इन दिनों पूरे देश में भगवान महाप्रभु जगन्नाथ की रथयात्रा की भव्य तस्वीरें आस्था, उत्साह और सांस्कृतिक एकता का संदेश दे रही हैं. लाखों श्रद्धालुओं की सहभागिता के बीच यह महापर्व भारतीय सभ्यता की उस जीवंत परंपरा का प्रतीक है, जो विविधताओं को एक सूत्र में पिरोता है. इसी राष्ट्रीय सांस्कृतिक चेतना के बीच छत्तीसगढ़ के बस्तर से भी एक ऐसी तस्वीर उभरती है, जो अपनी विशिष्ट परंपरा, जनसहभागिता और सांस्कृतिक वैभव के कारण पूरे देश का ध्यान आकर्षित करती है.
जगदलपुर में मनाया जाने वाला गोंचा महापर्व बस्तर की सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण प्रतीक है. भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा, पारंपरिक तुपकियों की सलामी, लोकवाद्यों की गूंज और श्रद्धालुओं की सहभागिता इसे एक विशिष्ट लोक-सांस्कृतिक उत्सव बनाती है. गोंचा केवल धार्मिक आस्था का पर्व नहीं, बल्कि बस्तर की सामुदायिक परंपरा, लोकसंस्कृति और जनसहभागिता का जीवंत उत्सव है.

बस्तर की यही सांस्कृतिक शक्ति आज उसके बदलते स्वरूप के साथ एक नया अर्थ ग्रहण कर रही है. यह परिवर्तन बताता है कि आधुनिक विकास और सांस्कृतिक विरासत एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं.
भारत की जनजातीय संस्कृति की विशेषता ही उसकी विविधता है. बस्तर की लोकपरंपराओं से लेकर झारखंड के सरहुल और करमा, महाराष्ट्र की वारली कला, मध्य भारत की गोंड कला, राजस्थान और गुजरात के भील समुदायों की लोकसंस्कृति तथा पूर्वोत्तर भारत के विविध जनजातीय समुदायों की विशिष्ट परंपराओं तक भारत की जनजातीय विरासत अत्यंत समृद्ध और बहुआयामी है.
इन सभी समुदायों की जीवनशैली अलग-अलग हो सकती है, लेकिन प्रकृति के प्रति सम्मान, सामुदायिक जीवन, लोकज्ञान, परंपरा और सहभागिता की भावना उन्हें एक व्यापक सांस्कृतिक सूत्र से जोड़ती है. इसलिए बस्तर में हो रहा परिवर्तन केवल एक क्षेत्र की कहानी नहीं है. यह भारत के जनजातीय क्षेत्रों में चल रहे व्यापक सामाजिक और विकासात्मक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण अध्याय है.
वास्तविकता यह है कि भारत में वामपंथी उग्रवाद से सबसे अधिक प्रभावित आबादी यदि कोई रही है, तो वह स्वयं जनजातीय आबादी है. छत्तीसगढ़ के बस्तर से लेकर झारखंड, ओडिशा, महाराष्ट्र और देश के अन्य वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों तक, दशकों तक हिंसा, भय, विकास से दूरी और अवसरों की कमी का सबसे बड़ा भार स्थानीय समुदायों ने उठाया.
भारत सरकार के उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों की संख्या 126 से घटकर अप्रैल 2024 में 38 और अप्रैल 2025 में 18 रह गई. दिसंबर 2025 में गृह मंत्रालय से संबंधित आधिकारिक संसदीय दस्तावेज़ में यह संख्या 11 तक पहुंचने का उल्लेख किया गया. यह परिवर्तन सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ विकास, सड़क, संचार, शिक्षा, कौशल और सरकारी सेवाओं की पहुंच से भी जुड़ा हुआ है.
2014 का बाद देश में सरकार के बदलने से आदिवासियों के जीवन में भी बड़ा परिवर्तन आया है. वर्तमान सरकार ने कई ऐसी योजनाएं लागू की जो सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं रहीं और जल, जंगल, ज़मान पर निर्भर रहने वाले विकास के मामले में पिछड़ चुके नागरिकों को जीवन की बुनियादी सुविधाएं देकर उन्हें मुख्य धारा में लेकर आईं.
विशेष रूप से कमज़ोर जनजातीय समूहों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के लिए लगभग 24,104 करोड़ रुपए के बजट वाली पीएम जनमन योजना योजना शुरू की गई, जिसके माध्यम से पक्के घर, सड़क, बिजली और सुरक्षित पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं. आदिवासी क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए सरकार एकलव्य विद्यालयों के निर्माण और संचालन में तेजी ला रही है, ताकि आदिवासी बच्चों को उनके ही क्षेत्रों में बेहतरीन शिक्षा मिल सके.
आदिवासी कारीगरों और संग्रहकर्ताओं को सशक्त बनाने के लिए, वन उपज के बेहतर मूल्य प्राप्त करने हेतु ‘वन धन योजना’ के तहत ‘वन धन केंद्रों’ की स्थापना की गई है, जिससे उनकी आय में वृद्धि हो सके.
आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को सम्मानित करने और उनके इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने के लिए भगवान बिरसा मुंडा की जयंती (15 नवंबर) को राष्ट्रीय स्तर पर जनजातीय गौरव दिवस के रूप में घोषित किया गया है. लघु वनोपजों पर एमएसपी में भारी वृद्धि की गई है और इसके दायरे में शामिल की जाने वाली वस्तुओं की संख्या बढ़ाई गई है, ताकि आदिवासियों को उनकी उपज का सही दाम मिले.
वर्तमान में भारत सरकार के 41 मंत्रालय/विभागों के द्वारा जनजातीय विकास के लिए 214 योजनाएं चलाई जा रही है जो अपने आप में सरकार की इस समुदाय के विकास के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है.
सरकारी न्यूज़ चैनल दूरदर्शन के अनुसार, केंद्र सरकार ने जनजातीय विकास के लिए पिछले 6 सालों के दौरान, 2019 – 20 से 2024 – 25 के बजट आवंटन में एसटीसी निधि के तहत 5,17,000 करोड़ रूपए से कई अधिक आवंटित किया हैं. 10 वर्षों में जनजातीय कार्य मंत्रालय को 2015 – 16 में 4495 करोड़, 2016 – 17 में 4822 करोड़, 2017 – 18 में 5318 करोड़, 2018 – 19 में 5995 करोड़, 2019 – 20 में 7328 करोड़, 2020 – 21 में 5495 करोड़, 2021 – 22 में 6174 करोड़, 2022 – 23 में 7301 करोड़, (आरई) 2023 – 24 में 12462 करोड़ (बीई), 2024 – 25 में 13000 करोड़ (यूबी) आवंटित किए हैं.
इसकी तुलना अगर कांग्रेस की सरकार के समय के बजट से की जाए तो एक बड़ा अंतर और आदिवासियों के प्रति अवहेलना का भाव सामने आता है. 2004 से 2014 के दौरान जनजातिय कार्य मंत्रालय का बजट हर साल लगभग 3,000 से 4,500 करोड़ रूपए तक ही रहता था. यूपीए के समय में आदिवासी मामलों के मंत्रालय का बजट कभी 4,500 करोड़ के पार नहीं गया.
नक्सलवाद के उन्मूलन और वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में शांति एवं विकास की दिशा में हो रही प्रगति का सबसे सकारात्मक प्रभाव जनजातीय समाज के जीवन में दिखाई देता है. जहां कभी भय और हिंसा के कारण विद्यालय, सड़क, स्वास्थ्य केंद्र, बाजार और प्रशासनिक सेवाएं दूर थीं, वहां आज विकास की नई संभावनाएं आकार ले रही हैं.
यह परिवर्तन जनजातीय समाज के जीवन में लौटते विश्वास, अवसर और सम्मान की कहानी भी है. जिस युवा के सामने कभी हिंसा और असुरक्षा की चुनौती थी, वही आज खेल, शिक्षा, कौशल, उद्यमिता और रोजगार के माध्यम से अपना भविष्य गढ़ रहा है.
शांति का वास्तविक अर्थ केवल हिंसा का कम होना नहीं है. शांति का अर्थ है—बच्चों का विद्यालय जाना, युवाओं का खेल के मैदान में उतरना, महिलाओं का आर्थिक रूप से सशक्त होना, किसानों और वनवासी परिवारों को अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलना तथा नागरिकों का शासन और प्रशासन पर विश्वास मजबूत होना.
कभी बस्तर का नाम आते ही लोगों के मन में घने जंगल, जनजातीय जीवन और नक्सल हिंसा की छवि उभरती थी. लंबे समय तक यह क्षेत्र सुरक्षा और विकास की चुनौतियों के कारण चर्चा में रहा. लेकिन आज बस्तर अपनी पहचान को नए सिरे से गढ़ रहा है.
7 फरवरी, 2026 को राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने जगदलपुर में बस्तर पंडुम 2026 का उद्घाटन किया. राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में कहा कि माओवाद के कारण बस्तर के लोगों ने लंबे समय तक कठिनाइयां झेलीं और अब निर्णायक कार्रवाई के कारण भय और असुरक्षा का वातावरण समाप्त होने की दिशा में है.

इस परिवर्तन की सबसे बड़ी शक्ति बस्तर का युवा है. इसका सबसे प्रभावी उदाहरण बस्तर ओलंपिक है. वर्ष 2025 में बस्तर ओलंपिक में 3 लाख 91 हजार खिलाड़ियों ने भाग लिया. आधिकारिक जानकारी के अनुसार, 700 से अधिक ऐसे युवाओं ने भी इसमें हिस्सा लिया, जिन्होंने नक्सलवाद का मार्ग छोड़कर आत्मसमर्पण किया था. पिछले वर्ष के 1.65 लाख प्रतिभागियों की तुलना में 2025 में भागीदारी लगभग ढाई गुना रही. महिलाओं की भागीदारी में भी उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई.
मोदी सरकार में 30 लाख से अधिक आदिवासी छात्रों को हर साल मंत्रालय के तहत विभिन्न छात्रवृत्तियां मिलती हैं. 2014 से मार्च 2024 तक 10 वर्षों में मंत्रालय के तहत 18,000 करोड़ रुपए की छात्रवृत्ति वितरित की गई हैं. जनजातीय समुदाय के लिए प्री-मैट्रिक और पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना के तहत 2019- 20 से 2023-24 के तहत 12000 करोड़ से अधिक राशि जारी की गई है.
एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (ईएमआरएस) योजना का बजट आवंटन पिछले 10 वर्षों में 22 गुना उछाल के साथ 2024 – 25 के बजट के तहत 6399 करोड़ रूपए हो गया है. पिछले 10 वर्षों में भारत सरकार ने अनेक ऐसे कदम उठाए हैं जिनसे जनजातीय विकास सुनिश्चित हुआ. जैसे, 85 से अधिक लघु वन उत्पादों को न्यूनतम उचित मूल्य (एमएफपी) में शामिल किया गया. वन अधिकार अधिनियम 2006 के तहत कुल भूमि कवरेज 2023-24 तक तीन गुना बढ़कर 181 लाख एकड़ हो गई है, जबकि 2013-14 में यह 55 लाख एकड़ थी, पीएम आदि आदर्श ग्राम योजना के तहत 14,000 से अधिक स्वीकृत ग्रामीण विकास योजनाओं के लिए 2216 करोड़ रुपए से अधिक पिछले 3 वर्षों में जारी किए गए, पिछले दशक में स्वच्छ भारत मिशन के तहत आदिवासी बहुल क्षेत्रों में 148 लाख से अधिक शौचालय बनाए गए और 2.55 लाख आंगनबाड़ी स्थापित की गईं. सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन के तहत 1 करोड़ से अधिक आदिवासियों की जांच की गई, अगले तीन वर्षों में इस बीमारी की अधिकता वाले क्षेत्रों में 7 करोड़ आदिवासियों की जांच का लक्ष्य रखा गया है और पिछले 10 वर्षों में, आदिवासी परिवारों को 23 लाख से अधिक पट्टे जारी किए गए हैं.
इसके अलावा लगभग सरकार ने ईएमआरएस स्थापित करने की योजना को नया रूप देने और विस्तार देने के लिए महत्वपूर्ण उपायों की घोषणा की. और भुवनेश्वर में ‘अनुसूचित जनजाति पीआरआई प्रतिनिधियों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रम’ और ‘1000 स्प्रिंग्स पहल’ को शुरू किया गया.
भारत के कई आदिवासी इलाकों कासतौर पर बस्तर औऱ उसी की तरह ओडिशा का मलकानगिरी भी लंबे समय तक दुर्गमता और वामपंथी उग्रवाद की चुनौतियों से प्रभावित क्षेत्र रहा है. मलकानगिरी का स्वाभिमान अंचल कभी भौगोलिक अलगाव और कमजोर कनेक्टिविटी के कारण विकास की कठिन चुनौतियों का सामना करता था.
समय के साथ सड़क, पुल, प्रशासनिक पहुंच, संचार और आजीविका से जुड़ी पहलों ने इस क्षेत्र को मुख्यधारा से जोड़ने की प्रक्रिया को गति दी. गुरुप्रिया सेतु जैसी कनेक्टिविटी परियोजनाओं ने क्षेत्रीय संपर्क को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.
मलकानगिरी का उदाहरण यह बताता है कि किसी वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र का परिवर्तन केवल सुरक्षा बलों की कार्रवाई से नहीं होता. सुरक्षा के साथ सड़क, पुल, प्रशासनिक पहुंच, शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और स्थानीय समुदायों का विश्वास भी आवश्यक है.
ओडिशा में मिशन शक्ति के माध्यम से स्वयं सहायता समूहों को स्थानीय आजीविका और आर्थिक गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है. मलकानगिरी जिले में महिलाओं और समुदायों को विभिन्न आजीविका गतिविधियों से जोड़ने की पहलें इसी व्यापक विकास प्रक्रिया का हिस्सा हैं.
मलकानगिरी और बस्तर की कहानियां एक जैसी ही हैं. जब दुर्गमता और हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों में शासन की पहुंच बढ़ती है, कनेक्टिविटी बेहतर होती है और स्थानीय लोगों को विकास में भागीदारी मिलती है, तब परिवर्तन की संभावनाएं मज़बूत होती हैं.
झारखंड, महाराष्ट्र और देश के अन्य वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्रों में भी सुरक्षा स्थिति में सुधार के साथ विकास की नई संभावनाएं बनी हैं.
भारत सरकार ने वामपंथी उग्रवाद प्रभावित जिलों में कौशल विकास, औद्योगिक प्रशिक्षण, सड़क निर्माण और मोबाइल कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों पर विशेष ध्यान दिया है. ऐसे क्षेत्रों में कौशल प्रशिक्षण का उद्देश्य स्थानीय युवाओं को रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण उपलब्ध कराना है.
दूरस्थ क्षेत्रों में मोबाइल और डिजिटल कनेक्टिविटी का विस्तार भी महत्वपूर्ण है. आज मोबाइल नेटवर्क केवल बातचीत का माध्यम नहीं, बल्कि डिजिटल शिक्षा, बैंकिंग, डिजिटल भुगतान, सरकारी सेवाओं और रोजगार के अवसरों से जुड़ने का माध्यम भी है.
इसलिए जनजातीय क्षेत्रों का विकास केवल सड़क और भवनों तक सीमित नहीं रह सकता. डिजिटल कनेक्टिविटी भी आज विकास की मूलभूत आवश्यकता बन चुकी है.
खेलों के साथ-साथ सांस्कृतिक पुनर्जागरण ने भी बदलते बस्तर को नई पहचान दी है. बस्तर पंडुम इसका सशक्त उदाहरण है.
2026 के बस्तर पंडुम में 55,000 प्रतिभागियों ने भाग लिया. आधिकारिक जानकारी के अनुसार, यह आयोजन सात जिलों, 1,885 ग्राम पंचायतों और 32 विकासखंड मुख्यालयों तक पहुंचा और 12 श्रेणियों में बस्तर की संस्कृति, कला, खान-पान, नृत्य, परंपराओं और लोकजीवन को मंच मिला.
यह आयोजन केवल सांस्कृतिक उत्सव नहीं था. यह जनजातीय अस्मिता, सामाजिक सहभागिता और सांस्कृतिक संरक्षण का व्यापक मंच बनकर सामने आया.
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी बस्तर पंडुम के अवसर पर कहा कि ऐसे आयोजन सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और स्थानीय समुदायों के सशक्तिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. आज बस्तर की पहचान केवल संघर्ष से नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, कला, लोकनृत्य, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक जीवन से भी हो रही है.
बदलते बस्तर की प्रेरक कहानियों में डॉ. बुधरी ताती का योगदान विशेष उल्लेखनीय है. वर्ष 2026 के पद्म पुरस्कारों में उन्हें सामाजिक कार्य के क्षेत्र में पद्मश्री से सम्मानित किया गया. उनका उदाहरण यह संदेश देता है कि सामाजिक परिवर्तन केवल बड़े सरकारी प्रोजेक्टों से नहीं आता. कई बार एक व्यक्ति का दशकों लंबा समर्पण भी समाज में पीढ़ीगत बदलाव की नींव रखता है.
बस्तर और देश के अन्य जनजातीय क्षेत्रों में ऐसे अनेक स्थानीय नायक और नायिकाएं हैं, शिक्षक, स्वास्थ्यकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता, महिला उद्यमी, कलाकार और युवा—जो अपने-अपने स्तर पर समाज में परिवर्तन ला रहे हैं.
इन स्थानीय प्रयासों को पहचानना और राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान देना जनजातीय विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है.
बस्तर में सुरक्षा और विकास के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा मॉडल सामने आया है.
मई 2026 में गृह मंत्रालय की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, बस्तर में स्थापित सुरक्षा शिविरों के एक हिस्से को ‘वीर शहीद गुंडाधुर डेरा’ के रूप में विकसित करने और सेवा डेरा मॉडल के माध्यम से सरकारी योजनाओं की पहुंच गांवों तक ले जाने की दिशा में कार्य किया जा रहा है. इसका लक्ष्य शासन को नागरिकों के और निकट लाना तथा सरकारी योजनाओं का अधिकतम लाभ लोगों तक पहुंचाना है.
बस्तर ओलंपिक की सफलता ने जनजातीय युवाओं की खेल क्षमता को व्यापक राष्ट्रीय ध्यान दिलाया. इसी क्रम में वर्ष 2026 में छत्तीसगढ़ ने पहले खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स की मेजबानी की.
इन खेलों का आयोजन रायपुर, जगदलपुर और सरगुजा में किया गया. आधिकारिक जानकारी के अनुसार, इसमें 3,800 प्रतिभागियों, 9 खेल विधाओं और 106 स्वर्ण पदकों का राष्ट्रीय मंच तैयार हुआ. यह पहल इस बात का प्रमाण है कि भारत के जनजातीय क्षेत्र केवल विकास की चुनौतियों वाले क्षेत्र नहीं हैं. वे देश की खेल प्रतिभा के महत्वपूर्ण केंद्र भी हैं. बस्तर सहित भारत के अनेक जनजातीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था सदियों से जल, जंगल और जमीन पर आधारित रही है. महुआ, तेंदूपत्ता, लाख, शहद, बांस, औषधीय पौधे और अन्य लघु वनोपज केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि जनजातीय अर्थव्यवस्था की आधारशिला हैं. यदि इन उत्पादों का स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग और विपणन किया जाए, तो जनजातीय परिवारों की आय में वृद्धि की बड़ी संभावनाएं हैं. महिला स्व-सहायता समूह, सहकारिता और स्थानीय उद्यमिता इस आर्थिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं.
पर्यटन भी बदलते बस्तर की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बनकर उभरा है. चित्रकोट जलप्रपात, तीरथगढ़, कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान, धोलकल, बस्तर दशहरा, गोंचा महापर्व और समृद्ध जनजातीय सांस्कृतिक विरासत पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. छत्तीसगढ़ पर्यटन बोर्ड बस्तर को उसकी प्राकृतिक सुंदरता और जनजातीय संस्कृति के लिए विशेष पहचान देता है.
बदलते बस्तर की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि आज विकास केवल सरकारी योजनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि आदिवासियों के जीवन को धरातल पर बदल रहा है.
युवाओं का आत्मविश्वास, महिलाओं की बढ़ती भागीदारी, सांस्कृतिक गौरव की पुनर्स्थापना और स्थानीय समुदायों की विकास प्रक्रिया में भागीदारी इस परिवर्तन की वास्तविक पहचान हैं.
यही भारत के जनजातीय विकास का भविष्य भी है—ऐसा विकास जिसमें जनजातीय समुदाय केवल योजनाओं के लाभार्थी न हों, बल्कि विकास के सक्रिय भागीदार और नेतृत्वकर्ता बनें.
बस्तर की कहानी को केवल बस्तर तक सीमित करके नहीं देखी जानी चाहिए. मलकानगिरी का स्वाभिमान अंचल, झारखंड के जनजातीय क्षेत्र, महाराष्ट्र के वामपंथी उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र और देश के अन्य जनजातीय क्षेत्र भी इस व्यापक परिवर्तन का हिस्सा हैं.
कहीं सड़क और पुल विकास का माध्यम बने हैं, कहीं खेल युवाओं को नई दिशा दे रहे हैं, कहीं स्वयं सहायता समूह महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बना रहे हैं, तो कहीं शिक्षा और कौशल विकास नई पीढ़ी के भविष्य को बदल रहे हैं.
गोंचा महापर्व से लेकर बस्तर ओलंपिक, बस्तर पंडुम, खेलो इंडिया ट्राइबल गेम्स, डॉ. बुधरी ताती जैसी प्रेरक विभूति, वीर शहीद गुंडाधुर सेवा डेरा जैसी पहलें और मलकानगिरी जैसे क्षेत्रों में सुरक्षा एवं विकास के साथ आगे बढ़ता परिवर्तन—ये सभी उदाहरण एक बड़े राष्ट्रीय बदलाव की ओर संकेत करते हैं.
गोंचा से जनसहभागिता तक की बस्तर की यह यात्रा केवल परिवर्तन की कहानी नहीं, बल्कि उस भारत की तस्वीर है जहां जनजातीय अस्मिता, सांस्कृतिक विरासत, सुशासन, सामाजिक समरसता और आधुनिक विकास एक साथ मिलकर राष्ट्र निर्माण की नई गाथा लिख रहे हैं.
