क्या एनजीओ और समाज सेवा के नाम पर आने वाला हर पैसा वाकई बेदाग होता है? भारत में जब भी गैर-सरकारी संगठनों और उनकी विदेशी फंडिंग की बात होती है, तो यह चर्चा केवल समाज सेवा तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता और देश के आंतरिक ताने-बाने को प्रभावित करने वाले एक बेहद संवेदनशील और गंभीर चिंता में बदल जाती है. हाल के वर्षों में, विशेषकर 22 जून, 2026 को लागू किए गए नए FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) संशोधनों के बाद, इस विषय पर देश के भीतर और बाहर काफी टकराव देखने को मिला है. एक तरफ जहां सरकार इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के लिए अनिवार्य कदम बता रही है, वहीं दूसरी तरफ वैश्विक स्तर पर भारत और हिंदू विरोधी एजेंडा चलाने वाली ताकतें और उनके स्थानीय पक्षकार इसे आम नागरिकों की आवाज़ दबाने का प्रयास कह रहे हैं. कांग्रेस, वामपंथी पार्टी और अन्य विपक्षी दलों का मानना है कि नए एफसीआरए संशोधन असल में गैर-सरकारी संगठनों में पारदर्शिता लाने के लिए नहीं, बल्कि देश में स्वतंत्र और लोकतांत्रिक आवाज़ों का गला घोंटने के उद्देश्य से लाए गए हैं. इन सभी दलों सहित पूरे विपक्ष का आरोप है कि सरकार इन कड़े प्रशासनिक नियमों के ज़रिए समाज सेवी संस्थाओं में डर का माहौल पैदा करके उन्हें अपनी कठपुतली बनाना चाहती है. विपक्ष ने विशेष रूप से बिना किसी न्यायिक जांच के किसी भी एनजीओ की संपत्तियों को सीधे जब्त करने के प्रावधान को ‘प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत’ का खुला उल्लंघन बताया है और इसे ‘प्रशासनिक टोल-टैक्स’ करार दिया, जो आपदा या आपातकाल के समय सामाजिक राहत कार्यों को पूरी तरह ठप कर देगा. इसके अलावा, एनजीओ प्रमुखों के सोशल मीडिया अकाउंट्स और ब्लॉग्स पर सरकार की चौबीसों घंटे पैनी नज़र रखने वाले नियम को मास सर्विलांस और निजता के अधिकार पर हमला कहा गया.
विपक्षी नेताओं का यह भी तर्क है कि ‘धर्मांतरण’ जैसे अस्पष्ट शब्दों की आड़ लेकर सरकार जानबूझकर अल्पसंख्यक संस्थानों को निशाना बना रही है और राज्यों को जांच शुरू करने के लिए केंद्र से मंजूरी लेने पर मजबूर करके देश के संघीय ढांचे को कमजोर कर रही है, जो कि पूरी तरह से एक तानाशाही कदम है. अब सवाल यह है कि क्या वास्तव में विदेशी पैसा केवल गरीबी हटाने,शिक्षा फैलाने और पर्यावरण बचाने के लिए आ रहा है या फिर इस परोपकार के मुखौटे के पीछे भारत की डेमोग्राफी, अर्थव्यवस्था और नीतियों को प्रभावित करने की कोई गहरी साजिश छिपी हुई है? एक ऐसी साजिश जिसे बाहरी देशों में बैठे साजिशकर्ता हमारे देश में रह रहे गद्दारो की मदद से अंजाम देने का काम कर रहे हैं.
भारत में विदेशी पैसे के प्रभाव को समझने के लिए इसके इतिहास को देखना जरूरी है. वर्ष 1976 में आपातकाल के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने महसूस किया था कि विदेशी ताकतें भारत की राजनीति और नीति-निर्माण को पैसे के दम पर प्रभावित कर रही हैं, जिसके बाद पहली बार एफसीआरए कानून लाया गया था. साल 2014 से पहले के दौर में भारत में एनजीओ सेक्टर का गोरखधंधा काफी फल फूल रहा था और इस पर नज़र रखने वाला कोई नहीं था. उस समय की व्यवस्था में कई ऐसी कमियां थीं जिनका वैश्विक ताकतों ने भरपूर फायदा उठाया. देश में लाखों की संख्या में ऐसे कागजी एनजीओ पंजीकृत थे जिनका कोई ज़मीनी वजूद नहीं था, लेकिन विदेशों से उनके खातों में करोड़ों रुपए आ रहे थे. एनजीओ खोलना एक मुनाफे का बिजनेस और टैक्स बचाने का ज़रिया बन चुका था. यूपीए सरकार के उस दौर में कई विदेशी एनजीओ के प्रमुख और उनके भारतीय पैरोकार सीधे मंत्रालय के गलियारों और नीति-निर्धारक कमेटियों में बैठकर देश के बजाय विदेशी हितों के अनुकूल नीतियां मोड़ने का दबाव बनाते थे.
इस ढीली व्यवस्था का सबसे ख़तरनाक असर भारत की आर्थिक प्रगति पर पड़ा. क्या यह महज एक संयोग है कि भारत के जितने भी बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट्स, पावर प्लांट्स या माइनिंग प्रोजेक्ट्स रहे उनके ख़िलाफ़ अचानक ज़मीन पर बड़े-बड़े आंदोलन खड़े हो गए? इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट्स से लेकर वित्तीय जांचों तक में यह बात बार-बार सामने आई है कि विदेशी ताकतों द्वारा पोषित कई एनजीओ का मुख्य काम भारत की आर्थिक प्रगति की रफ्तार को धीमा करना रहा है. तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र के ख़िलाफ़ हुए हिंसक और लंबे आंदोलनों के पीछे बड़े पैमाने पर विदेशी फंडिंग का हाथ पाया गया था. इसी तरह थूथुकुडी के विशाल स्टेफलाइट कॉपर प्लांट को पर्यावरण के नाम पर बंद करवा दिया गया. जिसके बाद भारत जो कभी तांबे का बड़ा निर्यातक था, वह अचानक इसका आयातक बन गया.
जब पश्चिम या किसी अन्य विदेशी शक्ति से पैसा किसी भारतीय एनजीओ को मिलता है, तो वह पैसा बिना किसी शर्तों के नहीं आता, बल्कि उसके साथ एक अदृश्य एजेंडा आता है जो अदालतों में जनहित याचिकाओं की बाढ़ लाकर विकास कार्यों पर स्टे-ऑर्डर लगवाने और देश की छवि वैश्विक मंच पर खराब करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है.
एफसीआरए संशोधन बिल के ख़िलाफ़ पूरा का पूरा विपक्ष एकजुट होकर इसके विरोध में आ खड़ा हुआ है. तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, के.सी. वेणुगोपाल और माकपा सांसद जॉन ब्रिटास सहित कई प्रमुख विपक्षी नेताओं ने केंद्र सरकार के इस नए बिल का कड़ा विरोध किया. इन सभी नेताओं का मानना है कि यह कानून आम लोगों की भलाई और धार्मिक स्वतंत्रता के लिए काम करने वाले एनजीओज़ पर एक प्रकार से सीधा हमला है, जो उन्हें पूरी तरह सरकार के नियंत्रण में ले आएगा. केरल विधानसभा में तत्कालीन मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और विपक्ष के नेता वी.डी. सतीशन ने एकजुट होकर इसके ख़िलाफ़ एक प्रस्ताव भी पारित किया. विपक्षी नेताओं ने प्रशासनिक देरी के कारण लाइसेंस रद्द होने, मामूली गलतियों पर भारी जुर्माना लगाने और दूसरे राज्यों में काम करने के लिए अलग से शुल्क वसूलने जैसे कड़े नियमों की आलोचना की. उनका कहना है कि इस डर के माहौल और भारी-भरकम प्रशासनिक टैक्स के कारण ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले छोटे व अल्पसंख्यक संस्थान पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगे और गरीबों की मदद रुक जाएगी.
पिछले कुछ सालों में भारत सरकार ने एफसीआरए का पालन न करने पर कई बड़े गैर-सरकारी संगठनों के ख़िलाफ़ काफी सख़्त कदम उठाए हैं. गृह मंत्रालय ने पाया कि कई संस्थाएं विदेशी फंड का सही इस्तेमाल नहीं कर रही थीं, समय पर अपनी सालाना रिपोर्ट जमा नहीं कर रही थीं या फिर जिस काम के लिए पैसा मिला था, उसे कहीं और खर्च कर रही थीं. इसी वजह से सरकार ने इन संगठनों के विदेशी फंडिंग लाइसेंस रद्द कर दिए हैं.
इनमें ‘सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च’ (CPR), ‘राजीव गांधी फाउंडेशन’ (RGF), ‘राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट’ और ‘ऑक्सफैम इंडिया’ जैसे कई बड़े नाम शामिल हैं. इसके साथ ही, समाज कल्याण और धार्मिक क्षेत्रों में सक्रिय कई अन्य संस्थाओं जैसे ‘वर्ल्ड विजन इंडिया’, ‘CASA’, ‘इंडो-ग्लोबल सोशल सर्विस सोसाइटी’ और ‘वॉलंटरी हेल्थ एसोसिएशन ऑफ इंडिया’ पर भी यही कार्रवाई हुई है. सरकार का साफ कहना है कि इस कदम के पीछे उनका मकसद विदेशी चंदे के लेन-देन को पारदर्शी बनाना है, ताकि यह पक्का किया जा सके कि बाहर से आने वाला पैसा देश के कायदे-कानूनों के मुताबिक ही खर्च हो.
राजीन गांधी फाउंडेशन को यूपीए सरकार के दौरान भारत स्थित चीनी दूतावास, चीन सरकार, जाकिर हुसैन, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF), मंत्रालय, सार्वजनिक उपक्रमों के साथ-साथ मेहुल चोकसी ने भी चंदा दिया था. चीन सरकार की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की वित्त पोषित चाइना एसोसिएशन फॉर इंटरनेशनल फ्रेंडली कॉन्टैक्ट (CAIFC) ने भी फाउंडेशन को फंड दिया था. जाकिर नाइक ने भी इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन के जरिए 2011 में फाउंडेशन को 50 लाख रुपए दिए थे. हालांकि, कांग्रेस ने बाद में रकम लौटा दी थी. ऐसी ही अनेकों गड़बड़ियों के कारण साल 2022 में सरकार ने फाउंडेशन में विदेशों से आने वाली फंडिंग पर रोक लगा दी थी.
बात सिर्फ कागजी हेरफेर की नहीं है, कुछ मामलों में तो ऐसे सबूत भी आए हैं जो सीधे देश को अस्थिर करने की साजिश की तरफ इशारा करते हैं. मिसाल के तौर पर, तीस्ता सीतलवाड़ के एनजीओ (सबरंग ट्रस्ट), एमनेस्टी इंटरनेशनल और ग्रीनपीस जैसी संस्थाओं पर आरोप लगने के बाद जांच एजेंसियों द्वारा की गई जांच में सबूत मिले कि विदेशी चंदे का इस्तेमाल विकास परियोजनाओं, जैसे पावर प्लांट या माइनिंग प्रोजेक्ट्स को रुकवाने, दंगों को भड़काने और देश की छवि खराब करने के लिए लॉबिंग करने में किया जा रहा था. अभी हाल ही में ‘द टिमोथी इनिशिएटिव’ नाम के विदेशी नेटवर्क पर भी ईडी ने नक्सल प्रभावित इलाकों में बिना एफसीआरए नियमों के करोड़ों रुपए खपाने का आरोप लगाया है.
विदेशी फंडिंग के ज़रिए भारत की डेमोग्राफी और संस्कृति को बदलने का सबसे पुराना और अचूक हथियार हमेशा से मानवतावादी सेवा का नाटक रहा है. मदर टेरेसा और उनकी संस्था ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ इसका सबसे चर्चित उदाहरण हैं. दशकों से दुनिया के सामने यह नैरेटिव सेट किया गया कि यह संस्था केवल अनाथों, बीमारों और मरते हुए गरीबों की निःस्वार्थ सेवा कर रही है, लेकिन इस कथित परोपकार के पीछे चुपचाप धर्मांतरण का एक बहुत बड़ा और संगठित खेल चल रहा था. विदेशों से मिलने वाले अरबों रुपए के चंदे के दम पर दूरदराज़ के आदिवासी इलाकों और पिछड़े समाज में सेवा, शिक्षा और स्वास्थ्य के जो जाल बुने गए, उनका असली मकसद गरीबों की लाचारी का फायदा उठाकर उनका ईसाई धर्म में परिवर्तन कराना था. इसका सबसे बड़ा प्रमाण झारखंड सरकार की विशेष शाखा (Special Branch) और राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की वो आधिकारिक जांच रिपोर्टें हैं, जिनमें गृह मंत्रालय के आदेश पर संस्था के बच्चों के शेल्टर होम्स की सघन जांच की गई थी. इन रिपोर्टों में साफ तौर पर सामने आया कि कैसे संस्था की आड़ में न सिर्फ अवैध रूप से नवजात बच्चों की खरीद-बिक्री की जा रही थी, बल्कि आश्रय गृहों में रह रहे अनाथ बच्चों और महिलाओं का ब्रेनवॉश करके उनका जबरन व लालच देकर धर्मांतरण कराया जा रहा था. सेवा के इस तरीके ने केवल लोगों की आस्था नहीं बदली, बल्कि गरीब और भोले-भाले भारतीयों को अपनी मूल संस्कृति से दूर करने का प्रयास भी किया. यही कारण है कि आज राष्ट्रीय सुरक्षा और देश की सांस्कृतिक संप्रभुता को सर्वोपरि रखते हुए ऐसी तमाम संस्थाओं के एफसीआरए खातों और उनकी संदिग्ध विदेशी फंडिंग को कड़ी कानूनी जांच के दायरे में लाया गया है.
विदेशी ताकतों द्वारा भारत को आंतरिक रूप से अस्थिर करने का यह खेल केवल औद्योगिक परियोजनाओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका सबसे आक्रामक रूप हाल के वर्षों में देश के भीतर हुए बड़े सामाजिक आंदोलनों और प्रदर्शनों में खुलकर सामने आया है. शाहीन बाग में सीएए के विरोध में महीनों तक चला धरना प्रदर्शन हो या फिर दिल्ली की सीमाओं पर हुआ लंबा किसान आंदोलन, इन दोनों ही घटनाक्रमों के दौरान जिस तरह अंतरराष्ट्रीय हस्तियों और विदेशी लॉबियों द्वारा रातों-रात सोशल मीडिया पर सुनियोजित ट्वीट और ‘टूलकिट’ जारी किए जाने लगे, उसने साफ कर दिया कि इन आंदोलनों की डोर कहीं न कहीं विदेशी फंडिंग और बाहरी ताकतों के हाथ में थी.
वैश्वीकरण और सोशल मीडिया के इस दौर में विदेशी ताकतों ने भारत जैसे उभरते राष्ट्रों को अंदर से अस्थिर करने के लिए एक बेहद शातिर रणनीति अपनाई है, जिसे ‘नैरेटिव बिल्डिंग’ कहा जाता है. इसके तहत ग्रेटा थनबर्ग और सोनम वांगचुक जैसे चेहरों को पर्यावरण संरक्षण और नागरिक अधिकारों के नाम पर रातों-रात ‘यूथ आइकॉन’ या युवाओं का आदर्श बनाकर पेश किया जाता है. असल में, इस कथित एक्टिविज़्म के पीछे वैश्विक पीआर एजेंसियां, पश्चिमी थिंक-टैंक और एनजीओ फंडिंग का एक बहुत बड़ा, अदृश्य नेटवर्क काम करता है. विदेशी शक्तियों द्वारा इन चेहरों को आगे करने का मुख्य उद्देश्य सामाजिक और पर्यावरणीय चिंताओं की आड़ में देश की नई पीढ़ी के भीतर अपनी ही चुनी हुई सरकार और व्यवस्था के प्रति असंतोष तथा विद्रोह की भावना भड़काना है. एनजीओ फंडिंग का यह पूरा ढांचा इस तरह काम करता है जहां पैसा सीधे किसी राजनीतिक एजेंडे के नाम पर नहीं आता, बल्कि उसे ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’, ‘ग्लेशियर प्रोटेक्शन’ या ‘मानवाधिकारों’ के परोपकारी मुखौटे के तहत भेजा जाता है. इस पैसे का इस्तेमाल टूलकिट तैयार करने, सोशल मीडिया पर सुनियोजित प्रोपेगैंडा चलाने और इंफ्रास्ट्रक्चर व ऊर्जा से जुड़े बड़े प्रोजेक्ट्स के ख़िलाफ़ युवाओं को सड़कों पर उतारने के लिए किया जाता है.
इस प्रकार, युवाओं की मासूमियत और उनकी जायज भावनाओं को ढाल बनाकर विदेशी ताकतें बहुत सफाई से अपना उल्लू सीधा करती हैं, जिसका अंतिम परिणाम देश के आर्थिक विकास को रोकना और उसकी आंतरिक सुरक्षा को पंगु बनाना होता है. अब इसी वैश्विक चक्रव्यूह के तहत भारत की युवा पीढ़ी यानी नई जनरेशन को भड़काने और उन्हें देश की चुनी हुई सरकार के ख़िलाफ़ खड़ा करने के लिए ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसे नए मोहरों का सहारा लेकर एक नई चाल शुरू की गई है. नीट के छात्रों की जायज चिंताओं की आड़ लेकर जिस तरह ये संगठन अचानक सड़कों पर उतरकर आंदोलनों को हवा दे रहे हैं, उसके पीछे भी वित्तीय जांचों और जन-अनुमानों के अनुसार विदेशी शक्तियों का ही हाथ माना जा रहा है, जिनका असली मकसद छात्रों का हित नहीं बल्कि एनजीओ और राजनीतिक मुखौटों के ज़रिए देश की बुनियाद को कमज़ोर करना और अशांति फैलाना है.
साल 2014 में सत्ता परिवर्तन के बाद मोदी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि के सिद्धांत पर काम करना शुरू किया. गृह मंत्रालय ने जब इन संगठनों के खातों और उनके खर्चों की फाइलें खोलनी शुरू कीं, तो एक के बाद एक चौंकाने वाले खुलासे हुए. सरकार ने सबसे पहले सभी एनजीओ के लिए अपने वित्तीय रिटर्न ऑनलाइन दाखिल करना और पाई-पाई का हिसाब देना अनिवार्य किया. जैसे ही जांच का दायरा बढ़ा, लगभग 20,000 से अधिक संदिग्ध एनजीओ रातों-रात गायब हो गए. जो संगठन कल तक दावों के बड़े-बड़े पहाड़ खड़े कर रहे थे, वे अपनी फंडिंग का कानूनी स्रोत और बही-खाता दिखाने में नाकाम रहे. एनजीओ के नाम पर जो धंधा चल रहा था, जहां विदेशी पैसे से आलीशान गाड़ियां खरीदी जाती थीं, फाइव-स्टार होटलों में सेमिनार होते थे और प्रशासनिक खर्च के नाम पर करोड़ों रुपए उड़ाए जाते थे, उस पर सरकार ने कानूनन लगाम लगा दी. जब ग्रीनपीस, एमनेस्टी इंटरनेशनल और ऑक्सफैम जैसी विशाल अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के वित्तीय उल्लंघनों पर कार्रवाई की गई, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार को बदनाम करने की कोशिशें हुईं, लेकिन सरकार ने साफ कर दिया कि भारत की संप्रभुता और कानून से ऊपर कोई वैश्विक दबाव नहीं हो सकता.
इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए सरकार ने हाल ही में विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन लागू किए, जिसने इस पूरे सिस्टम को पूरी तरह री-डिजाइन कर दिया है. अब एनजीओ को एक्टिविटी और जियोग्राफी-स्पेसिफिक रजिस्ट्रेशन कराना होता है, यानी उन्हें यह साफ बताना होगा कि वे किस राज्य के किस जिले में और किस खास काम के लिए पैसा खर्च करेंगे. वे मनमर्जी से पैसा कहीं भी ट्रांसफर नहीं कर सकते. नए नियमों के अनुसार किसी भी भारतीय एनजीओ के मुख्य नीति-निर्धारक पदों पर विदेशी नागरिक नहीं बैठ सकते और यदि किसी एनजीओ का लाइसेंस रद्द या सस्पेंड होता है, तो विदेशी पैसे से बनाई गई उसकी सारी संपत्ति एक सरकारी अथॉरिटी के नियंत्रण में आ जाएगी. इसके अलावा, देश के सभी पंजीकृत एनजीओ को विदेशी फंड केवल भारतीय स्टेट बैंक, नई दिल्ली की मुख्य शाखा के एक विशेष खाते में ही प्राप्त करना होता है. सरकार ने प्रशासनिक खर्चों की सीमा को भी अधिकतम 20 प्रतिशत कर दिया है, ताकि 80 प्रतिशत पैसा सीधे ज़मीनी काम पर खर्च हो. साथ ही, अब कोई भी बड़ा एनजीओ विदेश से मिले फंड को किसी दूसरे छोटे स्थानीय एनजीओ को आगे ट्रांसफर नहीं कर सकता.
जब किसी गैर-सरकारी संगठन का एफसीआरए लाइसेंस किसी जांच के चलते सस्पेंड किया जाता है, तो उसके बैंक खाते में मौजूद विदेशी चंदे के इस्तेमाल पर तुरंत रोक लग जाती है. सस्पेंशन की अवधि के दौरान यदि संगठन को कोई ज़रूरी खर्च करना भी है, तो उसे पहले गृह मंत्रालय से लिखित मंजूरी लेनी होती है. सरकार आमतौर पर केवल बहुत ज़रूरी कार्यों, जैसे अनाथालय के बच्चों के खाने या अस्पताल के कर्मचारियों की सैलरी के लिए ही सीमित फंड रिलीज करने की अनुमति देती है. वहीं, यदि जांच में नियमों का गंभीर उल्लंघन या देश विरोधी गतिविधियों में शामिल होना साबित हो जाता है, तो लाइसेंस हमेशा के लिए रद्द कर दिया जाता है.
लाइसेंस रद्द होते ही बैंक खाता पूरी तरह सील हो जाता है और उसमें बचा हुआ पूरा विदेशी पैसा कानूनी रूप से सरकारी अथॉरिटी के नियंत्रण में जा चुका होता है. इसके अलावा, उस विदेशी पैसे से खरीदी गई ज़मीन, इमारतें या गाड़ियां भी स्थानीय जिला प्रशासन की कस्टडी में चली जाती हैं, जिसका उपयोग सरकार जनहित के किसी अन्य कार्य के लिए कर सकती है. एक बार लाइसेंस रद्द होने पर वह संगठन अगले 3 साल तक दोबारा आवेदन करने के योग्य नहीं रहता.
अक्सर यह कहा जाता है कि इन कड़े कानूनों से उन संगठनों को नुकसान हो रहा है जो जमीन पर अच्छा काम कर रहे हैं और इसे नागरिक समाज की आवाज को दबाने का प्रयास बताया जाता है। लेकिन यह सोचने वाली बात है कि क्या कोई भी संप्रभु राष्ट्र अपने देश के भीतर विदेशी पैसे से चलने वाली एक ऐसी फौज तैयार होने दे सकता है जो सीधे उसकी चुनी हुई सरकार को चुनौती दे? अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस और कनाडा जैसे देशों के अपने विदेशी प्रभाव वाले कड़े कानून इस बात के सबूत हैं कि कोई भी देश अपने घर में बाहरी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करता. जो संगठन पूरी तरह पारदर्शी हैं, जिनका बही-खाता साफ है और जिनका उद्देश्य वास्तव में समाज सेवा है, उन्हें सरकार को अपनी बैलेंस शीट दिखाने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए. आपत्ति केवल उन्हें है जिनकी फंडिंग के पीछे विदेशी साजिश छिपी हुई है. भारत अब पहले की तरह कमज़ोर नेतृत्व वाली सरकार के द्वारा नहीं चल रहा है। यह आज का मज़बूत भारत है जो स्वयं वैश्विक स्तर पर एक बड़ा दाता बनकर उभर रहा है. ऐसे में देश के भीतर सामाजिक कल्याण के कार्यों के लिए भारतीय कॉरपोरेट सेक्टर की सीएसआर फंडिंग और देश के नागरिकों का दान ही पर्याप्त है. विदेशी फंडिंग पर यह आक्रामक रुख किसी भी तरह से जनसेवा के ख़िलाफ़ नहीं है, बल्कि यह भारत की आंतरिक सुरक्षा और संप्रभुता की रक्षा का एक अनिवार्य कवच है.
