की सच्ची वीर गाथाएं जोड़ना शुरू किया. वहीं से वामपंथ पूरी तरह से बौखलाया हुआ है. 70 सालों के इस दबदबे को सिर्फ चुनौती नहीं मिली बल्कि दबदबे को कुचल दिया जा रहा है.

आपने शायद ध्यान न दिया हो लेकिन मोदी सरकार में कोई भी शिक्षा मंत्री अपना कार्यकाल पूरा ही नहीं कर पाया. कारण यही रहा वामपंथियों ने इतना किसी और मंत्रालय या मंत्री को परेशान नहीं किया जितना शिक्षा मंत्री को किया और अंत में उन्हें या तो हटाया गया या उनसे इस्तीफा लिया गया.

2014 से अभी तक स्मृति इरानी, प्रकाश जावड़ेकर, रमेश पोखरियाल और धर्मेंद्र प्रधान शिक्षा मंत्री रहे इनमें से कोई भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया. यह सभी विपक्षी दलों के हमेशा निशाने पर रहे. रमेश पोखरियाल कोविड के समय शिक्षा मंत्री रहे, जिन्होंने अपने खराब स्वास्थ्य के कारण इस्तीफा दिया था. बाकी सभी को किसी न किसी विवाद से उलझना ही पड़ा. 

स्मृति इरानी 771 दिन, प्रकाश जावड़ेकर 1060 दिन, रमेश पोखरियाल 770 दिन और धर्मेंद्र प्रधान इनमें से सबसे ज्यादा 1845 दिन तक शिक्षा मंत्री रह पाए. 29 साल पहले 1997 में जिस धर्मेंद्र प्रधान ने उड़ीसा में पेपर लीक मामले पर खुद प्रदर्शन किया था, 29 साल बाद पेपर लीक मामाले पर ही उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा.

2014 में स्मृति इरानी ने शिक्षा मंत्री का पद संभालने के बाद ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) का ड्राफ्ट तैयार करने की पहल कर दी थी. और नेशनल इंस्टीट्यूशन रैंकिंग फेमवर्क (एनआईआरएफ) की शुरुआत की. यहीं से वामपंथी किले को भेदने की शुरुआत हो चुकी थी. भारत में वामपंथियों के बनाए भारत विरोधी शिक्षा नीतियों को अगर कोई भी बदलना चाहेगा तो उसे उसकी कीमत चुकानी होगी. जैसे अभी तक सभी शिक्षा मंत्री चुकाते आए हैं. कांग्रेस और लेफ्ट द्वारा पढ़ाए जाने वाले झूठे इतिहास को हटाना विपक्ष के गुस्से का सबसे बड़ा कारण है. वे अपनी वामपंथी विचारधारा को भारत की शिक्षा व्यवस्था से इस तरह समाप्त होते नहीं देख सकते. उन्हें अग्रेज़ों और मुगलों के इतिहास को हटाया जाना पसंद नहीं आ रहा.       

धर्मेद्र प्रधान ने भी यही गलती की और बाकियों से बहुत ज्यादा की. उन्होंने बड़े पैमाने पर किताबों से मुगलों के झूठे गौरव को हटाने के निर्देश दिए. शिक्षा व्यवस्था को भारत के वीरों और भविष्य के विकास की तरफ मोड़ दिया.

प्रधान के कार्यकाल में स्कूलों में आपातकाल का पाठ जोड़ा गया, मुगलों का इतिहास हटाया गया, भारत का गौरवशाली इतिहास जोड़ा गया. आधुनिक सैन्य ऑपरेशन्स (सर्जिकल स्ट्राइक) को सलेबस में जोड़ा गया. क्षेत्रिय राजवंशों जैसे, मराठा, चोल, मोर्य को प्राथमिकता दी गई. और भारत के मूल को बेहतर तरीके से समझने के लिए कई क्रियाकलापों को शामिल किया गया. यह सभी वे काम हैं जिन्हें लेफ्ट और विपक्ष भारत विरोधी और हिंदुत्ववादी बताता आया है. भारत के वास्तविक इतिहास को हिंदुत्ववादी बताने का कम वे लंबे समय से करते आए हैं. लेकिन इस बार बच्चों तक सही जानकारी के साथ इतिहास पहुंचा कर वामपंथियों के छत्ते में छेद कर दिया गया. वर्तमान समय में भारत के किसी भी शिक्षा मंत्री को इतना मज़बूत होना ही होगा जो लेफ्ट के दबाव के आगे न झुके और शिक्षा व्यवस्था से वाम झूठ को निकालने का काम करता रहे. शिक्षा मंत्रालय लेफ्ट की सबसे कमज़ोर नब्ज़ है. कोई मंत्री इसकों छेड़ेगा तो वे अपने सबसे बदनाम रूप में ज़रूर आएंगे और वामपंथी इतिहासकारों को आगे करके देश के वास्तविक इतिहास को चुनौति देंगे.

प्रधान के कार्यकाल में ऐसे ही कुछ ज़रूरी बदलाव किए गए जिन्हें बहुत पहले हो जाना चाहिए थे. इस तरह के बदलाव लेफ्ट सिस्टम से जुड़े लोग हज़म नहीं कर पाते. बीते कुछ सालों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को केवल कागजों तक सीमित न रखकर इसे कक्षाओं, कैंपसों और समुदायों तक पहुंचाया गया है. 5+3+3+4 ढांचा तैयार किया गया. पारंपरिक 10+2 ढांचे को बदलकर शुरुआती बाल्यावस्था देखभाल और शिक्षा (ECCE) को स्कूली शिक्षा के मुख्य ढांचे में शामिल किया. प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषाओं में देने पर जोर दिया, जिससे बच्चों की बुनियादी समझ मज़बूत हो सके. इंजीनियरिंग, मेडिकल और लॉ जैसी उच्च शिक्षा की किताबों को हिंदी और विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराने की पहल की.

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के कार्यकाल में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा (NCF-SE) के तहत भारतीय शिक्षा प्रणाली में औपनिवेशिक मानसिकता को हटाकर भारतीय संस्कृति, समृद्ध विरासत और निष्पक्ष इतिहास को शामिल करने पर प्रमुख बल दिया गया.

उन्होंने औपनिवेशिक प्रभाव को समाप्त करने और शिक्षा में भारतीय लोकाचार और प्राचीन ज्ञान को शामिल करने पर जोर दिया. शिक्षा व्यवस्था में भारतीय ज्ञान प्रणाली को बढ़ावा देते हुए स्कूल और उच्च शिक्षा पाठ्यक्रम में प्राचीन भारतीय विज्ञान, गणित, खगोल विज्ञान, दर्शन और आयुर्वेद जैसी पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों को आधुनिक तकनीकों (जैसे AI) के साथ जोड़ा गया.

एनसीईआरटी पाठ्यक्रम और इतिहास की किताबों में बदलाव भूले-बिसरे नायकों को स्थान दिया गया. इतिहास में उन भारतीय राजाओं, स्वतंत्रता सेनानियों, जनजातीय नायकों (जैसे भगवान बिरसा मुंडा) और क्षेत्रीय राजवंशों (जैसे चोल, अहोम और मराठा साम्राज्य) के योगदान को प्रमुख स्थान दिया गया, जिन्हें पहले पर्याप्त स्थान नहीं मिला था. पाठ्यपुस्तकों का पुनर्गठन करते हुए इतिहास की किताबों से मुगल काल और विदेशी आक्रमणकारियों के अति-महिमा मंडन को संतुलित किया गया और भारत के अपने समृद्ध इतिहास तथा संघर्षों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है.

केंद्रीय विश्वविद्यालयों और संस्थानों को “भारतीय शिक्षा”, एकीकृत अध्ययन और भारत के ऐतिहासिक योगदान को उत्सव के रूप में मनाने के निर्देश दिए गए. पाठ्यपुस्तकों के रटने के बजाय भारत की विविध कला, संस्कृति, हस्तशिल्प और संगीत को प्रयोगात्मक रूप से पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाया गया. इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य भारत की नई पीढ़ी में अपनी संस्कृति, भाषा और इतिहास के प्रति गर्व की भावना जगाना और उन्हें 21वीं सदी की आधुनिक चुनौतियों के लिए तैयार करना है.

भारत का वामपंथी गुट विश्व में सबसे ख़तरनाक राजनीतिक गुट है. इसलिए नहीं कि वे मजदूरों और गरीबों की बात करते हैं, बल्कि इसलिए कि वे जिस देश में रहते है उसी देश के इतिहास, धर्म, संस्कृति को मिटाने का काम करते हैं. गरीब और दलितों के नाम पर देश में विवाद, हिंसा को बढ़ावा देते हैं. यह मीठे ज़हर की तरह काम करते हैं. मोटे चश्में पहनने वाले पढ़ाकू लोगों की मीठी बोली में लोग बदलाव एक क्रांति ढूंढ लेते हैं और अपने ही माटी के विरोधी बन बैठते हैं. लेकिन इनके झूठ को चुनौती देना जारी रहना चाहिए, तभी वह क्रांति जीवित रह पाएगी जो भारतवर्ष के मूल को बनाए रखेगी.  

ईशा
ईशा
ईशा दिल्ली स्थित एक स्वतंत्र पत्रकार हैं.